ग़रीबी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदलती है 

  •  शरद कोकास 

 

गाँधी विद्यालय भंडारा में मिडिल स्कूल में श्री घड़ोले हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे ৷ एक दिन घड़ोले सर के मुँह से अंग्रेज़ी की एक कहावत सुनी “बोर्न विद सिल्वर स्पून इन माउथ ।“ सर ने बताया था कि यह मुहावरा व्यंजना में उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनका जन्म बहुत धनाढ्य घरों में होता है, वास्तव में पैदा होते समय चांदी का चम्मच मुँह में नहीं होता । मैं जब भी अपने आसपास नज़र दौड़ाता तो मुझे अपना एक भी दोस्त ऐसा नहीं दिखाई देता था जो चाँदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ हो । मेरे सारे के सारे दोस्त मेरे जैसे ही इस मुहावरे के अभिधात्मक अर्थ में मुँह में खुद का अँगूठा लेकर ही पैदा हुए थे ।

बाबूजी अक्सर हम बच्चों को अपने बचपन की ग़रीबी के किस्से सुनाया करते थे कि किस तरह उनके घर में कभी कभी ऐसी नौबत आ जाती थी जब खाने के लिए भी कुछ नहीं रहता था और पडौसियों से उधार मांगना पड़ता था यहाँ तक कि एक बार घर आये किसी मेहमान से ही पैसे लेकर सब्ज़ी लानी पड़ी थी ।

बाबूजी बार बार दोहराए गए किस्सों की शर्म से निर्लिप्त होकर अक्सर हम बच्चों से कहते “ तुम लोग तो बहुत अच्छे समय में पैदा हुए हो ।“ आज जब मैं अपने बचपन के दिनों के अपनी ग़रीबी के किस्से बच्चों को सुनाता हूँ तो उनसे भी यही वाक्य कहता हूँ । ऐसा लगता है जैसे यह वाक्य हर बच्चे को परम्परा से मिलता है जिसे वह अपने पिता बनने के बाद बच्चों को ग़रीबी का महत्व बताने के लिए उपयोग में लाता है ।

एक बार मैंने किसी मैगज़ीन में अमेरिका के कुछ ऐसे लोगों के चित्र देखे थे जो स्पोर्ट शू और जींस पहने किसी स्क्वायर पर गिटार बजाते हुए भीख मांग रहे थे৷ अपने यहाँ के भिखारियों की वेशभूषा से उनकी तुलना करने पर वे मुझे बिलकुल भी भिखारियों की तरह नहीं लगे मुझे ৷ उनकी प्रतीति भारत के संपन्न लोगों की भांति थी ৷ सही बात है , ग़रीबी भी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदल लेती है ৷

वैसे इस बात में कहीं कोई दो राय नहीं कि उन दिनों हर मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार में आर्थिक तंगी तो रहा करती थी । हालाँकि उन दिनों महंगाई आज जैसी नहीं थी और बाज़ार भी  आज के बाजारों की तरह जेब काटने वाले बाज़ार नहीं हुआ करते थे । तो चलिए, अब चलते हैं भंडारा शहर के बाज़ार की ओर और सैर करते हैं उन दुकानों की जो मेरे नन्हे पाँवों के रास्तों में आती थीं ৷

*दो: लाल किले और मांडू के महलों के चबूतरे पर सब्ज़ी की दुकानें*

उन दिनों कस्बों और छोटे शहरों में मेन रोड नामक एक रास्ता हुआ करता था ৷ शहर की मुख्य दुकानें इसी रोड के दोनों ओर हुआ करती थीं ৷ कुछ दुकानों के ऊपर दुकान के मालिक का निवास हुआ करता था अतः रात में भीतर से दुकान बंद करने की सुविधा उन्हें प्राप्त थी ৷ सुबह सुबह दुकानें खुलतीं, दुकान मालिक दुकान के आगे झाड़ू लगाकर पानी सींचते और अगरबत्ती लगाकर बोहनी की राह देखते ৷ अगरबत्ती की खुशबुओं के बीच बाज़ार की सुबह एक पवित्र सी सुबह लगती ৷

