लघुकथा :: डॉ कुँवर दिनेश सिंह

डॉ कुँवर दिनेश सिंह की दो लघुकथाएं   आत्मा का घर “सादा जीवन, उच्च विचार”― बहुत-से महापुरुषों का यही उपदेश रहा है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि व्यक्ति अच्छे वस्त्र न पहने, वर्तमान समय के अनुसार परिधान को न बदले। लोग अक्सर कहते हैं कि भोजन अपनी पसन्द का खाना चाहिए और परिधान दूसरों की पसन्द का पहनना चाहिए। परन्तु परिधान में मैंने हमेशा अपनी ही पसन्द को ऊपर रखा। पूर्व का हो या पश्चिम का, परिधान वही ठीक होता है जो आपके तन को सही ढंग…

Read More

लघुकथा : अरविंद भट्ट

अरविंद भट्ट की दो लघुकथाएं   रोटी एक तो दिल्ली की जून की तपती, दहकती दोपहरी और शरीर को तंदूर की तरह सेंके जा रही लू और दूसरा  भट्टी बनी यह लोकल ट्रेन. गनीमत थी कि दोपहर की वजह से ऑफिस आने-जाने वालों की भीड़ उतनी नहीं थी जितनी सुबह-शाम के समय होती है. गर्मी इतनी थी की हलक सूखा जा रहा था. गर्मी की ही सोचकर उसने ट्रेन में चढ़ने से पहले कोल्ड ड्रिंक की बोतल ले ली थी और कुछ चिप्स के पैकेट ताकि इसी बहाने गर्मी को…

Read More

लघुकथा : कैलाश झा ‘किंकर’

बाबूजी ठीक कह रहे हैं – कैलाश झा किंकर   ‘कोरोनटाईन सेंटर के प्रभारी के रूप में तुमने ग़लत कमाई का जो अम्बार खड़ा कर लिया है,उसे देखकर मुझे तुम्हारे पिता होने का बहुत अफसोस है।मेरे आदर्श और मेरी नैतिकता पर तुमने जो दाग़ लगाया है,उससे मैं बहुत आहत हूँ।संतोष से बड़ा कोई धन नहीं है।अपने वेतन पर गुज़ारा करना सीखो ‘ वृद्ध पिता सुखेश बाबू ने अपने पुत्र समरेश को डाँटते हुए कहा । समरेश खुशामद भरी आवाज में कहा-पिताजी, आप अपने ज़माने की बात छोड़ दीजिए।आज सब कुछ…

Read More

लघुकथा :: ज्वाला सांध्यपुष्प

मां का आशीर्वाद – ज्वाला सांध्यपुष्प आज शहर के युवा चिकित्सक अमितशंकर के प्रथम पुत्र की छट्ठी की रस्म थी और वे खुद अनुपस्थित थे।शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति पधारे और भोज खाकर चले भी गए। उपहारों से अमित का घर भर गया है मगर उनकी पत्नी अस्मिता के चेहरे पर मायूसी-सी छाई है, पति के पुश्तैनी घर से न लौट पाने को लेकर।रात के ग्यारह बज रहे हैं और डा अमित अभी तक न लौटे हैं। शहर से तक़रीबन बीस किलोमीटर दूर देहात में मकान होने से तो ऐसा…

Read More

लघुकथा :: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सब्ज़ी मेकर इस दीपावली वह पहली बार अकेली खाना बना रही थी। सब्ज़ी बिगड़ जाने के डर से मध्यम आंच पर कड़ाही में रखे तेल की गर्माहट के साथ उसके हृदय की गति भी बढ रही थी। उसी समय मिक्सर-ग्राइंडर जैसी आवाज़ निकालते हुए मिनी स्कूटर पर सवार उसके छोटे भाई ने रसोई में आकर उसकी तंद्रा भंग की। वह उसे देखकर नाक-मुंह सिकोड़कर चिल्लाया, “ममा… दीदी बना रही है… मैं नहीं खाऊंगा आज खाना!” सुनते ही वह खीज गयी और तीखे स्वर में बोली, “चुप कर पोल्यूशन मेकर, शाम…

