आलेख : डॉ अनिल कुमार पांडेय

जीवन, प्रकृति और समाज की अभिव्यक्ति : समकालीन हिंदी ग़ज़ल – डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय ग़र जमीं पर बाँट देने की हवस बढ़ती रही जंग कंधों पर उठाकर आसमां ले जाएगा| खौफ़ की अंधी-अंधेरी घाटियों से भी परे आदमी को आदमी जाने कहाँ ले जाएगा|| (माधव कौशिक) 1 प्रकृति को समझने के लिए हमें पर्यावरण को दृष्टिगत करना पड़ेगा| “पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के ‘परि’ उपसर्ग (चारों ओर) और ‘आवरण’ से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से…

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विशिष्ट कहानीकार : तरुण भटनागर

महारानी एक्सप्रेस तारा को छोटी बहन की बातें याद आ रही थीं। जब वे गोवा में थे वह वहाँ की औरतों को देखकर चहक उठती थी -‘माँ यहाँ तो बड़ी-बड़ी औरतें भी स्कर्ट पहरती हैं।’ उसने एक बार स्कूल में डाँस में भाग लिया था। उसे साड़ी पहराई गई थी। साडी कभी पैरों में उलझती, तो कभी कमर से फिसलती, कभी सिर का पल्लू गिरता, तो कभी कुछ और………..। उसे पता था कि बड़े होकर साड़ी ही पहरनी पड़ती है। यह सोच वह घबरा जाती कि साड़ी पहरनी होगी। पर…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : दिनेश प्रभात

1 पांव को आये न देखो आंच बस्ती में हर तरफ बिखरे हुए हैं कांच बस्ती में क्यों मरी उसके कुएँ में डूबकर औरत चल रही सरपंच के घर जांच बस्ती में आग के शोले उसी की ओर लपके हैं जिस गली में रह रही थी सांच बस्ती में सेठ, थानेदार ,मुखिया, पंच, पटवारी डालते डाके ये दिन में पांच बस्ती में ऐ कबूतर! आज तू आकाश में मत उड़ प्यार की चिट्ठी हमारी बांच बस्ती में 2 झील है, तट है, लहर है, कश्तियां हैं पार जाने पर मगर…

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खास कलम : शिवम ‘खेरवार’

वर्जना का दौर, इसमें प्रेम का अध्याय गढ़ना, है कठिन क्या? पर्वतों से हो गए जग के प्रणेता राह में जब, प्रेम की नदिया निकल बहती धरा की चाह में तब, नेह की मुस्कान वितरित कर सकें जल की तरंगें, शुष्क हिय के दो अधर पर नेह का ‘पर्याय’ धरना, है कठिन क्या? वर्जना का दौर….. पुष्प कलियों को सहेजे हँस रहे हैं खिलखिलाकर, चाँद तारों से लिपटने चल पड़ा विश्वास पाकर, कुछ गुलाबी रंग ले रंगने चला हूँ कालिमा को, कालिमा के गाल पर इस नेह का ‘अभिप्राय’ मलना,…

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विशिष्ट गीतकार : वीरेन्द्र आस्तिक

सर-सर बहा पवन अकस्मात इस मधुवन में सर-सर बहा पवन तभी देखने में आया इक नटखट मौसम झूम उठी हर टहनी जैसे झूम उठें झूमर कई जंगली चिड़ियां बैठी झूल रही उन पर चमक क्षितिज पर बिजुरी भी मचा गई हड़कम पेड़ों-पेड़ों उड़-उड़ बैठें मोर, धनेश पिकी चंचु दबाए तिनका बैठी चुप-चुप एक खगी कर्ण-कुहर में कूज भरी दृग झूमें शीशम एक कबूतर के जोड़े में छिड़ी हुई मनुहार देख रही हैं हम दोनों की आँखे मिलकर चार सटे करों की मुट्ठी में कसे हुए हैं हम तभी देखने में…

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लघुकथा : मुकुन्द प्रकाश मिश्र

राजधानी एक्सप्रेस – मुकुन्द प्रकाश मिश्र मैं रेलवे स्टेशन पर बैठ कर ट्रेन का इंतजार कर रहा था ।किसी ने कहा ट्रेन हमेशा की तरह है 2 घंटे लेट ! यह सूचना सुनकर मैं वही एक कुर्सी पर बैठ गया कुछ ही समय बाद मैने देखा । एक बुजुर्ग जो शायद प्राकृतिक तथा माननीय यातनाओं का शिकार था वह कूड़े के ढेर पर बैठ अपनी असहनीय भूख को शांत करने के लिए रोटी का टुकड़ा ढूंढ रहा था उनका प्रयास बेकार नहीं गया और करीब आधा घंटा मेहनत के बाद…

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पुस्तक समीक्षा : – डाॅ. भावना

भावनाओं का प्रतिबिंब : कई-कई बार होता है प्रेम – डाॅ. भावना “कई -कई बार होता है प्रेम“ प्रगतिशील, प्रतिबद्ध एवं प्रयोगधर्मी यवा कवि अशोक सिंह का सद्य प्रकाशित काव्य-संग्रह है, जो बोधि प्रकाशन से छप कर आया है। अशोक सिंह का यह संग्रह कई मायनों में खास है। परिवार व समाज की घटनाएँ संवेदना के केंद्र में हैं।. कवि ने परिवार में रोज घटित होने वाली घटनाओं व प्रसंगों को कविता का विषय बनाया है, चाहे मध्यमवर्गीय परिवार की कमर-तोड़ महंगाई का एहसास हो, या मां का स्नेहिल स्पर्श।…

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विशिष्ट कवि : अरविंद भट्ट

चारदीवारी तुम्हारे अपने शहर में, अतिव्यस्त मार्केट की चकाचौंध, और लोगों की रेलमपेल के सहारे आगे बढ़ते, जहाँ सड़क और फुटपाथ के अंतर की सीमा रेखा, शायद अपना अस्तित्व बचाते बचाते, कब का दम तोड़ चुकी थी. अब सब निर्बाध था, बिना किसी सीमा का मूल्यांकन किये, कोई कहीं से भी चल सकता था, किसी को भी धकिया सकता था. मैं बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे, इस धकापेल और अनचाहे शोर से , दूर जाने की छटपटाहट में, एक इमारत की तलाश में. पर इस अतिव्यस्त से दिखने वाले ,…

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