अपनों के लिए ईश्वर को साथ लिए चलती है स्त्री
सामा चकेवा के बहाने
पहुँच जाती है नइहर
भावजों से तिरस्कृत होकर भी
नही चाहती अनबन
रोक देती है
भाई के उठे हाथ

काहे लागि भइया हो भउजो के मारल हो
भइया हमरो लिखल
दूर देस बहुरियो न आएब हो

गोधन कूटती हुई
सरापती हैं
भाई बाप
बेटा दामाद

चुभाती है रेगनी का कांटा
सरापने वाले जीभ में
कूट देती है
जम रईया की चानी
मूसल से

हल्दी वाले पोर से
बाँटती है आयु
रुई के कलावे में

बांध देती है
भाई की कलाई पर
आस से

रक्षा करे
यह कलावा
तुम्हारा
तुम करना
सबों की

पलक से ओझल
होते ही
अपनो की चिंता में

कबूलती है चढ़ावा
देवी देवता से
मनाती है मंगल

होने नही देगी अनिष्ट
ईश्वर को साथ लिये
चलती है स्त्री।

लिखती हुई स्त्रियों ने बचाया है संसार यह
गेरू से भीत पर लिख देती है
बाँसबीट
हारिल सुग्गा
डोली कहार
कनिया वर
पान सुपारी
मछली पानी
साज सिंघोरा
पउती पेटारी

अँचरा में काढ लेती है
फुलवारी
राम सिया
सखी सलेहर
तोता मैना

तकिया  पर
नमस्ते
चादर पर
पिया मिलन

परदे पर
खेत पथार
बाग बगइचा
चिरई चुनमुन
कुटिया पिसीआ
झुम्मर सोहर
बोनी कटनी
दऊनि ओसऊनि
हाथी घोड़ा
ऊँट बहेड़ा

गोबर से बनाती है
गौर गणेश
चान सुरुज
नाग नागिन
ओखरी मुसर
जांता चूल्हा
हर हरवाहा
बेढी बखाड़ी

जब लिखती है स्त्री
गेरू या गोबर से
या
काढ रही होती है
बेलबूटे
वह
बचाती है प्रेम
बचाती है सपना
बचाती है गृहस्थी
बचाती है वन
बचाती है प्रकृति
बचाती है पृथ्वी

संस्कृतियों की संवाहक हैं रंग भरती स्त्रियाँ
लिखती स्त्री बचाती है सपने संस्कृति और प्रेम

इस तरह घर को बचा लेती है चुपचाप औरत
चुप औरत
किसी से नही बताती
यह बात
सीधा से निकालती है मुठिया
रोज
एक रोटी खा लेती है
कम

खींचकर पाई
रखती है पैसे का हिसाब

चुप्पे चोरी जाती
हाट बाजार
करती खूब तजबीज
बनबाती गहना गेठी

कान के पीछे करती
अँचरा
हुलास मारता कनफूल
दमकता लौंग

जैसे आता कोई
गाढ़ बिपत
रख देती बंधक कनफूल
बेच देती पायल

इस तरह बचा लेती है
घर को
चुपचाप औरत

अपने सुख दुख को बतियाती ईश्वर से स्त्रियाँ
चुप नहीं रह सकती औरतें

मेले ठेले भीड़ भाड़
बस ट्रेन के सफर में
पूछ लेती हैं
जात गोत
देख लेती हैं
पेटीकोट में लगे लेस
सीख लेती हैं
स्वेटर के पैटर्न
हपस के खेलाती हैं
अनजान बच्चे को
छाती लगा देती हैं
बिलखते मुँह में

कितना तो याद रखती हैं
खिस्सा कहानी
गीत नाद
गाते हुए पिसती हैं दर्द
कूटती हैं आक्रोश
काढती बुनती हैं प्रेम

सखी सलेहर के सामने
खोलती हैं
आँचल के खूंट से पीड़ा

पनिया के चलली हे समरो
गंगा रे जमुनमा रे
भईसुरा रसिकवा
सेहो बाट रोकल रे की

अपने खाता बही में रखती हैं
हिसाब उपेक्षा की
ढूढती है वजूद
अपने ही घर में
बाबा बाबा पुकारीला
बाबा न बोलले हो

निमुधन की पीड़ा को
कह देती है
दबे शब्दों में बोलती औरत

जईसही जे आहो बाबा
गइया दान कएल भईसिया दान कएल ओइसही करीह धीया दान हो।

अपने सुख दुख बतिया लेती है ईश्वर से
ढूंढ लेती हैं समाधान
हर समस्या का

सासु पढ़े गरिया हो दीनानाथ ननद ठुनका मारे
गोतनी बैरिनिया हो दीनानाथ बझिनिया रखलक नाम

अपने सवालों के जवाब में हो जाती है ईश्वर
बतियाती औरतें

सासु के गरिया गे अबला गंगा बही गेल
ननदी के ठुनका गे अबला दुइ चार दिन
गोतनी ओरहनमा गे अबला पईचा पालट भेल

बोलती औरतें संभालती आई हैं
अनलिखा दस्तावेज़
सदियों से

देह की कील से बंधी घर बाहर स्त्री
बड़ी चालाकी से
ठोक दिया
दीवार पर

कैलेंडर में
टांग दिए
व्रत उपवास
चंद्र और
सूर्यग्रहण
वार्षिक फलादेश

गैस बदलने और
धोबी का हिसाब
दूधिया और
पेपर का नागा

जब भी फड़फड़ाया
पन्ना
बन्द कर दिए
खिड़की दरवाजे

ऊपर से
टांग दिए
कमीज
बेल्ट
बच्चों के मेडल

भर दिया
दायित्व बोध के
गुमान से

बदले
मौसम महीने और
साल
नही बदली
नियति

कील सी टँगी
स्त्री की जिंदगी
समाज मे

देह से बंधी
घर बाहर
स्त्री
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परिचय : लेखिका चर्चित कवयित्री व ग़ज़लकारा हैं. इनकी कविताएं और ग़ज़ल देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. संपर्क :

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