विशिष्ट गजलकार: सुशील साहिल

1 निगाहें मेरी जाती हैं जहाँ तक नज़र आता है तू मुझको वहाँ तक महब्बत की अजां देता रहूँगा कोई आये, नहीं आये यहाँ तक कमर तक आ गया आबे-मुहब्बत ज़रा देखें ये जाता है कहाँ तक दिले-नादां ज़रा अब बाज़ आ जा उसे हम छोड़ आये हैं मकाँ तक जहां में धूम हिंदी की मची है नहीं महदूद ये हिन्दोस्ताँ तक शबाबो-मैकदा से तेरी रग़बत कभी नीलाम कर देगी मकाँ तक तेरा जलवा हर इक शय में निहाँ है तू ही तू है ज़मीं से आसमाँ तक न बाज़…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: डॉ. राकेश जोशी

1 इन ग़रीबों के लिए घर कब बनेंगे तोड़ दें शीशे, वो पत्थर कब बनेंगे कब बनेंगे ख़्वाब जो सच हो सकें और चिड़ियों के लिए पर कब बनेंगे बन गए सुंदर हमारे शहर सारे पर, हमारे गाँव सुंदर कब बनेंगे शर्म से झुकते हुए सर हैं हज़ारों गर्व से उठते हुए सर कब बनेंगे योजनाओं को चलाने को तुम्हारे वो बड़े बंगले, वो दफ़्तर कब बनेंगे आज तो संजीदगी से बात की है अब ये सारे लोग जोकर कब बनेंगे कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूं तुम कहो, बच्चे…

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श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी की गजलें

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी की गजलें (1) दश्त में प्यासी भटक कर तश्नगी मर जाएगी ये हुआ तो ज़िंदगी की आस भी मर जाएगी रोक सकते हैं तो रोकें मज़हबी तकरार सब ख़ून यूँ बहता रहा तो ये सदी मर जाएगी फिर उसी कूचे में जाने के लिए मचला है दिल फिर उसी कूचे में जाकर बेख़ुदी मर जाएगी आँख में तस्वीर बनकर आज भी रहता है वो आ गए आँसू तो ये तस्वीर ही मर जाएगी बोलना बेहद ज़रुरी है मगर ये सोच लो चीख़ जब होगी अयाँ तो…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : प्रेम किरण

1 हसीं मंज़र सलामत है ये दुनिया ख़ूबसूरत है नदी में चांद उतरा है क़यामत की अलामत है तुम्हारी झील सी आंखें हमारी प्यास बरकत है इधर है आग का दरिया उधर मेरी मुहब्बत है हमें नफ़रत की दीवारें उठाने में महारत है इसे काटो उसे जोड़ो अदब मेंभी सियासतहै हरइक चेहरा मुखौटा है दिखावे की शराफ़त है तुम्हे कैसे कोई चाहे न सूरत है न सीरत है किरन जी ख़ैरियत से हैं मगर यारोंको दिक़्क़त है 2 शजर एक ऐसा लगाया गया बहुत दूर तक जिसका साया गया दुआएं…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : कुँअर बेचैन

1 मिल न पाए जब ज़मीं पर, तो उड़ानों में मिले बन के बादल दोस्त हम कितने ज़मानों में मिले अपनी क्या औक़ात जब बिकने लगेभगवान भी उनके बुत मंदिर से भी पहले दुकानों में मिले हमसे मत पूछो निचोड़ा किस क़दर उनको गया फूल क्यारी में कहाँ, अब इत्रदानों में मिले ये नई कालोनियाँ, ये फ्लेट क्या दे पायेंगे वो जो रिश्ते हमको गलियों के मकानों में मिले जिनकी ख्वाहिश है कि फिर टुकड़ों में बँट जाए चमन ऐसे कुछ चेहरे भी अपने बाग़वानों में मिले क्या पता सादा…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : ध्रुव गुप्त

1 हद से भी बढ़ जाएंगे तो क्या करोगे चांद पर अड़ जाएंगे तो क्या करोगे इस क़दर आवारगी में दिल लगा है हम कभी घर जाएंगे तो क्या करोगे लाख टूटी ख्वाहिशों से दिल भरा है ख़ुद से ही लड़ जाएंगे तो क्या करोगे यूं नहीं समझाओ रिश्तों की सियासत शर्म से गड़ जाएंगे तो क्या करोगे इनसे जी बहलाने की आदत पड़ी है ज़ख्म सब भर जाएंगे तो क्या करोगे बेसबब यह ज़िन्दगी गुजरी ख़ुदाया हम अगर मर जाएंगे तो क्या करोगे 2 गरचे सौ चोट हमने खाई…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : दिनेश प्रभात

1 पांव को आये न देखो आंच बस्ती में हर तरफ बिखरे हुए हैं कांच बस्ती में क्यों मरी उसके कुएँ में डूबकर औरत चल रही सरपंच के घर जांच बस्ती में आग के शोले उसी की ओर लपके हैं जिस गली में रह रही थी सांच बस्ती में सेठ, थानेदार ,मुखिया, पंच, पटवारी डालते डाके ये दिन में पांच बस्ती में ऐ कबूतर! आज तू आकाश में मत उड़ प्यार की चिट्ठी हमारी बांच बस्ती में 2 झील है, तट है, लहर है, कश्तियां हैं पार जाने पर मगर…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : केशव शरण

1मेरी छोटी-सी उलझन को सुलझाने में साथी मुझको लेकर आए मयख़ाने में शीशा तोड़ा फिर दिल तोड़ा पर जाने दो ऐसा उनसे हो जाता है अनजाने में मतलब की ये दुनिया है जो मायावी है मैं क्या हूं जो आ जाता हूं भरमाने में मुस्कानों के फुसलाने में आ जाता हूं आ जाता हूं मृदु शब्दों के बहलाने में इन्कार नहीं है जां देने में जाने-जां इन्सान अगर कुछ खोता है कुछ पाने में स्वागत में दो बिस्कुट केवल और नहीं कुछ जाने कितना ख़र्च हुआ मेरा आने में क्या…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : कृष्ण कुमार प्रजापति

1 खुलके हँसना – मुस्कुराना आ गया हमको भी अब ग़म छिपाना आ गया दोस्त भी दुश्मन नज़र आने लगे जाने कैसा ये ज़माना आ गया जब चमन में टूट कर बिजली गिरी जद में अपना आशियाना आ गया चोट सह लेने की हिम्मत आ गयी दर्द में भी गुनगुनाना आ गया आँधियों से कह दो मैं डरता नहीं अब मुझे भी घर बनाना आ गया इक जवानी आप पर क्या आ गयी हर किसी से दिल लगाना आ गया ये तो उसकी मेहरबानी है “कुमार” शेर कहना , गीत…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : अशोक मिजाज

1 मोहब्बत की वो शिद्दत आज भी महसूस होती है, पुरानी चोट है लेकिन नई महसूस होती है। मेरी आँखों में तू ,ख़्वाबों में तू,साँसों में तू ही तू, न जाने फिर भी क्यूँ तेरी कमी महसूस होती है। मुझे आराम मिलता है तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में, कि सब छावों से ये छावों घनी महसूस होती है। अगर छूना भी चाहूं तो तुझे में छू नहीं सकता, कोई दीवार राहों में खड़ी महसूस होती है। मैं जब बिस्तर पे जाता हूँ कभी तन्हा नहीं रहता, कोई शय मुझको सीने…

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