भंडारा का मुख्य बाज़ार गांधी  चौक के आसपास ही केन्द्रित था । गांधी चौक से बस स्टैंड जाने वाली मेन रोड के दोनों ओर कुछ  दुकानें थीं जिनमें कपड़ा,किराना,अनाज,जूते,बर्तन,स्टेशनरी,दवा,मिठाई,बल्ब से लेकर हार्डवेयर सामग्री तक सब कुछ मिला करता था । उसी तरह एक रास्ता गांधी चौक से महल की ओर जाता था उस पर भी दुकानों का निर्माण  प्रारंभ हो चुका था ৷ शहर के दोनों सिनेमाघर भी इसी मार्ग पर थे ৷

बस स्टैंड के पास का क्षेत्र बड़ा बाज़ार कहलाता था । पोस्ट ऑफिस चौक और तुरस्कर टी हाउस के बीच एक पुरानी इमारत थी जिसे बारादरी कहते थे । शायद बारह दरवाज़ों की वज़ह से इसका यह नाम पड़ा था ৷ यह अंग्रेजों के समय बनी लाल पत्थर की एक ईमारत थी ৷ लाल किले और मांडू के महलों का आभास देती इस इमारत में केवल खम्भे और चबूतरे शेष थे ৷ छत की जगह आसमान दिखाई देता था  इन्ही चबूतरों पर  प्रति रविवार और बुधवार को सब्ज़ी बाज़ार लगा करता था ।

बाबूजी रविवार और बुधवार ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी साइकिल की  घंटी टनटनाते हुए बाज़ार जाते थे और दो तीन दिनों के लिए सब्ज़ियाँ फल इत्यादि ले आते थे । हम बच्चे उनके लौटने का बेसब्री से इंतज़ार करते ৷ वयस्कों की प्रिय सब्जी से हमें कोई सरोकार न होता लेकिन उनके थैले में सब्ज़ी के अलावा हम लोगों की मनपसन्द कोई न कोई चीज़ अवश्य होती थी, कभी सिंघाड़े, कभी अमरूद ,जिन्हे स्थानीय भाषा में जाम कहते हैं ,कभी पपीता,चना बूट,जामुन,बेर आदि ।

*सेब,अनार जैसे महँगे फलों की किस्मत में उस झोले के माध्यम से हमारे घर तक का प्रवास नहीं लिखा था । महँगे फलों को हम सजी हुई फलों की दुकान  में या  ‘अ’ अनार का पढ़ते हुए किताबों में देखते थे । हमें पता था, बाबूजी की जेब में रखी आमदनी की किताब में ‘अ’ से अनार नहीं बल्कि ‘अ’ से अमरुद लिखा है ।*

इधर जैसे ही ठण्ड शुरू होती ओस से भीगी हुई चने की भाजी बाज़ार में आने लगती ৷ हरे चने को मराठी में सोला कहते हैं ৷ हम बच्चों के लिए एक हाथ में हरे चने का गुच्छा पकड़कर दूसरे हाथ से एक एक चना ढूँढकर और उसे दांत या नाखूनों की सहायता से छीलकर खाने से बड़ा करतब और टाइम पास कुछ नहीं होता था ৷ अक्सर हम लोग आंगन में आग जलाकर उसमे हरे चनों से युक्त वह गुच्छा भूनते और फिर राख से काले पड़ चुके होलों या सोलों को छीलकर उनके भीतर से चने निकालकर खाते ৷

*यह हमें सीप से मोती निकालने की तरह लगता था ৷ महाराष्ट्र में गेहूँ ,चना,ज्वार आदि की हरी बालियों को आग में भूनकर बने इस भुने अनाज को हुरडा कहते हैं ৷ कभी कभी हम लोग खेतों की ओर चले जाते और किसानों के साथ हुरडा पार्टी में शामिल हो जाते ৷ भुने हुए उन हरे चनों का सोंधापन आज भी कभी कभी ज़ुबान पर मचल जाता है ৷*

