साहित्यिक छल-छद्म से हमेशा अलग रहे रेणु

  • डॉ.रामवचन राय

रेणु जी नहीं रहे, मन यह मानने को तैयार नहीं होता। जो लोग उन्हें जानते हैं, उनके नहीं रहने की सच्चाई पर भी सहसा यकीन नहीं करते। लगता है इस बार भी वह गाँव गए हैं – फसल की कटनी कराने और पाट की बोअनी हो जाने पर बरसात से पहले पटना लौट आएंगे। फिर मित्रों को पटसन की अलग-अलग किस्में, उसके सुस्वाद साग, हिलसा मछली से लेकर कोसी कछार की बुढ़िया आंधी ‘बिदापद’ नाच तक का हाल बताएंगे। कॉफी हाउस तुरत गाँव-गंध से सुवासित हो जाएगा। फिर शुरू हो जाएगी उनकी किस्सा-गोई-कथा-दर-कथा । गुणाढ्य और भंडरी की कला कोई उनसे सीखे। खलिहान और कॉफी हाउस को जोड़ने का अनुभव कोई उनसे सुने। रेणु की दुनिया इन्ही दोनों के बीच है। एक तरफ पद्माजी (कमला) और दूसरी तरफ लतिका जी ( ममता ) । इन्हीं दो छोरों को जोड़ कर जो सेतु बनता है, रेणु उसी की यात्रा-कथा कहते रहे – अपनी कृतियों में।

अपने गांव औराही-हिंगना और शहर पटना से बेहद प्रेम था उन्हें। कहीं तीसरी जगह जम कर वह रह ही नहीं सकते थे। जब वह गांव में होते थे तब एक किसान की पूरी सजगता और जिम्मेदारी लिए हुए। खेत, बगीचा, खलिहान की देखरेख और उसकी व्यवस्था में दूसरे किसानों से कहीं आगे ही होते थे। पर अगर लिखने का सिलसिला शुरू होता तो दिन में मच्छरदानी लगी रहती, कहीं गर्मी का महीना हुआ तो कोका-कोला की बोतलों से भरी बाल्टी कुएँ में पड़ी रहती। सन् 68 की बीमारी के बाद पीने के नाम पर कोकाकोला, कॉफी और कैप्स्टन ये ही तीन चीजें थीं जिनसे वह अंत तक जुड़े रहे।

पटना में रेणु जी के होने का मतलब कॉफी हाउस में होना होता था। कॉफी हाउस का रेणु-कार्नर जाड़ा-गर्मी-बरसात बराबर आबाद रहता । इनके अनुपस्थित होने का अर्थ था – पटना से बाहर होना या बीमार होना। एक निश्चित रूटीन थी, जिस पर मौसम का कोई असर नहीं था। हम दोनों के बीच एक अलिखित समझौता था। मैं नियमपूर्वक छह बजते-बजते उनके यहाँ पहुँचता। कभी वह बाल काढ़ते हुए मिलते और कभी तैयार होकर प्रतीक्षा करते हुए। फिर हमलोग कॉफी हाउस के लिए निकलते। किंतु फ्लैट से बाहर आते ही दो-तीन कुत्ते अपनी संततियों सहित उन्हें घेर लेते। ये किसी के पालतू नहीं, फालतू कुत्ते थे, जो ठीक समय पर राह रोके खड़े रहते। रेणुजी चाय की दुकानों से बिस्कुट खरीद कर उन्हें खिलाते और तब कहीं आगे बढ़ते। गोलंबर के पास जा कर रिक्शा लेते जो रात को घर लौटने तक साथ रहता। पड़ाव के सभी रिक्शे वाले उनके परिचित, प्रेमी और भक्त थे, जिनके सुख-दुःख के बारे में वे हमेशा पूछते रहते।

कॉफीहाउस से निकलने के बाद के कई पड़ाव थे। डी. लाल की दुकान में सिगरेट, साबुन, बिस्कुट या अगरबत्ती ( सुगंध शृंगार ) कुछ न कुछ खरीद कर आगे बढ़ते पिंटू होटल, जेल के ठीक सामने। वहां से रसगुल्ला और संदेश लेकर गाँधी मैदान होते हुए हथुआ मार्केट पहुँचते। विश्वनाथ के यहाँ कोकाकोला पीते और पान खाते। फिर राजेन्द्र नगर चौराहे पर कृष्णा के यहाँ से अखबार और मैगज़ीन लेकर कोई नौ-साढ़े नौ बजे तक घर लौटते थे। लतिका जी प्रतीक्षा करती रहतीं। दरबाजे पर हल्की दस्तक सुनते ही पूछतीं – के ? और इधर से जवाब मिलता – ‘आमरा’ । यही लगभग रोज का क्रम था, एकाध व्यक्तिक्रम को छोड़ कर।

