विशिष्ट गीतकार :: शिवनंदन सलिल

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1

सांझ होते ही नभ के सितारे जगे

कुछ हमारे लिए कुछ तुम्हारे लिये

नैन में सो रहे स्वप्न सारे जगे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

आमने सामने दीप जलने लगे

प्राण के पात्र में प्राण ढलने लगे

घूंट पर घूंट आसव के प्याले भरे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

पंखुड़ी-पंखुड़ी चूमती रह गयी

झील भी झील में उूबती रह गयी

दो किनारे-किनारे-किनारे रहे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

बिन बताये पहर तीसरा आा गया

तन थका मन थका दीप मुरझा गया

भोतर तक स्वप्न फिर भी कुंवारे रहे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

,

जिंदगी-जिंदगी की कथा हो गयी

पुष्प उद्यान में कुछ व्यथा बो गयी

दूब नभ के सितारे उतारे खडङें

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

2

हार गयी अब चूते-चूते छत की यह अगरी

ऐसे मत बरसो बदरी

ऐसे ना मत मोती बिखराओ

कोमल कुन्तल को न भिंगाओ

लगा छलकने यौवन देखे उपट गयी गगरी

ऐसे मत बरसो बदरी

वसन भीग कर सिमटा जाये

बरबस ही यौवन दिखलाये

नैन गड़ा कर रूप चुराये बस लोलुप नगरी

ऐसे मत बरसो बदरी

चोट कठिन बून्दों का सहना

कोमल तन पर झर-झर-झरना

वक्ष मध्य निष्ठुर धारायें ज्यों नदियां गहरी

ऐसे मत बरसो बदरी

इतना मत बहको बहकाओ

कुछ भी सोचो तरस भी खाओ

हमें जोगने दो यौवन-धन बाबुल की पगड़ी

ऐसे मत बरसो बदरी

 

3

तुम प्रभात की प्रथम किरण हो

नव जीवन का प्रथम चरण हो

केसर-सा कुंकुम कपाल पर

किरणों को मेला सा लगता

बिखरा कोमल केश-पाश यह

लहरों का रेला सा लगता

 

तुम वसुधा के युग नयन हो

नवजीवन का प्रथम चरण हो

 

थिरके हास कभी अधरों पर

मिल कर कभी क्षितिज बन जाते

होकर बंद बिखरे अमृत

खुलने पर मोती बरसाये

 

मधु छलकाते हुए चमन हो

नवजीवन के प्रथम चरण हो

काया कंचन मन वृदांवन

सोसों में मलयामिल बसेते

सयात-सुरों का संगम स्वर में

ताल सभी कदमों से बजे

तुम पायल की छनन-छनन हो

नवजीवन के प्रथम चरण हो

 

4

सांझ होते ही नभ के सितारे जगे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

नैन में सो रहे स्वप्न सरे जगे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

आमने-सामने दीप जलने लगे

प्राण के पात्र में प्राण ढलने लगे

घूंट पर घूंट आसव के प्याले भरे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिय

 

पंखुड़ी-पंखुड़ी चूमती रह गयी

झील भी झील में डूबती रह गयी

दो किनारे-किनारे-किनारे रहे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

बिन बताये पहर तीसरा आ गया

तन थका मन थका दीप मुरझा गया

भोत तक स्पप्न फिर भरी कुंवारे रहे

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

 

जिंदगी-जिंदगी की कथा हो गयी

पुष्प उद्यान में कुछ व्यथा बो गगयी

दूब नभ के सितारे उतारे खड़े

कुछ हमारे लिये कुछ तुम्हारे लिये

………………………………………………………………….

परिचय :  शिवनंदन सलिल के कई गीत-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. ये लगातार लिख रहे हैं. पत्र-पत्रिकाओं ने इनकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं

 

 

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One thought on “विशिष्ट गीतकार :: शिवनंदन सलिल

  1. बहुत कोमल भाव की श्रृंगारिक गीतें हैं, सलिल जी की। साधुवाद सर।
    चौथे गीत में पहले की पुनरावृत्ति हो गयी है

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