लघुकथा : सुरेखा कादियान ‘सृजना’

राधिका
”राधिका इतने साल से तुम्हें बुलाने की कोशिश कर रही हूँ, पर तुम हो कि मानती ही नहीं | ऐसी भी क्या जिद कि अपने दोस्तों की भी नहीं सुनती| इस बार कॉलेज के पुनर्मिलन समारोह में तुम्हें आना ही है, हम कोई भी बहाना नहीं सुनेंगें | और इस बार इतने साल बाद केशव भी आ रहा है, वो आजकल इंडिया आया हुआ है | सोनाली अपनी रौ में बोलती जा रही थी और राधिका के कानों में बस यही गूंजता रह गया कि केशव भी आ रहा है |
फोन रखने के बाद भी राधिका इसी कशमकश में थी कि जाए या नहीं| केशव जो कभी उसका सबसे अच्छा दोस्त था, जिस से राधिका मन ही मन बेइन्तहां प्यार करती थी, जिसकी एक झलक के लिए वो बरसों से तरस रही है, वो आ रहा है| उसे जाना चहिए|
पर क्या मैं उसको सामने देखकर खुद को संभाल पाऊंगीं” यही सवाल उसे उलझन में डाल रहा था| आखिरकार दिल ने दिमाग को हरा दिया और राधिका जयपुर समारोह के लिए जाने की तैयारी करने लगी|
उस शाम जब वो कॉलेज में पहुँची तो सब दोस्तों ने उसे घेर लिया पर उसकी नजरें किसी को तलाश रही थी| हल्की गुलाबी रंग की साड़ी और सिन्दूर भरी मांग में राधिका बहुत सुन्दर लग रही थी| तभी किसी ने पीछे से उसकी आँखें बंद कर दी और उन हाथों के अहसास को राधिका कैसे भूल सकती है? पल भर में ‘वो’ मुस्कुराता हुआ राधिका के सामने था| खुद को किसी तरह सहज कर उसने केशव का हालचाल पूछा| बहुत देर तक दोनों पुराने दोस्तों के साथ हँसी-मजाक व बातें करते रहे कि अचानक केशव राधिका का हाथ पकड़कर चल दिया|
अरे कहाँ ले चले इसको, सोनाली ने पूछा
तुम सब के साथ तो ये रहती ही है, पर मुझे इतने साल बाद मिली है, बहुत सी बातें करनी हैं इस से| कब से बुत सी बनी बैठी है, पहले तो इसकी बकर-बकर ही बंद नहीं होती थी| तुम सब बातें करो, हम आते हैं” केशव ये कहते हुए राधिका को लेकर उसी पेड़ के नीचे जा बैठा, जहाँ वो अक्सर बैठते थे|
बहुत देर तक बातें हुई, इतने साल में वक्त बेशक बीत गया था पर राधिका के लिए जैसे वहीं ठहर गया था|
अच्छा राधिका सबको तो तुम नहीं बताती पर यार मुझे तो बता दो कि तुम अपनी मांग में सिन्दूर क्यूँ लगाती हो? तुमने शादी तो की नहीं है, फिर??
मुझे अच्छा लगता है केशव बस… अपने कान्हा के नाम का सिन्दूर लगाना
पर कान्हा की दीवानी तो तुम कभी से रही हो, तब तो नहीं लगाती थी”
तुम सच में जानना चाहते हो?
हाँ बाबा
तुम्हें याद है कॉलेज का आखिरी दिन जब हम सब वृन्दावन गए थे और वहाँ गाइड एक पेड़ पर लगे राधा रानी के श्रंगार के सिन्दूर के बारे में बता रहा था कि उसको पति के हाथों पत्नी की मांग में भरना कितना शुभ होता है| सुनकर हम चलने लगे थे कि इतने में तुम चुटकी भर सिन्दूर लिए दौड़े आए और बोले कि अरे कान्हा की राधिका, मैं तो ठहरा नास्तिक पर तुम्हें तो ये लगाना चहिए| और तुमने उस सिन्दूर से मेरे माथे को सजा दिया और फिर चल पड़े| और मैंने यही मानकर संतोष कर लिया कि चलो तुमने न सही मेरे राधा-कृष्ण ने तो मेरे दिल की आवाज़ सुनकर उसमें अपने आशीर्वाद का रंग भर दिया| तुमने अनजाने में किया पर मुझे अपनी मंजिल मिल गई थी| वही इकतरफा रिश्ता माथे पे सजाए हूँ केशव|” इतना कहकर राधिका अंदर चल दी और केशव जड़ बना अपने और राधिका के नाम का अर्थ तलाशता रह गया……

 

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