अम्माँ  का समय
– राजनारायण बोहरे
अम्माँ लगभग मेरे सिर पर खड़ी हो पूछ रहीं थीं कि मैं क्या खोज रहा हूं?
उन्हें भला कहाँ सुहाता कि उनके एकल संसार में कोई इस तरह दिन दहाडे़ सेंध लगाकर खोजा-खखोरी करे।  अम्माँ ने मढ़ा में तिलिस्मी सा अपना एक निजी संसार बसा रखा था, जिसमें किसी का भी प्रवेश वर्जित था। दादाजी के जमाने की खपरैल अटारी के नीचे वाले कमरे को हम मढ़ा कहते हैं, जिसकी ऊंचाई मुश्किल से सात फिट है, कमरे में इस ऊंचार्इ्र  पर खजूर की मोटी शहतीरों को कुल्हाड़ी से काट कर बिछाये गये पटरे ही इस मढ़ा की भीतरी छत है, जिसकी दरारों में अम्माँ की प्रजा के रूप में जाने कितने झींगुर, तिलचट्टे, चींटे और चूहे अपना निवास तय करके रह रहे  हैं। एक अंधेरा और ठण्डा कमरा है यह, जिसमें ग्रीष्म ऋतु में गर्मी नही लगती और ठण्ड में सर्दी। मढ़ा ज्यादातर बंद ही रहता था। इसे बंद करते वक्त अम्माँ पुराने किवाड़ खींचते हुए आपस में भिड़ाकर जतन से दो सांकल खींच कुंन्दे में उलझा देती हैं-एक ऊपर,  एक नीचे। दरसवां (चौखट) में ऊपर नीचे दो कुंदे लगे थे और दोनों में दो ताले। किसी पुराने राजा के खजाने की गुफा की तरह था अम्माँ  का मढ़ा । इसी मढ़ा के ऊपरी मंजिल का कमरा ही अटारी है ; अम्माँ  की अटारी! मोहल्ले में सबसे बड़ी,सबसे पुरानी। लोग कहते हैं एक जमाने में इसमें यहां के जमींदार रहते थे, मेरे पिता के ब्याह के समय जमींदार साहब ने मेरे दादा को भेंट की थी यह अटारी।
कोई घण्टा भर पहले सुबह नौ बजे जब मैं यहां पहुंचा तो देखा कि  उस वक्त अम्माँ का आंगन सूना पड़ा है और अम्माँ एक कोने में बैठी सूखे हुए चने के झांड़ों को कपड़ा धोने की मुंगेरी से कूट रही है। चने के झाड़ों पर मेरी सवालिया निगाहों को भांपते हुए उन्होंने हंस के बताया कि महीना भर पहले गांव से हरे बूट आये थे, जिनमें से एक मुट्ठी पौधे धरे रह गये, तो सूख ही गये , अगर इन्हें नहीं निकालेंगे तो इधर-उधर पड़े रहेंगे और भीतर के चले बिसूरते रहेगें कि हमारे भाग्य में ये कैसी डुकरिया लिखी थी, जिसने न हमें दुनिया देखने दी और न हमारा उपयोग किया, हमको अकारण घेंटियों की भीतर ही सुखा डाला इस हत्यारी ने और अब यूं ही घुन जाने के लिए छोड़ दिया।
मैं मुस्कराया। दुनिया की सारी बेजान चीजों के बारे में अम्माँ यों ही सोचती है। इन्सान तो उनके बेटे बहुऐं और दूसरे घर के ठहरे। चौरासी साल की अम्माँ  का कुल वजन मुश्किल से तीस किलोग्राम होगा । उनकी सारी ज्ञानेन्द्रियां प्रबल है, बस कान खराब हो गये है, इसलिये आप कुछ भी बोलते रहिये, वे सुनती नहीं, अपनी बातें ही कहती रहती है। मैंने इशारे से समझाया कि मुझे मढ़ा के सामान में से अपने कुछ कागज ढूढ़ना है तो अम्माँ ने अनुमति देदी थी और मैं इस अंधियारे मढ़ा में आ घुसा था।
बचपन से घर से बाहर निकल जान केे कारण अम्माँ  के मन में मुझे कुछ ज्यादा प्रिविलेज हैं  अन्यथा अम्माँ  किसी को मढ़ा के आसपास नहीं फटकने देतीं। इसी प्रिविलेज का लाभ उठा कर मैंने मढ़ा में प्रवेश पाया था।
