विशिष्ट कहानीकार :: गोपाल फलक

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आम पक गए हैं

  •  गोपाल फ़लक

 

खिड़की से बाहर देखा घुप अंधेरा था, बीच-बीच में झिंगुर की आवाज, भगजोगनी (जुगनू) का टिमटिमाना और कुत्तों का अलाप वातावरण को डरावना बना रहा था। आज ही खाज डुमरी गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में योगदान दिया। इसी गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति रामशरण बाबू के यहाँ एक कमरा मुझे मिल गया, साथ ही खाने पीने की पूर व्यवस्था थी। इनका मकान गाँव के अंतिम छोड़ पर था। नई जगह रात का सन्नाटा, कमरे में मद्धिम रौशनी में जलता हुआ लालटेन और लकड़ी की कुर्सी पर एक जग पानी और ग्लास। अपनी कुछ किताबों के साथ एक रेडियो अपने साथ लाया था। बेतिया शहर में रहते हुए इस तरह के सन्नाटे से मेरा साबका कभी नहीं पड़ा था। गाँव की नीरवता और स्वच्छ हवा कई बार मन को आनंदित भी करता था, फिर भी जाने किस कारण से भय का अनुभव कर रहा था। भय को दूर करने के लिए रेडियो पर विविध भारती ट्यून करने लगा, जिसे सुनने का आदी था, किन्तु बार-बार ट्यून करने पर भी आज रेडियो ने मेरा साथ नहीं दिया। बिछावन पर लेटे हुए, भविष्य की चिंता करने लगा, कैसे रह पाऊँगा? कैसे नौकरी निभेगी?

झिंगुर की आवाज पहले से कुछ तेज हो गया। कुत्ते भौंकते हुए दूर जा रहे थे। मैं खिड़की से बाहर घने पेड़ों और टिमटिमाते हुए जुगनूओं को निहार रहा था। धरती के उन सितारों को इतने इत्मीनान से देखने का यह पहला अवसर था। शहरी जीवन में इस तरह के दृश्यों से जुड़ने का अवसर नहीं मिल पाता है। झिंगुर की आवाज धीमी पड़ रही थी, जुगनूओं का चमकना जारी था। मेरा ध्यान अब भी बाहर ही था। नींद जाने कहाँ रूठ के बैठी थी। लगता है सारी रात यूँ ही बेचैनी में कटेगी। इसी ऊहापोह में मैं रात के कटने का इन्तजार कर ही रहा था कि मेरे कानों में दूर से कोरस में गीत, डफ और खजरी की आवाज सुनाई दी। मैं ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा कि यह आवाज किधर से आ रही है। तमाम प्रयत्नों के बावजूद मैं असफल रहा कि आवाज किधर से आ रही है, किन्तु कोरस धीरे-धीरे मेरे समीप आता हुआ जान पड़ा। आवाज स्पष्ट नहीं था, किन्तु नीरवता और सन्नाटे को तोड़ मेरे भीतर उत्साह और आनंद का संचार कर रहा था। अब ध्वनि स्पष्ट सुनाई दे रहा था, किन्तु गीत के शब्द स्पष्ट नहीं थे। खिड़की से सटकर बाहर झांकने का प्रयास किया तो दाई ओर कुछ मद्धिम रौशनी में छोटी-छोटी परछाई दिखी। डफ और खंजरी की आवाज पहले से कुछ तेज हो गया था। डम{{ डम{{ डिम{{ डिम{{ कोरस कानों में मिठास घोल रहा था। मेरा ध्यान उस ओर केन्द्रित हो गया। गीत अब साफ-साफ सुनाई पड़ रही थी। रौशनी भी करीब आ चुकी थी। गीत गाते नृत्य करते हुए लड़कियों का समूह बिल्कुल पास से गुजर रहा था। नृत्य करते लड़कियों का यह समूह एकदम उन्मुक्त, अल्हड़, बेपरवाह और स्वतंत्र। गौर वर्ण की सभी लड़कियाँ इस अंधेरी रात में परियों जैसी दीख रही थी।

