विशिष्ट ग़ज़लकार : हरेराम समीप

1 काम जिनके अमीर जैसे हैं देखने में कबीर जैसे हैं रास्ते ये लकीर जैसे हैं और हम सब फ़कीर जैसे हैं एक झोंके की उम्र है अपनी खुशबुओं के शरीर जैसे हैं साथ चलने से दिल बहलता है हम सभी राहगीर जैसे हैं दिल के हालात क्या बताऊँ मैं आजकल काश्मीर जैसे हैं दीनो-मजहब के कैदखानों में आजकल हम असीर जैसे हैं माँगकर खा रहा है वो लेकिन ठाट उसके अमीर जैसे हैं शेर कहना ’समीप’ क्या जाने ये तो गूँगे की पीर जैसे हैं 2 ये न पूछो…

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खास कलम : गरिमा सक्सेना

1 इस सूखे में बीज न पनपे फिर जीवन से ठना युद्ध है पिॆछली बार मरा था रामू हल्कू भी झूला फंदे पर क्या करता इक तो भूखा था दूजा कर्जा भी था ऊपर घायल कंधे, मन है व्याकुल स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है सुता किसी की व्याह योग्य है कहीं बीज का कर्जा भारी जुआ किसानी हुआ गाँव में मदद नहीं कोई सरकारी चिंताओं, विपदाओं का पथ हुआ कभी भी नहीं रुद्ध है भूखे बच्चे व्याकुल दिखते आगे दिखता है अँधियारा सोच न पाता गलत क्या सही जब मिलता…

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विशिष्ट कहानीकार : डॉ पूनम सिंह

अनुत्तरित प्रश्न ‘‘पापा , हम मम्मी के पास कब चलेंगे , बताइये न पापा ।’’ रिम्मी के जिस सवाल से राजीव बार-बार बचने का प्रयत्न करता है वही सवाल करके रिम्मी अपने स्कूल की हर छुट्टियों में उसे एक कड़वे एहसास से भर देती है । राजीव को पता है, रिम्मी अब बड़ी हो रही है — बहुत दिनों तक अब उसे नहीं बहलाया जा सकता लेकिन वह कैसे कहे उससे कि मम्मी के पास जाने का रास्ता एक अंधेरी सुरंग से होकर जाता है , जिसे वह अपने सुकुमार…

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विशिष्ट कवि : राज किशोर राजन

ईश्वर की सर्वोत्तम रचना कितनी अजीब बात है जब उचारा आपने कि मनुष्य, ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है तो मुखमंडल आपका दिपदिपाने लगा पर जब कहा मैंने कि ईश्वर, मनुष्य की सर्वोत्तम कल्पना है तो मुखमंडल आपका स्याह हो गया सैकड़ों-हजारों साल हुए आपको अब तक भरोसा नहीं मनुष्य पर ईश्वर की सर्वोत्तम रचना होने के बाद भी दूब, गुलाब, तितली और मैं दूब को देखा मैंने गौर से और हथेलियों से सहलाता रहा दूब तो दूब ठहरी लगी थी पृथ्वी को हरा करने में निःशब्द सुबह का खिला गुलाब…

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आलेख : अनिरुद्ध सिन्हा

हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे (एक) : संजू शब्दिता जैसा कि कहा गया है युवा मन की ग़ज़लें प्रेम के गलियारे से होकर यथार्थ के धरातल पर उतरती हैं।नवलेखन के क्षेत्र में सौन्दर्यवादी रूझान कुछ दिनों तक चलता है।लेकिन विचारधारा की कसौटी पर संजू शब्दिता की ग़ज़लों का रूख बिल्कुल साफ है।ज़िन्दगी के मायने तलाशती इनकी ग़ज़लें जीवन के मुहावरों को निरंतर खोज करती रहती हैं।इस खोज में इन्हें कभी-कभी सन्नाटों से भी मुठभेड़ करना पड़ता है—— हम सितारों की उजालों में कोई कद्र कहाँ खूब  चमकेंगे     ज़रा   रात  घनी …

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समकालीन उर्दू हिंदी ग़ज़ल का नया नाम अशोक मिज़ाज बद्र

डॉ हरी सिंह गौर केंद्रीय विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा ,समकालीन ग़ज़ल और अशोक मिज़ाज,शीर्षक से परिचर्चा एवं काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य वक्ता के रूप में भोपाल से उस्ताद शायर जनाब ज़फर सहबाई, म, प्र,उर्दू अकादमी के शायर और आलोचक जनाब इक़बाल मसूद,आलोचक और शायर जनाब ज़िया फ़ारूक़ी ,हिंदी ग़ज़लकारों में श्री विजय वाते और डॉ, वर्षा सिंह ने अशोक मिज़ाज बद्र की शायरी पर अपने वक्तव्य दिए। इस अवसर पर इक़बाल मसूद ने कहा कि समकालीन ग़ज़ल में तो बहुत से नाम हैं, जिनमें…

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विशिष्ट गीतकार : डॉ बुद्धिनाथ मिश्र

(छोटे बच्चे अक्सर दीवारों पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाकर अपनी अद्भुत कलाकारी का इजहार करते हैं. उनके कमासुत माँ -बाप उसे ‘दीवार ख़राब’ करना मानते हैं और बच्चे को डांट -फटकार कर उस पर रंग-रोगन कर मिटा देते हैं. ऐसा प्रायः हर घर में होता है, जहां बचपन जिन्दा है और संवेदना मर गयी है) यह दीवारों का जेवर है आड़ी- तिरछी रेखाओं का अपना मतलब, अपना स्वर है पाटी पर भारी दीवारें कहतीं – यह बच्चों का घर हैै। ये पुरखों की आदिम लिपियाँ इनका अर्थ गुनो ये भविष्य की…

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विशिष्ट कवयित्री : प्रतिभा चौहान

सिलवटें एक दशक पुरानी है चट्टान खामोशी की और खर्च किये जाने से बचा हुआ है धीरज आकाश के पर्दे पर टका हुआ है जगमग संसार तुमसे मांगना है सारे पिछले पलों का हिसाब आखों के स्याह गड्ढों को भरते हुये कर लेने हैं सभी हिसाब चुकता हम तो यूं ही हमेशा शहर की सरस्वती में सिक्के ढूंढते पकड़े जाते हैं तुम्हारी भनक भी नहीं लगती समूचे भूखण्ड निगल जाते हो नदियों की मचलती ताजगी संदेश आज का जब लौटोगे शब्दों की नही बनेगी प्रतिमा बस उबासी के समय से…

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