बाहर की धूप से अचानक भीतर पहुंचने पर कुछ सूझ नही रहा था, मेरी आंँखेां को घना अंधेरा ही लग रहा था । पांचेक मिनट में चीजेंा के आकार प्रकट होने लगे। मैंने पाया कि सदा की तरह उधर बांये कोने में मिट्टी से चिनी हुई दो मिट्टी की कनारी जमीन में गढ़ी हुई खड़ी थी, इससे लग के रखी थी जाने कितने दिन पुरानी एक नीले रंग की टंकी, जिसके बाद दरवाजा और दरवाजे के दांयी ओर रखा था पुराना बड़ा बक्सा, उसके पीछे दीवार से सटी हुयी चार टंकियों के ऊपर रखे थे टीन के दस बारह छोटे-छोटे अलग-अलग आकार के बक्से। दीवार में बनी अलमारियों में ढेर सारी पोटलीयां बंधी रखी थी। मुझे इतने कबाड़े के बीच से अपना कागज खोजना था। इसके लिए भी मेरे पास दोपहर के तीसरे पहर तक का समय था।
मढ़ा में इतनी सारी चीजें गसी पड़ी थी, कि उनके बाद  केवल तीन वाई छह फिट खाली जगह थी जिसमें अम्माँ  अपना बिस्तर लगा के सोती थी और कहती थी कि अपने मढ़ा और अपने मजोटे में जैसी नींद आती है, वैसी इंदर को अपने बिस्तरे पर न आती होगी। अम्माँ बहुत जतन से हर दिवाली पर दीवारों पर सफेदी होते समय मजोटे (कच्चे मिटटी के फर्स) को मिट्टी का लेप कर उसके ऊपर ईंट और कबेलू के बारीक कपड़छन किये पावडर को बुरकते हुए चिकनी लुड़िया से कई दिन तक घिसती थी और मिटटी का फर्श सीमेंट की तरह  चकाचक कर देती थी।
सामान से अटे मढ़ा में मैं ठीक से बैठा ही था कि अम्माँ  हाथ में लोटा लिये पानी देने के बहाने भीतर आयी। वे पानी देकर मेरे बगल में बैठ गयी । मैने मुस्काते हुए इशारे से पूछा अम्माँ  से पूछा कि इन बक्सों, टंकियों और पोटलियों में क्या रखा है ?
मेरा सवाल समझ कर एक पल को अचानक गंभीर हो आयी अम्माँ  बोली थी ‘समय।’
बोलते हुए उनकी आंखे पनियल हो आयी थी और वे बिना कुछ कहे अचानक उठी और मढ़ा से बाहर चली गयी थी। महिलाऐं पता नहीं किस बेजान चीज से क्या नेह लगा लेती हैं और तमाम बेकार चीजों से जाने क्या-क्या यादें जोड़े रहती है।
हम सब भाई-बहन मानते हैं कि अम्माँ का मढ़ा तिलिस्मी है। इसमें भले ही व्यर्थ की चीजें रखी होंगी जोें अम्माँ  की यादों से जुड़ी होंगी, लेकिन यह भी सच है कि इसमें बहुत सारी कीमती चीजें भी होंगी-कुछ जमीन के ऊपर कुछ जमीन के अन्दर। हां दफीना होने की पूरी संभावना है हम सबको। किसी ओझा-गुनिया ने अम्माँ को बताया था कि इसमें सोने से भरे सात घड़े रखे हैं, इजाजत दो तो किसी रात खुदाई कर लेते हैं, बस दफीने की रखवाली कर रही शक्ति की इतनी सी शर्त है कि उसे गले में डाल के चारों धाम कराना होगा । अम्माँ समझ गयीं …गले में डाल के यानि कि इस दफीने का रखवाला सांप है, सांप ही तो डाला जायेगा गले में। न बाबा न, मेरे बच्चे सांप को गले में डाल के तीरथ नहीं जायेगे, न मिले तो न मिले ये खजाना, हम क्या इसी की भरोसे जीते-मरते हैं। धर राखे अपना दफीना। हमे नहीं चहिये सोने के वे सात घड़ा। हम भले, हमारी रूखी-सूखी दो बखत की रोटी भली।
किसी ने बताया था कि सांझ ढलते-ढलते मोहल्ले भर की औरतें अम्माँ  की खुली बैठक में बाल बच्चों समेत हाजिर हो जाती थी, जिनके बीच सरपंच बनी बैठी अम्माँ  सारे मोहल्ले के न्याय निबेरती थी। उस समय अम्माँ  का मढ़ा बंद ही रहता था। उस समय क्या, जब भी अम्माँ मढ़ा से बीस फिट दूर होती मढ़ा तो बन्द ही रहता था।
