खास कलम : विकास

1 सफर में रहनुमाई चाहता हूँ कहाँ तुमसे जुदाई चाहता हूँ मैं ज़िम्मेदार  हूँ  अपने किये का न  उसकी मैं बधाई चाहता हूँ ये कैसी ज़िद  मेरे  हिस्से में आई मैं  अपनों  से विदाई चाहता हूँ भटक  जाओ  न राहों में कभी तुम तुम्हारी  मैं  कलाई  चाहता  हूँ दिये  हैं  ज़ख्म  जिसने ढेर सारे उसी  से  मैं  दवाई  चाहता  हूँ   2 अपने  हिस्से  में  प्यार  रखते  हैं लोग    चेहरे    हज़ार   रखते   हैं मुस्कुराकर   उसे    ही   दे    देते हम   कहां   ग़म  उधार   रखते हैं डर   गए …

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दोहे : जयप्रकाश मिश्र

सोने जैसी बेटियाँ, भिखमंगें हैं लोग। आया कभी न भूल कर, मधुर-मांगलिक योग।। 11 लिपट तितलियाँ पुष्प से , करती हैं मनुहार। रंगों का दरिया बहे, बरसे अमृतधार।।12 चेहरे से चेहरे मिले, बजे हृदय में तार। तंग नजर है पारखी, उसपर यह शृंगार।। 13 सपनों की अट्टालिका, अनुपम तेरा चित्र। तेरे -मेरे प्यार में, तप है छिपा विचित्र।।14 गंध उड़ी ,मधुकर उड़े, लगे भटकने ध्यान। कोयल कूके बाग में, मोहित सकल जहान।।15 बच्चे भी पढ़ने लगे, तीर, धनुष, तलवार। दिल मेरा जलता रहा, देख हजारों बार ।।16 नित-नित बढ़ते जा…

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विशिष्ट कहानीकार : अंजू शर्मा

उम्मीदों का उदास पतझड़ साल का आखिरी महीना है ऑटो से उतरकर उसने अपने दायीं ओर देखा तो वह पहले से बस स्टॉप पर बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी! उसने एक उचाट सी नज़र उस पर डाली और अपनी पेंट की जेबों में हाथ डाले, वह सुस्त कदमों से गार्डन के गेट की ओर बढ़ चला! उसके मूक निमन्त्रण पर थके कदमों से वह भी उसका अनुसरण करने लगी! लग रहा था मानो वे दोनों एक अदृश्य उदासी की डोर से बंधे साथ चल रहे थे! यह दिन भी…

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आलेख : संजीव जैन

वस्तुकरण का उन्माद आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था ने पूरी दुनिया को ‘वस्तुकरण के उन्माद’ की धुंध और कुहासे के अनंत चक्रव्यूह में फंसा दिया है। ऐसा उसने व्यक्ति चेतना को ‘वस्तुकरण’ में बदलकर किया है। सबसे पहले तो पूँजीवाद ने व्यक्तिचेतना को सामूहिक मानवीय जीवन की समग्र गरिमा और अस्तित्व की सार्थकता को छिन्न-भिन्न करके उसका पाश्वीकरण किया और फिर आंतरिक संगति को विखंडित करके उसका वस्तुकरण किया। मानवीय गरिमा और अंतरात्मा से विच्छिन्न मनुष्य ‘उन्माद’ की धुंध में जीता है। हिंसा और बलात्कार, सामूहिक हिंसा और सामूहिक बलात्कार भी उसके…

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विशिष्ट गीतकार : किशन सरोज

1 धर गये मेंहदी रचे दो हाथ जल में दीप जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन बांचते हम रह गये अन्तर्कथा स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन जंगलों का दुख, तटों की त्रासदी भूल सुख से सो गयी कोई नदी थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव और झीने पाल सा हिलता रहा मन तुम गये क्या जग हुआ अंधा कुँआ रेल छूटी रह गया केवल धुँआ गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात हाथ के रूमाल…

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पुस्तक समीक्षा : परवाज-ए-ग़ज़ल

गहन संवेदना का प्रखर दस्तावेज परवाज-ए-ग़ज़ल गजल जब अपने परंपरागत ढांचे को तोड़ते हुए  रूहानियत और रूमानियत के सिंहासन से उतरकर किसी झोपड़ी के चौखट की पीड़ा के प्रति जवाबदेह हो जाती हैं तब ग़ज़ल अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम साबित होती है।  गजलें मानव मन की गहन संवेदना का प्रखर दस्तावेज साबित होती हैं। अपनी गज़लों के माध्यम से कलमकार सिस्टम पर चोट करते हैं और व्यवस्था से जुड़ी विसंगतियों से सीधा संवाद स्थापित करते हैं।आप देखेंगे कि गजलें आम आदमी के रोजमर्रा की जिंदगी के अनथक संघर्ष को…

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विशिष्ट गजलकार : ओमप्रकाश यती

1 कभी लगती मुझे भीगे नयन की कोर है अम्मा मगर हरदम मेरी उम्मीद का इक छोर है अम्मा बिखरने से बचाती है, सभी को बाँधकर रखती अनूठे प्रेम की, ममता की ऐसी डोर है अम्मा पिता को टोकती है, रोकती है वो कभी मुझको कभी इस ओर है अम्मा, कभी उस ओर है अम्मा हमें लगता है जब भी रात काली ख़त्म कब होगी चली आती हमारे पास बनकर भोर है अम्मा विदा के बाद गुड़िया की,सम्हल पाई नहीं अब तक भले मजबूत लगती है मगर कमज़ोर है अम्मा…

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विशिष्ट कवयित्री : मंजूषा मन

1 सहारा तुमने कहा – “तुम लता बन जाओ मैं हूँ न सहारा देने को, मेरे सहारे तुम बढ़ना ऊपर छूना आसमान… खो गई में तुम्हारी घनाई में तुम्हारे घने पत्तों के बीच दम घुटने लगा था मेरा पर मेरी नाजुक टहनियाँ उलझ चुकीं थी तुम में, निकल पाना सम्भव नहीं हुआ मैं घुट घुट कर मरने लगी, मेरे पत्ते मुरझाने लगे, मुझपर छाने लगा पीलापन, और तुम दम भरते रहे मुझे सहारा देने का… तुम भूल गए कि मैं अमरबेल हूँ में कहीं भी जी सकती हूँ मैं मरती…

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