हिंदी ग़ज़लों की महत्वपूर्ण कृति ‘रास्तों से रास्ते निकले’ : डॉ भावना

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हिंदी ग़ज़लों की महत्वपूर्ण कृति ‘रास्तों से रास्ते निकले’ :
–  डॉ भावना
‘रास्तों से रास्ते निकले ‘ लब्ध प्रतिष्ठित ग़ज़लकार ज़हीर कुरेशी का  ग़ज़ल -संग्रह है, जो अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से छप कर आया है । इस संग्रह में कुल 100 ग़ज़लें हैं ।संग्रह के शुरू में ही महेश अग्रवाल द्वारा लिया गया उनका एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार है। मेरे ख़याल से इस साक्षात्कार को पढ़ने के उपरांत हिंदी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल पर उठ रहे सवाल का सटीक जवाब उन सभी प्रश्नकर्ताओं को मिल जाएगा,  जो सिर्फ ग़ज़ल को ग़ज़ल कहने के हिमायती हैं। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट कहा है कि “जब  ग़ज़ल की अवधारणा हिंदी बोली, बानी और मुहावरे में संभव होती है, तो उसे हिंदी ग़ज़ल कहा जाता है ।भाषा के साथ पूरी संस्कृति जुड़ी होती है। भाषा बदलने के साथ उसका मुहावरा भी बदलता है। जैसे उर्दू में दर्पण दरकने को ‘आईने में बाल आना’ कहते हैं ।लेकिन हिंदी ग़ज़लकार अपने शेरों में ‘बाल आना ‘प्रयोग नहीं करेगा। वह अपने मुहावरे के अनुसार मिसरा कहेगा। ऐसी छोटी-छोटी अनेक बातें हैं, जिससे हिंदी ग़ज़ल का स्वरूप निर्धारित होता है ।”ज़हीर कुरेशी हिंदी के शीर्षस्थ ग़ज़लकारों में से एक हैं ।वे उर्दू में ग़ज़लें कहने के उपरांत हिन्दी में आये हैं ।अतः उनकी बातों को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए।
प्रेमी प्रेमिका के जुल्फों- खम में रहने वाली ग़ज़ल जब दांपत्य जीवन की बात करती है,तो हिंदी ग़ज़ल होती है। ज़हीर कुरेशी  के इस शेर से हिंदी ग़ज़ल के मिज़ाज को आप आसानी से समझ सकते हैं ।शेर देखें-
 वह जिसके साथ गुजारे हैं मैंने तीस बरस
 कभी-कभी तो बहुत अजनबी सी लगती है
     पृष्ठ 15
कबीर कहते हैं कि ‘तेते पांव पसारिए जैती लांबी सौर’  यानी जितनी लंबी सौर हो ,उतने ही पाँव पसारना चाहिए । ज़हीर कुरेशी भी आमदनी अट्ठनी ,खर्चा रुपैया वाले लोगों पर तंज कसते हुए कहते हैं कि
 पैरों का चादर से बाहर होना निश्चित है
पैरों को इतना ज्यादा फैलाते हैं कुछ लोग
        पृष्ठ 16
 विकास जब होता है तो कई चीजें अच्छी होती हैं ,तो कई चीजें बुरी भी होती हैं ।इंटरनेट और स्मार्टफोन के जमाने में आज जीवन जितना सरल हुआ है ,अपराध उतना ही बढ़ गया है। मोबाइल पर देखे जा रहे पोर्न फिल्मों ने लोगों की मानसिकता को कुत्सित कर दिया है। बहू बेटियां अब बाहर क्या घर में भी सुरक्षित नहीं रहीं! ऐसे में ,एक मां की अपनी बड़ी होती बेटी के लिए चिंता स्वाभाविक है ।शेर देखें-
 सशंकित मां की बानी हो रही है
 बड़ी बिटिया सयानी हो रही है
        पृष्ठ 27
 देशज शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल में मारक प्रभाव उत्पन्न करती है।या यूँ कहें कि देशज शब्दों के प्रयोग से ग़ज़ल में अपनी मिट्टी की गंध आने लगती है।हिंदी ग़ज़ल की ताकत का अंदाजा ऐसे ही ‘ठगनी’ जैसे  शब्दों के प्रयोग से लगाया जा सकता है। शेर देखें –
 त्याग बनाता है मनुष्य को हिम्मतवाला
माया की ‘ठगनी’ कितनी कायर होती है
    पृष्ठ 32
कहा जाता है ‘जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि’ यानी कवि की दृष्टि सूर्य के प्रकाश से भी आगे देख सकती है ।शेर देखें-
 भाषा की प्राजंलता उसकी विशेषता है। अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिंदी में बेहद आम है। कुछ शब्द ऐसे रच बस गए हैं जिसे हिंदी से अलगा कर नहीं देखा जा सकता ।शेर देखें –
