विशिष्ट कहानीकार : अवधेश प्रीत

कजरी – अवधेश प्रीत कजरी की हालत अब देखी नहीं जा रही। रात जैसे-जैसे गहराती जा रही है फजलू मियां की तबीयत डूबती जा रही है। वह इस बीच कभी घर के भीतर तो कभी बथान तक कई चक्कर लगा चुके थे। जब भी वह बथान तक जाते थम कर खड़े हो जाते। कजरी उन्हें सर उठाकर देखती और वह लक्ष्य करते कि उसकी आंखें पनियायी हुई हैं। उनका दिल धड़क उठता और वह गहरी उदासी में डूबे कजरी का सर सहलाते। कजरी चुपचाप सर झुका लेती। वह मन ही…

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विशिष्ट कहानीकार : मधु सक्सेना

वो चालीस मिनिट – मधु सक्सेना तेजी से चला जा रहा था थ्री व्हीलर । उतनी ही तेजी से मीठी के विचार ।आज साथ मिला कितने दिनों के इंतज़ार के बाद । कनखियों से मितान को देख रही थी ।उसके कठोर हाथों को देखकर सोच रही थी इतनी कोमल कविताएं कैसे लिख लेता है वो । कुछ तो बोले मितान …जाने क्या सोच रहा ..खुद में डूबा हुआ ।मीठी इंतज़ार ही करती रही ।आखिर झटके से थ्री व्हीलर रुका तो मितान तेजी उतर गया अपना सामान लेकर । मीठी भी…

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विशिष्ट कहानीकार : तरुण भटनागर

महारानी एक्सप्रेस तारा को छोटी बहन की बातें याद आ रही थीं। जब वे गोवा में थे वह वहाँ की औरतों को देखकर चहक उठती थी -‘माँ यहाँ तो बड़ी-बड़ी औरतें भी स्कर्ट पहरती हैं।’ उसने एक बार स्कूल में डाँस में भाग लिया था। उसे साड़ी पहराई गई थी। साडी कभी पैरों में उलझती, तो कभी कमर से फिसलती, कभी सिर का पल्लू गिरता, तो कभी कुछ और………..। उसे पता था कि बड़े होकर साड़ी ही पहरनी पड़ती है। यह सोच वह घबरा जाती कि साड़ी पहरनी होगी। पर…

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विशिष्ट कहानीकार : प्रवीण कुमार सहगल

पिता के जाने के बाद पिताजी सीरियस हैं, बड़े भैया का फोन आया तो हतप्रभ रह गया। अभी दो दिन पहले ही तो मैं घर से वापस नौकरी पर आया था। अच्छे-भले थे, पिताजी। बड़ी मुश्किल से भैया से पूछ पाया कि एकाएक पिताजी को क्या हो गया। रूंधे गले से भैया बोले- “जमीन पर गिरे फिर नहीं बोले, पोजीशन क्रिटीकल है। आई0 सी0 यू0 में भर्ती हैं। तुरन्त आ जाओ।” भैया के रिसीवर रखते ही मैं आनन-फानन में घर से निकल पड़ा। टैक्सी पकड़ी। रात को घर पहुंच गया।…

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विशिष्ट कहानीकार :: सिनीवाली शर्मा

अफसर की बीबी मोबाइल की घंटी बजते ही रसोई से भुनभुनाती हुई कामिनी निकली, ” कितनी बार कहा इनसे एक नया मोबाइल ले लो, लेकिन हर महीने कहेंगे अगले महीने ! पता नहीं वो महीना कब आएगा !” उसकी उंगली यंत्रवत मोबाइल के घिस चुके बटन पर चली गई। ” हलो ” ” पहचानी !” ” आं—नहीं—कौन—?” ” मैं साँवली ” ” सां…वली…तुम !” उसकी आवाज सुनकर कामिनी के भीतर खुशी की लहर दौड़ गई। ” इतने दिनों के बाद ?” ” तुम तो मुझे भूल ही गई पर मैं…

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विशिष्ट कहानीकार : अमरेंद्र सुमन

खामोशी चार अलग-अलग कंधों के सहारे बेजान एक जवान युवक को शहर के मुख्य अस्पताल की ओर ले जाया जा रहा था। विकट उष्णता भरी रात में भी आने वाले कल की चिंता से बेपरवाह शहर कुंभकर्ण की भांति खर्राटे ले रहा था। विरान सड़क रोज की भांति आज भी अपने अकेलेपन से बातें करने में मशगूल था। यदा-कदा गली के कुत्ते भोजन की तलाश में रास्ता सुंघते हुए दिख जाया करते थे। पुलिस महकमें की चलन्त गाडियां कभी-कभार ही रास्ते की शोभा बढ़ा पा रही थीं। विद्युत विभाग जैविक…

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विशिष्ट कहानीकार : प्रवेश सोनी

रिश्तों का रेशम निशा जरा जल्दी करो भाई ,मनोज ने मोज़े पहनते हुए किचन की और देखते हुए कहा |मनोज की आवाज़ सुन कर अनमनी निशा ने हाथों को गति दी और ,टिफिन पेक करने लगी | मनोज किचन में आया और निशा के दोनों कंधो पर हाथ रख कर बोला “मेरे चाँद पर उदासी के बादल अच्छे नहीं लगते ,तुम चहकती गुनगुनाती हुई खाना बनाती हो तो सच बताऊ अंगुलियों को भी खाने का मन हो जाता है| “ सुबह से वो कोशिश में लगा हुआ था की किसी…

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विशिष्ट कहानीकार : संजीव जैन

लालबत्ती एक दूसरी कहानी यह भी मेरी जिंदगी अंत से आरंभ हो रही है। मैं हमेशा आरंभ के लिए करता रहा कोशिश पर अंत हमेशा पहले आता रहा और अब मैंने पहली बार अंत से आरंभ करना आरंभ किया है। …….. अंततः इस आरंभ ने जीवन के उस आरंभ को सामने लाकर खड़ा कर दिया जो छब्बीस साल पहले घट चुका है मेरे साथ। मैं इस हिसाब से किसी भी उम्र का हो सकता हूं चालीस, तेतालीस या तिरेपन या …….. कुछ भी ………उम्र मेरी चारसौ बीस साल की भी…

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विशिष्ट कहानीकार : सपना सिंह

दो बहनों की कहानी – सपना सिंह ……कुछ पुराना सा शीर्षक है न। दो बैलों की कथा सा ध्वनित होता है। पर क्या करें एक के साथ दूसरे की बात आप से आप आ जाती है। एक की बात करो दूसरे की बात चलना लाजिमी हो जाता हैै। विवाह के बाद जहां मैं गई थी वह छोटा सा कस्बा नुमा शहर था और नया नया जिला बना था। वहां के सांसद पुराने धाकड़ नेता थे और उन्होंने विकास के नाम पर उस छोटे से कस्बे में कई फ्लाई ओवर बना…

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विशिष्ट कहानीकार : अंजू शर्मा

उम्मीदों का उदास पतझड़ साल का आखिरी महीना है ऑटो से उतरकर उसने अपने दायीं ओर देखा तो वह पहले से बस स्टॉप पर बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी! उसने एक उचाट सी नज़र उस पर डाली और अपनी पेंट की जेबों में हाथ डाले, वह सुस्त कदमों से गार्डन के गेट की ओर बढ़ चला! उसके मूक निमन्त्रण पर थके कदमों से वह भी उसका अनुसरण करने लगी! लग रहा था मानो वे दोनों एक अदृश्य उदासी की डोर से बंधे साथ चल रहे थे! यह दिन भी…

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