मेरा कागज इतना जरूरी न होता तो मैं अम्माँ  के इस रहस्यमय मढ़ा में कभी न आता, लेकिन पासपोर्ट बनवाने के लिए यह कागज जरूरी थी। मुझे एजेंन्ट ने बताया था कि सन पैंसठ के पहले जन्मे लोगों के लिए हायर सेकेण्डी परीक्षा का स्कूल प्रमाणपत्र ही जन्मतिथि का सबसे बड़ा आधार माना जाता है। ऐजेंट के मुताबिक पासपोर्ट के लिए अंकसूची से काम नही चलना था प्रमाणपत्र ही जरूरी था, जिसके वजह से काम अटका था। जब हायर सेकेण्ड्री पास करी तब हम सब इसी मढ़ा मे ंअपनी सारी जरूरी चीजें अम्माँ के इन बक्सेंा में रख लिया करते थे, सो वह प्रमाणपत्र भी यहीं कही रखा होगा। हालांकि बाद में मैंने बी. ए. करके एलएलबी और तीन विषय में एम ए तक के परीक्षा फॉर्म भरे लेकिन किसी भी फॉर्म में  इस प्रमाणपत्र की जरूरत नही थी सो कभी नही खोजा इसे। आज जरूरत पड़ी तो भागा आया हूंू शहर से।
पुराने बक्से, और मिटटी के विशाल घड़ों-कनारियांें से अटा पडा था यह मढ़ा , जहां मुझे अपना प्रमाणपत्र मिलने की गुंजायस थी। लेकिन अपने कौतूहल को रोक न सका सो बक्सों और फाइलों के अलावा भी दीगर सामान को खंगालना शुरू कर दिया । मैंने माचिस की डिबियों, पुराने कपड़ों, कंघी-दर्पण, रिबन , फाइलों ,पुरानी डायरियांे वगैरह से भरे थैले और पोटलियां और उनके ऊपर से दो छोेटे बक्से  उठा कर  अपने सामने पटक लिए थे और एक-एक कर उनमें ंसे चीजें निकालता  जा रहा था।
अब अम्माँ  कातर निगाहों से देख रही थी।
एक एक पोटली में कितनी कितनी यादें थी अम्माँ  की, हमारी भी।
अम्मां ने मेरे सामने रखी सात पोटलियां उठा कर एक तरफ रखके कहा था कि इनमें तुम सातो ंबच्चों की यादें हैं मेरे पास इसलिये इन्हे न छेड़ना। अम्मां के जाने के बाद मैंने ताका झांकी कर उन पोटलियों को देखा तो पाया कि हरेक पोटली हम भाइ बहनो की की यादों से भरी पड़ी थी। हमारे खिलौने, बचपन की किताबें, स्लेट-बरती, बचपन के कपड़े और भी जाने क्या क्या। मैने सुना है कि अम्मां खाली वक्त में इनमे ंसे कोइ पोटली खोले कर हमरा ने बचचन की यादों मे विचरती रहती है।
पोटली क्या हर सामान मंे समय दफन था मढ़ां में।
समय दफन था और सुरक्षित भी अपनी पूरी लह-दह के साथ। मुझे हर चीज छूते हुये लगता था कि रूका हुआ समय, अपने विस्तार को कम्प्रेस्ड कर चीजों में घुसके धकधक धड़क रहा था इस सामान में।
बेधक भी था समय का कुछ हिस्सा, जो अम्माँ को रूला देता होगा और कुछ चपल भी जो गुदगुदा देता होगा, तभी तो मढ़ा के इस तिलिस्मी संसार में  वे अकेली विचरती रहती थीं और जब कोई घुसपैठिया पातीं थीं तो तिलिस्मि के दारोगा की तरह सख्त सवाल-जबाव करती।
मै कुछ खोज रहा था लेकिन निकल कुछ और रहा था। पुराने बक्से मंे हाथ डाला कि एक खोवा भर के माचिस की डिबिया निकली। एक माचिस को मैने  कौतूहल से खोला तो झटके से सिर पीछे हट गया-उसमें एक बिच्छू था। मरा हुआ कौड़ी के आकार का सुर्ख लाल बिच्छू। मुझे याद आया कि एक दिन हम सब दोस्त माता मंदिर के बाहर के हरे मैदान में खेल रहे थे तब अचानक ऐसे सुर्ख लाल रंग के  बहुत सारे बिच्छू एक पंक्ति में चलते हुए दिखे थे तो हरि महाराज का बेटा पप्पू बोला था ‘‘ जे देखो खजानो सरक रहो है कोई को।’
‘खजानो ?’’हम सब समझ नही पाये ।
‘‘हमरे दादा बता रये थे कै जमीन के भीतर गढ़ो कोई खजानो जब एक जगह से दूसरी जगह को जाथै तो बिच्छु बनके  जमीन के बाहर निकलथै। सारी मोहरें बिच्छू बन जाथैं और एक के पीछे एक चलके दूसरी जगह चली जाथैं। ’
