विशिष्ट गीतकार : राहुल शिवाय

 बाज़ारी अजगर   बेच रहा जंगल अब शावक की खाल माँ अपने लालों को रख तू सम्भाल नयी-नयी विज्ञप्ति नये-नये रूप छाया तक बेच रही अब तीखी धूप फाँस रहा जीवन को यह अंतरजाल खेत, हाट निगल गये निगल गया गाँव बरगद भी खोज रहा गमले में ठाँव बाज़ारी अजगर का रूप है विशाल चन्दन-सा महक रहा काग़ज़ का फूल कृत्रिमता झोंक रही आँखों में धूल जान रहे फिर भी हैं मौन हर सवाल। हम सब का इतवार एक चाय के इंतज़ार में बैठा है अख़बार खोज रही हैं कलियाँ कब…

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 विशिष्ट गीतकार : वशिष्ठ अनूप

कल एक नर्स की मासूम बच्ची और एक पुलिस के मासूम बच्चे को माता-पिता के लिए तड़पते देखकर मन बहुत भावुक हो गया।महामारी से लड़ रहे ऐसे सभी डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस,प्रशासन,मीडियाकर्मियों और सफाईकर्मियों के लिए उसी मन:स्थिति में लिखा गया एक गीत- 1 तुम्हारी  कोशिशों से  ज़िन्दगी  की जंग जारी है, तुम्हारे दम से ही ख़ुशहाल यह दुनिया हमारी है।   लगा दी तुमने अपनी ज़िन्दगी इस देश की ख़ातिर, है घर-परिवार सब छोड़ा, सुखद परिवेश की ख़ातिर, कहीं   रोता   हुआ  बेटा, कहीं  बेटी  दुलारी  है।   तुम्हीं हो…

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विशिष्ट गीतकार : मृदुल शर्मा

1 सगुन पांखी अब नहीं इस तरफ आते।।   जि़न्दगी जकड़ी हुई है हादसों मे। खून बन कर बह रहा है भय नसों मे।   स्वस्ति-वाचक शब्द फिरते मुँह चुराते।।   हाथ खाली, पेट खाली, मन दुखी है। मुश्किलों का फूटता ज्वालामुखी है।   प्राण-पंडुक देह मे हैं  कसमसाते।।   काल की विकराल गति को थामना है। ज़िन्दगी जीते यही शुभकामना है।   दिन फिरें फिर मृदुल खुल कर खिलखिलाते।। 2 मानव की साँसों से देखो यह कैसी हो रही शरारत।।   नियमों की धज्जियां उड़ा कर बना रहे हैं…

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विशिष्ट गीतकार : रंजन कुमार झा

रंजन कुमार झा (1) व्याधि तुझे तो आना ही था सँग कुदरत के इन मनुजों ने जो  निर्मम व्यवहार किया है भू, जंगल, पर्वत, नदियों पर जितना  अत्याचार किया है इस सबसे आहत हो उसको रौद्र रूप दिखलाना ही था व्याधि तुझे तो आना ही था धन वैभव मेरे हों वसुधा पर मेरा ही राज रहे बस हर मानव की चाह यही उसके ही सिर पर ताज रहे बस क्षत-विक्षत तब कायनात को एक कहर बरपाना ही था व्याधि तुझे तो आना ही था धर्म-ध्वजा पाखंडी के भी हाथों में…

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विशिष्ट गीतकार : मंजू लता श्रीवास्तव

धन्य ये प्राण हो गए हाट हुए हैं बंद घाट सुनसान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   था स्वतंत्र अब तक यह जीवन अपनी शर्तों पर ही चलता समय अचानक ऐसा बदला अब अनुशासन में ही पलता   एक अजाने भय से सब हलकान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   हाथ मिलाना बंद,कहीं भी आना जाना बंद हो गया रेलिंग,कुर्सी,गेट,आयरन छूने पर प्रतिबंध हो गया   जीवन शैली के निश्चित प्रतिमान हो गए जीवन के अवरुद्ध सभी अभियान हो गए   बाहर…

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विशिष्ट गीतकार : शुभम् श्रीवास्तव ओम

