पुस्तक समीक्षा :: के.पी.अनमोल

समालोचना के निकष पर ग्यारह ग़ज़लकार: विमर्श के बहाने – के. पी. अनमोल पिछले अनेक सालों से ज़हीर क़ुरैशी हिन्दी ग़ज़ल के प्रवक्ता ग़ज़लकार रहे हैं, इस बात पर कोई सन्देह नहीं। उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक संरचना में बड़ा योगदान दिया है। इधर कुछ समय से उनका गद्य लेखन भी लगातार प्रकाशित हो रहा है। उनका संस्मरण संग्रह ‘कुछ भूला कुछ याद रहा’ वर्ष 2016 में प्रकाशित हुआ है। साथ ही कुछ पत्रिकाओं के लिए लिखे गये उनके लेख, जो हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायरों पर केन्द्रित रहे हैं, जिनके लेखन…

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पुस्तक समीक्षा :: नीरज नीर

अगस्त्य के महानायक श्रीराम : एक मनुष्य के रूप में राम के अंतर्द्वंद्वों की पड़ताल – नीरज नीर राम कथा का कथानक ऐसा है कि इसे जितनी बार लिखा जाये, हर बार कुछ नए रंग, कुछ नए शेड उभर कर सामने आते हैं, जो पहले देखे, गुने, समझे गए कथ्यों से भिन्न होते हैं। हजारों वर्षों से राम और उनकी कथा भारतीय जनमानस का कंठहार बनी हुई है। हम राम को जिस रूप में देखते और पढ़ते आए हैं, वह राम का एक पूजनीय रूप है, जिसमे वे मर्यादा पुरुषोत्तम…

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पुस्तक समीक्षा : अरविंद भट्ट

पुस्तक समीक्षा :: वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता कविता लेखन एक साधना है. यह शब्दों का ताना-बाना भर ही नहीं होता. भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों को साधना पड़ता है, परखना पड़ता है और फिर कल्पना की कसौटी पर कसते हुए एकाकार हो जाना होता है. यह सब कार्य एक साधक ही कर सकता है जिसके ह्रदय में भावनाएं शब्दों का स्पंदन कर ती हों. जब कोई साधक कल्पनाओं के भंवर में से अपने अतीत को निकाल कर वर्तमान में प्रत्यक्ष करता है और जब वह शब्दरूपों को…

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पुस्तक समीक्षा : सवा लाख की बाँसुरी

पुस्तक समीक्षा : सवा लाख की बाँसुरी – सत्यम भारती ‘दर्द, विरह, आँसू, घूटन अगर न होते मित्र, तो फिर कवि होता नहीं दीनानाथ सुमित्र ।’ स्वभाव से अक्खङ, बातों से फक्कङ, चेहरे पर तेज, हाथों में क्रांतिकारी कलम, चेहरे पर समाजिक चश्मा, सर पर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की टोपी, बांहों में आशा का झोला,पैरों में परिवार का चप्पल- ऐसे है कवि दीनानाथ सुमित्र । मैनें कबीर को तो नहीं देखा लेकिन सुमित्र को देखा हूं, ये ऐसे अवधूत है जो अकेले समाज बदलने का मद्दा रखते है ।…

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पुस्तक समीक्षा : – डाॅ. भावना

भावनाओं का प्रतिबिंब : कई-कई बार होता है प्रेम – डाॅ. भावना “कई -कई बार होता है प्रेम“ प्रगतिशील, प्रतिबद्ध एवं प्रयोगधर्मी यवा कवि अशोक सिंह का सद्य प्रकाशित काव्य-संग्रह है, जो बोधि प्रकाशन से छप कर आया है। अशोक सिंह का यह संग्रह कई मायनों में खास है। परिवार व समाज की घटनाएँ संवेदना के केंद्र में हैं।. कवि ने परिवार में रोज घटित होने वाली घटनाओं व प्रसंगों को कविता का विषय बनाया है, चाहे मध्यमवर्गीय परिवार की कमर-तोड़ महंगाई का एहसास हो, या मां का स्नेहिल स्पर्श।…

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रोचकता की खुशबू से पन्ने महक रहे : पारुल सिंह

