विशिष्ट कहानीकार :: पंखुरी सिन्हा

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अभी बस इतना ही

  • पंखुरी सिन्हा

‘किसी और से प्यार करती हूँ, ये शादी जबर्दस्ती कर दी गई है!’ ‘देखिये, ये शादी मेरी मर्ज़ी के खिलाफ हुई है! मैं कहती रही लेकिन उन्होनें आप के साथ बांध दिया, मैं किसी और के प्रेम में हूँ और उसे नहीं भूल सकती!’

शादी की पहली रात को, इस तरह के डायलॉग बोलने सुनने की घटनाएं इधर कुछ ज़्यादा ही घटने लगीं हैं! दरअसल, लड़कियाँ अब पहली बार बोलने लगी हैं!

जो बात वे अपने अभिभावकों को नहीं समझा पातीं,बड़ी आसानी से अपने अजनबी पति को बता देती हैं!

लेकिन, “हम किसी और को चाहते हैं! हम नहीं चाहते हमारी वजह से आप की जिन्दगी खराब हो, बस आप मेरे घर वालों से मत बताईयेगा, वो मेरी जान ले लेंगे!’ जैसा फिल्म मुगले-आज़म, हीरोइन जहाँआरा, टाईप डायलाग, पिछ्ले तीन दिन की त्रासद, दर्दनाक नाटकीयता के बाद, मेरे सामने बैठी मेरी नवविवाहिता पत्नी मुझसे कहेगी, यह एक ऐसा ऐ न्ति क्लाइमेक्स था, जिसकी मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था!

जी हाँ, मेरी! नवविवाहिता पत्नी! यह जो सुकोमल, सुशील सी दिखती, बेहद लजीली, अति सुंदर कन्या, गर्दन झुकाये मेरे सामने बैठी थी, अभी अभी जलती हुई आग के सात फेरे लिवा कर, मुझसे ब्याही गई थी! लगभग तीन घंटे पहले, मैने ही अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से, इसकी सुसज्जित माँग में वह लाल सिंदूर डाला था, जो पूरे कमरे में दमक रहा था!

जी हाँ, ठीक तीन दिन पहले, जब सूरज पटना जंक्सन की टीन की छत के पीछे डूबने की तैयारी कर रहा था, और चाय वाला घिरते झुटपुटे में बत्ती जलाने के लिए स्विच की ओर हाथ बढ़ा रहा था, मैं प्लेटफार्म नम्बर एक से सीधा बाहर निकलता हुआ, अचानक धर लिया गया, अर्थात अगवा कर लिया गया!

दो जोड़ी मज़बूत हथेलियों ने मेरे दोनों कन्धों को कसकर पकडा, मेरे सिर के ऊपर फौरन एक चादर डाली गई, किसी की बाँह ने मेरी कमर को इस तरह जकडा, जैसे अक्सर लफंगे धुँध -लके में राह चलती कमसिनों की कमर को मुट्ठी में भर , नौ दो ग्यारह हो जाते थे, लेकिन मुझसे एक सख्त आवाज़ ने कहा था, ‘भागने की कोई कोशिश बेवकूफी होगी। शान्तिपूर्वक हमारे साथ चलो, हम तुम्हारा कुछ नहीं बिगाडेगे!” गाड़ी अर्थात कार बमुश्किल छः कदम की दूरी पर रही होगी! उसके चलते ही मेरे सिर पर से चादर हटा दी गई थी! दुबारा रौशनी क्या समूची दुनिया को देखना कुछ इस तरह था, जैसे एक झटके में मौत के द्वारा निगला और उगला गया होउँ! स्टेशन के फाटक पर अदने से दिखते  दो सिपाही खड़े थे, लेकिन तब तक मेरे दोनो घुटनों के नीचे पिस्तौल की नली लगाई जा चुकी थी, और कह दिया गया था कि मैं कोई शोर गुल न करूँ! हालाकि दोनो की ही कोई ज़रूरत नहीं थी! मैं इतना भौंचक था, और इस हद तक सहमा हुआ, कि मुझे लग रहा था कि मेरी आवाज़ हमेशा के लिए चली गई है, और अगर फिर कभी मैं बोल सका, तो यह कोई जादुई करामात होगी, या  ईश्वरीय कृपा! जबकि, ईश्वर में मेरा विश्वास कम ही था, फिर भी उस वक्त मैं हर उस दैवी शक्ति को स्मरण कर रहा था, जिसमें मुझे मेरे इस संकट से उबारने की कोई भी क्षमता दिखती थी! आखिर, मेरे जैसे चुप्पा, शरीफ़, और लगभग निरीह प्राणी के ऐसे ताकतवर दुश्मन कौन हो सकते थे? क्या इन लोगों ने मेरे द्वारा लिखे तमाम वो लेख पढ़ लिये थे जो बालू माफिया, गिट्टी माफिया, ईंट माफिया, मिट्टी माफिया, पानी माफिया, पानी और सड़क माफिया के खिलाफ मैने ताबड़तोड़ लिखे थे और दश की चुनिंदा मार्क्सवादी पत्रिकाओं ने जिन्हें हाथों हाथ छापा था? क्या गुंडे भी बौद्धिक हो गए थे?

क्या उस वक़्त इस फिकरे नुमा सवाल पर मेरे जेहन में मुस्कुराहट का एक ख्याल रौशनी की एक लकीर की तरह गुज़रा था?

हाई वे पर पहुंचते ही पिस्तौल दूर हो गई थी, और चादर तो गाड़ी के चलते ही हट गई थी। लेकिन, डर मेरी पूरी देह पर पसीने की ठंढी बूँदो में छलछला आया था! भय का ऐसा खौफनाक चेहरा मैं पहली बार देख रहा था! घबराहट एक कसैले स्वाद की शक्ल में मेरे मुँह में उभर आई थी! मैं चाहने लगा था कि जो भी होना हो, जल्दी हो जाए! अगर किसी सुनसान जगह पर ले जा कर मुझे गोली ही मारी जानी हो, तो यह भी जल्दी हो जाए! बस खत्म हो जाये, यह यंत्रणा भरी यात्रा!