बादाम,अखरोट,खुबानी,चिलगोज़ा, जैसे मेवों के हमने केवल नाम सुने थे और बड़ी बड़ी दुकानों में उन्हें कांच के मर्तबानों में सजा हुआ देखा था । बहुत से मेवे तो हम पहचानते ही नहीं थे कि कैसे दिखाई देते हैं । स्मृति के हल्के से चित्र में एक काबुलीवाला था जिसे बलराज सहानी कहते थे, जब पहली बार काबुलीवाला आया पिस्ता बादाम लाया यह गीत सुना तो बाबूजी से पूछा था पिस्ता क्या होता है ? बाबूजी ने केवल इतना बताया कि एक मेवा होता है ৷ पिस्ता नामक इस अफगानी मेवे के दर्शन उस उम्र में हुए जब काबुलीवाला फिल्म देखने की समझ पैदा हुई ৷

ऐसा नहीं कि हमने उस ग़रीबी में मेवे न देखे हों ৷ मेवों के नाम पर कभी कभी खीर में डालने के लिए बाबूजी चार आठ आने के छुहारे, काजू या चिरौंजी ले आया करते थे । टुकड़े वाले काजू कुछ सस्ते मिला करते थे लेकिन कभी कभार पुड़िया में कोई साबुत काजू निकल आता था ৷

*माँ पुड़िया खोलकर खीर में डालने से पहले  वह साबुत काजू मुझे पकड़ा देती , मैं काफ़ी देर तक उस काजू को उलट पलट कर देखता फिर आशा भरी नज़रों से माँ की ओर देखता ,माँ मेरा आशय समझकर गर्दन ऊपर करते हुए मुझे संकेत देती ‘खा लो’ ,  फिर मैं उस साबुत काजू को लेकर गली में चला जाता और आधे घंटे तक उसे कुतर कुतर कर खाता रहता ৷*

दुकानों के अलावा बादाम के दर्शन पास पड़ोस में होने वाले सत्यनारायण की कथा में पूजा की चौकी पर भी होते थे । पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला चौकी पर लाल कपड़ा बिछाते और नवग्रहों की स्थापना करते हुए वहाँ नौ सुपारी,नौ खारीक, नौ बादाम रखते । पड़ोस में होने वाली इन कथाओं में मैं सबसे आगे बैठता और मिलने वाली खारीक या छुहारे की लालच में लीलावती कलावती की पूरी कथा सुनता ।

*पंडित जी मुझे कोकास गुरूजी के बेटे के रूप में जानते थे इसलिए कथा समाप्त होने पर अपना माल असबाब समेटते हुए मुझ पर कृपा बरसाते हुए वे मुझे एक छुहारा पकड़ा देते लेकिन मैं ललचाई नज़रों से बादाम की ओर देखता । ऐसा कई बार हुआ लेकिन कभी भी उन्हें मुझ पर तरस नहीं आया और मैं ग्रहों की कृपा से वंचित ही रहा  ।*

*तीन : अवचेतन पर विज्ञापनों के झूठ की हैमरिंग*

साठ और सत्तर के दशक में छोटे शहरों में मेन रोड और शहर की बाहरी सीमा से गुजरने वाली बाईपास रोड के अलावा तमाम सड़कें कच्ची हुआ करती थीं ৷ देशबंधु वार्ड स्थित हमारे घर से यह मेन रोड बमुश्किल सौ सवा सौ साइकिल के पैडल की दूरी पर थी ৷ यह कच्ची सड़क गाँधी चौक तक जाती थी और जिस स्थान पर रोड से मिलती थी वहीं नन्द किशोर बैस यानी नन्दू काका की किराने की दुकान थी ৷ घर के निकट खेमराज की दुकान में खाता खुलवाने से पहले  तक यही बाबूजी की प्रिय दुकान थी । हमारे घर का किराने का सारा सामान वहीं से आता था । नन्दू काका केवल दुकानदार ही नहीं थे बल्कि बाबूजी के मित्र भी थे ।

