आजादी का गुमनाम मसीहा गया प्रसाद सिंह :: अविनाश भारती

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आजादी का गुमनाम मसीहा गया प्रसाद सिंह
                                          – अविनाश भारती

15 अगस्त 1947 को दुनियां चाहे जिस रूप में देखती हो; लेकिन यह दिन हम समस्त भारत वासियों के लिए गौरव का दिन है। यह हम सबों का दिन है। तभी तो यह दिन हमारे लिए काफी खास है। इस दिन को खास बनाने वालों का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। उनके बलिदान और त्याग की गाथाओं को यथावत संजोया गया है लेकिन आजादी के कई मतवाले ऐसे भी थे, जिनका शौर्य इतिहास के पन्नों से ओझल रहा । खैर, इतिहास के पन्नों में जगह भले ही न मिली हो लेकिन ऐसे योद्धा आज भी लोगों के दिलों में राज़ करते हैं। बात आजादी से पहले की है। सन 1919 में जन्मे गया प्रसाद सिंह जो मूलतः बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत साहेबगंज प्रखंड के नया टोला गांव के निवासी थे। दादी और नानी अक्सर कहा करती थी कि वैसी कद-काठी और चमकदार चेहरे का आदमी हमने नहीं देखा। उस वक्त गया प्रसाद सिंह का घोड़े पर राइफल लेकर चलना अंग्रेजों को ठेंगा दिखाने जैसा था। पूरे प्रखंड में अंग्रेजों के अलावे किसी के पास मोटरसाइकिल थी तो वह गया प्रसाद सिंह के पास ही थी। उनके पुत्र अचिंत प्रसाद सिंह का कहना है कि उनकी बस्ती में ज्यादातर लोग निचली जाति से आते थे। तब जातिगत छुआछूत जैसी समस्याएं अपने चरम पर थी। उस वक्त भी उच्च जाति में जन्मे गया प्रसाद सिंह का एक वक्त का भोजन बस्ती के ही किसी घर में होता था।

गया प्रसाद सिंह के पिता का नाम हनुमान प्रसाद सिंह था, जो खुद एक स्वतंत्रता सेनानी होने साथ-साथ कांग्रेस के समर्पित नेता भी थे। गांधीजी के बताए मार्ग पर चलना ही ये अपनी नियति मानते थे, अहिंसात्मक रूप से नरम दल के देश प्रेमियों द्वारा जो आजादी की मशाल जलाई गई थी उस मशाल को हनुमान प्रसाद सिंह अपने क्षेत्रों में आगे ले जाने का काम कर रहे थे, लेकिन ठीक इसके विपरीत उनके पुत्र गया प्रसाद सिंह आजादी की लड़ाई में गरम दल के शीर्ष क्रांतिकारियों का साथ दे रहे थे। और इतना ही नहीं कई जगहों पर आजादी की रणनीति को लेकर नरम दल के सहयोगियों और अपने पिता से असंतुष्ट भी थे। आइए, गया सिंह की हकीकत को बिंदुवार जानते हैं-