इसलिए, हरियाली से लदे फदे किनारों वाले हाई वे पर दो घंटे दौड़ने के बाद, गाड़ी जब हल्दी और कुमकुम के निशानों से सजे से घर के आगे रुक कर खड़ी हो गई, तो पहले तो घरेलूपन के एक एहसास ने मुझे सुकून दिया, लेकिन फिर फौरन इस दहशत ने भी जकड़ लिया कि हो न हो, यह किसी तांत्रिक का आवास है और मेरी नर बलि होने जा रही है! हमारे गाड़ी से उतरते ही, पहले से शांत वातावरण अचानक तुरही या पिपही जैसे किसी वाद्ययंत्र से गूंज उठा! लगन या उस जैसी ही कोई शुभ ध्वनि बज रही थी और मुझे उस बकरे की याद हो आई, जिसे बलि से पहले पूजा जाता है!

दो चार कदम आगे बढ़ने पर, कुछ स्त्रियाँ, हाथों में पूजा अथवा आरती की थाल लिए आती दिखाई पड़ी!

निश्चित ही, यह कपाल कुण्डला के किसी साधक का वध स्थल है! मुझे मोकामा के एक मशहूर अघोरी साधू की याद आई, जिसके अड्डे पर हर कार्तिक पूर्णिमा को आसाम से जटा धारी नागा साधुओं का मेला लगता था और वे मसान साधते थे! मैं वर्षों से ‘नागा तांत्रिकों की श्मशान अर्चना’ पर एक निबंध लिखना चाहता था, और आज मुझे लग रहा था कि शायद इस इच्छा की पूर्ति के बिना ही, मैं आज दुनिया से रुखसत कर दिया जाने वाला हूँ!

एक उम्र दर महिला ने जब पान का एक गरम, अर्थात गुनगुने तापमान का पत्ता, मेरे दाहिने गाल से सटाया, तो ठंढे, सख्त, बेजान पड़े मेरे शरीर में एक झुरझुरी सी महसूस हुई, दिल में बहुत गहरे भीतर कहीं धुकधुकी कोई, और सुन्न से पड़े दिमाग के पिछ्ले हिस्से में कोई हरकत, सुगबुगाहट कोई! मुझे कुछ कुछ जानी पहचानी सी बात लगी, कुछ सुनी सुनाई हुई, और तभी लड़कियों की चुहल भरी ठिठोली ने, सारा मामला साफ़ कर दिया!

“शादी होने जा रही है जीजा जी, जय माल के लिए तैयार हो जाओ!” कहती हुई वो लोट पोट होतीं, एक दूसरे पर गिरती जाने कहाँ गुम हो गई ! मेरे कान गर्म हो गए और सारा आवेग आँखों से बह निकलने को तैयार हो गया! पान का दूसरा पत्ता जब तक दूसरे गाल तक पहुंचा, मेरी आँखे छलछला आईं थीं! मुझे माँ की याद आई और उन सारे सपनों की जो मैने गाहे बगाहे अपने जीवन में आने वाली औरत को लेकर देखे थे! मुझे वो सारी तारिकाएं याद आई, और कुछ इधर-उधर की लड़कियाँ भी, जिनके साथ मैं अपने खयालों में हम बिस्तर हुआ करता था! ‘फंतासी के ज़ौनर में प्रेम का चित्रांकन’, जैसे निबंध भी मैने लिखे थे, जिनपर कई प्रशस्ति पत्रों की शक्ल में छिपे छिपे प्रेम पत्र भी मुझतक पहुँचे थे और शहर के कॉफ़ी हाउस में, इन चिट्ठियों की कुछ लेखिकाओं से मुलाकातें भी मैंने की थीं! ‘तितलियों से घिरा भौंरा’, नाहक मेरा नाम पड़ गया था, लेकिन किसी के भी साथ संवाद बहुत दूर तक जा नहीं पाए थे! ‘आप प्रेम को लेकर बहुत गंभीरता से सोचते हैं, जबकि अधिकांश पुरुष इसे टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड लेते हैं!’, सरीखे तारीफ़ अनेकों तरहों से मुझे मिले थे! ‘कितनी बड़ी बात है कि आप ने स्त्री की फंतासी को कुबूला है, उसकी अनुपस्थिति को जीते हुए उसकी इतनी सौम्य कल्पना की है!’ किन्तु, वह स्त्री सुबोधिनी, स्त्री मनस्विनी कहाँ थी, जो फंतासी के उस ब्लैंक में अपनी बातों का रंग भर सके?

प्रेम में कल्पना, प्रेम में वास्तविकता, प्रेम में अपेक्षाएँ, महत्वकांक्षाएं, प्रेम में बराबरी, प्रेम में साझेदारी, प्रेम में जेन्डर, प्रेम में प्रतिस्पर्धा, प्रेम में स्वीकार, अस्वीकार आदि विषयों पर लम्बी चौड़ी बातें हुई, लेकिन कुछ भी नया या अनोखा नहीं कहा गया! अंत में, जब एक अति आतुर बालिका ने मुझसे पूछा कि ‘आप प्रेम को केवल फंतासी में ही जीना चाहते हैं, असलियत बनाना ही नहीं चाहते, है न?’ तो मुझे पलट कर सवाल करना पड़ा कि “अगर मैं इस जगमगाते शहर को छोड़कर, किसी पिछड़े गाँव के स्कूल में चला जाऊँ, तो क्या वह साथ चलेगी?” और बात यही खत्म हो गई!

प्राध्यापकीय नौकरी की प्रतीक्षा में वर्षों खड़े रहने के बाद, अब जाकर एड हौक में मेरा एप्यानटमेन्ट हुआ था, बल्कि कहें कि एक छोटा सा द्वार खुला था, जिसमें कोई स्थाइत्व नहीं था! रोजगार से इतर भी, मैं मानता था कि प्रेम चाहे और जो कुछ भी हो, उसे सबसे पहले ईमानदार होना चाहिए! दिखावा नहीं, आडम्बर नहीं! संभव था, बौद्धिक विमर्श करते हुए, प्रेम कर बैठना, लेकिन विमर्श उस स्तर पर पहुंचा ही नहीं था, जहाँ कोई मुझसे टक्कर ले पाता!

