पुस्तक समीक्षा :: शहंशाह आलम

आग की छाती पर पैर रखकर –  शहंशाह आलम रंजीता सिंह ‘फ़लक’ की कविताओं का संग्रह ‘प्रेम में पड़े रहना’ ऐसे वक़्त में छपकर आया है, जब दुनिया भर में स्त्रियों के लिए एक अलग तरह का माहौल बनाया जा रहा है। यह माहौल स्त्रियों के पक्ष में अब  भी पूरी  तरह  से  नहीं कहा जा सकता। ज़ाहिर है, जब दुनिया भर की स्त्रियां अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं ,तो चूँकि रंजीता सिंह ‘फ़लक’ ख़ुद एक स्त्री हैं, सो ऐसे किसी  भी  सामाजिक  आसमानता  के विरुद्ध इनकी मुट्ठियाँ…

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विशिष्ट कथाकार :: सिनीवाली शर्मा

 चलिए अब…. – सिनीवाली शर्मा परमानंद बाबू की पत्नी के देहांत होने के कुछ दिनों के बाद सभी इसी बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इनके आगे के दिनों का रहने-सहने और खाने-पीने का इंतजाम किस प्रकार किया जाए ताकि इनके बचे हुए दिन आराम से बीत सकें। सुलक्षणा और रामपुरवाली दोनों ही इनकी सेवा करने के लिए बहुत ही इच्छुक हैं। इनकी सेवा करके वे अपना जीवन धन्य करना चाहती हैं, ऐसी बात नहीं है। हां, इतना जरूर है कि इनकी सेवा से दोनों की आर्थिक हालत में…

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खास कलम :: ड़ा. अँजुम बाराबन्कवी

.1 जब चमकने लगा क़िस्मत का सितारा मेरा खुद बखुद बनने लगे लोग सहारा मेरा   आप को चाँद सितारों के सलाम आएंगे आप समझें तो किसी रोज़ इशारा मेरा   जानें किस किस की दुआएँ मेरे काम आई हैं वर्ना तक़दिर में लिख्खा था, ख़सारा मेरा   अब तो वह भी मेरे कपड़ो में शिकन ढुंढता है जिस ने पहना है कई साल उतारा मेरा   तुम भी गढ़ने लगे सैराबी के झूठे किस्से तिश्नगी पर तो अभी है इज़ारा  मेरा   कुछ नशा कम हो अमीरी का तो…

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  रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना : राजीव कुमार झा

रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना – राजीव कुमार झा रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक काल के भारतीय लेखकों में अग्रगण्य हैं. उन्होंने अपने काव्य लेखन और गद्य चिंतन से हिंदी लेखन को विशिष्ट धरातल प्रदान किया और कविता में यथार्थवादी प्रवृत्तियों के समन्वय से अपने समय और समाज के तमाम संकटों और सवालों को लेकर गहरे चिंतन  की ओर साहित्य को उन्मुख किया . दिनकर के काव्य में यथार्थ और कल्पना का अद्भुत समन्वय है . उनकी प्रारंभिक काव्य रचनाओं में युवाकाल के उमंग और उत्साह का…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: महेश अश्क

1 सुबह को मां ने कहा था चाय थोड़ी और दे शाम तक चौके में बर्तन झनझनाते रह गए   तब जो अपनापन था सूरज में, वो अब है ही नहीं तू किसी दिन धूप को,बाहों में भर के देख ले   भीड़ सब उनकी ही है,चाहे इधर चाहे उधर और तुम्हें लगता है,तुम करते हो सारे फैसले   आपका तो झूठ भी, कुछ इसकदर भारी पड़ा वाकई जो सच थे सब , किस्सा कहानी हो गए   जब तुम्हारे हाथ  कश्ती मौज तूफां कुछ नहीं फिर तो दरिया पर…

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विशिष्ट गीतकार :: डॉ मंजू लता श्रीवास्तव

(1) पतझर पर कोंपल संदेश लिख रहे माघ-अधर जीवन उपदेश लिख रहे डाल-डाल तरुवों पर सरगम के मधुर बोल आशा के पंथ नये मौसम ने दिये खोल समय फिर पटल पर ‘हैं शेष’ लिख रहे पीत हुए पत्रों से गबीत चुके कई माह समय संग जाग रहा खुशियों का फिर उछाह नये स्वप्न अभिनव परिवेश लिख रहे युग-युग परिवर्तन है पंथ अलग,अलग गैल नवविचार, नवदर्शन नयी क्रान्ति रही फैल डाल-डाल सुखद फिर प्रवेश लिख रहे   (2) सूरज का मुखड़ा उदास है निशा काँपती दिन निराश है अरुणाई पीहर जा…

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विशिष्ट कवयित्री :: रंजीता सिंह

  मन की स्लेट औरतों  के  दुःख बड़े  अशुभ  होते  हैं और  उनका  रोना बड़ा  ही  अपशकुन   दादी  शाम  को घर  के  आंगन  में लगी  मजलिस  में  , बैठी  तमाम  बुआ ,चाची ,दीदी ,भाभी और बाई  से  लेकर हजामिन तक  की पूरी  की  पूरी टोली  को  बताती औरतों  के  सुख और  दुख  का  इतिहास   समझाती  सबर  करना अपने  भाग्य  पर  .. विधि  का  लेखा  कौन  टाले जो  होता  है अच्छे  के  लिए  होता  है सुनी  थी उसने  अपने  मायके  में कभी भगवत  कथा थोड़ा  बहुत  पढ़ा रामायण  और …

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दलित चेतना के अग्रदूत डॉ. अम्बेदकर : डॉ पूनम सिंह

दलित चेतना के अग्रदूत डॉ० अम्बेदकर पूनम सिंह बाबा साहब अम्बेदकर अस्पृश्य मानी जाने वाली महार जाति में पैदा हुए थे । निम्न जाति में पैदा होने की मर्माहत पीड़ा को उन्होंने संवेदना के स्तर पर बहुत दूर तक महसूसा था इसलिए अस्पृश्य समाज की गुलामी को वे राष्ट्र की गुलामी से ज्यादा दर्दनाक समझते थे । उन्होंने अस्पृश्य समाज में अस्मिता का स्वाभिमान जगाने एवं अपने वजूद की पहचान कराने का व्रत लिया । उनका सम्पूर्ण जीवन रूढ़ियों से शोषित दलित मनुष्य के सामाजिक , आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान…

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