खास कलम : ज़हीर अली सिद्दीक़ी

ज़हीर अली सिद्दीक़ी की तीन कविताएं नंगे पांव ‘सड़क’ ख़ासा तप रही रास्ते कांटें भरे नंगे पांव चल पड़े मंज़िल ए उत्साह में सफ़र लम्बा देखकर उलझनें बढ़ती गयीं देखकर कतार पीछे हौसला बढ़ता गया देखकर पैरों में छाले दूर मंज़िल राह की सड़क भी बेचैन थी बेबशी के आह पर हौसला बेशक़ बुलन्द देखकर मंज़िल क़रीब कितने हैं दम तोड़ देते जीत के बेहद क़रीब फ़तह होती जंग में ज़िंदादिली की राह से टूट जाती हार भी जीजिविषा की प्रहार से मैं सरहद हूँ गोलियों की आवाजें ये कैसी…

Read More

खास कलम : डॉ अन्जुम बाराबंकवी

1 दर्द से, रंज से, तकलीफ़ से हलकान हैं हम, इतनी आबादी में रहते हुए वीरान हैं हम।   इन दिनों ख़ौफ़ का बेचैनी का उन्वान हैं हम, एक बे-देखे से दुश्मन से परेशान हैं हम।   ग़म की ये धुंध छटेगी तो खुलेगा ये भी, किन मसाइल के सबब दर्द का दीवान हैं हम।   इस मुसीबत में भी लोगों का बुरा चाहते हैं, शर्म आती है ये कहते हुए इंसान हैं हम।   जिसको देखो वो हिफाज़त की क़सम खाए है, ऐसा लगता है कि लूटा हुआ सामान…

Read More

खास कलम :: ड़ा. अँजुम बाराबन्कवी

.1 जब चमकने लगा क़िस्मत का सितारा मेरा खुद बखुद बनने लगे लोग सहारा मेरा   आप को चाँद सितारों के सलाम आएंगे आप समझें तो किसी रोज़ इशारा मेरा   जानें किस किस की दुआएँ मेरे काम आई हैं वर्ना तक़दिर में लिख्खा था, ख़सारा मेरा   अब तो वह भी मेरे कपड़ो में शिकन ढुंढता है जिस ने पहना है कई साल उतारा मेरा   तुम भी गढ़ने लगे सैराबी के झूठे किस्से तिश्नगी पर तो अभी है इज़ारा  मेरा   कुछ नशा कम हो अमीरी का तो…

Read More

खास कलम :: कुमारी लता प्रासर

1 कह दे कोई मौसम से हम प्रेम की वफ़ा लिखते हैं आता जाता रहे वह यूं हीं मेरी जिंदगी में मोहब्बत की कलम से हम सहीफा लिखते हैं! 2 सारे गिले-शिकवे भुलाकर हवा ने मौसम का एहतराम किया मौसम को भी जाने क्या इलहाम हुआ! 3 गुजर किसका हुआ ज़मानें में प्यार के बगैर कांटे भी कर लेता है फूलों संग सैर! 4 उन आंसुओं को कौन गिनेगा जो बिना किसी पत्थर से टकराये गिरते हैं उसके लिए तेरा उस पर हंसना ही काफी है! चलो क्षितिज के पार…

Read More

खास कलम :: डॉ पंकज कर्ण की ग़ज़लें

1 बहुत बारीकियों से तोलता है खरा सिक्का कभी जब बोलता है नसीहत है के उससे बच के रहिए जो कानों में ज़हर को घोलता है किसी के वश में ये रहता नहीं है सिंहासन है ये अक्सर डोलता है मैं फिर मशहूर होता जा रहा हूँ वो मेरे पीठ पीछे बोलता है जरूरतमंद की खातिर ए ‘पंकज’ कहाँ कोई दरों को खोलता है 2 रोज़ एक ज़ख़्म नया आ के लगा देता है मेरा क़ातिल मुझे जीने की दुआ देता है क्यों न उठ जाए अदालत से भरोसा अपना…