रोजगार से इतर भी, मैं मानता था कि प्रेम चाहे और जो कुछ भी हो, उसे सबसे पहले ईमानदार होना चाहिए! दिखावा नहीं, आडम्बर नहीं! संभव था, बौद्धिक विमर्श करते हुए, प्रेम कर बैठना, लेकिन विमर्श उस स्तर पर पहुंचा ही नहीं था, जहाँ कोई मुझसे टक्कर ले पाता! मेरा बहुत योग्य वर होने का कोई दावा नहीं, फिर भी मैं ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीता था! आखिर, मेरे जैसे शक्स को विवाह के लिए अगवा करने का तुक क्या हो सकता था?

मुझे याद आया कि यह जो पान के पत्ते से गाल सेंकने की रस्म अभी अभी निभाई गई थी, उसे चुमाओन कहते थे और अब सिल बत्टे के बत्टे, जिसे इस अंचल की भाषा में लोढी कहते थे, उसी लोढी से मुझे परीछने की तैयारी हो रही थी! अति उत्साह में लोढी लेकर आती, मुस्कुराती हुई उस उम्रदर महिला को देखकर पल भर के लिए मेरे भी चेहरे पर तिरछी ही सही, एक स्मित रेखा, खेल गई ! और फिर अगले ही पल, इस सवाल ने मुझे जकड़ लिया कि यह लोढी उनके या मेरे सर लग क्योँ नहीं जाती, और यह कार्यक्रम स्थगित क्योँ नहीं हो जाता? और उसके अगले पल, मैं राहत के इस एहसास से एक बार फिर ओत प्रोत हो गया कि कितना अच्छा था कि लोढी हम दोनों में से किसी को नहीं लगने वाली थी, और कोई खून खराबा नहीं होना था!

उस वक़्त मुझे बुद्ध याद आए या किसी और दार्शनिक के सिद्धांत, मैं ठीक ठीक नहीं कह सकता, लेकिन शान्ति जैसा एक शब्द मेरे जेहन में ज़रूर गूंजा था! पूजा अर्चना का माहौल बन रहा था, जिसमें मैं धीरे-धीरे खुद को संभाल पा रहा था!  जी हाँ, मेरे जैसा मार्क्सवादी विचार धारा का व्यक्ति भी यदि पूजा के वातावरण में शान्ति लाभ कर लेता था तो इसका श्रेय माँ की लगभग नित्य सुबह की पूजा को जाता था, जिसके मंत्रो उच्चार अब भी कहीं दूर से आते हुए मेरे कानों में पड़ रहे थे!

दरवाज़े पर की रस्म अदायगी के बाद, एक बार फिर, मुझे पुरुषों को सौंप दिया जाना था, ऐसा कहते हुए लड़कियों के झुंड ने मुझे धर दबोचा था! और जब उनकी अनेक उंगलियों ने मुझे भर आँख काजल लगाया तो एक बार फिर, मेरी आँखे डबडबा गईं थीं! एक तो आँख पर इतनी उंगलिया, दूसरे कजरौटे का काजल, और तीसरे, यह कैसी ठेठ देहाती सज्जा हुई, पुरुष को स्त्रैण बनाने की, सोचता हुआ, मैं यह भी सोचने लगा था कि अगर सामान्यतः मेरी शादी होती तो किस तरह से होती? क्या इसके बाद, ,,  मैं ज़्यादा सोच पाता इससे पहले कुछ लड़के बड़े सम्मान के साथ भीतर लिवा ले गए थे और इसके बाद जो उन्होनें मेरे साथ किया, उसे भी मैं बिना प्रतिवाद, चुप चाप झेल गया!

हल्दी लगाने की रस्म की शुरुआत, लड़कियों ने ही मेरे हाथों और चेहरे से शुरु कर दी थी, लड़कों ने मेरी कमीज़ उतार कर, मेरी पीठ और छाती को हल्दी मय बनाया! इसके बाद, काजल लगी मेरी आँखों के नीचे से और हल्दी पुति मेरी देह पर से मेरे सारे कपड़े उतारे गये और निर्वस्त्र कर मुझे नहाया गया! मुझे लगा कि यह प्रक्रिया मेरी मर्दानगी के परीक्षण का हिस्सा थी, और इतनी जोड़ी आँखे मेरे जननान्गों पर जमी थीं, कि मैंने ही अपनी आँखे बन्द कर लीं और सम्पूर्ण भाव शून्यता में शरण ले लिया!

इसके बाद, साफ शफ्फ़ाक एक धोती में लपेट कर मुझे मंडप पर बिठा दिया गया!

जो कुछ भी हो रहा था, उसके बारे में ठीक तरह से सोच पाने की हालत में मैं नहीं था, इतना आप समझ सकते हैं! यह पूरा घटना क्रम पिछ्ले दो तीन दिनों का है, जिसमें मेरी कलाई पर घड़ी नहीं थी, सेल फोन गाड़ी में ही ले लिया गया था और इसलिए मेरे पास घंटो का ठीक-ठीक हिसाब नहीं है! अगवा होने वाली रात मुझे काल कोठरी में सुलाया गया। अगले पूरे दिन मैं उसी काल कोठरी में बन्द रहा, उसी मार दिये जाने वाले अंदेशे के साथ और ये उस शाम को पता चला कि वह कोठरी इसी खुश नुमा, खुश हाल हवेली के पिछवाड़े में है!

मंडप पर बैठे भी कुछ घंटे बीत चुके थे, वैसे मेरे लिए हर लम्हा पत्थर की तरह भारी था! थकान की सीमा नहीं थी और आक्रोश कभी भी उबलने को तैयार!

लेकिन, एक बार फिर, पंडित के मंत्रोच्चार, आग की लपटों, धूप की खुशबू, और दुनिया की तमाम भलमनसाहत की मदद से, मैं खुद को थामे बैठा था! काफ़ी देर बाद, एक गठरी को लाकर मेरी बगल में रखा गया! माफ़ कीजियेगा, गठरी नुमा एक लड़की को! अगर वह खुद से चल कर आई , तो भी मैं देख नहीं पाया, क्योंकि मैं इतना थका था कि बीच बीच में नींद के हिचकोले ले रहा था!

