विशिष्ट कवि : असलम हसन

मुश्किल है आसाँ होना कितना मुश्किल है आसाँ होना फूलों की तरह खिलखिलाना चिड़ियों की तरह चहचहाना कितना मुश्किल है सुनना फुर्सत से कभी दिल की सरगोशियाँ और देखना पल भर रंग बिरंगी तितलियों को कितना मुश्किल है फ़िक्र से निकल आना किसी मासूम बच्चे की मानिंद मचल जाना कितना सख्त है नर्म होना,मोम होना,और पिघल जाना कितना आसां है दिल का जाना ,दुनिया में ढल जाना और आदमी का बदल जाना… ऊपर उठता है सिर्फ धुंआ पोटली में बांध कर चाँद जब कोई निकलता है निगलने सूरज तब गर्म…

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विशिष्ट कवि : ब्रज श्रीवास्तव

अणु एक अणु ने ओढ़ लिया है ज़हर वह अपनी काली शक्ति से मार डालना चाह रहा है बचपन वह उम्र को निगलने के लिए निकल पड़ा है   खबरों की दौड़ में वह सबसे बड़ी खबर बनते हुए नहीं संकोच कर रहा हत्यारा बन जाने में   क्या किसी मानव से ही सीख लिया है उसने अमानवीय हो जाना.   विषाणु एक विषाणु हमारी मुस्कराहट के फूल पर बैठ गया है   एक विषाणु हमारे पैरों के तलवे में कांटां बनकर घुस गया है एक विषाणु बैठ गया है…

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विशिष्ट कवयित्री :: रंजीता सिंह

  मन की स्लेट औरतों  के  दुःख बड़े  अशुभ  होते  हैं और  उनका  रोना बड़ा  ही  अपशकुन   दादी  शाम  को घर  के  आंगन  में लगी  मजलिस  में  , बैठी  तमाम  बुआ ,चाची ,दीदी ,भाभी और बाई  से  लेकर हजामिन तक  की पूरी  की  पूरी टोली  को  बताती औरतों  के  सुख और  दुख  का  इतिहास   समझाती  सबर  करना अपने  भाग्य  पर  .. विधि  का  लेखा  कौन  टाले जो  होता  है अच्छे  के  लिए  होता  है सुनी  थी उसने  अपने  मायके  में कभी भगवत  कथा थोड़ा  बहुत  पढ़ा रामायण  और …

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विशिष्ट कवयित्री :: मृदुला सिंह

वसंत और चैत वसंत जाते हुए ठिठक रहा है कुछ चिन्तमना धरती के ख्याल में डूबा मुस्काया था वो फागुन के अरघान में जब गुलों ने तिलक लगाया था अब फागुन बीता तो दस्तक हुई दरवाजे पर आगंतुक है चैत नीम ढाक महुये के कुछ फूल लिए संवस्तर का चांद जड़ा है सर के ऊपर छिटकाता नवल चांदनी पेड़ों ने आहिस्ता से झाड़े हैं पीले पत्ते और नव कोंपल उग आई हैं उदास ठूंठों पर खेतों का सोना किसानों के घर जाने को आतुर है खलिहानों की रानी ने छेड़…

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नारी चेतना के दोहे : हरेराम समीप

नारी चेतना के दोहे : हरेराम समीप हर औरत की ज़िंदगी, एक बड़ा कोलाज इसमें सब मिल जाएँगे, मैं, तुम, देश, समाज नारी तेरे त्याग को, कब जानेगा विश्व थोड़ा पाने के लिए, तू खो दे सर्वस्व न्यौछावर करती रही, जिस पर तन-मन प्राण वो समझा तुझको सदा, घर का इक सामान औरत कब से क़ैद तू, तकलीफ़ों के बीच भरे लबालब दुक्ख को, बाहर ज़रा उलीच करती दुख, अपमान से, जीवन का आग़ाज़ औरत के सपने यहाँ, टूटें बे-आवाज़ जुल्म सहें फिर भी रहें, हम जालिम के संग यही…

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विशिष्ट कवयित्री :: डॉ राजवंती मान