नंदू काका यह बात बाबूजी को बेहतर तरीके से बता चुके थे कि दुकानदार अगर मित्र हो तो उससे मोल भाव नहीं किया जाता ৷ सत्ता और पूंजीपतियों के संबंधों में आज भी नंदू काका की यह बात हम चरितार्थ होते हुए देख सकते हैं ৷

बाबूजी किराना खरीदने के बहाने अक्सर नंदू काका की दुकान पर कुछ देर ठहरकर गपियाते थे ৷ एक बार नंदू काका ने बाबूजी को बताया कि उनके यहाँ हॉर्लिक्स पेय की एक ऐसी पेटी आ गई है जिसके भीतर की काँच की बर्नियाँ किसी दुर्घटना में या पैकिंग की लापरवाही के कारण टूट गई हैं । वह पेटी वापस नहीं हो सकती थी इसलिए नन्दू काका ने वह पेटी बाबूजी को दे दी यह कहकर कि “गुरूजी, देख लीजिये इसमें से यदि कुछ आपके काम आ सके तो अच्छा है ।“

बाबूजी गत्ते की वह पेटी साइकिल के कैरियर पर रखकर घर ले आये और अगले ही दिन से काम में जुट गए ৷ कुछ बोतलों में नमी की वज़ह से पाउडर की गुठलियाँ बन गई थीं और कांच के टुकड़े उनमे धंस गए थे ৷ कई दिनों की मेहनत के बाद उन्होंने उस पेटी की टूटी हुई बोतलों में बंद हॉर्लिक्स पाउडर से बहुत सावधानी के साथ काँच के टुकड़ों को अलग किया और माँ को वह पाउडर देते हुए कहा “इस पाउडर का एक चम्मच  एक कप दूध में घोलकर रोज शरद को पीने के लिए देना ।“

माँ, बाबूजी के इस काँच विलगीकरण अभियान के प्रथम दिन से ही इसके खिलाफ़ थी, उन्होंने कुछ देर तो सब्र किया फिर बाबूजी से कहा “क्या यह ज़रूरी है कि इस पाउडर में काँच का कोई टुकड़ा या चूरा शेष न हो, मैं इसे किसी को पीने नहीं दूंगी ।“ बाबूजी ने यह प्रमाणित करते हुए कि अब यह पाउडर ठीक है और इसे पीने में कोई हर्ज नहीं उसे पानी में घोलकर स्वयं पी कर दिखाया ৷

माँ तो माँ होती है ना , अपने बच्चे को ऐसी कोई चीज़ खाने के लिए कैसे दे सकती है जिस पर ज़रा भी संदेह हो ৷ माँ की शंका दूर नहीं हुई ৷ बाबूजी पहले तो बहुत नाराज़ हुए लेकिन जब माँ अपने निर्णय से टस से मस न हुई उन्होंने सब कुछ उठाकर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया । कई दिनों की अपनी मेहनत व्यर्थ हो जाने का उन्हें कई दिनों तक अफसोस रहा ।

*बच्चे ही थे हम, इसलिए उन दिनों उनके चेहरे पर आत्मग्लानि का वह चित्र नहीं देख पाते थे जिसमें अपने बच्चों को बोर्नविटा या हार्लिक्स जैसी महंगे पेय या महंगे फल, मेवे बादाम आदि खरीदकर न दे पाने की विवशता शामिल थी । बाबूजी की हमेशा कोशिश होती कि हम लोगों के लिए कुछ बेहतर वस्तुएँ खरीद कर ला सकें । लेकिन जो बेहतर और पौष्टिक था वह महंगा था और आज भी है ৷*