पिछले साल जब वह गांव गए – धान कटवाने तब कटनी के बाद भी काफी दिन रह गए – कोई आठ-नौ महीने। इस बीच उन्होंने मुझे एक पत्र लिखा जिसमें कुछ पारिवारिक समस्याओं पर अपने एक कुटुम्ब के मनमुटाव की चर्चा थी। पर ऐसी दुशि्चन्ताओं ने उन्हें कभी कटु नहीं होने दिया। वह हमेशा मुस्कुराते रहे और जब दुर्गापूजा के समय पटना आये तब काफी स्वस्थ-प्रसन्न थे। फिर नवंबर में कुछ जरूरी काम से गांव गए और जब 1 दिसंबर को लौटे तब गंभीर रूप से बीमार हो कर ही आये और सीधे पटना मेडिकल कॉलेज में दाखिल हुए। इस अस्पताल के प्रति उनके मन में अत्यंत उच्च-धारणा और प्रशंसा-भाव था। यहां के चिकित्सकों की तारीफ करते वह नहीं थकते थे। इसी अस्पताल में उन्हें कई बार जीवन-दान मिला है, यह विश्वास भी कहीं गहराई में जमा हुआ था। और फिर उनका कथा-नायक ‘मैला आँचल’ का प्रशांत भी इसी मेडिकल कॉलेज का विद्यार्थी था। यह घोर मोह बंध ही उन्हें जकड़े हुए था। इसलिए जब जे.पी. उनसे मिलने अस्पताल आये और बातचीत में ऑपरेशन के लिए जसलोक जाने का सुझाव दिया तब वह मुस्करा कर टाल गए। जे.पी. के साथ उनकी वार्ता का वह ऐतिहासिक क्षण था। राजेन्द्र सर्जिकल ब्लॉक में के.एल. वार्ड का 21 नं. बेड लोकनायक और लोकलेखक का मिलन-स्थल। जे.पी. को देखते ही रेणु भर आये और अपने बीमार सेनानी को देख कर सेनापति भी भरा हुआ था। एक-दो क्षण की चुप्पी और फिर बातों का सिलसिला । जे.पी. ने कहा आपको तो इस जनरल वार्ड में असुविधा होगी, क्यों नही काटेज ……….. और वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि रेणु ने बहुत नम्रतापूर्वक निवेदन किया – ‘ मैं तो साधारण आदमी का लेखक हूँ और साधारण लोगों की तरह यहाँ रहना मुझे अच्छा लगता है। सच पूछिए तो जो अस्पताल की सीढ़ी तक पहुँच पाता है, वह भाग्यशाली होता है। हिंदुस्तान में अधिकांश लोग तो अस्पताल का मुंह ही नहीं देख पाते, इलाज की बात तो अलग रही। ‘ जे.पी. ने बीमारी के बारे में डॉ. शाही से पूछताछ की। पर रेणु फिर शुरू हो गए। ‘ सन् 68 के दिसंबर में बीमार हो कर यहीं आया और जनवरी भर रहा। उसी समय व्याधि (पेप्टिक) और उपाधि (पद्मश्री) दोनों मिली। उपाधि तो मैनें वापस कर दी, अब व्याधि रह गयी है। ‘ और यह सुन कर मुस्कराते हुए जे.पी. ने कहा – वह भी वापस हो जाएगी। रेणु बहुत प्रसन्न हुए और कहा – अभी बहुत कुछ लिखना है, काफी काम बाकी है। इस संकल्प को जैसे मन ही मन अपने सेनापति के सामने उन्होंने कई बार दुहराया।