सामर्थ्य मुझ पर विश्वास रखो मेरी दोस्त ! मैं तुम्हारे शिथिल / मरणासन्न अंगों को उद्दीप्त करुँगी करती रहूंगी भरती रहूंगी / तुम्हारी पिचकी धमनियों में अजर उमंगें लहू में विबुध सरसराहटें ! सूरज का असीम प्रकाश ढांपता रहेगा चिर ऊष्मा से प्रदान करता रहेगा दैव उर्जा बरबाद दिनों में ! मेरी दोस्त ! नहीं हो तुम वाणी रहित कुछ वक्त रह सकती हो मौन साँझ की लसलसी बेला में कथित प्रेरकों के विरुद्ध फीके उजालों की परतों में l गहरी हैं तुम्हारी जड़ें छिपी रहती हैं सारी शक्तियां वहीं…

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विशिष्ट कवि : अभिजीत

रोटी की बात मत करो रोटी की बात मत करो रोटी पर सवाल मत करो बात करनी हो तो करो सिर्फ मेरी मेरे आगे रोटी क्या है मात्र गूंधे हुए आटे का सिका हुआ एक टुकड़ा पर मैं वो हूँ जिसमें समाया है सब कुछ देखो मेरी ओर देखो और बताओ तुम्हें किसकी है ज्यादा जरूरत रोटी की या मेरी ? देखो भूल रहे हो तुम रोटी का रंग-रूप, उसका आकार देखते रहो मेरी तरफ मिट रही है तुम्हारी भूख ‘मिट रही कि नहीं’ मिट रही है ना…’ बस देखते…

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विशिष्ट कवयित्री: पूनम सिंह

(बाबा की सजल स्मृति को समर्पित) एकमुश्त बहुवचन है तुम्हारी कविता  फक्कड़ अक्खड़ और घुमक्कड़ तीन विशेषणों से परिभाषित तुम्हारा नाम अपनी बहुपरती संरचना में पूरी एक कविता है जब भी पढ़ती हूँ इसे अर्थों की तलाश में बिबाइयां फटे खुरदुरे पैरों की अंतहीन यात्रा मेरे साथ होती है अदम्य जिजीविषा का उत्कट आवेग लेकर तुमने लड़ी थी कठिन लड़ाईयां पूछे थे व्यवस्था से खतरनाक सवाल और अनुतरित प्रश्नों  के साथ गये थे आम तक सकर्मकता की सामर्थ्य पहचानने बाबा! यहीं से शुरू होती है न तुम्हारी कविता बंजर तोड़ते …

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विशिष्ट कवयित्री :: स्मृति शेष रश्मिरेखा

समय के निशान एक अर्से बाद जब तुम्हारे अक्षरों से मुलाक़ात हुई वे वैसे नहीं लगे जैसे वे मेरे पास हैं भविष्य के सपने देखते मेरे अक्षर भी तो रोशनी के अँधेरे से जूझ रहे हैं अब तो ख़ुद से मिलना भी अपने को बहुत दुखी करना है यह सब जानते हुए भी एक ख़त अपने दोस्त को लिखा और उसे बहुत उदास कर दिया पत्र पाने की खुशी के बावजूद सचमुच समय चाहे जितनी तेजी से नाप ले डगर अमिट ही रह जाते हैं उसके क़दमों के निशान 2…

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विशिष्ट कवि :: अरुण शीतांश

चोंप पारिस्थितिकी संतुलन के लिए हर घर मे एक बागीचा चाहिए पेडो़ं में फल हो छोटे पौधों मे फूल रोज़ नई घटना की तरह बना रहे सुंदर पर्यावरण जंगल की तरह घेरे में पक्षियों के कलरव घोड़ों का टॉप सुनाई दे ठक ठक ठक ठक शुद्ध हवा में कोई माउस लैपटॉप न हो और मोबाईल बस संवाद हो निश्चल हँसी के साथ भरपूर आम का पेड़ खूब हो जिस पर बैठकर ठोर से मारे मनभोग आम पर एक दिन गिरे तो चोंप कम हो धोकर खा जाँए सही सही मुँह…

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