*आज भले ही वैज्ञानिक सस्ती चीज़ों में विटामिन और पौष्टिक तत्व होने का दावा करते हों लेकिन सब जानते हैं यह ग़रीबों को फुसलाकर उन्हें ग़रीब बनाये रखने के लिए ही है ৷ ग़रीब बच्चों के लिए आज भी महँगे पौष्टिक पेय,खाद्य पदार्थ और मेवे आदि पहुँच से बाहर हैं, वे तो बस उन्हें दुकानों के शो केसों में सजा हुआ देखकर और टी वी पर रात दिन दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में देखकर संतोष कर लेते हैं ৷ वर्गभेद का सबसे बड़ा प्रतिबिम्ब बाज़ार के इस संप्रत्यय में दिखाई देता है ৷*

बाज़ार उन दिनों भी था लेकिन विज्ञापन, मुनाफ़े और लूट के अंतर्संबंध आज की तरह नहीं थे ৷ नन्दू काका की दुकान में  जब भी कोई नया प्रोडक्ट आता नंदू काका उसे बाबूजी को थमा देते । जब पहली बार रिन साबुन मार्केट में आया तब उसके नीले रंग को देखकर बाबूजी ने मज़ाक में कहा “ चलो अब कपड़ों में नील लगाने से मुक्ति मिलेगी । “

वह माउथ पब्लिसिटी का ज़माना था, तुरंत शहर में यह बात फैल गई कि रिन साबुन लगाने के बाद कपड़ों में नील लगाने की ज़रूरत नहीं है । साबुन खरीदते हुए किसीने यह नहीं सोचा कि साबुन से रंग निकल कर कपड़ों पर कैसे लग सकता है ।

*उन दिनों तो लोग कम पढ़े लिखे हुआ करते थे इसलिए ऐसा हो जाना स्वाभाविक था लेकिन आज के पढ़े लिखे,सभ्य सुसंकृत लोग और अधिक उन्नत तरीके से ठगे जाते हैं ৷ विज्ञापन फिल्मों में कैमरे और कंप्यूटर के कमाल से किसी कपड़े को किसी साबुन की वज़ह से सबसे साफ़ बताया जाता है या कपड़े साफ न होने का कारण सफाई के तरीके को नहीं बल्कि किसी सस्ते साबुन को बताया जाता है और हम सहज रूप से उस पर विश्वास कर महँगा प्रोडक्ट खरीद लेते हैं । हमारे मस्तिष्क पर किसी प्रोडक्ट के बारे में इतनी हैमरिंग की जाती है कि हम झूठ को सच मान लेते हैं ৷ यह टेक्नीक केवल बाज़ार में ही नहीं राजनीति में भी चलती है ৷*

आज हमारे जीवन में पाउच संस्कृति का प्रवेश हो गया है और ठोस और द्रव्य सभी वस्तुएँ पाउच  में मिलने लगी हैं ৷ उन दिनों कोई सोच भी नहीं सकता था कि तेल या दूध जैसे वस्तु बर्तन के अलावा किसी चीज में ली जा सकती है ৷ नंदू काका की दुकान में तेल के बड़े बड़े टिन हुआ करते थे जिनसे तेल निकालकर उसे घर से लाये बर्तन में तौल कर वे देते थे । हम लोगों के यहाँ मूंगफल्ली का तेल आया करता था जिसे बाबूजी एक कड़ी वाले पीतल के डिब्बे में लाया करते थे । । माँ उसे ‘तेल की डबकी’ कहा करती थी ৷

पहले तेल का यह बर्तन यानी डबकी तराजू के एक पलड़े पर रखा जाती और उसका वज़न किया जाता ৷इसके लिए बाँट रखना आवश्यक नहीं था ৷तराजू के दूसरे पलड़े पर गुड़ की डली, सुपारी या फल्ली दाने से भी काम चल जाता था ৷ फिर तेल नापने के लिए किलो, आधा किलो, सौ पचास ग्राम के बाँट रखे जाते ৷ नन्दू काका की दुकान में जब पहली बार पीतल की इस डबकी को भरकर तौला गया वह सवा किलो तेल से भर गई , फिर कभी उसे तौलने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई । नन्दू काका उसे ऊपर तक पूरा भर देते थे और सवा किलो तेल के पैसे खाते में जोड़ देते थे । हाँ उस डब्बे का ढक्कन चूड़ी वाला नहीं था इसलिये उसे बाबूजी साईकल के हैंडल पर लटकाकर बहुत सम्भाल कर लाते थे । बाद में माँ ने उसके लिये एक थैली सिल दी थी ।

