भाव और कला पक्ष का उत्कृष्ट सृजन ‘मेरी मां में बसी है…’ :: अविनाश भारती

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भाव और कला पक्ष का उत्कृष्ट सृजन ‘मेरी मां में बसी है…’

  • अविनाश भारती

`मेरी माँ में बसी है…´ बिहार की परवीन शाकिर कही जाने वाली अति संवेदनशील ग़ज़लकारा डॉ. भावना जी का सद्यः प्रकाशित संग्रह है, जो श्वेतवर्ण प्रकाशन से छप कर आया है। इस संग्रह में कुल 79 ग़ज़लें हैं, जो भाव पक्ष और कला पक्ष दोंनो उत्कृष्टता की दृष्टि से एक ही सिक्के के दो पहलू के समान प्रतीत होते हैं।

समकालीन हिंदी ग़ज़ल में अपनी अलग पहचान बना चुकी डॉ. भावना खास करके अपनी ग़ज़लों के लिए उन विषयों का चयन करती हैं जिन्हें अन्य रचनाकार सूक्ष्म या अति सामान्य समझ कर छोड़ देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर ऐसे कुछ शेर देखें :

हमें तो सिर्फ़ जामुन तोडना था ,

भले ही लाख सिर पर गर्मियां थीं ।

 

एक संवाद मन की बातों का,

आपसे कर रहा मेरा कंगन ।

 

नाटक का यह भी अंदाज़ लगा है अच्छा,

घूँघट बहुओं को हैं रखने आधे-आधे ।

 

अगर गौर करें तो डॉ. भावना, हिंदी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत की परंपरा का बखूबी निर्वहन करती हुई नज़र आती हैं। डॉ.भावना की ग़ज़लों के हर शेर विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। इनकी ग़ज़लें सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक समस्याओं को रेखांकित करती हैं। इस संदर्भ में कुछ शेर देखें :

तमाशा हो रहे हैं हम,तमाशाई बनी दुनिया,

सियासत आगे जाने क्या नया करतब दिखाती है।

 

न होते भूत और न ही कोई परियाँ यहाँ होती,

ग़रीबी मानती है बात इस बिटिया सयानी की।

 

क्या ग़ज़ब की ठंड है इस वर्ष भी यारो,

फिर सियासत आ रही है बाँटने कंबल।

 

सत्य बोलोगे मारे जाओगे,

सबसे अच्छा है आज चुप रहना।

 

रात-दिन लिप्त है जो सिर्फ़ बुरी बातों में,

कान देने से तो अच्छा ही है बहरा होना।

 

कुल मिलाकर कहें तो डॉ. भावना की ग़ज़लें सामाजिक विसंगतियों के विरूद्ध कड़े शब्द अख्तियार करती है। इन्होंने न केवल ग़ज़लें लिखी हैं अपितु उसे निरंतर जीने का साहस भी दिखाया है।

`मेरी माँ में बसी है…´ ग़ज़ल संग्रह में कवयित्री की बेहद निजी संवेदना प्रकट हुई है। अपनी माँ से अलगाव के बाद उनकी भावनाओं का बांध टूटा है लेकिन पढ़ने के बाद उनकी ये निजी भावना पाठकों की निजी भावना बन जाती है। इस संग्रह में और भी ग़ज़लें हैं जो जीवन के हर पहलू को छूते हुये दिल और दिमाग को झकझोरने का काम करती है।

डॉ. भावना की रचनाधर्मिता नयी पीढ़ी के ग़ज़लकारों के लिए प्रेरणा है। संग्रहित ग़ज़लों की भाषा सरल व सटीक है। इसके अलावा जो इसे और भी पठनीय बनाता है वो है इसकी वास्तविकता। अर्थात कवयित्री ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्ति “साहित्य समाज का दर्पण है” को पूरी ईमानदारी से आत्मसात करके शेरों को गढ़ा है।

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पुस्तक- मेरी माँ में बसी है…

ग़ज़लकार-  डॉ. भावना 

समीक्षक- अविनाश भारती 

प्रकाशन – श्वेतवर्ण प्रकाशन 

मूल्य – 199 रुपये /-

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