यह इलाका थारू जनजातियों का है। शहरों की संस्कृति से भिन्न यहाँ की लड़कियों का अपना स्वतंत्र संसार है। यह मातृसत्तात्मक समाज है। झमटा नृत्य करती, गीत गाते हुए लड़कियों का समूह मेरे पास से आगे बढ़ रहा था। हिन्दी सिनेमा में दिखने वाले आधुनिक परिधान से सुसज्जित, चेहरे पर हंसी, उल्लास, मस्ती में डुबे हुए इन लड़कियाें का समूह प्रकृति से एकालाप कर रही थी। धीरे-धीरे गाँव के अंतिम छोर पर स्थित मंदिर के पास यह समूह पहुँचा, जहाँ से हल्की-हल्की आवाज मुझ तक पहुँच रही थी। यहाँ की लड़कियाँ जादू जानती हैं इनसे बच कर रहने की सलाह माँ ने दी थी। इनका नैसर्गिक सौन्दर्य देखकर ऐसा लगता है कि माँ ने ठीक ही कहा। गीतों की मधुरता ने कब मुझे नींद के आगोश में ले गया पता ही नहीं चला।

विद्यालय में काम करते हुए कुछ दिन बीता। अपने सह-शिक्षकों के काम के प्रति नकारात्मक भाव, बच्चों को पढ़ाने के प्रति अरूचि मुझे थोड़ा निराश किया। यद्यपि हार न मानने की जिद्द लेकर अपना काम शुरू किया। मेरे द्वारा किए गए नवाचार से विद्यालय का वतावरण बदलने लगा। लेकिन इतना भी बदलाव नहीं आया कि मैं संतुष्ट हो सकूँ। अभी भी बहुत कुछ करना शेष था। मेरे सहकर्मी मेरे इस क्रांतिकारी कार्य से ज्यादा खुश नहीं हुये, वे मेरे काम करने के तरीके को अपनी दिनचर्या में बाधा के रूप में देख रहे थे। ग्रामीणों को दबाव पड़ने का खतरा तथा उनकी अपेक्षा पर  खड़ा न उतरने की स्थिति में अपमानित होने का भय इन्हें सता रहा था। बच्चों में सीखने के प्रति ललक और उनके व्यवहार में आये सकारात्मक परिवर्तन ने मेरे भीतर ऊर्जा का संचार किया। बच्चों में आए सकारात्मक परिवर्तन को ग्रामीणों ने भी महसूस किया। मेरी प्रशंसा होने लगी, जो मेरे सहकर्मियों को रास नहीं आया। यह बदलाव शहरी सुविधा सम्पन्न स्कूलों की तुलना में कुछ भी नहीं था, किन्तु गांव के निजी स्कूलों से बेहतर था, क्योंकि यहाँ के शिक्षक जीवन के सभी प्रतिस्पर्द्धाओं में असफ़ल होने के बाद मजबूरी में अध्यापन का विकल्प चुना था। किसी भी तरह का कोई शिक्षाशास्त्रीय ज्ञान या शिक्षक के प्रशिक्षण का कोई अनुभव के अभाव में ही स्कूल खोल कर बच्चों को शिक्षा देने का व्यापार कर रहे थे।

