अभी ख़ून से शेर लिखने हैं हमको— डॉ. उर्मिलेश :: वशिष्ठ अनूप

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अभी ख़ून से शेर लिखने हैं हमको— डॉ. उर्मिलेश

  • वशिष्ठ अनूप

 

परिंदों में कोई फ़िरकापरस्ती क्यों नहीं होती,

कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्ज़िद पे जा बैठे।

तीर था, ऑंख थी, निशाना था,

सबकी ज़द में हमीं को आना था।

अगर तू ही चुप हो गया इस सदी में,

हमें रोज़ ऑंसू बहाने पड़ेंगे।

अभी ख़ून से शेर लिखने हैं तुमको,

क़लम हड्डियों के बनाने पड़ेंगे।

वो जो अपने वक़्त को आवाज दे सकती नहीं,

शायरो ! तुम ही कहो वो शायरी किस काम की।

रक्तपिसासु मनुष्य की सांप्रदायिक और जातिवादी मानसिकता पर करारा प्रहार करने वाले, सब का शिकार होने वाले, आम आदमी के साथ अपनी प्रतिबद्धता घोषित करने वाले और कलाकारों को उनके कर्तव्य का बोध कराने वाले ये शानदार शेर हिंदी ग़ज़ल के श्रेष्ठ कवि डॉ. उर्मिलेश के हैं। उर्मिलेश जी दुष्यंत कुमार के बाद के ग़ज़लकारों में कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। आरंभ में उनकी ग़ज़लों के कथ्य और शिल्प पर बलवीर सिंह रंग का रंग दिखाई पड़ा था लेकिन वह शीघ्र ही उससे बाहर निकलकर ठोस और तप्त ज़मीन पर आ खड़े हुए। उनकी कल्पना ने भी पर फैलाये और पैरों ने भी हर प्रकार की जमीन को नापा। उनकी सोच का दायरा लगातार व्यापक होता गया और उसमें आम आदमी का दुख-दर्द ,राजनीतिक साजिशें, व्यवस्था की तानाशाही, मानव मूल्य, प्रकृति और मनुष्य का सौंदर्य आदि शामिल होते गए। उनकी गजलों में मनुष्य की जिजीविषा और अपराजेयता की बेहतरीन अभिव्यक्ति हुई है। जो हमारे निर्माण का समय था उस वक्त उर्मिलेश जी की ग़ज़लें और उनके गीत चर्चित होने लगे थे।वह मंच के भी सिद्ध कवि थे इसलिए उन्हें कई बार सुनने का सुयोग बना। वह हिंदी के योग्य शिक्षक थे।

डॉ उर्मिलेश ने अपने को कई विधाओं में व्यक्त किया। धुआं चीरते हुए, फैसला वो भी ग़लत था, धूप निकलेगी, आईने आह भरते हैं, डॉक्टर उर्मिलेश की ग़ज़लों में उनकी ग़ज़लें संकलित हैं। स्रोत नहीं बहती है, चिरंजीवी है हम, बाढ़ में डूबी नदी, जागरण की देहरी पर, बिम्ब कुछ उभरते हैं उनके गीत संग्रह है। उन्होंने दोहे, कविताएं और मुक्तक भी लिखे हैं। साहित्य और समालोचना की सरल आयाम, नया सप्तक: व्याख्या और विवेचन के नए आयाम तथा गीति सप्तक: पहचान और परख उनकी समीक्षा कृतियां हैं। उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन भी किया था। उर्मिलेश जी एक सुलझे हुए समालोचक थे और बहुत सारे विषयों पर उनकी समझ बिल्कुल साफ थी। हिंदी ग़ज़ल के विषय में भी उनका स्टैंड एकदम स्पष्ट था। इस विषय पर उन्होंने कई आलेख लिखे थे।  हिंदी ग़ज़ल के विषय में उनका कहना है कि-“हिंदी ग़ज़ल वह है जो हिंदी जाति से संबंद्ध कवियों द्वारा हिंदी भाषा में कहीं और देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।… जो उर्दू में प्रयुक्त क्रियाओं, फ़ारसी के पैटर्न पर बनाए गए बहुवचनों, फ़ारसी के ढंग पर विशेषण की तरह प्रयुक्त होने वाले क्रिया रूपों, फ़ारसी शैली में समासों और संधियों ओं से बचती है।… जो हिंदी जाति से गृहीत पौराणिक तथा सांस्कृतिक प्रयोगों के साथ खिलवाड़ न करें।…जो ग़ज़ल के परंपरा-नुमोदित शिल्प, यथा- मतला, मक़्ता, शेर, रदीफ़, क़ाफिया तथा बहरों की बाध्यता को स्वीकारते हुए हिंदी की मूल प्रकृति को क्षरित नहीं होने देती।… हिंदी में नुक़्ते वाले शब्द हमें नुक़्ता लगाकर प्रयुक्त करने चाहिए। वरना ‘जलील’ ‘ज़लील’ और ‘राज़’ को ‘राज’ लिखने से भारी उलट-पुलट हो जाएगी। यहां हिंदी की सीमाएं पहचानते हुए हमें ऐसे प्रयोगों की अधिकता से बचना चाहिए।… हिंदी ग़ज़ल वह है जिसमें हिंदी, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी के वे सभी सरल शब्द प्रयुक्त होते हैं जो दैनिक जीवन के अंग बन चुके हैं।…”( हिंदी ग़ज़ल: हिंदी जाति और संस्कृति की ग़ज़ल, हिंदी ग़ज़ल और डॉ. उर्मिलेश, सं. सोनरूपा विशाल, अन्य बुक प्रकाशन, 2021, पृ. 38-39)