हम लोग बड़े लालच से उन बिच्छुओं का ताकने लगे  थे। पप्पू ने ही कहा कि अगर अपन को खजाने में से कुछ परसाद चाहिये तो एक एक बिच्छू को जिन्दा पकड़ के माचिस में रख लेनो चाहिये और साबर मंत्र से इन्हे कील देना चहिये। मेरे दोस्तो ंने पतले धागे से फंदे बनाये और बिच्छू के डंक उनमें फंसा कर खींचने लगे। सब दोस्तों ने एक-एक बिच्छू को पकड़कर माचिस में बंद कर लिया था कि हरि महाराज का लड़का उन बिच्छुओं पर फूंक मारते हुए बोल रहा था ‘‘ गोरा पारवती की आन जो अब नये बिच्छू मुझे दिखें। सत्त के सांचे हुइयो तो सब बिच्छू मोहरें बन जइयो।’
कितने बरस बीत गये बिच्छू वाली माचिस ज्यों की त्यों धरी रह गयी , खजाना तो क्या, फूटी कौड़ी तक नही मिली किसी को। वो जमाना भी क्या था कि एक बच्चे ने कहा और सब विश्वास कर लेते थे और आज अदालत में भी शपथ लेके बयान देने वाले की सचाई का कोई ठिकाना नहीं।
माचिस एक न थी कई थी। किसी में दिवाली पर बिकने वाली रंगीन रोशनी की काड़ी रखी थी तो किसी में  हमारे पर्ची वाले खेल राजा, कोतवाल चोर और वजीर की पर्चियां।  किसी में कौड़ियाँ थी। तो किसी में इमली के बीज की फटी हुई चीपें, जिन्हंे चंगा अष्टा या चौंसठ गोटी खेलते हुए हम पांसे की तरह उपयोग करते थे । रोशनी की काड़ियां मामा लाये थे, अपने बच्चों की आतिशबाजी की चीजो ंमें से हमे खेलने के वास्ते।
अब मेरे हाथ मे एक पोटली थी जिसमें ढेर सारे मुसे-तुसे कपडे़ रखे थे़े। उसमें सबसे पहले निकला था, एक रेशमी पीला-गोटेदार अंगरखा जो रामलीला में बड़े भैया को राम के रूप में अभिनय करते समय पहनने के वास्ते अम्माँ ं ने अजुद्धी कक्का से सिलवाया था। पूरी घटना याद आयी मुझे। रामलीला के पुराने धुराने अंगरखा फट गये थे और रामजी का कोट तो सबसे ज्यादा बुरी हालत में था। अम्माँ  ने सुना तो अपने मायके से आये सलमा-सितारे जडे़ एक रेशमी सुनहरी लूंगरे को निकाल कर अम्माँ ने भैया को दिया था, जिससे उन्होंनेे राम जी का अंगरखा सिलवाया था।  इस कोट पहन रामलीला के मंच पर जब भैया राम के रूप में अपने संवाद बोलते तो हिलते-मटकते कोट से वो सुनहरी लश्कारियां छूटती थीं कि लोगों की नजर न टिक पाती थीं रामजी पर।
पोटली में से फिर निकला मेरा गहरे नीले रंग का मखमल का  छोटा सा कोट। मेरे जीवन का पहला कोट। हुआ यूं कि मैं जब नवें दर्जे में दाखिला हुआ, सारे बच्चे ब्लेजर के बने कोट पहन कर स्कूल आते जबकि मैं और मंझले भैया जिज्जी की बुनी हाफ स्वेटर पहन कर तेज तेज चलते हुए अपनी कांखों में हाथ घुसाये प्रार्थना में पहुंच सावधानी की मुद्रा में जा खड़े होते थे। घर आकर कई बार हमने अपनी दयनीय दशा का वर्णन किया तो   अम्माँ  ने  मायके से आये अपने बक्से मे रखे मखमल के पुराने चादर मे से यह कोट सिलवाया था मुझे।  मंझले ने अल्टर कराया था पिताजी का रखा एक पुराना कोट। जिसने हमारी लाज जैसे तैसे बचाई थी।