लगभग आठ माह बीत चुके थे। एक दिन स्कूल के बरामदे पर बच्चों को पढ़ा रहा था। ऐसा महसूस हुआ कि सामने झाड़ी में लगे पेड़ के पीछे से कोई बार-बार झाँक रहा है। कई बार देखने का प्रयत्न भी किया लेकिन कोई नजर नहीं आया। ऐसा कई दिनों तक महसूस होता रहा, फिर मेरा ध्यान उधर से हट गया। एक दिन तीसरे क्लास का एक बच्चा अपनी कमीज में कुछ पके हुए आम लेकर मेरे पास आया। गौरव सर जी दीदी ने आपके लिए दिया है। ”तुम्हारी दीदी कहाँ है?“ सूरज कुछ नहीं बोला। मैंने डाँटते हुए पूछा ”कहाँ है तुम्हारी दीदी—। वह सहमते हुए सामने झाड़ी वाले पेड़ की तरह ईशारा किया। मैंने उधर देखा तो कोई नजर नहीं आयाµफ्वहाँ तो कोई नहीं है?य् वह बिना कुछ बोले उस तरफ़ देखने लगा। मैंने सूरज से कहाµफ्जाओ और उससे कह दो मुझे यह सब पसंद नहीं है। आईंदा ऐसा न करें। यह आम-वाम भी लेते जाओ।य् थोड़ा चिखते हुए मैंने कहा। तभी पेड़ की ओट से एक लड़की सहमी हुई सी मेरी ओर बढ़ी और मेरे पास आकर रूआंसी आवाज में बोली, फ्सर! पेड़ से पका हुआ और टूटकर गिरे हुए आम आपके लिए लाए हैं, यह मेरे अपने बगीचे का है। कहीं से चुरा कर नहीं लाए हैंय्µएक साँस में वह बोल गई। वह झुनिया थी, कुछ देर में उसे अपलक देखता रहा फिर उसे मना करने की कोशिश की, किन्तु वह तो देवता पर अर्पित करने वाले परसाद की तरह वह आम मुझे देना चाहती थी, चेहरे पर करुण भाव, आँखों में सजलता और समर्पित करने का भाव। मैंने इस हिदायत के साथ आम लेना स्वीकार किया की वह दुबारा ऐसा नहीं करेंगी, किन्तु दो दिनों के बाद फि़र वह कुछ पके आम को लेकर सूरज के साथ आ गयी। मैंने डाँट-डपट कर उसे विदा किया, जाते-जाते बार-बार आग्रह कर रही थी। आज का आम उस दिन से ज्यादा अच्छा और मीठा है, सर मना मत कीजिए, रख लिजिए। मेरे भीतर एक अनजाने भय ने उसे ग्रहण करने से रोक िदया। झुनिया तीन साल पहले इसी विद्यालय से पढ़ कर निकली थी। गाँव में ज्यादा उम्र हो जाने के बाद ही लड़कियों का दाखिला स्कूल में कराया जाता है, झुनिया अब व्यस्क हो गयी थी। उससे ज्यादा मेल-जोल रखना मैं ठीक नहीं समझा। मैं जिनके मकान में रहता था उनकी भतीजी थी झुनिया, सूरज इसका छोटा भाई। सूरज कभी-कभी शाम को मेरे कमरे में पढ़ने आ जाता था। विद्यालय के बाद मैं भी फुर्सत में ही था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं थी। अचानक एक दिन मेरे मकान मालिक झुनिया को पढ़ाने की सिफारिश की। फ्सर प्राथमिक पाठशाला छोड़ने के बाद झुनिया आगे पढ़ना चाहती थी, किन्तु पास में कोई स्कूल नहीं होने के कारण पढ़ नहीं सकी आप इसे पढ़ा देंगे, तो थोड़ी समझ बढ़ जाएगी। मेरे रहने तथा खाने-पीने की सारी जरूरतों का पूरा ख्याल उनके परिवार द्वारा रखा जा रहा था, मैं उन्हें इन्कार नहीं कर सका। आज शाम सूरज के साथ झुनिया भी पढ़ने आयी। उसके चेहरे पर संकोच और लज्जा के भाव साफ दिख रहा था, मैं थोड़ा असमंजस में था। नीचे चटाई पर दोनों बैठ गये। मैंने पढ़ाना शुरू किया। उसकी बुद्धिमत्ता अच्छी थी, किन्तु आगे बढ़ने के अवसर का अभाव था।य्