उसके आने पर कुछ रुन झुन की सी आवाज़ हुई थी, शायद वह चल कर ही आई थी और वह उसकी पायल की आवाज़ थी! वैसे उसके ज़रा भी हिलने पर किस्म किस्म की झंकार जैसी आवाज़े आ रहीं थीं! उसने  पीली साड़ी पहन रखी थी , जिसका गोटे दार किनारा मुझे छू रहा था! और लम्बा लहराता गोटे का ही बना लाल दुपट्टा मेरे घुटनों पर था! मुझे इस तरह की जय माता दी स्टाइल की चुनरी बिल्कुल पसंद नहीं थी , लेकिन अब उसका एक सिरा मेरी धोती के सिरे से बांधा जा रहा था और जाने कहां से, और जाने क्योँ, तीन शब्द बार बार मेरे गले पड़ रहे थे, या कहिये कि गले में अंटक रहे थे– ‘हमेशा के लिए’! हमेशा के लिये उसके दुपट्टे का सिरा, मेरी धोती के सिरे से बांधा जा रहा था! मैं इस खयाल को झटक देना चाहता था, मैं इस चुनरी और धोती और मंडप और सबकुछ को दूर झटक देना चाहता था! आप समझ सकते होंगे ! मैं इस पूरी घटना को लेकर, कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाने की स्थिति में था, इतना तो आप समझ सकते होँगे !

तभी पण्डित ने हमसे हथेलियां आगे करने को कहा! मैंनें यंत्रवत अपनी हथेली आगे बढ़ा दी और देखा कि लाल पीले की तहों के भीतर से लहठी भरा, मेहंदी रचा उसका हाथ निकला और हथेली बनकर मेरी हथेली के समानांतर हवा में टंग गया!

‘हथेली इनकी हथेली पर रखिये!’ पंडित ने अपनी बात दुहराई! लड़कियों के झुंड से खिलखिलाती हुई एक लड़की आगे आई और उसने कन्या अर्थात उसका हाथ, वर अर्थात मेरी हथेली पर रख दिया!

कई-कई अन्य रस्में हुईं, अग्नि के सात फेरे और अब लगभग सुबह होते होते, रजनीगंधा की कुछ लड़ियों के नीचे, बेले से सजे बिस्तर पर हम आमने-सामने बैठे हैं! उसने गर्दन इस हद तक झुका रखी है कि चेहरा अब भी छिपा है, लेकिन दिखते हुए कुछ हिस्से से मैं जान गया हूँ कि लड़की बला की खूबसूरत है!

“और कौन है ये शक्स जिससे आप प्यार करतीं हैं?”

मुझे अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं हुआ. मुझे तो चाहिए था कि कूद पडूँ खिड़की से! लेकिन मैंने ये तक जानने की कोशिश नहीं की, कि खिड़की कितने माले पर है, मैं ठीक ठीक कहाँ हूँ, और अगर मैं कूदा तो मुझे कितनी चोट आ सकती है!

मैं पूरी तरह उसकी साडी के पीले रंग में खो रहा था. सरसों के पीले और कच्ची हल्दी के बीच का वह रंग, सस्ते रेशम में भी केसर सा खिल रहा था. गोटे की किनारी ऐसे चमक रही थी कि मेरा मन हुआ उसे छू कर देखूँ। और मैंने घुटनों के बल सरक कर, दोनों हाथों से उसके सर के ऊपर लटक रहा घूंघट पीछे कर दिया! उसकी सुडौल आँखों से आँसू बह रहे थे. तीखी नाक के नथुने रुलाई की लय में बंधे, फड़क रहे थे. होठ कांप रहे थे. लड़की सचमुच बेहद खूबसूरत थी. मैं उसका चेहरा देखने को कितना भी उत्सुक होऊं, इतना निष्ठुर नहीं था कि

उसके रोने के बीच ही उसका चिबुक अपनी उँगलियों में थाम कर, उसका चेहरा ऊपर कर दूँ!

मैं चाहता था, उसकी रुलाई थम जाए. मैं चाहता था, वह मुस्कुरा दे. और मैं जाने क्या क्या चाहता था? अव्वल तो मैं अपने ऊपर विश्वास करना चाहता था. खुद को अचंभित करते हुए, मैंने फिर पूछा, “बताइये न, आप किससे प्यार करती हैं?”

“किसी से नहीं!” उसने तमक कर कहा, और तैश में अपना चेहरा ऊपर उठा दिया।

घनी पलकों के नीचे, आँसुओं से डब-डब, मुझे घूरती, दो विशाल, गहरी काली आँखों के मोहपाश में मैं जीवन भर के लिए बंध गया!

ओह! मैं होश में तो हूँ? क्या मैं ही बचा हूँ, दुनिया में सारी क्रांति के लिए ? सबके उद्धार के लिए? ‘जानकी हाय!’ क्या कभी न प्रिया का उद्धार हो सकेगा?

किन्तु, इस बरबस खींचती काया के प्रति उमड़ते अपने सहज अनुराग को, विराग में बदलने की कोशिश मैं क्यों करूँ? सिर्फ इसलिए कि यह शादी, बिना मेरी इजाज़त, बिना मुझसे पूछे, बिना मेरी पसंद के हुई? लेकिन फिर पसंद का क्या? पसंद की लड़की मिल जाए, ज़रूरी तो नहीं? बंदूक की नोक पर थोपी हुई कोई चीज़ स्वीकारी जा सकती है? क्या ये मुमकिन नहीं कि परिवार वालों की ग़लती, बत्तमीज़ी और बेअदबी के लिए, इस लड़की को माफ़ कर दूँ, जो अपने भविष्य के सारे साल अपनी हथेली पर पसारे, मेरे सामने उम्मीद और खौफ के सागर में गोते लगाती, कांपती बैठी है. आत्म सम्मान काजल की एक हल्की सी रेखा के साथ, गालों पर ढुलक गया है.

जो आकर्षण आत्मा की शांति से बंध रहा है, उसमें प्रयास कैसा ? “फिर कहा क्यों?” मैं उसके बारे में सब कुछ जानना चाहता हूँ.

हम खोये खोये, घबराये से, अपने पांवों के नीचे की ज़मीन तलाशते हुए से, कुछ देर एक दूसरे को गौर से देखते रहे.