डॉ. उर्मिलेश बहुअधीत और अनुभव संपन्न रचनाकार थे। उनका अनुभव उनकी ग़ज़लों में बोलता है। उन्होंने अपने समय की अनेक विसंगतियों और विडंबनाओं को बहुत निकट से देखा था और उनके दुष्परिणामों का भी अनुभव किया था। बाज़ार के इस चरम वर्चस्व के समय में हमारे जीवन-मूल्य जिस तेजी से क्षरित हो रहे हैं तथा प्रेम जैसे पावन भाव भी बाजार के भाव से तय होने लगे हैं। इस उत्तर आधुनिक बाज़ार में जिस्म से रूह तक सब बिक रहा है-

ये ख़बर भी छापियेगा आज के अख़बार में,

रूह भी बिकने लगी है जिस्म के बाज़ार में।

वो तड़प, वो चिट्ठियां, वो याद, वो बेचैनियां,

सब पुराने बाट हैं अब प्यार के व्यापार में।

देखकर बच्चों का फैशन वो भी नंगा हो गया,

ये इजाफ़ा भी हुआ इस दौर की रफ्तार में।

समय ऐसा बदला है कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ सिर्फ शब्दों तक ही सिमट गया है। लोग अब दूसरे के सुख से दुखी और उनके दुख से ख़ुश होने लगे हैं-

हमारे दुख से सुख उनको, हमारे सुख से दुख उनको,

सही माने में अपनों का यही व्यवहार होता है।

सरकारी कार्यालयों, न्यायालयों, शिक्षा के मंदिरों, थानों, तहसीलों में सर्वत्र उम्मीद लेकर जाने वाले आमजन के साथ सरेआम लूट हो रही है। हर प्रकार का दुर्व्यवहार और प्रताड़ना अलग से झेलनी होती है। इन विकृतियों पर उर्मिलेश जी के ये शेर बहुत सुंदर बन पड़े हैं-

जो ग़रीबों की बात भी सुन लें,

ऐसे दफ़्तर कहीं नहीं मिलते।

जेब पर हाथ रखकर निकल,

देख तहसील है सामने।

न्यायालयों में झूठ, फ़रेब और अन्याय को प्रतिष्ठित होते देखकर उन्होंने बहुत वाजिब प्रश्न उठाया है-

सच तो ये है कि यहां सच का कोई मोल नहीं,

मुंसिफ़ो, हाथ पे रखी ये गीता क्यों है?

एक प्रतिभाशाली कवि संवेदनशील तो होता ही है, उनमें परकाया प्रवेश की भी क्षमता होती है। वह दुखी व्यक्ति की तकलीफ को समझता और महसूस कर सकता है। उर्मिलेश जी में यह क्षमता तो थी ही,  उनकी पक्षधरता भी ग़रीब और वंचित समाज के साथ थी। अपनी ग़ज़लों में वह मेहनतकश वर्ग की  पीड़ा को पूरी ताकत के साथ व्यक्त करते हैं-

जिसको तुम कोलतार कहते हो,

जलते मजदूर का लहू है वो।

मेरे ख़्वाबों का हाल-चाल न पूछ,

फ़ाइलों में कहीं पड़े होंगे।

यह मेहनतकश वर्ग सिर्फ़ मेहनत करने के पश्चात भूख और ऑंसू ही नहीं पाता, कई बार शोषक वर्ग की अति महात्वाकांक्षाओं  का भी शिकार होता है। ये शेर देखें-

