अंकुश 
        – संतोष दीक्षित
 साहेब सरकारी संत थे। एक सरकारी मठ के प्रधान थे।उन्हें खाने के बाद फल खाने की आदत थी। एक दोपहर पेट भर भोजन के बाद बरामदे की चौकी पर बैठे केला खा रहे थे। छिलका सामने जमीन पर फेंका ही था कि एक बकरी लपकती आ पहुंची और प्रसन्न भाव से नत सर किये छिलका चबाने लगी।उसे उदरस्थ कर लेने के बाद वह सर उठा संत का मुंह तकने लगी। उसकी आंखों में गहरी याचना का भाव था।संत की आंखों से नज़र मिलते ही उसने हल्की मिमियाहट से पहले तो धन्यवाद दिया,फिर एक तेज मिमियाहट के साथ  कुछ और की मांग दुहरा दी।संत को भी उसकी जर्जर काया और कातर वाणी ने दया माया से भर दिया। उन्हें एक और केला खाना पड़ा।फिर एक और।उधर बकरी के आस पास उसका पूरा कुनबा जमा हो गया।अब सब के सब अपनी समवेत मिमियाहट से संत की उदारता का गुणगान करने लगे थे।संत भी अति भावुकता में आकर रोने लगे थे।लेकिन केला कितना खा पाते? संयोग से आज रसोइये ने उनका प्रिय राजमा चावल बनाया था।मन भर भोजन के बाद उन्होंने मिष्टी दही के एक कुल्हड़ का भोग लगा रखा था। अब और केले खा पाना उनसे संभव न था। केले के कई घौद उनके भंडार में सुरक्षित थे। बाहर खड़ी बकरियां भी उदास थीं।संत साहेब के मन में भी कांटे उग आये थे। उनकी आंखों से झर झर आंसू बहने लगे थे। उनकी यह दशा देख  मुनीम ने आकर सलाह दी,लेकिन उन्होंने हाथ उठा मना करते हुये कहा,”नऽ…न..साबुत केले देने की जरुरत नहीं। इनका दिल दिमाग फिर जायेगा।  फिर छिलका जमा होगा ,फिर बांटा जायेगा। मठ की प्रजातान्त्रिक प्रकिया को भी तो जिन्दा रखना है न…कि नहीं ?वरना ट्रस्टियों को मुझे मठ से बाहर करते तनिक भी देर नहीं लगेगी   …!कितनी मुश्किल से यह चौकी नसीब हुई है,तुम क्या जानो…?” कहते कहते संत और भी उदास हो गये।
 उनके आंसू बहाते उदास मुख मंडल को देख भोली भाली  बकरियां और भी  उदास हो उठीं और में… में …करतीं खाने की खोज में तितर बितर हो गईं।

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