मौन को शब्द देने की संवदेशीलता मौत का जिंदगीनामा :: मनीष शुक्ला

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मौन को शब्द देने की संवदेशीलता मौत का जिंदगीनामा

  • मनीष शुक्ला

कहते हैं कि स्त्री, संवेदनशीलता का ईश्वर द्वारा दिया गया सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। और उस पर यदि वह रचनाकार हो तो फिर सोने पर सुहागा। यूँ तो रचनाकारों के बीच स्त्री-पुरुष के आधार पर कोई भी भेद-भाव करना उचित नहीं, परन्तु ये बिल्कुल सत्य है कि स्त्री का मौन भी बोलता है।

प्रज्ञा शर्मा एक ऐसी ही रचनाकार हैं, जो यदि मौन को शब्द दे दें, तो वो कविता बन जाती है। प्रज्ञा जी से परिचय कुल जमा तीन सालों से है और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उन्हें एक कवयित्री या शायरा से ज़्यादा एक ‘स्त्री’ के रूप में मैंने महसूस किया है।  एक ऐसी स्त्री जिसका स्त्रीत्व उसके रोम-रोम से बोलता है। एक ऐसी स्त्री जिसका विचारशील वक्तव्य कविता हो या शायरी, हर जगह एक ज़िम्मेदार बयान बनकर उभरता है। एक ऐसी स्त्री जो अपने लेखन पर किसी भी तरह अपने स्त्रीत्व को हावी तो नहीं होने देती, मग़र समाज के हर उस तबक़े की औरत के लिए अपनी कविता में जगह बनाती है, जो ख़ुद ही को ख़ुद कहीं रखकर भूल गई है। कहते हैं कि सृजन आपके व्यक्तित्व का दर्पण होता है। आप जो जीते हैं, वही लिखते हैं। प्रज्ञा शर्मा अपने-आप से सन्तुष्ट होने के बाद ही जीवन की किसी महत्वकांक्षा को गले लगाती हैं। यही कारण है कि प्रज्ञा की कविताओं में महिलाओं के लिए  किसी भी तरह की बेचारग़ी नहीं है। जानबूझकर स्त्रियों को संस्कारवान दिखाने की कोशिश नहीं है। कोई सीता-सावित्री जैसी आसमानी बातें भी नहीं है। है…तो केवल एक भरी-पूरी सम्पूर्ण स्त्री।  जो चरित्र को बोझ नहीं, अपना एक गुण मानती है। एक ऐसी स्त्री जो समर्पित है तो समर्पण चाहती भी है।

प्रज्ञा जी की दो किताबें अभी तक प्रकाशित हुई हैं। पहली; प्रभात प्रकाशन से आई नीरज जी का हस्तलिखित कविता संग्रह है। जो लोग नीरज जी को जानते हैं, उन्हें पता होगा कि नीरज जी के हाथों से उनकी कविताएँ लिखवाना कितना दुरूह कार्य है। यूँ भी, किसी भी कवि द्वारा अपनी ही रचना को पढ़ना या पुनः लिखना, वास्तव में एक उबाऊ कार्य है।  मग़र प्रज्ञा शर्मा की ललक ने नीरज जी को इस कार्य के लिए विवश कर दिया। इस पुस्तक में कविताओं का चयन और नीरज जी की बोलती हुई हस्तलिपि अद्भुत है। हम में से हर किसी ने नीरज को थोड़ा या ज़्यादा पढ़ा है, सुना है। मग़र मेरा विश्वास कीजिए;  इस किताब को पढ़ते हुए आप उन्हें छू सकेंगे।

प्रज्ञा जी की दूसरी किताब हाल ही में रेख़्ता पब्लिकेशन से आई ‘मौत का ज़िंदगीनामा’ है। सच कहूँ तो आज के समय में बहुत कम किताबों का टाइटल आपको पल भर रुक कर सोचने को मजबूर करता है। इस किताब के शीर्षक को पहली बार सुना तो मेरे साथ यही हुआ। मन एक पल को ठहर कर पन्ने पलटने लगा तो जाना कि मैं तो प्रज्ञा के लेखन के इस कलेवर से बिल्कुल अनभिज्ञ ही थी। प्रज्ञा जी मुक्त छंद में भी इतना बेहतर कहती हैं, मुझे पता ही नहीं था। एक गीतकार होने के नाते मैं हमेशा सोचती हूँ कि मुक्त छंद, छंद मुक्त कविताएँ या नज़्में कहना बहुत कठिन काम है। क्योंकि आपकी कहन अगर ज़रा सा भी चूक गई तो कविता सपाट हो जाएगी और अपने उद्देश्य से ख़ाली जाएगी। प्रज्ञा जी ने अपनी कविताओं में कहन की इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया है। कई जगह कविताओं में मनुष्य को वक़्त और हालात की सच्चाई से रूबरू कराने के लिए तल्ख़ शब्दों का इस्तेमाल किया गया, ताकि अहसास गहरे चोट करें पढ़नेवाले पर । एक कविता ‘पेस्ट कंट्रोल’ का अंश देखिए-