थारू जानजातियों का यह क्षेत्र चारों ओर घने जंगल और पहाडि़यों से घिरा हुआ है। हरे-भरे पेड़ और सदाबहार हरियाली मन को मोहने वाला है, वहीं दस्युओं के लिए भी काफी सुरक्षित जगह के लिए ख्यात है। अलग-अलग जगह से अपहृत लोगों को यहीं रखा जाता है। डाकूओं के आश्रय-स्थल के रूप में चर्चित यह क्षेत्र लूट, हत्या को अंजाम देकर डाकू यहीं छुप जाते हैं। डाकूओं का भय यहाँ के लोगों में व्याप्त था। डाकू गिराह की सक्रियता ने यहाँ के विकास को भी बाधित कर रखा था। बच्चों और उनके अभिभावक पर भी इनका दुष्प्रभाव साफ-साफ दिखाई पड़ता था। पढ़ाई और खेल के क्षेत्र में बच्चों की प्रगति कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा था। खेल महोत्सव का आयोजन गाँव के कुछ समृद्ध लोगों से मदद लेकर बड़े स्तर पर किया। जिसमें आस-पास के कई गांव के बच्चों पर हमारे विद्यालय के बच्चों की प्रतिभा भाड़ी पड़ी। ग्रामीणों ने मेरी जय-जयकार की। बच्चों की शैक्षणिक समस्याओं के साथ-साथ अपनी सामाजिक समस्याओं पर भी मैं पहल करता था। बच्चों के सामाजिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं को सुन कर यथा संभव समाधान करने का मेरा प्रयास रहता था। बच्चे बेझिझक अपनी समस्या मुझे बताते थे, जिनमें उनके अभिभावकों द्वारा नशा करना तथा नशा के व्यापार से जुड़ना प्रभुख था। बच्चों द्वारा प्रभात फेरी के माध्यम से नशा के दुष्परिणाम को बताया। जनजागरूकता से कई लोगों ने नशापान का त्याग किया। अंधकार के बादल छटते दिखाई दिए और उम्मीद की रौशनी से विश्वास के सूरज का उदय हुआ। यद्यपि यह जरूरी नहीं कि आपके अच्छे काम से सबका भला ही होता है। अपराध और प्रपंच से जुड़े लोगों को अपना धंधा चौपट होता जान पड़ा। सुधार के चक्कर में उनलोगों का बिगाड़ कर बैठा। पुलिस के छापेमारी में कई नशा व्यापारियों का वहाँ नुकसान हुआ। वे सभी पुलिसिया कार्रवाई को मेरे सुधारवादी जागरुकता को ही जिम्मेवार मानने लगे। बच्चों के शैक्षणिक और व्यावहारिक स्तर में बदलाव को सभी महसूस कर रहे थे। अपनी इस उपलब्धि पर मैं भी काफी उत्साहित और गौरवान्वित अनुभव कर रहा था। अधिकांश लोगों का समर्थन और सहयोग मेरे साथ था।

ग्रीष्मकालीन अवकाश के कारण विद्यालय अठारह दिन तक बंद रहा। अवकाश में मैं अपने घर आ गया था। अवकाश समाप्त होने के पश्चात् आज सुबह बगहा स्टेशन तक ट्रेन से पहुँचा, वहाँ से अपने एक परिचित के यहाँ रखे अपनी साईकिल को लेकर विद्यालय की ओर चल पड़ा। लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर वह गाँव था। गाँव की सीमा पर पहुँचने पर कई ग्रामीणों से मुलाकात हुई, किन्तु कोई भी मुझसे बात नहीं की, सभी मुझसे दूर भाग रहे थे। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया! मैं आगे बढ़ता गया, आगे रघु ने मुझसे कहा आप यहाँ क्यों आ गए आप यहीं से घर लौट जाईए। मैंने कारण जानना चाहता, किंतु वह मुझसे दूर भागते हुए कहा कुछ मत पूछिए बस वापस चले जाइये। मैं थोड़ा भयभीत होने लगा। आखिर बात क्या है? सब मुझसे दूर क्यों भाग रहे हैं? लोगों के चेहरे पर डर साफ-साफ देख जा सकता था। मेरे मन में कई सवाल बिच्छुओं की तरह डंक मारने लगा। ऊहापोह के कारण दिमाग भी ठीक-ठीक काम नहीं कर रहा था। क्या झुनिया को लेकर किसी ने कोई गलत अफवाह तो नहीं फैला दी? लेकिन— मैंने तो ऐसी कोई भी गलती नहीं की थी। आखिर क्या बात हो सकती है? स्कूल के बच्चों ने कोई शिकायत तो नहीं की? बच्चों को तो मुझसे काफी लगाव है और मेरे आने का उन्हें इन्तजार रहता है। क्या बात हो सकती है? सोच-सोच कर मैं पागल हुआ जा रहा था। हिम्मत जुटा कर आगे बढ़ा लेकिन आगे धैर्य खोने लगा, आगे जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। क्यों न यहीं से लौट जाऊँ? अनजाने भय से पूरा शरीर बोझिल हो रहा था। पैर मानों जाम पड़ गया हो नौकरी का भी ख्याल था लौट जाऊँगा तो नौकरी चली जाएगी और लौटककर लोगों को क्या बताऊँगा, क्यों वापस आ गया। इस सवाल का कोई जवाब मेरे पास नहीं था। लोग पता नहीं क्या-क्या सोचेंगे। नहीं— नहीं— बिना कारण जाने, वापस नहीं जाऊँगा। साँसों को जोर से अपने भीतर भरा और लोगों की बातों को नजरअंदाज कर विद्यालय की ओर बढ़ गया।