हाथ काटे जो गये ताजमहल के पीछे,

ढूंढना उनको कभी मेरी ग़ज़ल के पीछे।

हमेशा से ग़रीबों का शोषण करती आ रही शक्तियों की कोशिश होती है कि ग़रीबों के बच्चे पढ़-लिखकर अपने अधिकारों को न जाने और संगठित न हों। इसलिए उन्हें जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर लड़ाती और अलग-थलग रखती आ रही हैं-

ग़रीबों के ये बच्चे हैं बड़े ज़ाहिल बनेंगे ये,

अगर कुछ पढ़ गये तो आपके क़ाबिल बनेंगे ये।

इन्हें महज़ब में, कौमों में हमेशा बाॅंंटकर रखना,

इकट्ठे हो गये तो आप के क़ातिल बनेंगे ये।

उर्मिलेश जी को भारतीय राजनीति की अच्छी समझ थी। वह देख रहे थे कि राजनीति अपने उच्च आदर्शो से लगातार दूर होती गई है। राजनीति समाज और देश-सेवा से भटककर स्वार्थ केंद्रित होती गई है। शिक्षित और चरित्रवान व्यक्तियों  की जगह आजकल गुंडों और अपराधियों ने ले ली है। ये सभी धृतराष्ट्र की तरह पुत्र और परिवार मोह से ग्रस्त हैं। इस विषय पर उनके कुछ शेर देखें-

जिसको कहते हैं जम्हूरियत,

आजकल गुंडई हो गई है।

मान लो मुल्क के सब लोग अगर पढ़ जायें,

कैसे फिर चोर-लुटेरे यहां लीडर होंगे।

एक धृतराष्ट्र हो तो सह लेते,

सबकी ऑंखों पे पट्टियां हैं अब।

सांप्रदायिकता एक ऐसा खतरनाक भाव है जिसने समाज का हमेशा अहित किया है। अंग्रेजों ने इसी का लाभ उठाकर हमारे देश को बांटा और इस पर राज किया। आजादी के बाद भी सत्ता के लिए राजनीतिक पार्टियों ने इस प्रवृत्ति को ज़िन्दा रखा। इन दिनों हिजाब को लेकर पक्ष-विपक्ष में प्रदर्शन इसी प्रवृत्ति का नया रूप है। मंदिर-मस्ज़िद और जातिगत वैमनस्व के कारण आम आदमी के बीच नफ़रत फैलाकर उन्हें लड़ाना और वोटों का ध्रुवीकरण करना इसी मानसिकता का घोतक है। उर्मिलेश जी की ग़ज़लों में भी इस प्रवृत्ति को विस्तार से देखा जा सकता है-

उसने मंदिर तोड़ डाला, तूने मस्ज़िद तोड़ दी,

ज़लज़ला वो भी ग़लत था, ज़लज़ला ये भी ग़लत।

बाॅंटकर जिस्मों को अब वो बांटने निकले हैं दिल,

फैसला वो भी गलत था, फैसला ये भी गलत।

नजरें धुआं-धुआं हैं, नज़ारें धुआं-धुआं,

मैं पूछता हूॅं दिन में यहां रात किसने की ?

वह किसी उदार हृदय व्यक्ति की भाॅंति यह मानते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि धर्मावलम्बी और विभिन्न जातियों, क्षेत्रों, भाषाओं, संस्कृतियों से संबंधित लोग मिलकर भारतीयता का निर्माण करते हैं। ये सभी भारतीय सांस्कृतिक माला के रंग-बिरंगे मनके हैं-

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, इन्हें बांटकर मत देखो,

ये सब महज़ब की माला के रंग-बिरंगे दाने हैं।

इसलिए उनकी कामना है कि-

कोई मंदिर, कोई मस्जिद, कोई गुरुद्वारा न हो,

मेरे ईश्वर, तेरे घर का कोई बॅंटवारा न हो।

सियासी साजिशों को समझते हुए वह ऐसी हर नकारात्मक प्रवृत्ति का विरोध करते हैं और जनता को एकजुट होकर वह इन अंधेरी ताकतों को दूर भगाने का आह्वान करते हैं-

दीपक जलाइये या मशालें चलाइये,

जैसे भी हो इस घर से अंधेरे भगाइये।

बाहर के दुश्मनों से न भीतर के ठगों से,

इस घर को दोस्तों की नज़र से बचाये।

कोई भी कवि जब सहज ढंग से पहली बार लेखनी उठाता है, तो उसकी लेखनी रूप का ही अभिनंदन करती है। किसी रूप का, किसी हृदय पर कब जादू चल जाए कहना कठिन है। युवा मन में कभी भी गुपचुप कोई रूप का चंद्रमा उतर जाता है। मन के तारों पर कोई अंजाना-सा, बहुत प्यारा-सा राग अचानक बज उठता है। उर्मिलेश की ग़ज़लें बताती हैं कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था।  किसी रूप-राशि को देखकर उनका मन भाव विभोर होकर कह उठा था-