Read More

लघुकथा : मुकुन्द प्रकाश मिश्र

राजधानी एक्सप्रेस – मुकुन्द प्रकाश मिश्र मैं रेलवे स्टेशन पर बैठ कर ट्रेन का इंतजार कर रहा था ।किसी ने कहा ट्रेन हमेशा की तरह है 2 घंटे लेट ! यह सूचना सुनकर मैं वही एक कुर्सी पर बैठ गया कुछ ही समय बाद मैने देखा । एक बुजुर्ग जो शायद प्राकृतिक तथा माननीय यातनाओं का शिकार था वह कूड़े के ढेर पर बैठ अपनी असहनीय भूख को शांत करने के लिए रोटी का टुकड़ा ढूंढ रहा था उनका प्रयास बेकार नहीं गया और करीब आधा घंटा मेहनत के बाद…

Read More

लघुकथा : तारकेश्वरी तरु ‘सुधि ‘

प्रेम जैसे ही फोन उठाया वो बोली मेरे जीवन में आपने रंग भरे हैं । मैं कर्जदार हूँ आपकी । अपने घर आ गई हूँ । आपको हर पल याद किया।शादी के बाद पहला फोन आपको किया । सुनकर किरण ने चैन भरी सांस ली ।किसी कारण से शादी में नही जा पाई थी । दूसरी मुलाकात में जब किरण ने उसके कन्धे पर सान्त्वना के लिए हाथ रखा तो फफक- फफक कर रो पड़ी थी। वही एक पल था जिसमे किरण ने उसे दोस्त मान लिया था ॥ उसके…

Read More

लघुकथा : कामिनी पाठक

अहसास का बंधन वेे अतीत के पल भी कितने सुनहरे थे। चुपके -चुपके मिलना ,माता-पिता का डर , समाज का डर । वो पहली बारिश में हमारा मिलना , तुम्हारे सुंदर बदन पर बारिश की फुहार का मोतियों – सा थोड़ी देर के लिए जमना। वो प्यारी -प्यारी बातें ! कभी -कभी नाराज़ होना ,मेरा तुम्हें मनाना। विपरीत परिस्थितियों में भी अलग -अलग विचार धाराओं के होते हुए भी एक साथ मजबूती से खड़े होना । क्योंकि हमारा प्यार शर्तों पर नहीं , दिल से था । कोई बनावट नहीं…

Read More

लघुकथा : सुरेखा कादियान ‘सृजना’

राधिका ”राधिका इतने साल से तुम्हें बुलाने की कोशिश कर रही हूँ, पर तुम हो कि मानती ही नहीं | ऐसी भी क्या जिद कि अपने दोस्तों की भी नहीं सुनती| इस बार कॉलेज के पुनर्मिलन समारोह में तुम्हें आना ही है, हम कोई भी बहाना नहीं सुनेंगें | और इस बार इतने साल बाद केशव भी आ रहा है, वो आजकल इंडिया आया हुआ है | सोनाली अपनी रौ में बोलती जा रही थी और राधिका के कानों में बस यही गूंजता रह गया कि केशव भी आ रहा…

Read More

लघुकथा

नीलिमा शर्मा की लघुकथाएं अपना  सुख “पापा  आपके घर क्या बर्तन नही थे  जो माँ शादी में बर्तन फर्नीचर  लेकर आई थी ‘ बेटे ने हाथ से अखबार लेते हुए  गुप्ता जी से सवाल किया “बेटे सब कुछ था घर में  , लेकिन उन दिनों बेटी को विवाह में  सब कुछ देने का रिवाज़ था तो !! आप मना नही कर सकते थे क्या ? ” “ बेटा हमारे ज़माने में सब कुछ माँ बाबा निर्धारित करते थे , हम तो झलक भर लड़की की देखते थे  और हाँ मम्मी आप देख लो कहकर अपनी मोहर लगा देते…

Read More