अब तो डर की भी मार्केटिंग होती है
 डर भी बाजारों तक आते रहते हैं
     पृष्ठ 59
 महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था । सिद्धार्थ जब अपने सारथी के साथ एक दिन सैर पर निकले तो उन्हें एक बुजुर्ग व्यक्ति ,एक बीमार व्यक्ति तथा एक मरा हुआ व्यक्ति दिखायी दिया।राजसी ठाठ में पले सिद्धार्थ ने कभी इससे पहले ऐसे दृश्य नहीं देखे थे।उन्होंने सारथी से इनके बारे में पूछा।सारथी ने बताया कि बुढ़ापा जीवन का कटु सत्य है ,हमारा शरीर नश्वर है ।यह एक समय के बाद हमारा साथ नहीं देता ।इंसान बीमार पड़ने लगता है एवं मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।सिद्धार्थ बहुत व्याकुल हो गये।उन्हें जीवन से वितृष्णा हो गयी।तभी उन्होंने एक संन्यासी के तेज को देखा एवं उन्हें रास्ता मिल गया  और वे महल छोड़कर निकल गये।इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों के केंद्र में रखकर कहे इस शेर को देखें।
‘सिद्धार्थ’ को मिले न सवालों के जब जवाब
ऐश्वर्य अपने महलों के त्यागे, निकल गए
कुछ नया करने के लिए अपने ही बनाए गए सीमाओं को तोड़ना होता है ।रूढ़ियों से मुक्त होना होता है ।सीमाओं में घिरे रहकर  हम तालाब तो बन सकते हैं ,पर समंदर नहीं ।शेर देखें –
सीमा से अपनी जो कभी बाहर न हो सका
 तालाब हो गया वो, समंदर न हो सका
         पृष्ठ 107
 ग़ज़लें सांकेतिकता से बात करने में यकीन रखती है। हमारा शेर तभी बड़े फ़लक का  शेर कहलाता है ,जब हम कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कह देते हैं। जब कोई आदमी अपने शरीर के द्वारा कोई काम नहीं कर पाता तो उसे कल्पना में करके आनंदित होता है। मन की गति सबसे तेज होती है।  विकलांगता विमर्श पर यह महत्वपूर्ण  शेर देखें-
हम आज भी कहीं उस आदमी ने व्यक्त हुए
जो उड़ न पाया वो उड़ने लगा पतंगों में
       पृष्ठ 108
 आजकल किसी व्यक्ति का मूल्य ही उसकी कीमती होने का पर्याय है और यह मूल्य हम नहीं बल्कि बाजार तय करता है। बाजार का इस तरह जीवन में हस्तक्षेप जीवन के ताने-बाने को संकट में डाल दिया है ।शेर देखें-
 कुछेक वस्तुएं अनमोल लगती रहती हैं
 वो जिनका मूल्य नहीं है,वे कीमती भी नहीं
      पृष्ठ 109
 आगे वे बाजारवाद की मनसा को और स्पष्ट तरीके से व्यक्त करते हुए कहते हैं कि
 समय से पहले ‘खिलाने ‘लगा उसे बाजार
 वो फूल भी नहीं, इस वक्त वो कली भी नहीं
    पृष्ठ 109
 ऐसे तो, हम पर्यावरण की खूब चिंता करते हैं। पर, सच्चाई यह है कि सारी बातें आम आदमी के लिए है ।माफिया आज भी सक्रिय है और जंगल को खत्म करने पर लगा है। पर ,भ्रष्ट तंत्र में ऐसे लोगों पर अंकुश लगाना कितना कठिन है ,यह सभी जानते हैं ।शेर देखें-
 जंगल में ,माफिया को कटाई की छूट है
 सामने खड़े हैं पेड़ कुठारों के बीच में
    पृष्ठ 112
 इस तरह हम देखते हैं कि ज़हीर कुरेशी की ग़ज़लें आम जनमानस के बेहद करीब हैं। वे जहां ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से गूढ़ विषयों को बखूबी व्यक्त करते हैं, वहीं प्रकृति, पर्यावरण, विकलांगता विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर भी गंभीरतापूर्वक बात करने से परहेज नहीं करते ।जीवन से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण बातों को ग़ज़लों में सलीके से कहने की वज़ह से ही ज़हीर कुरेशी जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
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ग़ज़ल-संग्रह-रास्तों से  रास्ते निकले
ग़ज़लकार – ज़हीर कुरेशी
 समीक्षक- डॉ भावना
 प्रकाशन – नई दिल्ली
 मूल्य ₹240
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