किराने का बाकी सारा सामान अखबारी कागज़ की पुड़िया में आता था, जिसे कच्चे धागे से लपेटा जाता था । धागे का यह बण्डल बीच दुकान में छत से बंधा लटकता रहता था ৷ बड़ी पुड़िया की जगह अखबार को नीचे से पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए शंकु के आकार का एक चोंगा बनाया जाता और सामान भरकर उसका मुंह बंद कर धागे से लपेट दिया जाता ৷ सामान घर आने के बाद धागा और कागज़ दोबारा किसी काम में आ जाते या जला दिए जाते ৷

*यद्यपि दुनिया को कचराघर बनाने वाले प्लास्टिक का प्रवेश उन दिनों मनुष्य जीवन में हो रहा था लेकिन उसका  चलन उन दिनों बहुत कम था ৷ पॉलीथिन का आविष्कार नहीं हुआ था और सडकों पर आज की तरह कचरा नहीं दिखाई देता था ৷ पैकिंग के लिए कागज़, कपड़ा वनस्पति आदि का इस्तेमाल किया जाता था जो अगर फेंक भी दिया जाए तो कुछ समय बाद मिटटी बन जाता था ৷*

*माँ रद्दी कागज़ों का बहुत अच्छा उपयोग करती थी वे उन्हें पानी में भिगोकर उसकी लुगदी बना लेतीं और मटके की पीठ पर उसे थापकर उसकी छोटी छोटी टोकनियाँ बना लेतीं जिनके सूखने के बाद बाबूजी उस पर लाल नीली स्याही, महावर, या बाज़ार के रंगों से रंग कर दिया करते ৷*

बड़े होने के बाद पता चला कि यह कला का एक रूप है और इसे पेपरमैशी कहते हैं लुगदी साहित्य यह शब्द भी जब पहली बार सुना तो माँ द्वारा बनाई गई रद्दी कागजों की वह लुगदी याद आई ৷  उन दिनों कई सस्ते नॉवेल , जासूसी उपन्यास आदि इसी लुगदी से बने कागज़ पर छपे जाते थे इसलिए उन्हें लुगदी साहित्य या पल्प लिटरेचर कहा जाता था ৷

आज हम विज्ञापनों में देखते हैं , सुबह सुबह ही हमें डरा दिया जाता है यदि आपने फलां फलां टूथपेस्ट से अपने दांत साफ नहीं किये तो एक दिन आपके सारे दांत ख़राब हो जायेंगे ৷ उन दिनों विज्ञापनों का ऐसा कोई आतंक नहीं था और  दांतों के लिए दातौन ही सबसे मुफीद मानी जाती थी ৷ टूथपेस्ट व टूथब्रश का समावेश लग्ज़री में था ।

बाबूजी दांतों की बहुत केयर करते थे इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता अख्तियार किया था  वह था दंत मंजन । बिटको का काला दंत मंजन बाबूजी का प्रिय दंतमंजन था । लेकिन बाबूजी कुछ कीमियागरी से उसे और भी विशिष्ट बना देते थे । उस समय बिटको का दंतमंजन षटकोनी आकार की शीशी में आता था ৷ वे एक शीशी दंतमंजन खरीदते फिर घर आकर उस पाउडर को अखबार पर उंडेल देते ,फिर उसमें पहले से तैयार किया हुआ नमक, लकड़ी के कोयले का चूरा, सरसों का तेल व बादाम के जले हुए छिलकों का चूरा मिलाते ৷ यह सब सामग्री लगभग दोगुनी मात्रा में होती थी ৷ इस तरह वे एक बोतल मंजन का तीन बोतल मंजन बना लेते थे ।