रूप उनका वसंत हो जैसे, गंधमय दिग्दिगन्त हो जैसे।

पलकें उठती हैं और गिरती हैं, सृष्टि का आदि-अंत हो जैसे।

ये नयन, भौंहें और तिरछी नज़र, ओम् आकृति हलन्त हो जैसे।

और फिर यह भी कहा कि-

फूल, झरने, आईने जब हमको भरमाने लगे,

हम ग़ज़लों में सीधे-सीधे तुमसे बतियाने लगे।

डॉ. उर्मिलेश ने लिखा है कि उन्होंने पहली ग़ज़ल सन् 1971 में हिंदी के प्रथम ग़ज़लकार स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग की ग़ज़ल ‘सूनी-सूनी है होली तुम्हारे बिना, जिंदगी है ठिठोली तुम्हारे बिना’ से प्रभावित होकर लिखी थी। हिंदी के तत्सम शब्दों में लिखी गई उनकी वह ग़ज़ल भी बहुत प्यारी है-

सुना-सुना है सावन तुम्हारे बिना, अब न लगता कहीं मन तुम्हारे बिना।

मंदिरों में गया तो यह स्वर सुना, व्यर्थ जाएगा पूजन तुम्हारे बिना।

उनकी प्रेम की आरंभिक ग़ज़लों में एक नैसर्गिक आकर्षण, पावन दृष्टि और सहजता का सौंदर्य है। उनमें दिखावे का चित्रण नहीं, मन का समर्पण है। इसलिए वे शेर बहुत डूबकर लिखे गए हैं-

हर नयन से हैं न्यारे तुम्हारे नयन, कैसे हैं प्यारे-प्यारे तुम्हारे नयन।

जैसे कश्मीरी डल के सजल वक्ष पर, दो सजीले शिकारे तुम्हारे नयन।

हर निशा आपके बिन अमा-सी लगे, आज जब साथ हों पूर्णमासी लगे।

जाने क्या बात है आप के रुप में, आधुनिक दृष्टि भी आदिवासी लगे।

उर्मिलेश जी की ग़ज़लों में प्रेम की नोक-झोंक, परिस्थितियां, मन:स्थितियां, शिकवे-गिले और उनके समग्र प्रभाव का बहुत मनोरम वर्णन हुआ है-

उनसे शिकवे-गिले रह गए, यानी कुल सिलसिले रह गए।

उनसे कहना तो चाहा बहुत, होंठ लेकिन सिले रह गए। उनसे हर बार मिलकर लगा, कहीं बिना मिले रह गए।

आज मायूस वो क्या दिखे, फुल तक अधखिले रह गए।

उर्मिलेश जी मंचों से भी खूब जुड़े रहे, इसलिए मंच की विकृतियों को भी ठीक से जानते थे। अति महात्वाकांक्षा और चमक-दमक-पैसे के आकर्षण में पड़ी तमाम कवयित्रियों को क्या-क्या गॅंवाना पड़ता है, इसका भयावह रूप मधुमिता शुक्ला के रूप में सामने आया था। ऐसी कवयित्रीयों को सचेत करती हुई उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर स्मरणीय हैं-

जिन्स, स्कर्ट और मोबाइल, कोई बिग बॉस उनको ले डूबा।

मंच पर जितनी मधुमिताऍं हैं, सब का परिहास उसको ले डूबा।

मधुमिता, मंच, मान -मादकता, ये ही अनुप्रास उसको ले डूबा।

उर्मिलेश जी ने ग़ज़ल की दुनिया के लिए बहुत सारे अपरिचित और अप्रचलित विषयों पर भी अच्छे शेर लिखे हैं। उन्होंने बेरोजगारी की समस्या, घर का महत्व, मां, पिता, बच्चे, पत्नी, वृद्धावस्था का दर्द, अमीर और ग़रीब का फर्क, ईश्वरीय प्रेम, सपना, कोशिश, परिवर्तन की आकांक्षा, प्रतिरोधी चेतना, आदि से संबंधित बेहतरीन ग़ज़लें लिखी हैं। उन्हें ग़ज़ल के अनुशासनों का अच्छा ज्ञान था, इसलिए उनकी ग़ज़लों का छंद चुस्त-दुरुस्त है। ज़्यादातर जगहों पर उनकी भाषा भी सहज और प्रभावपूर्ण है। उनकी ग़ज़लें हिंदी के नये ग़ज़लकारों के लिए आदर्श हैं।

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परिचय : वशिष्ठ अनूप वरीय कवि-लेखक हैं. इनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.

संप्रति – प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

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