विशिष्ट कवयित्री :: रानी सुमिता

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रानी सुमिता की छह कविताएं : 

 

 मन के भीतर मन

स्त्री के मन के भीतर

बसता है एक और मन

जैसे शाँत नदी के भीतर

बहती है एक अलहङ नदी

और समंदर के अंदर उफान

मारता है एक और समंदर

 

भीतर वाला मन

वाचाल स्वप्नदर्शी

ऊपर वाला मन

ओढ़ाये  गये लबादे के बोझ तले

बमुश्किल साँसे लेता हुआ

भीतर वाले मन की आँखों को

ढक लेता है अक्सर

लबादे का एक सूत

अनचाहे बंध जाता है

भीतर वाले मन पर

और बंद हो जाती है

आखिरकार एक दिन सारी आवाज़

भीतर वाले मन की!

दिखता है स्त्री के साथ

बस एक मन

ढोता रहता है

अशरीर हुए भीतरी  मन को

जीवन पर्यन्त!

चूल्हे पर अदहन के साथ

खदका देती हैं स्त्री भीतर वाले मन को

उफना कर बेमन  गिरा देती हैं अनचाहे गर्भ सा

अधखिले सपनों को गांठ में  बांधे

अवशेषित आँखें पहने

रिश्तेदारी निभाती है

स्थितियों की तुरपाई करती हुई

अहम मान बैठती है अक्सर खुद को

मौका मिलते मगर

दाल चावल की तरह

सान दी जाती हैं मसलों में

प्रश्न पूछती कई बार

कड़वी बोली से आँखें फेरती कॢई बार

अंतराल की चुप्पी का अंतर्नाद झेलती

उलझा लेती खुद को खुद में

माना जाता है सबसे गैर जरूरी काम जगत का

मुआफी माँगना स्त्री से

बरफ सी

आहिस्ता पिघलती जाती है

जीवन की चक्की में

हिचकोले झेलती

एकमन धारी ये स्त्रियाँ

अंततः नहीं भूलती

कलम उठाना

गोष्ठियों में जारी

स्त्री विमर्श को जीवित

रखने के लिए!

बरसो मेघ

भरे भरे से हो
मेघ
सिमटाये हो जैसे
भीतर ही भीतर
कोई आवेग..

क्या छुपा रहे
कोई दुख कोई विराग !
अश्रु रोकता कोई मन
भींच लेता जैसे
भीतर ही सब घुटन!

बहने दो नीर
बरसो झम झम
बोझिल मन
साझा करो

तनहा  हुई है धरा
ह्रदय  तिक्त
दरारें गहरी
पनघट सूने
दहलीज कोरी
पीड़ा सघनतम

बढ़़ो, करो आलिंगन!
तुम्हारे नीर से आकंठ
तर जायेगी धरा
दुख से दुख का ..
हो क्षरण !!

सूखी बारिश 

मैं पत्तों की बारिश के दरमियाँ खड़ी हूँ

झर रहे हैं बगैर मनमर्जी के झक्की से पत्ते

कुछ सूखे पत्ते

कुछ मुड़े पत्ते

कुछ सीधे पत्ते

कुछ कड़क पत्ते

झर रहे हैं पत्ते

गिर रहे हैं पत्ते…

ओ पतझड़ के झरते पत्तों

ओ बेशुमार बारिश से पत्तों

ढक लो

मुझे भी

सिर से पाँव तक

इस तरह

दिखूँ न एक जरा भी

टूटते पत्तों की यह

सूखी बारिश

कितनी अलग

बूंदों की उस

नम बारिश से

दिखला रही दर्पण,

इन टूटते पत्तों सा

अस्तित्व मेरा

कुछ बिखरा

कुछ झरता

कुछ टूटता

कुछ बीतता

पत्तों की बरसात!

