आलेख : मनोज जैन

मिल्टन से टकराता रहता रोज ईसुरी फाग के बहाने जंगबहादुर बंधु के दो गीतों पर मनोज जैन का समीक्षात्मक आलेख साहित्यिक विरादरी का शायद ही कोई शख्स ऐसा हो जिसका सम्बन्ध पुराने भोपाल के इस,सांस्कृति तीर्थ से न जुड़ता हो,तीर्थ इसलिए कि जिस भवन में महीयसी महादेवी वर्मा,भवानी दादा,शिवमंगल सिंह सुमन,शरद जोशी,हरिशंकर परसाई,बालकवि वैरागी,रतन भाई पत्रकार,प्रोफेसर अक्षय कुमार जैन,डॉ चन्द्र प्रकाश वर्मा,मूलाराम जोशी,शिव कुमार श्रीवास्तव, मदन मोहन जोशी,राजेन्द्र अनुरागी,दिवाकर वर्मा,भगवत रावत, राजमल पवैया, उपेंद्र पांडेय,राजेन्द्र नूतन,रामनारायण प्रदीप,कैलाश चन्द्र पंत,देवीशरण,देवेंद्र दीपक जैसे वंदनीय साहित्यिक मनीषियों के चरण पड़े हों,जहाँ तत्कालीन भोपाल…

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सुशांत, आखिर क्यों ,सुशांत ! – सलिल सरोज

सुशांत, आखिर क्यों ,सुशांत ! –  सलिल सरोज आत्महत्या निस्संदेह में एक जघन्य पाप है। एक आदमी जो खुद को मारता है, उसे इस दुनिया में बार-बार लौटना होगा और उसकी पीड़ा भुगतनी होगी। — श्री रामकृष्ण परमहंस दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित पुस्तक Le suicide (The suicide) सन् 1897 में प्रकाशित हुई जिसमें आत्महत्या के सिद्धांत के बारे में उल्लेख है। इस पुस्तक में सर्वप्रथम आत्महत्या के अर्थ को समझाया गया है। सामान्य रूप से पूर्व में यह समझा जाता है कि व्यक्ति के स्वयं के प्रयत्नों द्वारा घटित मृत्यु ही…

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चीन की खतरनाक महात्वाकांक्षा और भारत सहित अन्य देश : रत्नेश कुमार मिश्रा

चीन की खतरनाक महात्वाकांक्षा और भारत सहित अन्य देश                                                           – रत्नेश कुमार मिश्रा विश्व आज चीन की महात्वाकांक्षा एवं उसके विनाशकारी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के कारण कोरोना जैसे अबूझ एवं गंभीर बीमारी की आग में जल रहा है. अमेरिकाख्, इंग्लैंड, ब्राजील, इटली, आस्ट्रेलिया एवं रूस जैसे शक्तिशाली देश भी आज इस समस्या के सामने घुटने टेक चुके हैं और त्राहिमाम कर रहे…

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ग़ज़लकार डॉ अनिरुद्ध सिन्हा से  कुसुमलता सिंह की बातचीत

प्रश्न –आप पिछले कई दशकों से रचनकर्म से जुड़े कवि,कथाकार आलोचक हैं । इधर कुछ वर्षों में आपने हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में मजबूत पहचान बनाई है । आपमें बहुमुखी प्रतिभा है । हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल सामानांतर विधा है या इन्हें अलग –अलग विधाएँ मानते हैं ? उत्तर –लेखन का गणित उम्र और विरासत से हल नहीं होता । हाँ भले हम ये परिकल्पना कर सकते हैं , हमारी लेखकीय उम्र क्या है ? लेखन का उत्कर्ष परिपक्वता है ।  लेखन की सामाजिक सरोकारों के प्रति क्या भूमिका…

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‘समाजवाद या बर्बरतावाद : मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध’ : डॉ संजीव जैन

