विशिष्ट कहानीकार   : राजेन्द्र श्रीवास्तव

कोरोना की चिट्ठी कर्मवीर के नाम                                – राजेन्द्र श्रीवास्तव प्यारे भाई कर्मवीर, कोहराम मचाने वाले कुटिल कोरोना का, दूर-से ही दुआ सलाम, राम राम। वैसे तो मेरा मन कर रहा था कि खुद ही आकर तुमसे दो बातें करूँ , लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम बीमार हो जाओ। मैं नहीं चाहता कि जाते-जाते एक कलंक और मेरे माथे मढ़ जाए, इसलिए मन मार कर यह चिट्ठी भेजी है। ध्यान रहे, पढ़ने-से पहले…

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विशिष्ट गीतकार : रंजन कुमार झा

रंजन कुमार झा (1) व्याधि तुझे तो आना ही था सँग कुदरत के इन मनुजों ने जो  निर्मम व्यवहार किया है भू, जंगल, पर्वत, नदियों पर जितना  अत्याचार किया है इस सबसे आहत हो उसको रौद्र रूप दिखलाना ही था व्याधि तुझे तो आना ही था धन वैभव मेरे हों वसुधा पर मेरा ही राज रहे बस हर मानव की चाह यही उसके ही सिर पर ताज रहे बस क्षत-विक्षत तब कायनात को एक कहर बरपाना ही था व्याधि तुझे तो आना ही था धर्म-ध्वजा पाखंडी के भी हाथों में…

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विशिष्ट गीतकार : मंजू लता श्रीवास्तव

धन्य ये प्राण हो गए हाट हुए हैं बंद घाट सुनसान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   था स्वतंत्र अब तक यह जीवन अपनी शर्तों पर ही चलता समय अचानक ऐसा बदला अब अनुशासन में ही पलता   एक अजाने भय से सब हलकान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   हाथ मिलाना बंद,कहीं भी आना जाना बंद हो गया रेलिंग,कुर्सी,गेट,आयरन छूने पर प्रतिबंध हो गया   जीवन शैली के निश्चित प्रतिमान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   बाहर…

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विशिष्ट गीतकार : शुभम् श्रीवास्तव ओम

काँपता है गाँव गाँव में कुछ लोग लौटे हैं शहर से! हैं वही परिचित वही अपने-सगे हैं पाँव छूकर फिर गले सबके लगे हैं रोज के निर्देश से कुछ बेखबर से! कौन जाने, कौन क्या- लाया कहाँ से सोचने का हर सिरा गुज़रा यहाँ से काँपता है गाँव, सहसा-एक डर से।   जैव-आयुध का निशाना हर तरफ हैं सिर्फ हत्यारी हवाएँ और मजबूरी है अपनी साँस लेना! भोर से लेकर अंधेरी रात तक बस चीखना-रोना सहमना-हाँफना है जीन में है आज तक परमाणु-हमला यह अपाहिज देह- अपनी जन्मना है जैव-आयुध…

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विशिष्ट कवि : ब्रज श्रीवास्तव

अणु एक अणु ने ओढ़ लिया है ज़हर वह अपनी काली शक्ति से मार डालना चाह रहा है बचपन वह उम्र को निगलने के लिए निकल पड़ा है   खबरों की दौड़ में वह सबसे बड़ी खबर बनते हुए नहीं संकोच कर रहा हत्यारा बन जाने में   क्या किसी मानव से ही सीख लिया है उसने अमानवीय हो जाना.   विषाणु एक विषाणु हमारी मुस्कराहट के फूल पर बैठ गया है   एक विषाणु हमारे पैरों के तलवे में कांटां बनकर घुस गया है एक विषाणु बैठ गया है…

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विशिष्ट गीतकार : राजेन्द्र वर्मा

1  पीठ पर माँ बेटा माँ को लाद पीठ पर चला गाँव को । देश बंद है, ख़त्म हुआ सब दाना पानी, दो रोटी देने में भी काँखे रजधानी,   रेल-बसें सब हक्का-बक्का खड़ी हुई हैं, अब तो चलते ही रहना, रुकना न पाँव को ।   सत्ता दुबकी-दुबकी बैठी चिन्तन करती, चोर-शाह का खेल खेलती, झोली भरती,   कोरोना सबकी छाती पर मूँग दल रहा, मात दे रहे मास्क-मुखौटे काँव-काँव को ।   कैसे भी, अब तो काले कोसों चलना है, रस्ते में ही सूरज को उगना-ढलना है,  …

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विशिष्ट ग़ज़लकार : के.पी.अनमोल

1 मौला मुझको घर जाना है माई रस्ता देखे है छत, पनियारा, ओसारा, अँगनाई रस्ता देखे है   पिछली बार कहा था बेटा इक दिन वीडियो कॉल तो कर शक्ल दिखा दे, आँखों की बीनाई रस्ता देखे है   भाई की आँखों में दिखती हैं अब कुछ-कुछ चिंताएँ उन आँखों में पापा की परछाई रस्ता देखे है   अबकि दफ़ा तो बड़की अम्मा ने भी ख़बर ली बेटे की यानी अब तो इस बेटे का ताई रस्ता देखे है   मेरे घर में बिलकुल मेरे जैसा एक भतीजा है इस…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : डी.एम. मिश्र

1 यूं अचानक हुक्म आया लाकडाउन हो गया यार से  मिल भी न पाया लाकडाउन हो गया बंद पिंजरे में किसी मजबूर पंछी की तरह दिल हमारा फड़फड़ाया लाकडाउन हो गया घर के बाहर है कोरोना, घर के भीतर भूख है मौत का कैसा ये साया लाकडाउन हो गया गांव से लेकर शहर तक हर सड़क वीरान है किसने ये दिन है दिखाया लाकडाउन हो गया किसकी ये शैतानी माया, किसने ये साजिश रची किसने है ये जुल्म ढाया लाकडाउन हो गया ज्यों सुना टीवी पे कोरोना से फिर इतने…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : अनिरुद्ध सिन्हा

उदास-  उदास  सफ़र  था  उदास  रस्ता भी उदास लगता था मुझको ख़ुद अपना साया भी   हमारी  रात  उजालों  से  कब  हुई  रौशन बना  के  चाँद  उसे  आइना  में देखा  भी   ज़मीं ही  सहरा में तब्दील हो न जाए कहीं वो धूप  है कि  उबलने  लगा है दरिया भी   वो अपने ख़त से भी अंजान था मैं क्या करता तो  उसका  नाम  दिखा कर  उसे पढ़ाया भी   उसे समझना  भी आसान  कुछ नहीं था,और बदल-बदल के वो मिलता था अपना चेहरा भी ……………………………………………………….. परिचय :ग़ज़लकार की कई…

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