थाना कांड
बात आजादी के चंद महीने पहले की है जब अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई काफी मजबूत होते जा रही थी और ऐसा लग रहा था कि हर आने वाली सुबह मानों आजादी की नई किरण अपने साथ लेकर ही आएगी। इस लड़ाई की चिंगारी समूचे भारतवर्ष में धधक रही थी, जिससे साहेबगंज भी अछूता न रहा। गया सिंह के नेतृत्व में युवाओं की टोली ने सन 1946 में ही स्थानीय थाने में राष्ट्र ध्वज को फहराने की हिमाकत कर दी। इस बाबत अंग्रेजी पुलिस के द्वारा रोकने पर गया सिंह और उनकी टोली ने तत्कालीन अंग्रेजी अफसर पर लाठियां बरसाना शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि गया सिंह समेत कई लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसमें कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद गया सिंह को पुलिस पकड़ नहीं सकी। इस संदर्भ में आज भी गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जब पुलिस उनके घर पर गिरफ्तारी के लिए पूरी तैयारी के साथ गई थी उस समय भी गया सिंह चकमा देकर भागने में सफल हुए। वास्तव में हुआ यह था कि घर के बाहर कुछ महिलाएं अनाज पाट रही थी। किसी ने अंदर जाकर गया सिंह को बताया कि बाहर पुलिस खड़ी है तब गया सिंह ने घर में पड़ी एक साड़ी पहनी और सिर पर घास की गठरी के साथ एक बकरी को लेकर पुलिस के बगल से ही घूंघट कर के निकल गए और पुलिस देखती रह गई।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मित्रता
पुलिस की नज़रों में लगातार आने के बाद गया सिंह कई दिनों तक भूमिगत हो गएं लेकिन आज़ादी की ललक को कतई कम नहीं होने दिया। इसी क्रम में इनकी मुलाक़ात कलकत्ते में पहली बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई और यह सिलसिला नेपाल में जा कर और प्रौढ़ हो गया। नेपाल में इन्हें कई दिनों तक नेताजी के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। नेताजी और गया सिंह दोनों पर अंग्रेजों की नज़र थी। इन सबके बावजूद जान की परवाह किए बिना दोनों ने आजादी की लड़ाई को थमने नहीं दिया। इसी क्रम में दोनों क्रांतिकारियों ने कुछ अन्य मित्रों के साथ अपनी पहचान बदलकर दरभंगा नरेश के दरबार में प्रवेश किया। कहा जाता था कि दरभंगा नरेश अंग्रेजों के हिमायती थे। अतः क्रांतिकारियों के छिपने के लिए इससे अच्छी जगह और नहीं होती। वहां पर कई दिनों तक दोनों छद्मवेश में रहकर सैनिकों को तलवारबाजी के गुर सिखाते रहें। माहौल कुछ शांत हो जाने के बाद पुनः दोनों ने नेपाल का रुख कर लिया। इसके बाद गया सिंह नेताजी के आदेश पर बिहार लौट आएं और आजादी की लड़ाई को गति देने में अंत तक लगे रहें।

पिता से वैचारिक मतभेद
गया सिंह के पिता श्री हनुमान प्रसाद सिंह गांधी के विचारों को जीवन का मूल मंत्र मानते थे। अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए आजादी को प्राप्त करना उनके जीवन का मुख्य ध्येय था। वह कांग्रेस की विचारधारा से भी इत्तेफाक रखते थे और खुद भी एक कांग्रेसी नेता थे। जबकि ठीक इसके विपरीत उनके पुत्र उग्र स्वभाव के थे। गया सिंह अंग्रेजों के प्रति अहिंसात्मक रवैये को बुजदिली मानते थे। उनका मानना था कि इतने लंबे वर्षों के अनुनय विनय के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत ने हमारा शोषण करना नहीं छोड़ा, वो अब क्या छोड़ेंगे!!
जहां एक ही छत के नीचे दो अलग- अलग विचारधारा के अनुकर्ता का वास हो वहां आपसी टकराहट और गर्माहट लाज़मी है। एक पिता-पुत्र के रिश्ते की मर्यादा को दोनों ने बनाए रखा किंतु कर्म और स्वभाव के लिहाज़ से दोनों के रास्ते हमेशा से ही अलग रहे। जहां वृद्धावस्था में भी हनुमान प्रसाद सिंह अपनी पथराई आंखों से आजादी की प्रतीक्षा करते रहें और यथासंभव साहेबगंज की नरम दल की टोली का मार्गदर्शन करते रहें, वहीं दूसरी ओर गया सिंह अपने और अपने गरम दल के साथियों के मिजाज़ को कभी ठंडा नहीं पड़ने दिया।

होली कांड
15 अगस्त सन 1947 को आखिरकार आजादी मिली। अपने देश में अपनी सरकार बनी किंतु इन सबके बावजूद यह कटु सत्य है कि आम-अवाम की जिंदगी में बहुत फर्क नहीं दिखा। हमारा प्रशासन और हमारे अधिकारी एक तरह से अंग्रेजों के बनाए रास्ते पर ही चल रहे थे। इसका जीता जागता उदाहरण सन 1955 के होली के दोपहर में देखने को मिला। सादे लिबास में स्थानीय थाना प्रभारी बाजार की गलियों से गुजर रहे थे। उसी वक्त किसी छोटे बच्चे ने अधिकारी पर रंग फेंक दिए। उसके बाद स्वतंत्र भारत के तथाकथित भारतीय थाना प्रभारी ने अंग्रेजों जैसा विकराल रूप अख्तियार कर लिया और बच्चे को बड़ी ही बेरहमी से पीटने लगा। थोड़ी ही देर में भीड़ इकट्ठी हो गई। जैसे ही यह बात गया सिंह के कानों तक पहुंची वे बिना विलंब किए घटनास्थल पर पहुंच गएं। गया सिंह और थाना प्रभारी के बीच हाथापाई की नौबत आ गई। मामला काफी गर्म हो गया। गया सिंह का पद पाकर स्थानीय लोगों ने अधिकारी की जमकर पिटाई कर दी। यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि यह लड़ाई सामाजिक ना होकर अब गया सिंह की व्यक्तिगत लड़ाई बन गई। स्थानीय प्रशासन अपने तमाम जरूरी कामों को छोड़कर गया सिंह को पकड़ने के लिए कई तरह के अमानवीय हथकंडे अपना रही थी लेकिन लाख कोशिशों के बाद पुलिस अपने मंसूबों में सफल नहीं हो सकी। लोगों ने अपने चहेते और दुलारे गया सिंह का बाल भी बांका नहीं होने दिया। उस दिन झूठ पर सच की जीत हुई थी। उस दिन यह एहसास हुआ कि वाकई देश में लोकतंत्र है।