Read More

खास कलम : अंजनी कुमार सुमन

1 ये है मेरा ये है तेरा को किनारा रखना मेरा भारत तो हमारा था हमारा रखना कहा इकबाल ने सारे जहाँ से अच्छा था हमारे देश को वैसा ही दुबारा रखना किसी भी मुल्क में होता नहीं ऐसा यारों सभी जातों सभी धर्मों को दुलारा रखना हटा दो देश के ऊपर घिरे सितारों को जरूरी क्या है सितारे को सितारा रखना यहाँ सापों को भी मेहमान हम बनाते हैं हमें आता है सपेरे सा पिटारा रखना 2 हवा पर गर हवा दोगे तो फुग्गा फूट जाता है कई सपनों…

Read More

खास कलम: अफरोज आलम

खुद कलामी  मेरे रूखसार पे जो हल्की हल्की झुर्रियां आ गई हैं यकिनन उस को भी आ गई होंगी जिंंदगी के सफ़र मे उमर के जिस ढलान पर मैं खडा हूँ यकीनन वो भी वहीं खडा होगा शब-वो-रोज के मद-व-जजर रंज-व-गम, आंसू  व खुशी सरदी गरमी, सुबह शाम से उलझते हुए चढती उमर का वो चुलबुलापन जो अब संजीदगी में ढल चुका है एेन मुमकिन है उस के भी मेजाज का हिस्सा होगा । हां ये मुमकिन है गैर मतवकाै तौर पे सरे राह तुम कहीं कभी मिल भी जाओ…

Read More

खास कलम :: ज़फर अहमद

मेरे मन में कौंधते हैं  मेरे मन में कौंधते हैं कुछ सवाल कि लोग क्या सोचते हैं? मेरे बारे में! मुझसे क्या अपेक्षाएं क्या आशाएं हैं उनको क्यों समझ नहीं आती मेरी बेचैनी और मेरे चुप रहने का कारण क्या चाहता हूं में लोगों से ये मेरी समझ में भी नहीं आता क्या कारण है कि इन उलझनों में उलझ जाता हूँ कभी कभी अपनी बात रख नहीं पाता दूसरों के सामने और वक्त बीत जाने पर अफसोस क्यों होता है? कौंधता है ये सवाल कि इन सवालों का जवाब…

Read More

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / अमन के नाम ग़ज़ल :: के.पी.अनमोल

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / अमन के नाम ग़ज़ल :: के.पी.अनमोल कैसा ग़ज़ब है उसने किया राम राम राम आते ही कह दिया है ‘विदा’ राम राम राम अच्छा नहीं हुआ है मगर हो गया है बस जो हो गया बुरा ही हुआ राम राम राम किरदार बस जवान हुआ था अभी-अभी परदा अभी है कैसे गिरा राम राम राम राही ज़रा-सी देर रुका और चल दिया सब देते रह गये हैं सदा राम राम राम भीतर की आह करती रही हाय हाय हाय बाहर से दर्द कहता रहा राम…

Read More

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / एक भाई का चले जाना :: गरिमा सक्सेना

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / एक भाई का चले जाना :: गरिमा सक्सेना अमन चाँदपुरी २०-२१ साल का एक लड़का, कोई नहीं सोचता होगा कि लेखन में इस उम्र में कोई इतना परिपक्व व साहित्य के प्रति गम्भीर हो सकता है। अमन से मेरा पहला परिचय दोहा दंगल समूह में दोहा रत्न प्रतियोगिता के दौरान हुआ। वर्ष था २०१७ अमन ने जिस बारीकियों के साथ मेरे दोहों पर टिप्पणियां की वह अद्भुत था। जितना मैं उससे प्रभावित थी शायद उतना ही वह भी। इसके बाद उसका और मेरा साहित्यिक संबंध…

Read More