खास कलम :: अनामिका सिंह अना

1 नोंक है टूटी क़लम की, भाव मन के सब उपासे। चीख का मुखड़ा दबा है, और सिसकती टेक है। शब्द हैं बनवास पर, शून्यता अतिरेक है। सर्जना का क्या सुफल जब, गीत के हों बंध प्यासे। छप रहे हैं नित धड़ाधड़, पृष्ठ हर अखबार में। क्षत-विक्षत कोपल मिली है, फिर भरे बाज़ार में। और फिर हम हिन्दू-मुस्लिम, के बजाते ढोल ताशे। दूर हैं पिंडली पहुँच से, ऊँचे रोशनदान हैं। कैद दहलीज़ों के भीतर, पगड़ियों की शान हैं। जन्म पर जिनके बँटे थे, खोंच भर भी न बताशे। प्रश्न तुझसे…

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विशिष्ट कवि :: अरुण शीतांश

चोंप पारिस्थितिकी संतुलन के लिए हर घर मे एक बागीचा चाहिए पेडो़ं में फल हो छोटे पौधों मे फूल रोज़ नई घटना की तरह बना रहे सुंदर पर्यावरण जंगल की तरह घेरे में पक्षियों के कलरव घोड़ों का टॉप सुनाई दे ठक ठक ठक ठक शुद्ध हवा में कोई माउस लैपटॉप न हो और मोबाईल बस संवाद हो निश्चल हँसी के साथ भरपूर आम का पेड़ खूब हो जिस पर बैठकर ठोर से मारे मनभोग आम पर एक दिन गिरे तो चोंप कम हो धोकर खा जाँए सही सही मुँह…

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विशिष्ट कहानीकार :: नज़्म सुभाष

खाली हाथ – नज़्म सुभाष चचा ने सफेद कुर्ते पर काली सदरी पहनी ।सिर पर टोपी लगाई,कांधे पर रूमाल रखा और अपनी साइकिल बाहर निकाली, चूड़ियों का बक्सा कैरियर पर रखा और दो थैले हैंडल पर टांग लिए। वो निकलने वाले ही थे कि रशीद ने पूछ लिया -“अब्बा कहां जा रहे हैं ? बैठे बैठे जी ऊबता है…बस जरा बसंतपुर तक जा रहा हूं अब क्यों परेशान हैं?अब कोई कमी तो नहीं… दो -दो दुकानें हैं फिर ये फेरी? बेटा मैं कमाई के लिए नहीं जा रहा बहुत वक्त…

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पुस्तक समीक्षा :: नीरज नीर

अगस्त्य के महानायक श्रीराम : एक मनुष्य के रूप में राम के अंतर्द्वंद्वों की पड़ताल – नीरज नीर राम कथा का कथानक ऐसा है कि इसे जितनी बार लिखा जाये, हर बार कुछ नए रंग, कुछ नए शेड उभर कर सामने आते हैं, जो पहले देखे, गुने, समझे गए कथ्यों से भिन्न होते हैं। हजारों वर्षों से राम और उनकी कथा भारतीय जनमानस का कंठहार बनी हुई है। हम राम को जिस रूप में देखते और पढ़ते आए हैं, वह राम का एक पूजनीय रूप है, जिसमे वे मर्यादा पुरुषोत्तम…

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विशिष्ट गीतकार :: शैलेंद्र शर्मा

सावन के झूले यादों में शेष रहे सावन के झूले गाँव-गाँव फैल गई शहरों की धूल छुईमुई पुरवा पर हँसते बबूल रह-रहके सूरज तरेरता है आँखें बाहों में भरने को दौड़ते बगूले मक्का के खेत पर सूने मचान उच्छ्वासें लेते हैं पियराये धान सूनी पगडण्डी सूने हैं बाग कोयल -पपीहे के कण्ठ गीत भूले मुखिया का बेटा लिए चार शोहदे क्या पता कब-कहाँ फसाद कोई बो दे डरती आशंका से झूले की पेंग कहो भला कब-कैसे अम्बर को छू ले . कर्जों की बैसाखी पर कर्जों की बैसाखी पर है…

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आलेख :: संजीव जैन

भूमंडलीकरण: विभिन्न आयाम – संजीव जैन भूमंडलीकरण एक महत्वपूर्ण ही नही अत्यंत ताकतवर परिघटना है जिसकी जननी ‘आधुनिकता’ की अवधारणा थी। आधुनिकता की बहुत ही खास प्रवृत्ति थी कि वह सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों को समरूपीकरण की ओर ले जाने का प्रयास करती रही है। यूरोपीय पुनर्जागरण से जन्मी आधुनिकता हमेशा से ही सार्वभौमिक संस्कृति और सभ्यता का स्वप्न देखती रही है और यूरोप ने इसे उपनिवेशीकरण के माध्यम से विस्तृत भी किया है। आज भाषा – अंग्रेजी, सभ्यता ब्रिटिश (आधुनिकता के दौर में) अब अमेरिकी, को विश्वभर में मानकीकृत…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : प्रेम किरण

1 हसीं मंज़र सलामत है ये दुनिया ख़ूबसूरत है नदी में चांद उतरा है क़यामत की अलामत है तुम्हारी झील सी आंखें हमारी प्यास बरकत है इधर है आग का दरिया उधर मेरी मुहब्बत है हमें नफ़रत की दीवारें उठाने में महारत है इसे काटो उसे जोड़ो अदब मेंभी सियासतहै हरइक चेहरा मुखौटा है दिखावे की शराफ़त है तुम्हे कैसे कोई चाहे न सूरत है न सीरत है किरन जी ख़ैरियत से हैं मगर यारोंको दिक़्क़त है 2 शजर एक ऐसा लगाया गया बहुत दूर तक जिसका साया गया दुआएं…

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