शुरू में मुझे लगता था कि बाबूजी कंजूसी की वज़ह से ऐसा करते हैं लेकिन बाद में पता चला कि वे ऐसा मंजन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये करते थे । यद्यपि यह सब टोटके मिलकर भी उनके दांतों का क्षरण नहीं रोक पाए और साठ साल की उम्र तक सारे दांत उन्हें बाय बाय कहकर चले गए ।

*चार : बड़े बाज़ार में एक छोटा बाज़ार रहता था*

उन दिनों बाज़ार आज की तरह रिलैक्स होने की जगह नहीं थी ৷ लोग तफ़रीह के लिए नहीं बल्कि ज़रूरत की चीज़ें खरीदने जाते थे ৷ दुकानदार और ग्राहक के सम्बन्ध भी दोस्ताना होते थे ৷ वे ग्राहक का चेहरे पर उसके जेब की तस्वीर देख लेते थे और यदा कदा उधार भी दे दिया करते थे ৷

अधिकांश दुकानें दोस्तों की बैठक के अड्डे हुआ करती थीं  ৷ हर दुकान में बाहर की ओर बेंचें रखी रहती जिन पर बैठकर लोग शामों को दुकान में जलते हुए चराग देखते थे ৷  कट चाय और खर्रा पान भी आसपास की दुकानों से आ जाते थे ৷ गांधी चौक शाम को दोस्तों की महफ़िलों से गुलज़ार रहता था ৷ बाबूजी की बैठक नंदू काका की दुकान में थी यद्यपि बहुत सी चीज़ें वे अन्य दुकानों से भी खरीदते थी ৷चीज़ों के मामले में बाबूजी की चॉइस काफी अच्छी थी ৷ वे वस्तुएँ सस्ती ख़रीदते थे लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते थे ।

भंडारा के बाज़ार में हर वस्तु के लिये बाबूजी ने कुछ विशेष दुकानें तय कर रखी थीं । किराने का सामान नंदू काका की दुकान के अलावा वे कभी कभी मकनजी जीवनलाल की दुकान से भी लाते थे । मकनजी भाई गुजराती थे जो दुकान से विदा लेते समय बाबूजी को ‘फिर आउजो’ कहा करते थे ৷

दवाइयाँ गणेश मेडिकल स्टोर्स से आती थी जिसके मालिक किशनलाल तलदार जी बाबूजी के दोस्त थे । बाद में उनके बेटे टिल्लू से मेरी दोस्ती हुई ৷ कपड़े पंजाब क्लॉथ स्टोर्स से खरीदे जाते थे जहाँ बाबूजी को गद्दी पर बैठने का सम्मान मिलता ৷ कपड़े सूर्यवंशी टेलर से सिलवाये जाते ৷ चप्पल जूतों के लिए  हिन्दुस्तान बूट हाऊस तय था ।

स्टेशनरी और किताबों के लिये गभने गुरूजी की दुकान थी जिसका नाम था विजय बुक डिपो ৷ बाद में गभाने गुरूजी का नाता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से जुड़ गया था ৷ विजय बुक डेपो के  ठीक नीचे डोमाजी की दुकान थी जहाँ चूना,रांगोली  और हार्डर्वेयर का सामान मिलता था ।

छुटपुट वस्तुओं धागा, सुई, मनिहारी के लिए लीलाधर वसाणी की दुकान थी जिसका नाम था सौभाग्य कंगन स्टोर । मिठाई दिल्ली होटल से और पीतल के बर्तन निर्वाण की दुकान से आते थे । मटन वे दयाराम की दुकान से खरीदते थे और हँसते हुए कहते थे कि देखो उसका नाम तो दयाराम है लेकिन वह प्राणियों पर कोई दया नहीं करता ।