फिर निकली एक सेंण्डो बनियान जिसमें आगे की तरफ नाभि के ठीक ऊपर खून का धब्बा लगा था जो अब सूख कर काला हो चुका था। याद आया कि बरसात में बाहर की बजाय भीतर पानी बहाते अटारी के टूटे छप्पर को सुधारने या मरम्मत करने के लिए उस बरस जब ज्यादा पैसे न मिले तो हमने सोचा था कि सामान नही बदलते सिर्फ  मजदूर लगा लेते है जो सुतली-रस्सी कस के छप्पर की बंसोटियों की  बांधा बूधी करके काम चला लंेगे। कम मजदूरी में बहुत खोजबीन के बाद एक ही मजूदर मिल सका था, एक की कमी थी, जिसकी जगह मैं और मंझले भैया मजदूर के साथ काम पर लग गये और हम लोग खपरैल की पांत उधेड़ते चले गये थे। यकायक ही अम्माँ की अंधेरी अटारी में ट्रॉली भर रोशनी भरभरा के घुस आयी थी, जिससे आंख चुराता अम्माँ  का सारा सामान मानो आंख मूंदे खड़ा था- जिज्जी के ब्याह में रात को तैयार करायी गयी पूड़ीयों को दबा के रखने के वास्ते लाये गये बड़े बड़े डला, मिटटी के जे बड़े भारी भारी मटका, पू़ड़ी बेलनहारिनों के पास से हलवाई तक पूड़ी लाने के लिए बापने गये दर्जन भर सूप, मण्डप के नीचे गाड़ा गया लकड़ी का बना दुछत्ती का बना लम्बी म्यानों वाला खम्भ, रगवारे का लोटा, बेई की डुबलियां, कितने सारे उरसा-बेलन, कितनी सारी होलियों पर जलाई गयी गोबर की बनी मलरियां, पुराने से पुराने मक्का के भुट्टे और भी जाने क्या-क्या।
छप्पर याद आया तो उसकी बनावट याद आयी , हमारे दादाजी के खेतों पर जाने कितनी खजूरें थी, कि जब अटारी का छप्पर डाला गया तो मढ़ा से लेकर ऊपर अटारी के छप्पर तक खजूर ही खजूर उपयोग की गयी थी। लगता है कि अटारी बनते समय खजूरो ंका पूरा जंगल काट के लाया गया होगा। आज भी मुझे छप्पर डालने की प्रक्रिया याद है जिस में एक दीवार को दूसरे से जोड़ती हुयी सबसे नीचे लगती थी खजूर की लम्बी म्यारें, उनमें बड़े छोटे के आकार में ठुके  कान-चिरैया ( यानि क्रिकेट के तीन स्टम्प और ޹ऊपर रखी गिल्ली से दिखते लकड़ी के छोटे छोटे चौखटे, ) जिन  से बंाधे जाते थे नीम की डाल के कुल्हाड़ियों से चिरे बेरतरतीब से टुकड़े जो कमरे के बीचोंबीच  मगरा कहलाने वाले हिस्से पर सबसे ऊंचे होते थे और क्रमशः दीवार की तरफ आते समय झुकते चले जाते थे , मुझे याद आया कि इन लकड़ियों पर बिछी होती थी, सुतली से बंधी हुई स्यारी की झाड़ी की पतली डंडिंया। स्यारी केे ऊपर देशी कबेलू जमाये जाते थे। दो हथेलियों से चौडे से फैले हुए देशी कबेलू हमारे गांव के कुम्हार बिना किसी सांचे और कलाकारी के एक मिट्टी के लौंदे से बना लेते थे जिन्हें सुखा कर लकड़ी-कण्डे के अवाँ में पकाया जाता था। देशी कबेलू का आकार और उसके जमाने का तरीका मुझे आज भी याद है।  इसी के साथ  मुझे याद आया अटारी का पचास साल पुराना छप्पर। जो अपने बनने के दिन से कभी नही बदला गया, न बांस डले और न बल्लियां। उस साल एक मजदूर की एवजी में मैं और मंझले भैया काम  करते हुए काम चला रहे थे कि अचानक अटारी में लगी पुरानी वह बल्ली चर्रर होती हुयी टूट गयी थी जिस पर मैं खड़ा था और बल्ली के साथ ही धप्प से नीचे आन गिरा था । नीचे पड़े कबेलू के टुकड़ों ओर अम्माँ ं के प्रिय कबाड़े पर घिसटजाने से मेरे पेट की खाल छिल गयी थी। उस वक्त यही बनियान पहनी थी मैंने, जो पेट से छलछलाते खून से संन गयी थी। अम्माँ ं सुनती तो बहुत गुस्सा होती, इस कारण हम दोनों ने यह बनियान अम्माँ  की नजरों से  ऐसी छिपाई कि फिर कभी हमको भी खोजने पर मिली नही , तब की खोयी आज निकल रही थी। बनियान निकली तो उससे जुड़े कितने सारे दर्द उभर आये। आज भी मढ़ा की ऊपर की अटारी पर वही छप्पर है, जिससे मैं गिरा था। वही कमजोर, तार-तार होता अटारी के भीतर बरसात की उरवाती बहाता छप्पर आज भी ज्यों का त्यों था।
