खास कलम : पंखुरी सिन्हा

घिर रही हैं बदलियां अब जाने किधर   घिर रही हैं बदलियां अब जाने किधर ना जाने किस देस में ठनका गिरा है   किस दिशा में मेघ ने खुद ही उतर कर दूब को सहला दुबारा भर दिया है   कौन कहता था उसी के घर बराबर नदी तट पर सोन मछरी तैरती है   किस तलैया से उठी अबकी ये पुरवा रोक कर रस्ता ये मेरा छू लिया है   छू लिया है आम की किस शाख ने मुझको अभी यूँ मंजरों से महक मन बौरा गया है…

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आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल-शिल्प और कथ्य : अनिरुद्ध सिन्हा

आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल-शिल्प और कथ्य – Nअनिरुद्ध सिन्हा मैं यह मानता हूँ दुष्यंत कुमार हिन्दी ग़ज़ल के अनिवार्य हस्ताक्षर हैं। उनके ग़ज़ल -लेखन का कथ्य परिवेश जितना विशाल है,उतना ही हिन्दी ग़ज़ल के विकास में उनका योगदान है। वे हिन्दी ग़ज़ल-धारा के सर्वाधिक प्रखर और मुखर व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। जीवन में जहाँ कहीं उनको विसंगति/विद्रूपता दृष्टिगत हुई,उनका न केवल व्यक्तिगत स्तर पर,बल्कि साहित्यिक स्तर पर भी विरोध किया।यही कारण है अन्य विधाओं की तुलना में ग़ज़ल लेखन में उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली और उनकी बातें सुनी…

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रोचकता की खुशबू से पन्ने महक रहे : पारुल सिंह

  रोचकता की खुशबू से पन्ने महक रहे : पारुल सिंह “यायावर हैं आवारा हैं बंजारे हैं”, ये किताब हाथ में लेते ही मुझे बहुत भा गई। सुंदर कवर, हल्का वज़न और गोल्डन स्याही से लिखा हुआ लेखक और किताब का नाम। क़िताब के पन्नों और स्याही की लिखावट की ख़ुशबू पाठक पर क्या प्रभाव छोड़ती है, यह हर पुस्तक प्रेमी समझ सकता है। किताब को पढ़ना उस पर लिखे हुए को ही पढ़ना नहीं होता पाठक के लिए। किताब को हाथों में थामना, खोलना उसकी ख़ुशबू में खो जाना…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : केशव शरण

1मेरी छोटी-सी उलझन को सुलझाने में साथी मुझको लेकर आए मयख़ाने में शीशा तोड़ा फिर दिल तोड़ा पर जाने दो ऐसा उनसे हो जाता है अनजाने में मतलब की ये दुनिया है जो मायावी है मैं क्या हूं जो आ जाता हूं भरमाने में मुस्कानों के फुसलाने में आ जाता हूं आ जाता हूं मृदु शब्दों के बहलाने में इन्कार नहीं है जां देने में जाने-जां इन्सान अगर कुछ खोता है कुछ पाने में स्वागत में दो बिस्कुट केवल और नहीं कुछ जाने कितना ख़र्च हुआ मेरा आने में क्या…

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विशिष्ट गीतकार : राम किशोर दाहिया

स्वाभिमान का जीना  लीकें होती रहीं पुरानी सड़कों में तब्दील नियम-धरम का पालन कर हम भटके मीलों-मील । लगीं अर्जियाँ ख़ारिज लौटीं द्वार कौन-सा देखें उलटी गिनती फ़ाइल पढ़ती किसके मुँह पर फेंकें वियावान का शेर मारकर कुत्ते रहे कढ़ील । नज़र बन्द अपराधी हाथों इज्जत की रखवाली बोम मचाती चौराहों पर भोगवाद की थाली मुँह से निकले स्वर के सम्मन हमको भी तामील । मल्ल महाजन पूँजी ठहरी दावें पाँव हुजूर लदी गरीबी रेखा ऊपर अज़ब रहे दस्तूर स्वाभिमान का जीना हमको करने लगा ज़लील । कोई शेर नहीं…

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विशिष्ट कवि : संजय छिपा

लोग कविता में स्वाद देखते है उस खून को नहीं देखते जो स्याही बनकर टपकता है आँखों से कुछ लोगों को आदत है शब्दों को ईधर उधर करने की ये जादूगर है कविता को गायब कर देते है एक सच्ची कविता उस अनपढ़ मजदूर के पास है जो लिख नहीं सकता उसे सुनने के लिए एक तपती दुपहरी में नंगे पाँव चलना होगा उसने कई दिनों भूखे रहकर तुम्हारे शब्दावली को किया है पराजित सच कहूँ तो असल में वह कवि नहीं है जिसके पास शब्द है सच्चा कवि वह…

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विशिष्ट कहानीकार : प्रवीण कुमार सहगल

पिता के जाने के बाद पिताजी सीरियस हैं, बड़े भैया का फोन आया तो हतप्रभ रह गया। अभी दो दिन पहले ही तो मैं घर से वापस नौकरी पर आया था। अच्छे-भले थे, पिताजी। बड़ी मुश्किल से भैया से पूछ पाया कि एकाएक पिताजी को क्या हो गया। रूंधे गले से भैया बोले- “जमीन पर गिरे फिर नहीं बोले, पोजीशन क्रिटीकल है। आई0 सी0 यू0 में भर्ती हैं। तुरन्त आ जाओ।” भैया के रिसीवर रखते ही मैं आनन-फानन में घर से निकल पड़ा। टैक्सी पकड़ी। रात को घर पहुंच गया।…

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