विशिष्ट ग़ज़लकार : रमेश ‘कँवल’

रमेश ‘कँवल’ की ग़ज़लें 1 मुंह पे गमछा बाँधने की ठान ली गाँव ने दो गज़ की दूरी मान  ली   आपदाओं में भी अवसर खोजना यह कला भी देश ने पहचान ली   मास्क, सैनीटाइज़र बनने लगे देश ने किट की चुनौती मान ली   ट्रेन मजदूरों की ख़ातिर चल पड़ीं बच्चों ने घर पर सुखद मुस्कान ली   शहर से जब सावधानी हट गयी दारु की बोतल ने काफ़ी जान ली   कुछ मसीहा जब गले मिलने लगे मौत ने दहशत की चादर तान ली   थी क़यादत…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : डॉ भावना

1 लोगों जरा तुम सुन लो रक्खो बहुत सफाई कोरोना नाम की इक चीनी बीमारी आई इक दिन दवा बनेगी ,इक दिन हम मात देंगे तब तक ये देशवासी छोड़ो जरा ढिठाई  मन कांप-कांप  जाता है देख कर ये तांडव संदेह कुछ रहा न जैविक है यह लड़ाई  हाथों को धोते रहना, चेहरे को ढक के रखना  महंगी पड़ेगी वरना तुमको ये बेवफाई मेरी ये बात मानो, बस दूरियां बना लो  जो हो, सुरक्षित रहना, खुद से करो सगाई

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विशिष्ट ग़ज़लकार : दिनेश प्रभात

दोस्तो! साहित्य में नौ रस होते हैं. सोचा भी नहीं था कि कभी दस वांँ भी रस होगा और उसका नाम होगा – वायरस. कविताओं में सबसे ख़तरनाक रस होता है ‘वीभत्स’. मगर ‘कोरोना वायरस’ इससे भी डरावना है. कवि को इस पर भी कलम चलानी पड़ेगी और मेरे जैसा सुकुमार कवि (प्रेमिल गीतों का रचयिता) इस दुर्दांत विषय पर भी रचना लिखेगा, यह अकल्पनीय था. बहरहाल, देश की राजधानी कह रही है, आकाशवाणी कह रही है और सावधानी कह रही है कि सिर्फ़ – बचिये. लापरवाही का इतिहास मत…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : के.पी.अनमोल

1 मौला मुझको घर जाना है माई रस्ता देखे है छत, पनियारा, ओसारा, अँगनाई रस्ता देखे है   पिछली बार कहा था बेटा इक दिन वीडियो कॉल तो कर शक्ल दिखा दे, आँखों की बीनाई रस्ता देखे है   भाई की आँखों में दिखती हैं अब कुछ-कुछ चिंताएँ उन आँखों में पापा की परछाई रस्ता देखे है   अबकि दफ़ा तो बड़की अम्मा ने भी ख़बर ली बेटे की यानी अब तो इस बेटे का ताई रस्ता देखे है   मेरे घर में बिलकुल मेरे जैसा एक भतीजा है इस…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : डी.एम. मिश्र

1 यूं अचानक हुक्म आया लाकडाउन हो गया यार से  मिल भी न पाया लाकडाउन हो गया बंद पिंजरे में किसी मजबूर पंछी की तरह दिल हमारा फड़फड़ाया लाकडाउन हो गया घर के बाहर है कोरोना, घर के भीतर भूख है मौत का कैसा ये साया लाकडाउन हो गया गांव से लेकर शहर तक हर सड़क वीरान है किसने ये दिन है दिखाया लाकडाउन हो गया किसकी ये शैतानी माया, किसने ये साजिश रची किसने है ये जुल्म ढाया लाकडाउन हो गया ज्यों सुना टीवी पे कोरोना से फिर इतने…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : अनिरुद्ध सिन्हा

उदास-  उदास  सफ़र  था  उदास  रस्ता भी उदास लगता था मुझको ख़ुद अपना साया भी   हमारी  रात  उजालों  से  कब  हुई  रौशन बना  के  चाँद  उसे  आइना  में देखा  भी   ज़मीं ही  सहरा में तब्दील हो न जाए कहीं वो धूप  है कि  उबलने  लगा है दरिया भी   वो अपने ख़त से भी अंजान था मैं क्या करता तो  उसका  नाम  दिखा कर  उसे पढ़ाया भी   उसे समझना  भी आसान  कुछ नहीं था,और बदल-बदल के वो मिलता था अपना चेहरा भी ……………………………………………………….. परिचय :ग़ज़लकार की कई…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: महेश अश्क

1 सुबह को मां ने कहा था चाय थोड़ी और दे शाम तक चौके में बर्तन झनझनाते रह गए   तब जो अपनापन था सूरज में, वो अब है ही नहीं तू किसी दिन धूप को,बाहों में भर के देख ले   भीड़ सब उनकी ही है,चाहे इधर चाहे उधर और तुम्हें लगता है,तुम करते हो सारे फैसले   आपका तो झूठ भी, कुछ इसकदर भारी पड़ा वाकई जो सच थे सब , किस्सा कहानी हो गए   जब तुम्हारे हाथ  कश्ती मौज तूफां कुछ नहीं फिर तो दरिया पर…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: घनश्याम

1 अलग तुमसे नहीं मेरी कथा है तुम्हारी ही व्यथा मेरी व्यथा है ये गूंगे और बहरों का शहर है किसी से कुछ यहां कहना वृथा है हताहत सभ्यताएं हो रही हैं हुआ पौरुष पराजित सर्वथा है तुम्हीं से ज़िन्दगी में रोशनी है चतुर्दिक कालिमा ही अन्यथा है बिना बरसे घुमड़ कर भाग जाता कृपण, बादल कभी ऐसा न था है समय का दोष है या आदमी का सदा ऐसे सवालों ने मथा है अभी ‘घनश्याम’ की पूंजी यथा है समर्पण, प्यार, अपनापन तथा है 2 शुद्ध अंत:करण नहीं मिलता…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: सुधीर कुमार प्रोग्रामर

सुधीर कुमार प्रोग्रामर की पांच ग़ज़लें 1 लगाकर आग बस्ती से निकल जाने की आदत है जिन्हें हर बात में झूठी कसम खाने की आदत है चुराकर गैर के आंसू बना लेते हैं जो काजल उन्हें खुशियों की इक दुनिया बसा जाने की आदत है सजीले बागबानी में टहलने आ गए साहब जिन्हें फूलों की रंगत पे बहक जाने की आदत है इजाजत है नहीं कहना आवारापन को आवारा बड़े हाकिम का बेटा है जुल्म ढाने की आदत है जो मेहनत से हथेली पर हुनर बोये हुनर बांटे उन्हें पाताल…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: स्वदेश भटनागर

1 वक्त ने कैसी तल्खियां दे दी कब्र के नाम चिट्ठियां दे दी ले के लम्हों ने हमसे आवाजें बात करने को चुप्पियां दे दी छुप गये हर्फ जाके लफ्जों में किसने कागज को बर्छियां दे दी ऊंघते हैं ये क्यों हसीं मंजर सुबह को किसने लोरियां दे दी हमने बच्चों से छीनकर तितली याद करने को गिनतियां दे दी 2 किरनों की तरह हंस पड़ा अंदर कौन सूरज-सा यह उगा अंदर ये जो उठकर गया है इक लम्हा देर तक शाख-सा हिला अंदर रास्ते खुद में जब उलझ जाये…

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