काँपता है गाँव गाँव में कुछ लोग लौटे हैं शहर से! हैं वही परिचित वही अपने-सगे हैं पाँव छूकर फिर गले सबके लगे हैं रोज के निर्देश से कुछ बेखबर से! कौन जाने, कौन क्या- लाया कहाँ से सोचने का हर सिरा गुज़रा यहाँ से काँपता है गाँव, सहसा-एक डर से।   जैव-आयुध का निशाना हर तरफ हैं सिर्फ हत्यारी हवाएँ और मजबूरी है अपनी साँस लेना! भोर से लेकर अंधेरी रात तक बस चीखना-रोना सहमना-हाँफना है जीन में है आज तक परमाणु-हमला यह अपाहिज देह- अपनी जन्मना है जैव-आयुध…

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विशिष्ट गीतकार : राजेन्द्र वर्मा

1  पीठ पर माँ बेटा माँ को लाद पीठ पर चला गाँव को । देश बंद है, ख़त्म हुआ सब दाना पानी, दो रोटी देने में भी काँखे रजधानी,   रेल-बसें सब हक्का-बक्का खड़ी हुई हैं, अब तो चलते ही रहना, रुकना न पाँव को ।   सत्ता दुबकी-दुबकी बैठी चिन्तन करती, चोर-शाह का खेल खेलती, झोली भरती,   कोरोना सबकी छाती पर मूँग दल रहा, मात दे रहे मास्क-मुखौटे काँव-काँव को ।   कैसे भी, अब तो काले कोसों चलना है, रस्ते में ही सूरज को उगना-ढलना है,  …

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विशिष्ट गीतकार :: डॉ मंजू लता श्रीवास्तव

(1) पतझर पर कोंपल संदेश लिख रहे माघ-अधर जीवन उपदेश लिख रहे डाल-डाल तरुवों पर सरगम के मधुर बोल आशा के पंथ नये मौसम ने दिये खोल समय फिर पटल पर ‘हैं शेष’ लिख रहे पीत हुए पत्रों से गबीत चुके कई माह समय संग जाग रहा खुशियों का फिर उछाह नये स्वप्न अभिनव परिवेश लिख रहे युग-युग परिवर्तन है पंथ अलग,अलग गैल नवविचार, नवदर्शन नयी क्रान्ति रही फैल डाल-डाल सुखद फिर प्रवेश लिख रहे   (2) सूरज का मुखड़ा उदास है निशा काँपती दिन निराश है अरुणाई पीहर जा…

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विशिष्ट गीतकार :: डॉ संजय पंकज

दो गीत : संदर्भ पर्यावरण 1. कंकरीट के जंगल में चली उजाले की आँधी हरियाली को लील गई! खिड़की से उतरा चंदा लोहे पर अटक गया है कंकरीट के जंगल में सूरज भी भटक गया है रौशन दानों पर जुगनू तितली को कील गई! नीलकंठ – सुग्गा – मैना गौरैया औ’ ललमुनिया जहर हवा के हाथों में सौंप गई अपनी दुनिया कंधे पर बैठी बुलबुल लेकर उसको चील गई! घायल है नील गगन अब और दिशाएँ पीली हैं धरती के पोर पोर में जल की धार नुकीली है प्राणों के…

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विशिष्ट गीतकार :: धीरज श्रीवास्तव

(1) क्या रक्खा अब यार गाँव में! नहीं रहा जब प्यार गाँव में! बड़कन के दरवाजे पर है खूँटा गड़ा बुझावन का!  फोड़ दिया सर कल्लू ने कल  अब्दुल और खिलावन का!  गली-गली में बैर भाव बस  मतलब का व्यवहार गाँव में!  क्या रक्खा अब यार गाँव में!  नहीं रहा जब प्यार गाँव में! बेटी की लुट गई आबरू बूढ़ा श्याम अभी जिन्दा!  देख बेबसी बेचारे की  मजा ले रहा गोविन्दा!  सच का है मुँह धुआँ-धुआँ बस  झूठों का अधिकार गाँव में!  क्या रक्खा अब यार गाँव में!  नहीं रहा…

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