विशिष्ट कवि : अरविंद भट्ट

चारदीवारी तुम्हारे अपने शहर में, अतिव्यस्त मार्केट की चकाचौंध, और लोगों की रेलमपेल के सहारे आगे बढ़ते, जहाँ सड़क और फुटपाथ के अंतर की सीमा रेखा, शायद अपना अस्तित्व बचाते बचाते, कब का दम तोड़ चुकी थी. अब सब निर्बाध था, बिना किसी सीमा का मूल्यांकन किये, कोई कहीं से भी चल सकता था, किसी को भी धकिया सकता था. मैं बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे, इस धकापेल और अनचाहे शोर से , दूर जाने की छटपटाहट में, एक इमारत की तलाश में. पर इस अतिव्यस्त से दिखने वाले ,…

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विशिष्ट कवयित्री : कल्पना मनोरमा

अग्निफूल सूरज के अनुभव में चाँद छोटा चाँद के अनुभव में तारा छोटा तारे के अनुभव में जुगनू छोटा और जुगनू भी समझता है छोटा दीपक को लेकिन ज्यादा नहीं फिर भी कुछ तो जरूर होता है अद्भुत छोटे के निज में भी समझाता है दीपक तेजस्विनी शिखा को दिखाकर उसके पास में अभी-अभी उगे अग्निफूल वसंत की आहट है वसंत की आहट है याकि शोर है पतझड़ का कहना कठिन है हाँलाकि कर दिया है दिशाओं ने प्रारम्भ रँगना अपने होंठों को रचने लगी है भोर अल्पनाएँ नई -नई…

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विशिष्ट कवयित्री : मंजुला उपाध्याय ‘मंजुल’

मिट्टी में जडे़ं कसीदे कारी वाले गमलों में आश्रय देकर इतरा रही है अपनी सम्पन्नता पर तुम्हारी सोच । मेरी हरी भरी डालियां खिला खिला यौवन देखकर तन जाती है गर्दन तुम्हारी हक़दारी के अहम में । मगर तुम्हें पता ही नहीं सांवले बदन पर जंचती पिली साडी़ का मर्म । आओ ! छुकर देखो ! कैसे पक्की मिट्टी को फोड़कर समाई हुई हैं कच्ची मिट्टी में गर्भ में जड़ें मेरी …।। नि:शब्द स्नेह दर्पण सा पैगाम तुम्हारा बांचू तेरा आखर -आखर सिर टिकाए दरवाजे पर बैठूं तुझको हाथ में…

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विशिष्ट कवि : अरविंद भट्ट

चारदीवारी तुम्हारे अपने शहर में, अतिव्यस्त मार्केट की चकाचौंध, और लोगों की रेलमपेल के सहारे आगे बढ़ते, जहाँ सड़क और फुटपाथ के अंतर की सीमा रेखा, शायद अपना अस्तित्व बचाते बचाते, कब का दम तोड़ चुकी थी. अब सब निर्बाध था, बिना किसी सीमा का मूल्यांकन किये, कोई कहीं से भी चल सकता था, किसी को भी धकिया सकता था. मैं बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे, इस धकापेल और अनचाहे शोर से , दूर जाने की छटपटाहट में, एक इमारत की तलाश में. पर इस अतिव्यस्त से दिखने वाले ,…

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विशिष्ट कवि : संजय छिपा

लोग कविता में स्वाद देखते है उस खून को नहीं देखते जो स्याही बनकर टपकता है आँखों से कुछ लोगों को आदत है शब्दों को ईधर उधर करने की ये जादूगर है कविता को गायब कर देते है एक सच्ची कविता उस अनपढ़ मजदूर के पास है जो लिख नहीं सकता उसे सुनने के लिए एक तपती दुपहरी में नंगे पाँव चलना होगा उसने कई दिनों भूखे रहकर तुम्हारे शब्दावली को किया है पराजित सच कहूँ तो असल में वह कवि नहीं है जिसके पास शब्द है सच्चा कवि वह…