‘समाजवाद या बर्बरतावाद : मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध’ रोजा लक्जमबर्ग ने मार्क्स के अध्ययन और पूंजीवादी व्यवस्था या उत्पादन पद्धति के उनके विश्लेषण के परिणामों पर लिखते हुए यह टिप्पणी की थी कि पूंजीवाद अपने चरम विकास की स्थिति में दो ही दिशाओं में जा सकता है : समाजवाद या बर्बरतावाद। समाजवाद या बर्बरतावाद पूंजीवाद का खुला परिणाम है। यह पूंजीवाद के आंतरिक संबंधों के द्वंद्वात्मक चिंतन से खोला गया पाठ है। दरअसल जब पूंजीवाद के बीच आंतरिक रूप से संबंधित द्वंद्वी इस संबंध के प्रति आलोचनात्मक रुप से सचेत…

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  रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना : राजीव कुमार झा

रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य और उनकी जीवन चेतना – राजीव कुमार झा रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक काल के भारतीय लेखकों में अग्रगण्य हैं. उन्होंने अपने काव्य लेखन और गद्य चिंतन से हिंदी लेखन को विशिष्ट धरातल प्रदान किया और कविता में यथार्थवादी प्रवृत्तियों के समन्वय से अपने समय और समाज के तमाम संकटों और सवालों को लेकर गहरे चिंतन  की ओर साहित्य को उन्मुख किया . दिनकर के काव्य में यथार्थ और कल्पना का अद्भुत समन्वय है . उनकी प्रारंभिक काव्य रचनाओं में युवाकाल के उमंग और उत्साह का…

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दलित चेतना के अग्रदूत डॉ. अम्बेदकर : डॉ पूनम सिंह

दलित चेतना के अग्रदूत डॉ० अम्बेदकर पूनम सिंह बाबा साहब अम्बेदकर अस्पृश्य मानी जाने वाली महार जाति में पैदा हुए थे । निम्न जाति में पैदा होने की मर्माहत पीड़ा को उन्होंने संवेदना के स्तर पर बहुत दूर तक महसूसा था इसलिए अस्पृश्य समाज की गुलामी को वे राष्ट्र की गुलामी से ज्यादा दर्दनाक समझते थे । उन्होंने अस्पृश्य समाज में अस्मिता का स्वाभिमान जगाने एवं अपने वजूद की पहचान कराने का व्रत लिया । उनका सम्पूर्ण जीवन रूढ़ियों से शोषित दलित मनुष्य के सामाजिक , आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान…

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यथार्थ के प्रकाशित धरातल पर हिन्दी ग़ज़ल :: अनिरुद्ध सिन्हा

यथार्थ के प्रकाशित धरातल पर हिन्दी ग़ज़ल – अनिरुद्ध सिन्हा वर्तमान समय में सच और झूठ ,न्याय और अन्याय,धर्म और अधर्म के सारे फासले मिट गए हैं । सच की निशानदेही करनेवाला साहित्य आज  मौन है । क्या हमारा मौन शून्य की ओर चला गया  है ?दुख की कारक शक्तियों को पहचानने और उनका प्रतिकार करने का दम-खम साहित्य से विसर्जित हो चुका है ?शब्दों के संस्कार मात्र एक अवैध नगरी के संवाद बनकर रह गए हैं ?ऐसे ढेर सारे प्रश्न हैं जिनके उत्तर अभी खोजे जाने हैं । साहित्य…

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कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत

कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत राजीव –आप लम्बे समय से लेखन कर रहे हैं । आपने कविता लेखन कब शुरू किया था और साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रतिष्टित कवि के रूप में कब स्थापित हुये थे। उस समय आपकी पीढ़ी में और कौन से लोग कवितायें लिख रहे थे । ….. कविता का रोग तो बचपन से लगा था । बचपन में मां के साथ तुकबंदी करता रहता । कविता साथ रह गयी और मां असमय हमें छोड़ कर चली गयी । यह मेरे…

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ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम :: चित्तरंजन कुमार

ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम – चित्तरंजन कुमार किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ -अहमद फराज बातें हुई तो प्रेम, नजरें मिली तो प्रेम, रूठ गए तो प्रेम, मनाने पर मान गए तो प्रेम । वाकई, प्रेम भी अजीब है । हो जाए तब भी मुश्किल, न हो तो भी मुश्किल । हद है मन में उफखी-बिखी है, फिर भी प्रेम है । प्रेमिका मिल जाए तो कुछ बोलते डर लगे, न मिलें तो कल्पनाओं का दौर……….। प्रेम न हुआ…

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