खास कलम : गुड़िया पांडेय

दुर्जीव पहचान करो पहचान करो, उस दानव की पहचान करो। जो दैत्य से भी बढ़कर है, उस मानव की पहचान करो। जो रोज आके इन गलियों मे, एक ढुंढता शिकार है। मस्तिष्क मे इसके घुम रहा , एक सस्ता व्यभिचार हैं। नष्ट कर दो उस वृत्ति को ही, मत उसका सम्मान करो। जो दैत्य से भी बढ़कर है, उस मानव की पहचान करो। जो कदाचार अपनाया है, जिसकी एक काली माया है। उखाड़ फेंको उस जड़ को, वो जितना मजबूत बनाया है। जितना भी हो सके संभव, उतना इसका अपमान…

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विशिष्ट गजलकार : वशिष्ठ अनूप

1 सारे जग से निभाया तुम्हारे लिए हर किसी को मनाया तुम्हारे लिए तुमको अपना बनाना था बस इसलिए सबको अपना बनाया तुम्हारे लिए नाज़ से सर उठाकर चला हर जगह हर जगह सर झुकाया तुम्हारे लिए जाने किस रूप में तुम कहाँ पर मिलो द्वार हर खटखटाया तुम्हारे लिए चाहता था तुम्हारी हँसी देखना मैंने सबको हँसाया तुम्हारे लिए कौन सा राग तुमको सुरीला लगे राग हर गुनगुनाया तुम्हारे लिए 2 अड़े हैं तो मंज़िल की ज़िद में अड़े हैं बहुत छोड़ कर ही हम आगे बढ़े हैं अदब…

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विशिष्ट कवि : शरद कोकास

धुएँ के खिलाफ अगली शताब्दि की हरकतों से पैदा होने वाली नाजायज़ घुटन में सपने बाहर निकल आयेंगे परम्परिक फ्रेम तोड़कर कुचली दातून के साथ उगली जाएँगी बातें मानव का स्थान लेने वाले यंत्र – मानवों की सुपर कम्प्यूटरों की विज्ञान के नए मॉडलों ग्रहों पर प्लॉट खरीदने की ध्वनि से चलने वाले खिलौनों की मस्तिष्क के खाली हिस्से में अतिक्रमण कर देगा आधुनिकता का दैत्य नई तकनीक की मशीन पर हल्दी का स्वास्तिक बनाकर नारियल फोड़ा जायेगा ऊँची ऊँची इमारतों से नीचे झाँकने के मोह में हाथ – पाँव…

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विशिष्ट गीतकार : पूर्णिमा वर्मन

अमलतास डालों से लटके आँखों में अटके इस घर के आसपास गुच्छों में अमलतास झरते हैं अधरों से जैसे मिठबतियाँ हिलते है डालों में डाले गलबहियाँ बिखरे हैं– आँचल से इस वन के आँचल पर मुट्ठी में बंद किए सैकड़ों तितलियाँ बात बात रूठी साथ साथ झूठी मद में बहती वतास फूल फूल सजी हुईं धूल धूल गलियाँ कानों में लटकाईं घुँघरू सी कलियाँ झुक झुक कर झाँक रही धरती को बार बार हरे हरे गुंबद से ध्वजा पीत फलियाँ मौसम ने टेरा लाँघ के मुँडेरा फैला सब जग उजास…

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समकालीन महिला गजलकार : एक महत्वपूर्ण कृति : जयप्रकाश मिश्र

समकालीन महिला गजलकार : एक महत्वपूर्ण कृति – जयप्रकाश मिश्र ख्यातिप्राप्त लेखक एवं चर्चित दोहाकार हरेराम “समीप” के संपादकत्व में छपी पुस्तक “समकालीन महिला गजलकार” साहित्य जगत में एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें कुल बाइस महिला गजलकारों की गजलें छपी है। कुछ नामों को छोड़कर सभी महिला गजलकारों की एक विशिष्ट पहचान है। यह पुस्तक प्रासंगिक और पठनीय है। इसमें प्रकाशित गजलों के विभिन्न रंग हैं तथा विविधता का खास ख्याल रखा गया है। लगभग सभी ख्याति प्राप्त महिला गजलकार यहाँ मौजूद हैं मसलन-  डॉ भावना, डॉ मालिनी गौतम, उर्मिल…

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विशिष्ट कवयित्री : मीरा श्रीवास्तव

स्त्रियाँ कहीं से आएँ स्त्रियाँ कहीं से आएँ कहीं भी जाएँ तनाव, खीझ, झुँझलाहट की परत चिकने , महीन फेस पाउडर की तरह फैली होती है उनके चेहरे पर अॉटो से उतरती, कंधे से लटकते थैलेनुमा पर्स में ठुँसी सब्जियों में कॉम्पैक्ट , मनपसंद लिपस्टिक कंघे की लापता मौजूदगी भी स्त्रियों के तनाव से खींचे चेहरे झुँझलाहट में भिंचे होंठों की सिकुडन मिटाने में कामयाब नहीं हो पाती पर्स में ढनमनाते लंच के डब्बे सा खाली मन और मनों भारी कधमों से इन स्त्रियों के लिफ्ट में घुसते ही लिफ्ट…

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एक मिशन के आधार स्तंभ स्वामी सत्यानंद सरस्वती : कुमार कृष्णन

एक मिशन के आधार स्तंभ  स्वामी सत्यानंद सरस्वती – कुमार कृष्णन स्वामी शिवानंद ने कहा था कि—’ प्राय: सभी महान उपलव्ध्यिों के सुंदर और आकर्षक पक्ष ही हमें दिखाई देते हैं। भव्यता हमें प्रभावित और विस्मृत कर देती है। इस चमक—दमक के बीच हम उन परिश्रमी,आत्मनिग्रही सेवकों को भूल जाते हैं,जिसकी सहायता से मिशन तैयार होता है। वास्तव में सारा श्रेय और यश तो उन्ही को जाता है।’ स्वामी सत्यांनद के संदर्भ यह बात काफी सटीक है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती देश के ऐसे संत हुए जिन्होंने न सिर्फ योग को पूरी दुनिया…

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विशिष्ट कहानीकार : सीमा शर्मा

 मैं,रेजा और पच्चीस जून यह उम्र ही ऐसी होती है। सब कुछ अच्छा लगता है। सुंदरता और शोख रंग तो खींचते ही हैं। पर जो हट कर है, वह और अधिक आकर्षित करता है। शायद यह चुंबकीय उम्र होती है। खींचती है और खिंचती भी चली जाती है। मैं रोज ही उसे देखता था। लेकिन यह नहीं जानता था कि वह आंखों की भाषा समझती है या नहीं। उसे देख कर कभी नहीं लगा कि समझती होगी। वह देखती थी, पर आंखें बोलती नहीं थीं। जिसे आप साफ-साफ पढ़-सुन नहीं…

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