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विाशिष्ट कवि : सलिल सरोज

1 ये सड़क कहाँ जाती है इसके उत्तर भी कई हैं और मायने भी कई हैं एक तो यह सड़क कहीं नहीं जाती बस अपने पथिकों का सफर देखती है और मंज़िल मिलते ही उसको आँखें मूँद लेती है। दूसरा तो यह सड़क पथिक की सहगामी है आरम्भ से गंतव्य तक की परिणत आगामी है। पर क्या सड़क के बस इतने ही मायने हैं क्या यही क्या सड़कें सभ्यता का मार्ग प्रशस्त नहीं करती समाज को अभ्यस्त नहीं करती कुछ नियम से, कुछ कायदों से कुछ तरक्की से, कुछ फायदों…

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विशिष्ट कवयित्री : डॉ उषा रानी राव

जैसे थामती है हवा सफेद बादलों की कतार में.. नीले सागर के गर्भ में .. पतझड़ के पत्तों के मर्मर में .. चेतन के अचेतन में .. थामते हैं तुम्हारे हाथ मुझे जैसे थामती है हवा फूलों को ! तुम्हारा आलोकमय स्पर्श जीवित रखते हैं मुझे अनंत तक! दिखते हो तुम आँखें बंद करने पर … दिखते हो तुम ..केवल तुम ! मेरी हर स्पंदन से जुड़ कर … ले ..चलते हो मुझे ..मुक्त सीमांत तक जहाँ प्रणय प्रकाशित है ! चलने का विभोर आनंद सारी विषमताओं की दीवार फाँदकर…

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विशिष्ट कवि : अशोक सिंह

क्या होता है प्रेम ? (अपनी उम्र से पाँच वर्ष बड़ी एक दोस्त से जब मै आठवें का छात्र था।) क्या होता है प्रेम ? मैंने उससे पूछा उसने किताब की तरह मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में थामा और गौर से देखते हुए मुस्कुराकर अपने कंधे पर टिका लिया कुछ दिन बाद मैंने फिर पूछा वह फिर मुस्करायी और मेरी कमीज के अधखुले बटन को सलीके से लगाकर नाक पकड़ कर हिला दी मैं उत्तर जानने के लिए बेचैन था सो कुछ महीने बाद एक दिन सर्द चाँदनी रात…

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विशिष्ट कवयित्री : डॉ भावना

यह जरूरी नहीं जानना यह जरूरी नहीं जानना कि मोर की तड़प को महसूस उमड़ता है बादल या बादल को उमड़ते देख नाचता है मोर यह जरूरी नहीं जानना कि सूरजमुखी के प्रेम की खातिर फिर-फिर निकलता है सूरज या सूरज के प्रेम की खातिर खिलने को अकुला जाता है सूरजमुखी यह जरूरी नहीं जानना कि पूनम के चांद को देख समुन्दर की लहरें हो जाती हैं बेकाबू या लहरों के आवेग को देख चांद उसे अपलक निहारता है जरूरी है जानना कि कैसे पेट के भूगोल में उलझ हमने…

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विशिष्ट कवि: विनय

हँसी का सौंदर्य झरने की तरह कल-कल करती ध्वनि आसमान में चिड़ियों का कलरव फूलों पर मंडराते भौंरों का गुंजन या फिर अल्हड़ हवाओं की सनसनाहट सच कहूँ ऐसे ही हँसती हो तुम तुम्हारी हँसी में जैसे ढलता है प्रकृति का सौंदर्य साज पर सँवरता है कोई राग सुबह की पहली किरण पर उल्लासित क्ूकती है कोई कोयल चाँदनी की फुहारों में जैसे मचलती है नदी की जलधारा तुम्हारी हँसी जैसे सावन की पहली घटा जीवन का पहला वसंत सौंदर्य रस का पहला छंद किसी युवती का पहला शृंगार शिशु…

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