दुनिया बदल गयी थी, या कि वही थी? या बदल रही थी, हर पल, अभी, ठीक इस वक़्त आधी रात के?

“हम डर गए थे”, घबराहट में लिपटा, एक वाक्य उसके अधरों से फूटा, जो लाल रंग दिए जाने के बाद, साकेत की उर्मिला के सुग्गे जैसे लग रहे थे. इत्तफ़ाकन, उसने नाक में मोती पहन रखा था. एक मुस्कराहट की आहट, मेरी आँखों में मुलायमियत की तरह पसरी, लेकिन होठों तक आते आते रह गयी.

‘यह भी है कि पहेलियाँ ही बुझा रही है’, मैंने सोचा और एक अजीब सा विनोद का भाव, मेरे होठों पर हरकत कर गया.

“किससे डर गयी थी?”, मैंने लगभग वातसल्य भरी आवाज़ में पूछा। और मुझे लगा कि डरना तो स्वाभाविक ही था.

“सब कुछ से”, उसने तपाक से उत्तर दिया, “आपसे, इस शादी से, अपने घर वालों से, ससुराल वालों से”, वह रौ में बोलती चली गयी और फिर से सर झुका लिया।

“हम सचमुच आप पर बोझ नहीं बनाना चाहते,” चेहरा फिर उठा, नज़रें फिर मुझपर टिक गयीं।

“तुम्हें क्यों लगता है, तुम मुझपर बोझ बनोगी?” मेरे भीतर का सारा मनुष्य उसकी ओर लपका, शायद पुरुष भी, शायद पति!

“हमने बिल्कुल नहीं सोचा था, हमारी शादी ऐसे होगी ! हमने अपनी सहेली की शादी में बारात को एक घंटे नाचते देखा!” उसने आव देखा न ताव, अपना चेहरा अपनी हथेलियों से ढंका और सिसक सिसक कर रोने लगी.

“सोचा तो मैंने भी नहीं था”, क्या मैं भी रो पाने की बुलंदी रखता था? मैंने उसकी दोनों कलाईयाँ कसकर पकड़ीं और हाथों को अपने हाथों में भर लिया।

मेरे स्पर्श से उसकी सिसकती हुई रुलाई तेज़ हो गयी और डर कर मैंने उसे गले लगा लिया। कुछ देर हम एक दूसरे से लिपटे, सकपकाए, काँपते बैठे रहे, फिर लेटकर सो गए. वह न जाने कितनी देर तक रोती रही! उसकी छुवन से मुझे यह एहसास हो रहा था कि मेरा पोर पोर दुःख रहा था. थकान, मेरे ऊपर, नींद क्या, नशे की शक्ल में तारी हो रही थी.

सुबहें पहले भी आयी होंगी! यह अच्छी सुबह थी या बुरी, खूबसूरत या नहीं, शुरुआत या अंत, मैं चाहता था वह जागे और मुझे बता दे! मैं पहले उठा था. गाँव में चिड़ियों का चहचहाना, मुझे हमेशा बहुत लुभाता है. मेरे उठकर बैठने से उसकी नींद भी टूट गयी थी.

वह हड़बड़ा कर उठी, और आँखें फाड़कर, मुझे इस विस्मय से देखने लगी कि जैसे पूछ रही हो, आप कौन? फिर अगले ही पल, उसके चेहरे का भाव ऐसा बदला कि जैसे मेरे कहने में उसकी जान अंटकी हो!

मैं सचमुच मुस्कुरा दिया। उसके चेहरे पर एक तरावट फैल गयी. “हम एकदम अभी निकल चलेंगे!”,

मैंने कहा, फिर उसकी घबराहट देखते हुए फ़ौरन जोड़ा, “मतलब जितनी जल्दी सम्भव हो सके” !

मैं रिहा होना चाहता था!

क्या मैं अब भी उसके लिए अजनबी था? क्या वह मेरे लिए अजनबी नहीं थी?

क्या वह डर रही थी, यहाँ से निकलते ही, मैं उसे काट कर गटर में तो न डाल दूंगा?

क्या मैं, क्या यह लड़की, क्या मुझे डरना नहीं तो सचेत न होना चाहिए कि यह लड़की कुछ भी कर सकती है? कितनी भी बड़ी साज़िश में फंसा सकती है मुझे? क्या यह वह करने के काबिल नहीं हो सकती, जो इसके घर वालों ने किया?

लेकिन हम या तो विश्वास करते हैं या नहीं करते! आँखें या तो बंद होतीं हैं या खुली! ये अलग बात है कि इस बालिका, बालिका वधु समान लड़की की गति विधियां, मैं बंद आंखों से देख सुन पा रहा था. खतरनाक या आरामदेह? हम या तो निर्णय लेते हैं या नहीं लेते! ये अलग बात है कि कई बार निर्णय लेना ही नहीं होता!

दृश्य की अनुभूति में बह जाना, मेरी पुरानी आदत रही. मैंने उसे शह भी दी! कितना सुकून था किसी झरने का होकर रह जाने में! कितना सुकून था एक नन्हे से मेमने को पत्ते खिलाने में! कितनी राहत, उसे शेर के मुंह से बचा लेने में! शेर हमेशा दिखता कहाँ है? बचाना तो शेर के आने से पहले ही होता है! ये जानते कि बचाते में हमारा भी शिकार हो सकता है!

काश! राहत रूह अफ़ज़ा शर्बत का एक ठंढा, कत्थई गिलास मिल जाता तो इस उबलती हुई गर्मी को कुछ चैन पड़ जाता!

दरवाज़ा बाहर से बंद था. उसपर दस्तक हुई,  वह अचानक खुला, और खुल जा सिमसिम की ठिठोली करता साली समूह, एक दूसरे पर गिरता पड़ता, चाय ट्रे में थामे, उसे इस कदर हिलाता कमरे में दाखिल हुआ कि मैं डर गया, चाय मुझतक पहुँचने से पहले, पूरी की पूरी ट्रे के हवाले न हो जाए!