 

हम भी

इन कीड़े मकोड़ों की तरह ही हैं

जिन्होंने

उसकी बनाई ख़ूबसूरत दुनिया की

शक़्ल बिगाड़ दी है

उसे भी

साफ़-सफ़ाई के दौरान

हमें मारने का हक़ है

ये वायरस

उसका भेजा हुआ पेस्ट कंट्रोलर है

 

एक और कविता ‘बच्चे पढ़ रहे हैं ‘ में-

 

ये बच्चे

ज़िन्दगी का गणित सीख रहे हैं

मौत का फॉर्म्युला रट रहे हैं

इन्हें मालूम है

अपने माहौल की किताब में लिखा

हर पाठ

इन्हें वक़्त रहते पढ़ लेना है

कविता का काम मनुष्य को संवेदना का टीका देना है। जैसे टीका लगने के दौरान व्यक्ति को सुई की चुभन तो महसूस होती है, मग़र शरीर को बीमारी का काट मिल जाता है। उसी तरह कविताएँ इस सलीके से बड़ी से बड़ी बात कह जाती हैं कि आपको सुई बराबर चुभन मिले और बीमारी जितना सबक़ । ‘मौत का ज़िंदगीनामा’ से एक और कविता देखिए-

जैसे,

म्युनिसिपल कारपोरेशन की गाड़ी

सड़क से उठा  ले जाती  है कचरा

वैसे ही

कोरोना संदिग्ध लोगों को

उठा ले जाया जा रहा है

उनके घरों से…

 

प्रज्ञा ने कई जगह एक तीर से दो शिकार करते हुए हालात से मजबूर इंसानों और बेख़बर सियासतदानों; दोनों पर शानदार व्यंग्य किया है-

मरते हो

तो ख़ामोशी से मरो

कि इस शोर से

कहीं मेरा ज़मीर

जाग न जाए…

लॉकडाउन के दौरान हर किसी ने अपने अकेलेपन को शिद्दत से महसूस किया। मग़र आम आदमी और कवि, लेखक या शायर में यही तो अंतर है। चोट लगने पर दर्द तो हर किसी को होता है, मग़र उस दर्द को ज़ुबान देने की ताक़त केवल एक रचनाकार के शब्दों में होती है। क्योंकि उसे शब्दों की तासीर पता है। उसे शब्दों से खेलने का हुनर पता है। प्रज्ञा द्वारा शब्दों का प्रयोग इस कविता में देखिए-

मैं,

अपनी ज़ाहिरी शख़्शियत के

तहख़ाने में रखे

अपनी वहशत के एक सन्दूक में

क्वारंटीन हूँ

जिस पर मेरे ज़ब्त का

मज़बूत ताला जड़ा है

मुझे

किसी से मिलने की इजाज़त नहीं है।

इस कविता के पन्नों को उलटते हुए सबसे ज़्यादा देर तक जिस पन्ने ने मेरा हाथ थामें रक्खा, वह कविता है ‘वरदान छिन गया’। उस कविता का अंश यहां उद्धृत नहीं करूँगी, क्योंकि मैं चाहती इस कविता को आप स्वयम महसूस करें। महसूस करें आज़ादी की वो ‘लिबर्टी’ जो ईश्वर से हमें ‘बाई डिफॉल्ट’ मिली थी मग़र हमने उसे थोड़ा ज़्यादा ही ‘ग्रांटेड’ ले लिया।

कुल मिलाकर; लॉकडाउन के दौरान लिखी गईं इन कविताओं में उन तमाम चुनौतियों का कच्चा चिट्ठा है, जिनके सामने मनुष्य का विश्वास पल भर को ही सही, डगमगा तो गया था। इस किताब की हर कविता एक सार्थक कविता है क्योंकि उसमें जो कहा गया है, उससे कहीं ज़्यादा अनकहा छोड़ा गया है। ताकि रचनाकार की बेचैनी का थोड़ा सा हिस्सा पाठक में सांस ले सके, और उसे बेचैन देखकर रचनाकार की सांसों को सुकून आए। इस क़िताब को पढ़ते समय कविता-दर-कविता आपकी आँखों के सामने से वो सारे मंज़र गुज़रेंगे जो जब हमारे सामने थे तो ऐसा लगता था कि बाहर का माहौल कभी सामान्य होगा ही नहीं होगा। और जब बाहर सब सामान्य हो गया तो ऐसा लगता है जैसे हमारे अंदर बहुत कुछ बदल चुका है।

बहरहाल, प्रज्ञा शर्मा को उनकी इन दोनों किताबों के लिए बधाई और आने वाले समय में उनके सामने खुले सृजन आकाश पर एक सशक्त लंबी उड़ान के लिए शुभकामनएँ। अगर ज़िन्दगी से कभी जी ऊबे, तो ज़रूर पढ़िए  ‘मौत का ज़िंदगीनामा’। क्योंकि इस किताब का अर्थ है –

“ज़िन्दगी इतनी मुश्किल कभी नहीं होती कि जी न जा सके”।

 

 

 

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