पोटली में बहुतेरे कपड़े बंधेे रखे थे हमारे। अम्माँ जाने क्यूं सम्हाले रखे थीं वे कपड़े।
एक दूसरी पोटली खोली तो सबसे ऊपर रखी थी लैदर के कबर में फंसी एक कटार। उन दिनों हर दूल्हा तमाम अला-बला से सुरक्षित रहने के वास्ते ऐसी कटार  अपने कंधे से लटकते बेल्ट के साथ कमर में बांधता था । हमारे घर में जानें कैसे आगयी थी यह कटार जिसकी वजह से हमारे घर की पूछ-परख पूरे मोहल्ले में थी, जिसे भी जरूरत होती अम्माँ ं से यह कटार मांग कर ले जाता। कई दावत-पंगतियों के न्यौते तो इसी कटार की वजह से मिलते थे हमे। यही कटार हवेली वाले ठाकुर कक्का के बेटे रामप्रसाद सिंह ने बांधी थी। रामप्रसाद सिंह की शादी भी क्या आलीशान शादी थी ! गिनके एक सौ पच्चीस टेªक्टर में बैठकर बारात गयी थी। जिनमें से दो टैक्टरों में बैठी थी नाचने वाली वाई जरीना के साथ उसकी सहायक चार वाइयें और उनके साजिन्दे, जो उरई से आये थे। जनवासे में उस रात पांच-पांच महफिलें जमी थी। मैं भी उस बारात में गया था। मैं अलग महफिल में बैठा था तो बड़े भैया अलग मंे और चाचा अलग महफिल में। दूल्हा की महफिल में था मैं और सारे दोस्त, जहां कि जरीना ने अपनी सबसे कमसिन नर्तकी हसीना को नाचने भेजा था। जिसका गाया गाना आज भी कानों में गूंजता है- हाय अल्ला ये लड़का कैसा है दीवाना, कैसा मुश्किल है तोबा इसको समझाना,धीरे धीरे दिल बेकरार होता है, होते-होते-होते प्यार होता है।
प्यार होने की इत्ती मुकम्मल और धीमी प्रक्रिया सुनते हुए उस रात हम सबको पहली बार अहसास हुआ था कि अब हम जवान होने लगे हैं।
इसी पोटली में कागज में बंधी एक पुड़िया मिली थी जिसे खोला तो उसमें से तिल के लडडू निकले थे। तिल के लडडू को देखा तो  संक्रांति के बहाने सारे त्यौहार याद आये। जब दूसरों के यहां अनेक व्यंजन बनते थे और हमारे यहां मिटटी के कल्ले-तवा की रोटी और पानीदार आलू की तरकारी । यदि किसी त्यौहार में मिटी का कल्ला रखने का निषेध होता था तो अम्माँ ँ एक चम्मच तेल के दसवें हिस्से का तेल इस अंदाज में रोटी पर चुपड़कर उसे परांठे का नाम देती थी कि भोग पारही मूर्तियां भी धोखा खा जायें। अम्माँ ं हर त्यौहार पर बने पकवान्न बचा कर  रखती थी,जो गर्मी की छुटिटयों मे आने वाले हमारी मंझली बहनजी के लिए रखी जाती थी। इस पोटली में वे तमाम व्यंजन निकले, उन्हें व्यंजन भी कहाँ कह सकते थे, बस ऐसी चीजें थी जो रोज के खाने से हट कर होती थी जैसे होली की आग में  भूने गये आटे के टिक्कर और गेंहूं की अधभुनी बालियां, तिल के लडडू ,सेंवइयां, किसी के यहां से बच्चे के जन्म पर भेजे गये गुड़-अजबाइन के लडडू, मैदा की खिकरियां(पपड़ियां) और सत्तू वगैरह।
एक पोटली में हम लोगों के बस्ते निकले थे, जिनमे ंसे कुछ में तो अब तक हमारी पुरानी रफकॉपी और किताबें सुरक्षित थीं। वे किताबेें जिनमें रसखान के पद थे, रहीम के दोहे और प्रेमचंद की पंच परमेश्वर जैसी कहानी। ऐसे पाठ इस दिनों किसी भी सरकारी गैर सरकारी विद्यालयो ंके पाठ्यक्रम से बाहर जा चुके हैं।
एक बस्ते मेें से अनेक फाइलें और छोटी सी डायरी निकली थी। इस डायरी में घर खर्च के कुछ हिसाब लिखे थे- दूध का, राशन का। मैंने पाया कि हरेक पन्ने पर देनदारी बाकी रही थीं जिसे अम्माँ ं ने हम सबके नौकरी पा जाने के बाद  पाई पाई करके चुका दिया था। इसके पहले लेनदार कितने दिनों तक मांगते रहे।