सालियां इतनी थीं, कि दरवाज़ा जाम था! बाहर की बालकनी में सर ही सर दिखाई दे रहे थे! मुझे लग रहा था कि गाँव के रिश्ते में वह हर लड़की जो साली लग सकती थी, फ़िलवक्त यहाँ मौजूद थी! सबसे अगली पंक्ति में खड़ी लड़की की उम्र पांच बरस लगती थी. मारे उत्साह के लगता था वह मेरी गोद में उछल आएगी!

गांव के लिए यह एक ऐतिहासिक पल लगता था! आखिर, उन्हें मेरे निर्णय की इत्तला कैसे हो सकती थी? अगर नहीं, तो फिर यह फुलझड़ी सा उतावलापन क्या सिर्फ यह जाने के लिए था कि दुल्हन ठुकराई तो न गयी?

मैं दरवाज़े के बाहर खुली हवा में, कुछ देर अकेला खड़ा होना चाहता था. जो शायद बिल्कुल असम्भव था. शर्बत नहीं तो कम से कम, वह पेय जो मेरे नाम पर लाया गया था, मुझे क्यों नहीं थमाया जा रहा था. मुझे कुछ भी पीने की बहुत ज़रूरत थी. मैंने निगाहें प्याली पर जमा दीं.

“”ये लो जमाई बाबू, हम हुईं कनिया की भाभी!”, प्याली थमाती हुई औरत जाने किस ख़ुशी में दोहरी हो रही थी! भाभी! भाभी होते, तुम इतना बड़ा जुआ कैसे खेल सकती थी? अपने पति को, अपने बहन की सारी ज़िन्दगी दांव पर लगाने से रोक न सकीं?

“और बताईये जमाई जी, रात कैसी बीती?”

मेरे चाय थामते ही उन्होंने फूहड़ हंसी के साथ, सस्ता सा एक सवाल दागा, और चाय मेरे हलक में अंटक कर सरकने को हुई कि मेरे होंठों ने हरकत महसूसी और फ़ौरन बोल पड़े!

“मैं जाना चाहता हूँ”, मैंने खुद को बोलते सुना और फ़ौरन कहा, “हम जाना चाहते हैं”.

‘मैं से हम’ तक का ऐसा जोखिम भरा सफर मैंने आज तक नहीं किया।

“कहाँ जाना चाहते हैं जीजाजी?” “ऐसी भी क्या जल्दी?” सालियों का समूह मुझपर टूट पड़ा. हंसी का फव्वारा गाने बजाने में तब्दील हो गया!

विदाई समारोह, अतिशय लम्बा होता हुआ चलता ही चला जा रहा था. हर कोई पुक्का फाड़ कर रो रहा था. मुझे जिज्ञासा हुई कि ऐसी ह्रदय विदारक रुलाई अगर विदाई की घड़ी हो रही थी, तो अगर कन्या की विदाई न होती तो क्या होता? जाने क्यों मुझे लगा कि एक मुर्दनी छाती! रुआंसी सी एक चुप्पी, जिसमें रुलाई भीतर घुटती है. मैंने अनुमान लगाया कि जो स्त्री सबसे अधिक दयनीय ढंग से बिलख कर रो रही थी, हो न हो मेरी पत्नी की माँ थी. मेरी पत्नी उससे अलग होने का नाम न ले रही थी. अपनी पत्नी के करुण विलाप से मुझे अमृता प्रीतम की एक कहानी याद आ रही थी, जहाँ क्रंदन रत नायिका के भाव समझाती, वे कहती हैं, “वह उन सुखों के लिए रो रही थी, जो उसे नहीं मिले!”

कन्या के पिता से, अगर मेरी भेंट हुई भी हो तो उन्हें चीन्हने का अवसर न था. मेरे निकट जितने भी पुरुष आये थे, हट्टे कट्टे जवान मुस्टंडे थे. गुंडे सरीखे। बाद में पता चला, कन्या के पिता को कुछ समय पहले ही, लकवे का अटैक हुआ था और वे बिस्तर पर थे. शरीर का समूचा दाहिना हिस्सा लकवा ग्रस्त हो गया था. जाने कैसी और कितनी, उनकी चिकित्सा हुई थी. सुना था उनकी आखिरी ख्वाइश, अपनी इकलौती और लाड़ली बेटी की शादी देखने की थी!

उनकी गाडी से रिहा होकर, जब मैं -हम राज्य परिवहन की जीर्ण शीर्ण फटेहाल बस में बैठे, तो मुझे लगा, प्रलय अभी खत्म हुआ है, अभी शुरू हुई सृष्टि दुबारा, भयानक घटाटोप के बाद फिर से हवा चली है, दुनिया दुबारा मिली मुझे!

हवा के झोंकों को हाथ में थाम लेने की इच्छा हो रही थी. इच्छा हो रही थी, खेतों में एक लम्बी टहल के लिए निकल जाऊं! कम से कम, खिड़की से सर टिकाकर कुछ देर के लिए घूम आऊं बाहर से! अनुपस्थित हो जाऊं, इस चलते हुए वाहन से, जिनमें बस कंडक्टर ठूंसे चला जा रहा था, सवारी पे सवारी! हर चौक क्या, हर पान दुकान पर चिल्लाता, ‘ऐ जहानाबाद, पटना!’

किन्तु, मैंने लड़की को खिड़की वाली सीट दे दी थी. ‘लड़की’! मैं अपनी ही सोच की रेल गाडी पर, स्वयं द्वारा पत्नी के अनेक नामकरणों पर रीझ गया. मूछों के नीचे मुस्कराहट फ़ैल गयी. गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी तो मैंने उससे पूछा, ” सुनो, तुम्हारा नाम क्या है?”

“मीरा” रुआंसी आवाज़ में उसने कहा.

वह अब भी, सुबक रही थी. अगर वह ज़ार-ज़ार भी रोती होती तो क्या मैं उसे दोष दे सकता था? अगर बगेरी सा धड़क रहा होता उसका दिल, तो क्या मैं समझ न सकता था? लड़कियों का कलेजा यों भी शादी पर धड़कता होगा! लड़कों का भी! क्या मेरा भी धड़का था? धड़क रहा था?

अगर वह डर रही हो, कहीं मैं उसे किसी कोठे पर बेच तो न दूंगा, तो भी मैं समझ सकता था. कोठे पर बेच देने के ख्याल से मैं भीतर तक दहल गया, और उससे छोटी मोटी बातें करने लगा.