भंडारा की इस मेन रोड पर मिठाई की एक ऐसी दूकान थी जिसमे केवल पेड़ा बिकता था ৷इस दुकान पर एक बोर्ड लगा था ‘ केसरी पेढ़ा ‘ इसके अलावा दुकान में कोई फर्नीचर नहीं, शोकेस नहीं, दुकान के सामने स्टील के एक बाउल  में सफ़ेद कपड़े से ढंके पांच- सात किलो पेड़े रखे रहते थे जो शाम तक बिक जाते थे ৷इतना संतुष्ट दुकानदार मैंने नहीं देखा ৷ आजकल इस दुकान का नाम ‘रानी पेढ़ा’ हो गया है ৷

छोटे बाज़ार से बड़े बाज़ार की ओर जाते हुए नानक चंद पंजाबी  के पिताजी की किराने की दुकान थी यद्यपि नानक मेरा अच्छा दोस्त था लेकिन किराना उसके यहाँ से कभी नहीं खरीदा गया उसी तरह मेरे क्लासमेट घनश्याम कौरानी के पिता हेमनदास की कपड़े की दुकान थी ৷ लेकिन कपड़े वहां से कभी नहीं खरीदे गए ৷ बाबूजी इस मामले में बहुत सख्त थे बेटे के दोस्तों की दुकानों से उन्हें कोई मतलब नहीं था यहाँ तक कि बाद में मेरी स्टेट बैंक में नौकरी लग जाने के बावजूद उन्होंने कभी स्टेट बैंक में खाता नहीं खुलवाया ৷

मेन रोड पर पटाखों की एक दुकान अवश्य मेरी पसंद की थी राजेश फटाका,  फिर उसके आगे विष्णुचंद्र शर्मा की साइकिल की दुकान थी ৷ विष्णु भैया स्कूल में मेरे सीनियर था मैट्रिक करने के बाद उन्होंने पैतृक व्यवसाय संभाल लिया ৷ फिर कुछ आगे निखार की इलेक्ट्रिकल दुकान थी ৷

भंडारा की यह मेन रोड बहुत बड़ी नहीं थी , छोटा बाज़ार ख़त्म होने से पहले ही बस चंद क़दमों बाद  ही बड़ा बाज़ार आ जाता था यहाँ सब्जी मंडी थी, किराना व गल्ले की थोक दुकाने थीं, ताले चाबी की दुकानें थीं और एक ‘बिसेन होटल’ थी जहाँ खारा मीठा मिलता था৷ चौंकिए नहीं , महाराष्ट्र में नमकीन को खारा कहा जाता है ৷

*उत्तर भारत के अन्य भागों की तरह बिसेन होटल में भी आलूबोंडे और समोसे की विशेष डिमांड होती थी ৷ समोसे के साथ कढ़ी का कॉम्बिनेशन सबसे अधिक पसंद किया जाता था ৷ कभी कभी देसी चने की सब्जी अर्थात ‘मिसल’ भी बनती थी ৷ पाव के संग भाजी के चलन के पहले मिसल परोसने का चलन था यह तीखी रसेदार मिसल पोहे के साथ भी दी जाती थी ৷*

बाबूजी भंडारा के प्रतिष्ठित नागरिक थे और उन्हें सभी लोग गुरूजी कह कर बुलाते थे । कभी कभी मुझे भी उनके साथ साइकिल के कैरियर पर बैठकर बाज़ार जाने का अवसर प्राप्त होता था ৷ जब कई कई लोग उन्हें गुरूजी कहकर नमस्ते कहते तो मुझे अच्छा लगता  । उनका सम्मान देखकर मुझे गर्व महसूस होता था , मैं सोचता था, मनुष्य के पास पैसा हो न हो उसकी इज़्ज़त और सम्मान अवश्य होना चाहिए ।

*कैसा लगा आपको बचपन के बाज़ारों का यह सफ़र ? आपको अपने बचपन के दिन , मोहल्ले, बाज़ार की दुकाने, और दुकानदार याद आये या नहीं ?

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