अब एक और बक्शा खोला था मैंने जिसमें ढेर सारी फाइलें थी। एक फाइल में ढेर सारे अंतरदेशीय पत्र और बंद लिफापे में रखी चिट्ठियाँ थी जो प्रायः मेरी मंँझली बहन हमे लिखती थी। किसी में लिखा था कि इसी पत्र के साथ दो सौ रूप्या भजे है, जिनसे तुम दोनेां अपनी फीस भर देना। किसी के साथ पांच सौ रूप्ये थे जिनसे दिवाली पर घर की कच्ची दीवारों  की मरम्तत और पुताई कराई गयी थी । याद आया दिवाली तक पूरे घर की दीवारों  पर बरसात की धारों से बन गयी पतली लम्बे सूराखो ंवाली नालियों  की हर दिवाली पर  मिटटी से भराइ्र की जाकर  ,गोबर से लिपाई और सफेद मिट्टी यानि छुई से पुताई होती थी, जिसकी ऊपरी परत हम हम कलई चूना से  पोतते थे। बाहर की दीवारों पर मजदूर लगता अन्यथा भीतर वाली सारी दीवारे,संडास और मजोटे(फर्श)हम ही ठीक करते थे।
एक दूसरी फाइल खोली तो सारे कागज पलट लेने के बाद सिवाय जमीन की तकाबी के नोटिस और जमा की रसीदों के एक मात्र हमारे हाई सकूल का एक प्रमाणपत्र मिला था, जिसमें पितृविहीन होने से मेरे और मंझले  फीस माफी की स्वीकृति का जिक्र था । याद आया कि हमारे पास फीस भरने का पैसे न होते थे और नाम कट जाने से हम कइ्र दिनों तक स्कूल भी न जा पाते थे ।
एक फाइल में हमारी प्रतिष्ठा और सम्मान के कागजात जतन से रखे मिले मुझे। गहरे लाल रंग का एक निमंत्रण पत्र था जो महाराज जीवारीराव सिंधिया ने मेरे दादाजी को भेजा था, जिसमें जिक्र था उनके बेटे माधव राव के विवाहोत्सव का। बहुत आजिजी की भाषा में ब्याह में पधारने का निहोरा किया गया था इसमें। इसी के ठीक नीचे वह पत्र मिला जो राजमाता सिंधिया ने काँग्रेस पार्टी छोड़ते समय अपनी पूर्व रियासत के सारे मनसबदारों को लिखा था।
काठ के एक बड़े से बक्से मे से निकले थे हल-बक्खर के दांते और पांसे जो खालिस लोहे से बने थे। जिनसे लिपटी पड़ी थी घोडे के मुंह में रखने वाली लोहे की लगाम ओर पांव की रकावें। सुना था किसी जमाने में घर मे घोड़े थे तीन। दस हलच लते थे घर में-यानि बीस बैल। दर्जन भर दुधारू गायें थीं। जिनके गले में बंधने वाली घंटियां मिली थी इसी काठ के बक्शे में । हमने जब होश संम्हाला न गाय बैल रहे न घोड़े बस घंटी और रकाबें थीं।
फिर मिला बंदूका पटटा,  जिसका कुंदा बंदूक पर ऊपर और नीचे उलझा के कंधे पर बंदूक टांग के अकड़के साथ निकलते थे दादा। बंदूक याद आयी तो बहुत से किस्से याद आये, दादा की बतायी वो मुठभेड़़ भी याद आयी, जिसमें पुलिस के साथ दादा और दूसरे ग्रामीणों ने डाकुओं से मुकाबिला किया था।
 मुकदमा भी याद आया और  उसकी जीत भी याद आई जो दादा से सुनते रहते थे। पुरखों का चौदह सौ बीघा का चक रियासत के राजा ने लगान न चुकाने की वजह से जपत कर के सुपुर्दगी में दादा के एक दूसरे रिश्तेदार को सोंप दिया था जिसके लिए दादा ने तब के उच्च न्यायालय कहे जाने वाले दरबार के यहां अपील की थी जिसकी सुनवाई बाद आये फैसले मे चक वापस दादा को मिला था-एकल नाम से, न कि शामलात में चारों भाइयो को। दादा ने दरबार से खुद गुजारिश कर अपने साथ अपने अनुजों का नाम जुड़वाया था।…फिर याद आया दादा का वो हरामखोर छोटा भाई जिसने मुकदमे के फैसले के बाद तहसीलदार द्वारा खेत नपती कराके सोंपते वक्त ही अपने हिस्से की जमीन बेच दी थी। वो चवन्नी का हिस्सा क्या बिका… सब बिखर गये। सब कमजोर हो गये। खैर , ये किस्सा  हमारा देखा हुआ न था, बस सुना हुआ था।