“तुम पहले कभी पटना गयी हो?”

“नहीं, जहानाबाद टाउन गए थे”, वह इतना ही कह सकी, और वह भी इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे मुड़कर, सर घुमाकर उसे सुनना पड़ा!

सिन्दूर की लम्बी लाल रेखा नाक के कोण से शुरू होकर, माथे में कहाँ खत्म होती थी, पता न चलता था. मेरे हिसाब से उसे सर धोने की बहुत आवश्यकता थी!

मैं हंसने ही वाला था, कि मैंने देखा, नाक के दूसरी तरफ, उसकी नथ भी सर के दूसरे हिस्से में जा मिलती थी. गले में कुछ एक छोटे मोटे हार थे. हाथों में लाल लहठी के आगे, एक एक सुनहले कंगन! अगर यह सबकुछ सोना था तो हमारा जहानाबाद शहर से गुज़रना भी मुश्किल था!

खैर, हम घर पहुँच गए. शाम की चाय का वक़्त था. मैं जैसे ही ऊपर का जीना चढ़, दरवाज़े के सामने पहुंचा, कहीं जाते हुए पिता मिले और मुझे देख ठिठककर खड़े हो गए!

अगले ही पल उनकी ठिठकन, ख़ुशी की लहर में बदल गयी. “बेटा तू आ गया”, “आह, मैं जी गया! गरदनी बाग़ पुलिस स्टेशन जा रहा था”, उनकी आँखें आंसुओं से भर आयीं, और फिर नव विवाहिता के चेहरे पर टिक गयीं।

पिता की आवाज़ सुनते ही, विक्षिप्त सी मेरी माँ दौड़ी आयीं और मुंह फाड़े, कहें कि मुंह बाए, दृश्य को हतवाक देखने लगीं। पल भर के लिए खामोशी रही, या सम्पूर्ण सन्नाटा, और फिर मैंने देखा, रंग धीरे धीरे दोनों के चेहरे पर लौटने लगे.

सस्ती गुलाबी बनारसी साड़ी और गोटे वाली उस लाल चादर में सिमटती जा रही, मेरे पार्श्व में खड़ी, किसी देहाती गुड़िया सी स्त्री, मेरी पत्नी है, मैं चाहता था वे खुद समझ जाएँ।

“बेटा, तू किसी के प्रेम में था, शादी करना चाहता था, हमसे क्यों नहीं कहा?” माँ बोलीं पहले, “! और फिर, लगा बोलती जाएंगी, “हमीं ऐसे पराये हो गए, तेरी शादी में!”, किन्तु पिता ने कहा “भीतर तो चलो”, और हम सब अंदर हो गए.

लेकिन, प्रेम के छुपाने, शादी में न बुलाने का मुकदमा, मुझपर तत्क्षण ऐसा चला और मैं इस तरह थका था कि मैंने खुलासा कर दिया।

बाद में मुझे लगा मैं कह सकता था, ‘समय न मिला माँ, मीरा ने फोन किया, उसके घर वालों को पता चल गया है और वे अभी के अभी, उसके हाथ पीले और मिटटी पलीद कर रहे हैं, मुझे फ़ौरन एक दोस्त की मदद से, उसे भगाना पड़ा! आनन् फानन में मंदिर में शादी हुई, उसी दोस्त के घर में हम छिप गए, और दो दिन बाद कोर्ट में रेजिस्ट्री होने पर बाहर निकले और सीधा यहीं आ रहे हैं!’

वाह! क्या कहानी बना सकता हूँ मैं! और क्या न करने को तैयार हूँ, इस जाहिल गंवार के प्यार में!

फिर माँ उसके लिबास के बारे में कहतीं, अजीबो गरीब वेश भूषा के बारे में पूछतीं और मैं कहता, जल्दी में दोस्त ने जो इंतज़ाम किया! फिर माँ ज़रूर पूछतीं, इससे आखिर भेंट कहाँ हुई? तुझे कोई मॉडर्न, पढ़ी लिखी, अपने टाइप की लड़की नहीं मिली? और मैं कहता, माँ, उसी दोस्त के घर एक रिश्तेदार की शादी में मैं जहानाबाद के एक गांव गया था, वहीँ! फिर मैं जहानाबाद पर, एक शोध करने लगा और एक दो मुलाकातें और हुई!

कमाल, मुझे तो किस्सा -गो होना चाहिए! प्रोफेशनल स्टोरी राइटर !

मैं हंस दिया। ‘प्यार क्या है?’, यूनिवर्सिटी के अड्डों की पुरानी बहस का कभी न बदलने वाला मुद्दा था, लेकिन फिलहाल, मैं किसी भी कीमत पर, ऐसी उठाई गिरी की शादियों का अंत बदलना चाहता था. मैं हमेशा से परम्पराओं को तोड़ना चाहता था! और मैं किसी भी कीमत पर, इस लड़की को कुंए में नहीं धकेल सकता था.

अब मैं उसके साथ जीना चाहता था. कोई सुनवाई नहीं।

लेकिन, घर में बात तूल पकड़ चुकी थी. माँ बड़े प्यार से समझा रही थी, लगभग फुसफुसाती हुईं, “बेटा, ऐसी शादियों के बाद की चीज़ों को कचरे का डब्बा मानकर फेंक देना चाहिए! ये कोई शादी हुई, तू इसे घर कैसे ले आया? हम तेरी अच्छी सी एक शादी करेंगे।”

पिता कह रहे थे, “अगर तुम इन्हें स्वीकार लोगे, तो उन्हें सबक कैसे मिलेगा?”

मेरा कुछ कुछ दिल टूट रहा था और मूड दिलों के जुड़ने का हो रहा था. मैंने उन दोनों से बस इतना ही कहा, “कई बार हादसों को स्वीकारना होता है. वैसे, ये हादसा नहीं है, मैं इसे हादसा होने नहीं देना चाहता!” और चल दिया।

आलोक धन्वा के कहे मुताबिक, ट्रेनें अब भी चलतीं थीं. टिकट तत्काल में मिलते थे. वैसे भी, मेरी छुट्टियां खत्म हो गयीं थीं और अपनी नौकरी से लापता होना मेरे बूते से बाहर था.