मुझे भी ढक लो

अपने इन ऊंचे ढेर के भीतर

ढक लूँ मैं

मन के टूटन को

समेट लूँ

समस्त अस्तित्व को

तुम्हारे भीतर,

हवा के तेज झोके

जब बिखरा दे

तुम्हें दूर दूर

और बिसरा जाये

तुम्हारी पहचान

किस पेड़ के

अपना होने का था दावा

मैं भी देखूँ

तुम्हारी ये लड़ाई

तुम्हारी जद्दोजहद

ये कहानी

दूर से,

अपने अस्तित्व का

हर बिखरा कोना

बटोर कर

फिर स्थापित  करूँ

अपने वजूद की प्राण प्रतिष्ठा

जैसे तुम देखते हो

एकटक

अपने पेड़ को

दूर से ,

समय को पछाड़ते हो

जन्मते हो

फिर कोपल स्वरूप

हो कर ||

आत्मचिन्तन

उसने पैरों में चक्के पहन लिए हैं

कर्मठता के वस्त्र धारण कर

वह चक्करघिन्नी सी

घूमती रहती दिन भर

वह मोजे उजले करती

आँगन चमकाती

फूल सजाती

बमुश्किल मिले खाली पहर में

डूबती उतराती रहती

चिंतन में

उसने ठीक से खाया नहीं

उसने ध्यान से पढ़ा नहीं

बारिश में जुकाम पकड़े नही

धूप में वह भटके नहीं

घिरी रहती

अनंत विचारों से

सोच से उसने लगाव लगा रखा था

नहीं चाहा

झोली भर क्षण

खुद के वास्ते

व्यस्त घंटों के लघुत्तम अंश

छाँट रखे थे

अपनी हिस्सेदारी में

उतार रखा था खुद को

खुशी खुशी एक भँवर में

वह जल्दी में नहाती

जल्दी में खाती

उनींदी आँखें लिए

जिम्मेदारी निभाती जाती

आईने में वह ठीक से

झाँक भी नहीं पाती थी

उसकी व्यस्तताओं ने

खुद ही चमका रखा था

उसका चेहरा

अपने घर संसार को पहन ओढ़

एक आनंदातिरेक अभिमान से

डूबती उतराती वह

एक दिन

उस समारोह में

अचानक ही पढ़ लिया उसने

अपनो की नजर में

इक अनकही

कहीं पीछे छूटती सी

कुछ अनभिज्ञ सी

चौंक पड़ी वह

अरसे बाद

उस शाम

ध्यान से निहारा खुद को

आत्मचितंन में डूबी

बरसो बाद

वे ख्वाब जो महीन

रेखाएँ बन चुके थे

जोड़ना शुरू किया उसने

उस दिन

एक स्त्री जग गई

उसने अपने चक्कों का ब्रेक

ढूँढ लिया

एक माँ

एक पत्नी

आज मुखर हुई

खुद के लिए

जन्म लिया

इक इंसान ने

जो  अब अपने बारे में भी

सोचने लगी ।

इंतज़ार 

आसमां ताल ठोक कर खड़ा था

औऱ जमीं कहानी लिखने मे व्यस्त

सभी  जमे हुये थे

अपनी अपनी जगह पर

जमीन के अपने टुकड़े को

कस कर पकड़े हुये,

अपने हिस्से की जमीं से

अपने हिस्से के आसमां को

अपनी गवाही दिलवाते हुये!

चौधियाते इस उजियारे में

मैं ठिठके कदमों से

ढूँढ रही थी

अपना परिचय पत्र

अपने हिस्से की धूप…

मैं डूबना चाहती थी शनैः शनैः

पसरती धूप में

छीना झपटी से उकता

कभी तो ज़मीं पर उतरेगी धूप!

मुझे है

उस युग का इंतज़ार!

 

अनोखा बंधन 

कैसे नींद की

आगोश में

बिता दूं रात

 

न  तारों की गिनती

पूर्ण होती है कभी मुझसे

न मुक्त होता है मन

बौराये आकाश में

चांद के अकेले

छूट जाने की आकुलता से

 

यूं झरते हैं मन में

संबंध और रिश्ते

संभालने की हद तक

 

जैसे अंतिम शाख पर

उनींदे से बैठे पुष्प को

पेड़ संभालता फिरता है

दिन रात

भूल कर अपना वजूद!

चाहत का दूसरा नाम अनचीन्हा सा भय

सदियों से

प्रेम और विरह की

उदात्त  जोड़ी सा!

 

 

 

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