विद्यालय में बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ मेरा स्वागत किया। बच्चों के खिले चेहरे ने मेरे भय को कुछ कम कर दिया, लेकिन अपने सहकर्मी शिक्षकों का व्यवहार अंजाने भय से भरा हुआ था और फिर वही सलाह आप जितना जल्दी हो सके अपने घर लौट जाएँ। आपको यहाँ आना ही नहीं चाहिए था। मेरा सब्र जवाब दे गया मैं थोड़ा झिरकते हुए कहाµ अरे— क्यों नहीं आना चाहिए था आखिर मेरी नौकरी है यहाँ? आखिर बात क्या है कोई कुछ बताता क्यों नहीं है ? सभी खामोश थे। एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था। बच्चों के खेलने और हँसने की आवाज ने मेरे भीतर साहस को मरने नहीं दिया, किन्तु एक बार फिर गहरी चिंता में डुब गया। शीघ्र निकलना मुझे उचित नहीं लगा, इसलिए सभी बातों को भूलकर मैं अपने काम में लग गया। बच्चों का मध्यावकाश हुआ। अपने सहकर्मी शिक्षकों का दबाव एक बार फिर मेरे ऊपर पड़ा। सर कम से कम कुछ दिनों के लिए अपने घर वापस चले जाइए। कारण बताने से अब भी बच रहे थे। मध्यावकाश के समय ही विद्यालय से गाँव की ओर चल पड़ा। जिनके यहाँ मैं रहता था, वहाँ पहुँचा तो उनकी बहु ने डरते और काँपते हुए बोली आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था जितनी जल्दी हो सके अपने घर चले जाईए। हाँ— हाँ— चला जाऊँगा, लेकिन कोई बताएगा, आखिर बात क्या है? डाकू— बहू की काँपती हुई आवाज। क्या डाकू? हाँ—हाँ— डाकू आपको ढूँढ़ते हुए यहाँ आए थे। आपके जान को खतरा है। हमलोगों के साथ भी मारपीट कर गये हैं और धमकी दी है कि मास्टर जैसे ही आए हमलोगों को बता देना। मेरा शरीर लगभग सुन्न पड़ गया, डाकू मुझे क्यों खोज रहे थे? मैंने क्या बिगाड़ा है उनका? उनको शक है कि पुलिस ने जो उनके साथियों को पकड़ा है, उसमें आपका ही हाथ है। इनको ऐसा क्यों लग रहा है? सर वो सब मैं नहीं जानती हूँ बस आप जल्द से जल्द वापस चले जाइए।