दिल्ली स्थित मेरे वन बी एच के को, मेरी ज़िन्दगी और दिनचर्या को, जितनी खूबसूरती से, उस देहातन ने संवारा, मेरी कल्पना से परे था. मेरे ठाठ के दिन थे. मेरे ब्रश करने भर की देर थी कि चाय हाज़िर! हर रोज़ नाश्ते में नए स्वाद का कोई व्यंजन, खाने का डब्बा वैसा ही लजीज़, और रात की थाली का कहना ही क्या! जिसे मैंने ही ज़िद कर उसके साथ खाना शुरू किया।

मेरे कपडे, धुले और प्रेस किये मिलते। जूते भी पॉलिश किये हुए, जिन्हें पहनते मुझे हमेशा गिल्टी फील होता! उसका बस चलता, तो खुद मुझे जूते पहनाती भी, उतारती भी! लेकिन ये मेरे लिए, नाकाबिले बर्दाश्त था.

हम साथ टेलीविज़न देखते, ख़बरों पर चर्चा करते। हम! हम–इस शब्द के अभ्यस्त और तलबगार हो रहे थे. धीरे-धीरे, इन दो अक्षरों में एकाकार हो रहे थे.

एक दिन, जब शाम को मैं घर लौटा तो मीरा पड़ोस की एक सहेली से बात कर रही थी-“आ मैं तो उस सब्ज़ी वाले से कुछ भी खरीदना बंद कर दी हूँ”! हम से मैं का सफर, बड़ी खूबसूरती से उसने तय किया था. मैं उत्फुल्ल हो गया. दिल्ली में अनेकों किस्मों के मैं बोलने वाले रहते हैं. बंगालियों की मैं, पंजाबियों की मैं से अलग है. दक्षिण वालों की कुछ और प्रकारों की! इतने किस्मों की मैं को समेटे, यह शहर एक अलग तरह के हम की ज्यामिति बनाता है. अनेकों संभावनाओं से भरी हुई.

मीरा से मैं नियमित अखबार पढ़ने का आग्रह करता, पत्रिकाएं और किताबें भी. मैंने ही उसे रोज़, एक पन्ना नियमित लिखने की आदत डलवाई। और जब मैंने पूछा, क्या वह इंटर के आगे पढ़ना चाहेगी, तो वह ख़ुशी से दोहरी हो गयी.

मां की बुलाहटें, तेज़ हो गयीं थीं. जब उनकी बहुत अनुनय भरी चिट्ठियां आने लगीं तो एक दिन वाली एक छुट्टी में वीकेंड मिला कर, दो दिन का ट्रिप मैंने बना लिया।

माँ ने खूब स्वागत तो किया, पर इस अंदाज़ में जैसे बहू के साथ साथ, मैं भी कोई अतिथि होऊं! ऊपर से, रिश्ते के उस चचेरे भाई को देखकर मैं उखड़ गया, जो पूरे खानदान में अपनी शैतान-खुराफातियों के कारण फंटूस के नाम से मशहूर था. किसी के भी रखे हुए पर्स से रुपये गायब कर देना, उसके बाएं हाथ का खेल था.

इस आदमी को हमारे साथ एक छत के नीचे रहने की इज़ाज़त क्यों थी, मेरी समझ से बाहर था.   अगर यह अचानक आ भी गया था, तो बड़ी आसानी से इसे चलता किया जा सकता था!

उसके बाद जो घटा वह एक हादसा था. अगली शाम मैं चौक से टहल कर लौटा तो घर में कुहराम मचा था! लगभग आधा मोहल्ला वहां जमा था, और मेरी माँ और पत्नी लगभग गुत्थम गुत्था थीं. माँ उसे भद्दी, निकृष्टम गालियां दे रहीं थीं, और वह यानी मीरा, बित्ते भर की छोकरी, जिसने पहली ही रात मुझे मोह लिया था, पूरी ताकत लगाकर, टनकदार, ज़ोरदार आवाज़ में माँ को जवाब दे रही थी, “देखिये, हम कुछ नहीं किये हैं. फालतू हमारे चरित्तर को दोस मत दीजिये। आप हमको फंसाई हैं.” मुझे देखकर, उसकी आँखों से ज़ार ज़ार आँसू बहने लगे. फंटूस की ओर ऊँगली उठाये, वह चिल्लाने लगी, “ई आदमी हमारे ऊपर कूदा था”, फिर चेहरा ढंक बिस्तर पर बैठ असहाय रोने लगी. घबराहट में वह मैं से हम की ओर वापस लौट आयी थी, और मुझे लगा ऐसा ही हमेशा होना चाहिए!

मेरे पीछे का घटना क्रम चाहे जो भी रहा हो, मेरे सामने का घटना चक्र कुछ इस प्रकार था, कि मैंने ही उसे फंटूस को लेकर सावधान किया था. उसने बाद में मुझे बताया कि सुबह ही छत पर कपड़े फैलाते में, उसने कंकड़, पत्थर, गिट्टी के साथ ईंट के टुकड़े बीन लिए थे और पोटली सिरहाने रख ली थी.

फंटूस पर उसने इनकी बरसात कर दी थी और दीवारों पर घूंसे चलाती, मदद की आवाज़ लगाने लगी थी. पडोसी दौड़ कर आये थे.

माँ के मुताबिक, यह घटना क्रम कुछ और था, लेकिन मेरे पास उसे सुनने की शक्ति नहीं थी. मेरी आँखें भर आयीं थीं, रोम रोम सुबक रहा था. क्या माँ को हमारा अलग थलग शांति पूर्वक, प्रेम पूर्वक रहना भी गवारा न हुआ? वो क्या चीज़ थी, जो नाकाबिले बर्दाश्त थी? बचा क्या था, कहने सुनने को?

अगली ट्रेन से हम लौट तो आये, लेकिन, क्या इस इतनी बड़ी दुनिया में, इतने बड़े परिवारों के बावजूद, हम एकदम अकेले हो गए थे?

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परिचय : पंखुरी सिन्हा कहानी और कविता में अपनी विशेष पहचान रखती हैं. इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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