लोक सभा के चुनाव की घोषणा हुई थी और रेणु जी अस्पताल में पड़े कुछ करने के लिए छटपटा रहे थे। थोड़ा अच्छा होते ही डॉक्टर की अनुमति लेकर 13 फरवरी को घर लौट आये। पर्चा-पोस्टर लिखना, लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया। किन्तु, फिर अस्वस्थ हो गए। पेप्टिक का दर्द भयंकर हो गया और 25 फरवरी को पुनः के.एल. वार्ड के उसी 21 नं बेड पर दाखिल हो गए । इस बीच चुनाव से पहले ही अज्ञेय जी कलकत्ता होते हुए रेणुजी से मिलने अस्पताल आये थे और एक बयान पर उनका हस्ताक्षर भी लिया, जिसमें आपातकाल का विरोध करते हुए लोकतंत्र की स्थापना की हिमायत की गई थी। एक-डेढ़ घंटे तक विभिन्न मुद्दों पर दोनों की बातें होती रहीं । अज्ञेयजी को विदा करके हवाई अड्डे से जब मैं अस्पताल आया तो रेणुजी प्रसन्नमुद्रा में बैठे थे। भाईजी (अज्ञेयजी को इसी संबोधन से याद करते थे) के साथ हुई वार्तालाप को उनके जाने के बाद फिर दुहराते रहे। कुछ संकोच और प्रसन्नता के बीच उन्होंने कहा – देखिये न, मैं भाईजी से इलाजी का समाचार पूछना चाहता था।पर सीधे कुछ  पूछ नहीं पाया, पता नहीं वह क्या सोचते। पिछली बार गर्मियों में जब मैं दिल्ली गया था, तब इलाजी के हाथ का बर्फ मिला ठंडा तरबूज खाने को मिला था। सो, मैंने भाईजी से इतना ही कहा कि अच्छा होने के बाद मैं इस बार फिर दिल्ली आ रहा हूँ। तरबूज का मौसम रहेगा न ? और भाईजी मेरा मंतव्य समझ कर मुस्करा रहे थे। इस तरह से प्रकारान्तर से तो मैंने इलाजी का समाचार पूछ ही लिया।’ मैं रेणुजी के ग्रामीण संकोच, भोलापन और हार्दिकता पर देर तक सोचता रहा । भला मैं कैसे यकीन करूँ कि वह जीवंत आदमी अब हमारे बीच नहीं रहे।

लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने आए। जनता पार्टी को शानदार बहुमत मिला। कोई 30 वर्षों से केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की विदाई हो गयी। रेणु के लिए यह परम संतोष का क्षण था। उन्होंने ऑपरेशन कराने का निश्चय कर लिया। 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार का शपथ-ग्रहण था। उसी दिन रेणु का ऑपरेशन हुआ। लेकिन उसके बाद उनकी चेतना कभी लौटी नहीं। 11 अप्रैल की रात में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई …..

रेणु साहित्यिकों के छल-छद्म से अलग थे। उनका कोई गुट या गिरोह नहीं था। जब भी उन पर कीचड़ उछाली गई ; वह किनारे कमल की तरह मुस्कुराते रहे। सारे विवादों अपवादों से निर्लिप्त वे इतना ही कहते — कथा सुनियेगा ? कौन-सी कथा, महुआघटवारिन की…………इस्स!

पर आज हीरामन की पीठ में गुदगुदी नहीं लगती। गाड़ी में रह-रह कर चम्पा का कोई फूल नहीं खिलता। आज उसकी आँखें भरी हुई हैं। मन बेहद उदास है। पहले गाड़ी पर बैठते ही वह किसी गीत की कड़ी गुनगुनाने लगता था। किंतु आज गला रूँध गया है। आवाज कहीं खो गई है। वह बैलों को दुआली से मारता है और सिमराहा से औराही हिंगना की राह पकड़ लेता है।

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परिचय : कविता और आलोचना के अलावा साहित्य की विभिन्न विधाओं में करीब एक दर्जन पुस्तक प्रकाशित. पूर्व विधान पार्षद. समाजवादी धारा से जुड़ाव. जे.पी. के नेतृत्‍व में बिहार आंदोलन में सहभागिता. फणीश्‍वरनाथ रेणु के साथ आंदोलन के सांस्कृतिक पक्ष में संलग्नता, पेन्सिलवानिया विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन आर्बकल के शोध कार्य’दि कम्पैरेटिव स्टर्ड ऑफ भोजपुरी स्पोकेन इन मॉरिशस एंड बिहार में सहयोग (1969-70)। कैलिफोर्निया  विश्वविद्यालय के प्रो. ओलिवर पेरी द्वारा भारत में आपातकाल के दौरान लिखी गयी हिन्द कविताओं के संकलन में सहयोग (1977). व्याख्यान के लिए अनेक बार विदेश यात्राएं.

 

 

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