चुनाव ही नहीं, जनमानस के विजेता
राजतंत्र और ज़मींदारी प्रथा के खात्मे के बाद नए भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में समस्त जनमानस ने अपनी सहमति प्रकट की और सहर्ष स्वीकार किया। गया सिंह की लोकप्रियता और कर्तव्यनिष्ठा ने उन्हें अपने पंचायत का आजीवन मुखिया बनाए रखा। वे जब तक जीवित रहे, उन्हें किसी प्रत्याशी से हार नहीं मिली। इस दौरान उन्होंने अपने पंचायत और अपने समाज के लोगों की भरपूर सेवा की। सन 1962 में पूरा क्षेत्र अकाल की चपेट में आ गया, तब तत्कालीन मुखिया गया सिंह ने ही अपने लोगों को संभाला। लोग आज भी मिसाल देते हुए नहीं थकते कि “मुखिया हो तो गया सिंह जैसा”। उस मुश्किल दौर में भी गया सिंह ने एक बार भी अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा। घर में जो भी बचा- खुचा अनाज था, उसे भी जनता की सेवा में लगा दिया। हालात फिर भी नहीं सुधरे, तब अंततोगत्वा साहेबगंज प्रखंड कार्यालय के प्रांगण में आमरण अनशन का शंखनाद कर दिया। इन सब के बावजूद भी सरकार की नजर यहां की दुर्दशा पर नहीं पड़ी तो लोगों ने 8 दिन से भूखे निढाल पड़े गया सिंह को सूती कपड़े के सहारे जूस पिलाया। सरकार की उदासीनता से जनता और भी आक्रोशित हो गई। पूरे साहेबगंज प्रखंड में लोगों की प्रतिक्रिया हिंसक होने लगी, तब कहीं जाकर 22वे दिन सरकार की ओर से मदत मिली।

आज जिस तरीके से कोविड-19 ने लोगों के जनजीवन को खासा प्रभावित किया है। कुछ इसी तरीके से ही कभी हमारा मुल्क हैजे की चपेट में आया था। न जाने कितने लोगों ने अपनों को खोया, न जाने कितने घर बर्बाद हुए हैं। इन सब का अनुमान लगा पाना काफी मुश्किल था। सबको अपनी जान की फिक्र थी। जिनके पास संसाधन था वह घरों में दुबक कर बैठे थे और जिनके पास संसाधन नहीं थे वे घर से बाहर निकलने को विवश थे। इस स्थिति में गया सिंह ने यह तय किया कि सभी अपने घरों में रहेंगे और जो भी खाने -पीने के सामान हैं उन्हें उन तक पहुंचा दिया जाएगा। गया सिंह ने निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा की। घर-घर जाकर सबकी देख-रेख की। कहा जाता है कि जिस घर के सभी सदस्य बीमार थे, वहां खुद गया सिंह ने उनका मल-मूत्र तक साफ किया था, उनके कफ़ को अपनी हथेलियों पर लेकर बाहर फेंका था।