अपने कुछ किताब और रेडियो को लेकर पूरी गति से साईकिल चलाते हुए वापस होने लगा। भय के कारण गला सुखा जा रहा था। यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य बेजान और रूखा प्रतीत हो रहा था। सूरज की तेज रौशनी और रास्ते की धूल से दम घूट रहा था। मैं ऐसे भाग रहा था, जैसे मेरे पीछे कोई राक्षस पड़ा हो। जल्द से जल्द इस क्षेत्र से बाहर निकल जाना चाहता था। प्यास से जान जा रही थी लेकिन भय के कारण भागता ही जा रहा था। आकाश में बादलों के बीच उड़ते चिडि़यों के झुुंड आज मुझे आकर्षक नहीं लग रहा था। ये सभी मेरी तरह ही भागता हुआ जान पड़ रहा था। लगभग ढ़ाई घंटे बाद में उस क्षेत्र से दूर प्रखण्ड मुख्यालय पहुँचा। वहाँ अपनी पूरी आपबीती शिक्षक संघ के प्रखण्ड अंचल सचिव रघुनाथ प्रसाद से बतायी। कुछ दिनों के लिए प्रखण्ड मुख्यालय में ही प्रतिनियोजन के लिए आग्रह किया। मेरी स्थिति को देखते हुए उन्होंने प्रखण्ड शिक्षा पदाधिकारी से बात कर अगले आदेश तक मेरा प्रतिनियोजन प्रखण्ड मुख्यालय में करा दिया। यहाँ महीनों प्रखण्ड मुख्यालय का कार्य करता रहा। चुनाव के समय में चुनाव कोषांग में मेरी ड्यूटी लगी, जहाँ काम करते हुए कई बार जिला मुख्यालय में काम करने का अवसर मिला। जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय में भी काम करने का अवसर मिला। मेरे काम करने के तरीके से जिला शिक्षा अधीक्षक काफी प्रभावित हुए, मौका पाकर अपनी घटना को उन्हें विस्तार से बताया और स्थानांतरण के लिए उनसे विनती की। उन्होंने आश्वासन दिया चिंता नहीं करिए मैं देखता हूँ। मैं अपने कार्य में मशगूल रहा, इसी बीच जिला शिक्षा अधीक्षक के स्थानांतरण की सूचना मुझे मिली, किन्तु जाते जाते उन्होंने कुछ शिक्षकों का स्थानांतरण किया था। स्थानांतरित शिक्षकों की सूची स्थानीय अखबार में प्रकाशित हुआ था। बड़ी उत्सुकता से अखबार के उस पन्ने को पढ़ा। मेरा नाम कहीं नहीं था। उस हिस्से को बार-बार ध्यान से पढ़ने की कोशिश की। ऐसा कैसे हो सकता है सर ने तो मुझे पूरी तरह से आश्वस्त किया था, लेकिन हाकिमों का क्या? काम रहने पर मित्रवत व्यवहार करते हैं बाद में दो कौड़ी का भी नहीं समझते हैं। मैं गहरी चिंता में डुब गया। प्रखण्ड के सारे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हो गये थे और नये पदाधिकारी से कोई परिचय भी नहीं था। निराशा और अवसाद की स्थिति में अपने घर वापस आ गया। अपनी परेशानी को किसी से मैंने साझा नहीं किया। अगले दिन प्रखण्ड मुख्यालय पहुँच कर अपने काम में लग गया। काम में मन बिल्कुल नहीं लग रहा था, कागज समेट बाहर चाय पीने चन्दु की दुकान चला गया। चाय पी ही रहा था कि मेरे विद्यालय के एक शिक्षक साईकिल से वहाँ पहुँचा और एक कागज थमाते हुए बोला सर आपका ट्रांसफर जिला मुख्यालय से स्कूल में हो गया है। विद्यालय पर एक व्यक्ति यह पत्र दे गया था। मेरी खुश का ठिकाना नहीं रहा। शिक्षक का मुँह मीठा कराया और विद्यालय आने की बात कह विदा किया।

आज अंति बार हस्ताक्षर बनाने तथा विरमित होने आया। बच्चे काफी उत्साहित थे। शिक्षकों का व्यवहार भी स्नेहपूर्ण था। मेरी अनुपस्थिति में मेरे अच्छे कार्यों की चर्चा ग्रामीणों ने किया। सहकर्मियों ने भी मेरे कार्य को आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया। अंतिम बार विदा लेने के लिए रामशरण बाबू के यहाँ पहुँचा। मेरा ट्रांसफर शहर में हो गया है सोचा अंतिम बार आप सभी से मिल लूँ। अंतिम बार क्यूँ यह भी आपका घर है हमलोगों ने आपको अपने परिवार का एक सदस्य के रूप में ही देखा है। सभी लोगों के साथ झुनिया भी यहाँ उपस्थित थी। अपनी डबडबायी आँखों से लगातार मुझे देख रही थी। लोगों ने बताया कि अब सारी परिस्थिति बदल गई है। आपके जाने के बाद डाकूओं का भी आपके प्रति दूराग्रह समाप्त हो गया। आपके कारण बच्चों में काफी बदलाव आया है सभी लोग इसकी सराहना करते हैं। लोगों का स्नेह, प्रेम और व्यवहार देखकर अब यहाँ से जाने का जी नहीं कर रहा था, किन्तु अब कुछ नहीं हो सकता था। सभी लोग मुझे विदा करने के लिए बाहर खड़े थे। भारी मन से उस सबसे विदा हुआ। आज यहाँ से जाने की जल्दी नहीं थी। सभी ग्रामीणों से संवाद करता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। चिडि़यों की चहचहाहट, शीतल हवा का झोंका झुमती पेड़ों की डालियाँ मेरे कदमों को आगे बढ़ने से रोक रही थी। आकाश के ठहरे रंग बिरंगी बादल अब मनमोहक लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि झुनिया की दो सुन्दर आँखें दूर तक मेरा पीछा कर रही हो और मुझसे कह रही हो सर आम फिर से पक गये हैं खा लिजिए न!

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परिचय : लेखक साहित्यकार के साथ चित्रकार भी हैं. चित्रकारी के लिए सरकारी और निजी संस्थाओं की ओर से कई बार सम्मानित हो चुके हैं.

मो-: 9741668012

 

 

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