विशिष्ट कवि : विमलेश त्रिपाठी

चूल्हा वह एक स्त्री के हाथ की नरम मिट्टी है आँच में जलते गालों की आभा आत्मा के धुँए का बादल और आँख का लोर झीम-झीम बहता काजल वह आसमान की ओर उमगी उदास हँसी है वह एक सुहागिन का पुरूष है एक अटूट व्रत एक पूरी हुई भखौटी नवजातों की लंबी उम्र की अंतहीन एक प्रार्थना एक ईश्वर है वह भूख के खिलाफ सदियों से इतिहास में अकेली खड़ी एक आदिम स्त्री का शोकगीत है अन्न के भविष्यत काल तक गूँजता वह एक अनाम स्त्री का घर है पेट…

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ख़ास कलम : बृजमोहन स्वामी ‘बैरागी’

मेरे हिस्से की भूख : लाचार कविता —————————————————– ( गरीबी और लाचारी में जीवन यापन करते हुए एक कवि/लेखक की अंतरात्मा से लिखी गई एक कविता जो विश्व की महान से भी महान अवधारणा को तोड़ती जाती है । ) सुनो अवंतिका ! मैं अभी जिंदा हु, थोड़ी देर तो…. मैं ही वह बदनसीब रास्ता हूं जो एक फ़टे कुर्ते में छिपा रहा सालों तक मुझे समझो “स्याही”, बेज़ुबान गहरी रातें धारणाओं को तोड़ जाती हैं थोड़ा झांककर देखो अवंतिका, मानवता को अलविदा कहते हैं पिछली शदी के सबसे गरीब…

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विशिष्ट गीतकार : जय कृष्ण राय तुषार

एक गीत-ये हमारे प्रान बहुत मुश्किल से हवा में लहलहाते धान ये नहीं हैं धान , प्यारे ये हमारे प्रान ! जोंक पांवों में लिपटकर रही पीती खून, खुरपियों से उंगलियां काटीं , बढ़े नाखून, गाल में बस एक बीड़ा रहा दिनभर पान एक झिलगां चारपाई कटे कैसे रात, पिता बहरे और माँ को हुआ पक्षाघात, मौसमों से दर्द का मिलता रहा अनुदान सिर्फ़ अपना हौसला है खेत-क्यारी में, बीज-पानी उर्वरक सब कुछ उधारी में , पर्व होली का इसी से, इसी से रमज़ान आखेटक चुप्पियाँ तोड़कर आज हँसेंगे सारा…

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विशिष्ट कवयित्री : अनीता सिंह

अपनों के लिए ईश्वर को साथ लिए चलती है स्त्री सामा चकेवा के बहाने पहुँच जाती है नइहर भावजों से तिरस्कृत होकर भी नही चाहती अनबन रोक देती है भाई के उठे हाथ काहे लागि भइया हो भउजो के मारल हो भइया हमरो लिखल दूर देस बहुरियो न आएब हो गोधन कूटती हुई सरापती हैं भाई बाप बेटा दामाद चुभाती है रेगनी का कांटा सरापने वाले जीभ में कूट देती है जम रईया की चानी मूसल से हल्दी वाले पोर से बाँटती है आयु रुई के कलावे में बांध देती…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : हातिम जावेद

हातिम जावेद की ग़ज़लें 1 इक नज़र आपकी हो गई ज़िंदगी ज़िंदगी हो गई आपने लफ़्ज़े-कुन कह दिया सारी कारागरी हो गई आप की दी हुई ज़िंदगी लीजिए आपकी हो गई वो जुदा क्या हुए, ज़ीस्त की बाँसुरी बेसुरी हो गई ओढ़ कर अज़्म जब तल पड़े चार-सू रौशनी हो गई वो न आए अयादत को भी ऐसी क्या बेबसी हो गई सब्र को गोद जबसे लिया मेह्रबाँ ज़िंदगी हो गई अब तो बे-बह्र या बेवज़न जो कहो शायरी हो गई 2 ज़िंदा मंज़िल की आस रहने दे अपने पाँवों…

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पुस्तक समीक्षा : अनिरुद्ध सिन्हा

डी.एम.मिश्र की ग़ज़लें लोक-जीवन का काव्यात्मक अंकन हैं डी.एम.मिश्र की ग़ज़लें अपने स्वगत चिंतन और आत्मानुभूति के लोक में स्वछंद विहार करती हुई नज़र आती हैं। इसका प्रमुख कारण है लोक से उनका जुड़े रहना। शोषण में जकड़ी हुई और पूंजीवादी व्यवस्था से आक्रांत लोक जीवन अपनी मुक्ति के लिए जैसे संकल्प-विकल्प कर सकता है और जिस सीमा तक विद्रोह अथवा पलायन कर सकता है उसका बड़ा ही काव्यात्मक अंकन हुआ है। हम यह भी कह सकते हैं इनकी ग़ज़लों ने लोक संवेदना की छ्द्म समस्यापूर्ति का महत्व गौण बना…

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आलेख : डॉ मनमीत कौर

आदिवासी स्त्रियाँ (निर्मला पुतुल की कविताओं के विशेष संदर्भ में)                                                                      – डॉ मनमीत कौर वर्तमान भारत में आदिवासियों की कुल आबादी लगभग आठ प्रतिशत है। इसमें आदिवासी स्त्रियों इसका आधा हिस्सा हैं। आदिवासी स्त्रियों के संबंध में आम धारणा है कि यह अपने पति को ईश्वर नहीं मानती। पति या सास-श्वसुर द्वारा सताए जाने पर घुट-घुट कर जीने के बजाए उसका त्यागकर दूसरा मनपसंद साथी या पति का वरण करती हैं। आदिवासी समाज इस व्यवहार को मान्यता भी देता है। यह ठीक है कि आदिवासी स्त्रियों को मनपसंद साथी…

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विशिष्ट कहानीकार : सपना सिंह

दो बहनों की कहानी – सपना सिंह ……कुछ पुराना सा शीर्षक है न। दो बैलों की कथा सा ध्वनित होता है। पर क्या करें एक के साथ दूसरे की बात आप से आप आ जाती है। एक की बात करो दूसरे की बात चलना लाजिमी हो जाता हैै। विवाह के बाद जहां मैं गई थी वह छोटा सा कस्बा नुमा शहर था और नया नया जिला बना था। वहां के सांसद पुराने धाकड़ नेता थे और उन्होंने विकास के नाम पर उस छोटे से कस्बे में कई फ्लाई ओवर बना…

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