सरकार की नीतियों का विरोध
आजादी के बाद अपनी सरकार बनी,लेकिन यह भी सही है कि सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतर सकी। ‘अंधा युग’ में धर्मवीर भारती ने लिखा भी है कि – “कुर्सी पर बैठने वाले लोग बदले, उनके काम करने का तरीका नहीं बदला।पहले उस कुर्सी पर गोरे बैठते थे,अंतर बस इतना ही है कि आज काले बैठे हैं।“ उम्मीदों के टूटने से लोगों में मोह भंग की स्थिति पैदा हो गई। गया सिंह ने भी कई मंचों से सरकार की नीतियों का पुरजोर विरोध किया। चुनाव जीतने के बाद भी वह कांग्रेस के कट्टर विरोधी ही बने रहे। गौरतलब है कि उनके पिता खुद एक सक्रिय कांग्रेसी नेता थे। एक ही छत के नीचे दो अलग विचारधारा के लोगों का वास करना और सामंजस्य बनाए रखना काफी मुश्किल था। रिश्तों की मर्यादा और राष्ट्र धर्म में गया सिंह ने सदैव राष्ट्र धर्म को ही चुना। पिता से वैचारिक मतभेद के बावजूद भी अपने बेटे होने का फर्ज भी बखूबी अदा किया। लोग आज भी कहते हैं कि गया सिंह ने अपने सिद्धांतों से कभी भी समझौता नहीं किया, अगर किया होता तो वे भी विधायक या सांसद आसानी से बन जाते, लेकिन उन्होंने सदैव गलत को गलत और सही को सही कहना ही अपना धर्म समझा।

देहावसान
यह सच है कि आज जो बीमारी हमें छोटी लगती है, दवा व इलाज की खोज से पहले वही बीमारी लाइलाज भी लगती है। कैसे एक छोटी-सी बीमारी बड़े से बड़े व्यक्तित्व को खा जाती है। गया सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ 46 वर्ष की अल्पायु में ही टिटनेस की वजह से गरीबों का मसीहा इस दुनियां को अलविदा कह गया। इस बात से ही इनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। जब गया सिंह की मृत्यु हुई थी तब श्मशान घाट में हजारों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी और ताज्जुब की बात तो यह है की शमशान में सिर्फ पुरुष ही नहीं थे, सामाजिक बंधनों को तोड़कर कर महिलाएं भी शमशान घाट तक पहुंच गई थी। इससे पहले कभी भी इस तरीके के हालात पैदा नहीं हुए थे। यह पहला मौका था जब इतने लोग किसी एक व्यक्ति के लिए आंसू बहा रहे थे। जिस अस्पताल में इलाज के दौरान इनकी मृत्यु हुई थी, उस अस्पताल के डॉक्टर भी वहां मौजूद थे। भीड़ डॉक्टर को पीटने तक को उतारू हो गई थी। हजारों की भीड़ में कई अधिकारी, थाने के कर्मचारी और न जाने कितने उनके हमदर्द मौजूद थे जो पथराई आंखों से आग की लपटों में अपने गया सिंह को ढूंढ़ रहे थे।
12 नवंबर सन 1965 के बाद भी कई दिनों तक पूरा कस्बा, पूरा बाजार सन्नाटों में डूबा रहा। लोगों को अब तक यकीन नहीं हो रहा था कि वह रोबदार चेहरा अब साहेबगंज की सड़कों पर अपने मोटरसाइकिल और घोड़े पर दोबारा नहीं दिखेगा। भले ही गया सिंह को गुजरे एक अरसा बीत चुका हो लेकिन आज भी उनके पराक्रम और आत्मीयता के किस्से घर-घर में सुनाई जाती है।

उद्देश्य
तुलसी का पत्ता क्या छोटा और क्या बड़ा। सबकी अहमियत एक-सी है। आज़ादी की लड़ाई में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी लेकिन उनमें से कुछेक शहीदों को ही देश जान पाया। गया सिंह भी उन्हीं गुमनाम सपूतों में से हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली। इस जीवनी के माध्यम से पाठक उनके योगदान से अवगत हो सकेंगे और उन्हें देर से ही सही लेकिन लोगों के दिलों में जगह ज़रूर मिलेगी।

(प्रस्तुत जीवनी के साथ इसकी सत्यता के साक्ष्य संलग्न हैं, जो श्री गया सिंह के सुपुत्र श्री अचिंत सिंह के द्वारा उपलब्ध कराएं गए हैं | इसी के साथ इस जीवनी लेखन में जनश्रुति तथा किंवदन्तियों का भी सहारा लिया गया है |)

 

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One thought on “आजादी का गुमनाम मसीहा गया प्रसाद सिंह :: अविनाश भारती

  1. आजादी के ऐसे मतवाले को मेरा क्रांतिकारी सलाम।
    आपने बहुत सरल भाषा का इस्तेमाल करते हुए अपनी बात कही है। आपके पद्य की तरह एक लययात्मकता आपके गद्य में भी देखने को मिलता है। एक बार अगर कोई पढ़ना शुरु कर दे तो बिना खत्म किये रुक नहीं सकता है।
    आपको साधुबाद।

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