  रोचकता की खुशबू से पन्ने महक रहे : पारुल सिंह “यायावर हैं आवारा हैं बंजारे हैं”, ये किताब हाथ में लेते ही मुझे बहुत भा गई। सुंदर कवर, हल्का वज़न और गोल्डन स्याही से लिखा हुआ लेखक और किताब का नाम। क़िताब के पन्नों और स्याही की लिखावट की ख़ुशबू पाठक पर क्या प्रभाव छोड़ती है, यह हर पुस्तक प्रेमी समझ सकता है। किताब को पढ़ना उस पर लिखे हुए को ही पढ़ना नहीं होता पाठक के लिए। किताब को हाथों में थामना, खोलना उसकी ख़ुशबू में खो जाना…

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पुस्तक समीक्षा :: डॉ सपना तिवारी

वर्तमान यथार्थ का : ‘अनकही अनुभूतियों का सच’ वस्तुतः काव्य मानवीय संवेदना की भावाभिव्यक्ति है, जिसमें समग्र यथार्थ के साथ तदात्म्य स्थापना की प्रक्रिया चलती रहती है। कविता का काम है लोगों में चेतना को जगाना। कविता ही मानव जीवन के यथार्थ से जुड़कर मानवीय चेतना और आत्मा का नवनिर्वाण करती है। बावन विभिन्न विषयों के सारगर्भित कलेवर से सजा ‘अनकही अनुभूतियों का सच’ काव्य संग्रह अरविंद भट्ट का प्रथम काव्य संग्रह है। उनके प्रथम काव्य संग्रह को पढ़कर यह कतई महसूस नहीं होता कि संग्रह की कविताओं का सृजन…

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हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा

हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा सामान्य धारणा है कि हस्तीमल हस्ती ग़ज़ल-विधा पर विचार करनेवाले ग़ज़लकार हैं। इनकी ग़ज़लें सृजन और समय की सूक्ष्म,जटिल अंतःक्रियाओं के साथ चलती हैं। ग़ज़ल के आंतरिक सौंदर्य और उसकी मासूमियत से समझौता नहीं करते तथा भावों के संप्रेषण के लिए छंद की छूट नहीं लेते।इनके पास ग़ज़ल के वास्तविक स्वरूप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। ग़ज़ल में प्रयुक्त होनेवाले शब्दों के प्रति भी सावधान रहते हैं। शब्दों का वास्तविक सामर्थ्य ग़ज़लों में स्पष्ट रूप से उजागर होता…

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पुस्तक समीक्षा : डॉ.भावना

संवेदना को झकझोरती ग़ज़लें – शिखरों के सोपान                                                                                     – डॉ.भावना  ग़ज़ल की बात आती है तो बरबस ही प्रेम याद आता है, प्रेम में बीता पल याद आता है और याद आती है विरह- मिलन की बेला।  ग़ज़ल प्रेमी- प्रेमिका के बीच से कब आम जनता के दुख- दर्द तथा हास- परिहास के साथ- साथ  सामाजिक-आर्थिक  एवं राजनैतिक विसंगतियों का आईना बन हमारे सामने आ गई, पता ही नहीं चला। कुछ ग़ज़लकार दुष्यंत को इसका श्रेय देते हैं, तो कुछ का कहना है कि इसकी शुरुआत दुष्यंत के पूर्व…

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पुस्तक समीक्षा : अनिरुद्ध सिन्हा

डी.एम.मिश्र की ग़ज़लें लोक-जीवन का काव्यात्मक अंकन हैं डी.एम.मिश्र की ग़ज़लें अपने स्वगत चिंतन और आत्मानुभूति के लोक में स्वछंद विहार करती हुई नज़र आती हैं। इसका प्रमुख कारण है लोक से उनका जुड़े रहना। शोषण में जकड़ी हुई और पूंजीवादी व्यवस्था से आक्रांत लोक जीवन अपनी मुक्ति के लिए जैसे संकल्प-विकल्प कर सकता है और जिस सीमा तक विद्रोह अथवा पलायन कर सकता है उसका बड़ा ही काव्यात्मक अंकन हुआ है। हम यह भी कह सकते हैं इनकी ग़ज़लों ने लोक संवेदना की छ्द्म समस्यापूर्ति का महत्व गौण बना…

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