फाइलों के बीच निकला ग्राम हापाखेड़ी के स्कूल का हाजिरी रजिस्टर। याद आये पिता, पेशे से स्कूल टीचर थे मेरे पिता, जिन्होने अपने पिता की राजनैतिक विरासत और दुश्मनियो ंको त्याग कर स्कूल की मास्टरी पकड़ ली थी। पिता से जुड़ी घटनायें याद आयीं। पांच साल की उमर से मुझे सिखाये गये एक एक जार इंगलिस वर्ड और उनके मीनिंग। इतिहास की जानी अनजानी कई शख्सीयतें, जैसे- हाथी सी खाद्य क्षमता वाला महमूद बघर्रा, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, महारानी लक्ष्मीवाई, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई इतिहास पुरूष।
पिता का असामयिक निधन हुआ तो घर पर परेशानी के हालात बने। वे अपने पिता के इकलौते बेटे थे, पिता यानि हमारे दादा की उम्र थी सत्तर साल,सो घर में खाने – पहनने के लाले पड़ गये थे। दादा हर साल एक खेत बेच देते और घर का राशन, अपनी दवाइयां,हमारी किताबें एकमुश्त खरीद ली जाती।  बस कपड़े नही बनते थे हमारे, जाने क्यां दादाजी को कपड़ो की याद नही आती थी, डर के मारे हम उनसे फरमाइस भी नही करते थे। अपने बड़े जीजाजी के पुराने कपड़ों को अल्टर करा फिटिंग कराके पहनते हम।मंझली बहन भी एक बड़ा असरा थी हमारा। वे साल में एक बार अपनी ससुराल से हमारे घर आती। बहन के आने पर हमारे दिन बहुरते कुछ दिनों के लिए, मनमर्जी का खाना बनता,घी लगी रोटी के साथ ठीकठाक सब्जी मिलती, मिठाई खाने को मिलती और गोली-बिसकुट भी जिनके लिए साल भर तरसते थे हम लोग। दूसरो ंके कपड़े देख  ललचाते हम लोगों को देा दो जोड़ी कपड़े नये कपड़े सिलाये जातेे ।
फाइल मे ंरखा हमारा स्कूल का ग्रुप फोटो निकला एक-ब्लैक एन व्हाइट। याद आया कि  मैं और मंझले एक ही कक्षा में पढ़े थे, पहली से बी.ए. तक ।  उस समय कक्षा का ग्रुप फोटो निकालने फोटोग्राफर आया और उस दिन हम लोग अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन गये थे, लेकिन बिना प्रिंट के सादा कपड़े फोटो में यूं उभर के आये-मुसे तुसे और बेरंगत। हालांकि ब्लैक-एन-व्हाइट में रंगत क्या आती। लेकिन घर में प्रेस यानि आयरन न होने से कटोरी में अंगारे भर के कपड़े पर रगड़ते थे। यह फोटो धुलकर आया तो उसकी कीमत थी पच्चीस रूप्या। सबने ले ली हम नही ले पाये, इस ग्रुप फोटो की काफपी। फिर जब बहनजी आयीं तो चार महीने बाद फोटोग्राफर के तमाम निहोरे करके हम एक कॉपी हासिल कर सके थे।
रेशमी कपड़े की एक पोटली देख मेरा मन पुलकित हो गया। कस्बे के माता मंदिर के महंत जी द्वारा प्रसाद रूप में दिये गये कपड़े थे इसमें। माता मंदिर की याद आयी तो उसके पीछे बना साधु आश्रम यानि अस्थान याद आया । पिताजी की असामयिक मौत के बाद हम दो भाइयों का बचपन तो इसी आश्रम में बीता था, आज भी ताज्जुब है मुझे कि जिन घड़ियों में लोग नास्तिक हो जाते है उस क्षणों में हम आस्तिक हो उठे थे।  उसी आस्तिकता का नतीजा था उस अस्थान से हमारा लगाव होना, साधु सम्प्रदाय , अखाड़ों और टकसाली परम्परा का ज्ञान। सिद्वांत पटल का मुखाग्र हो जाना। अस्थान से जुड़ी कितनी सारी कहानियां याद आयी। कितने साधु याद आये… सबसे ज्यादा बूढ़े बाबा। किसी रजवाड़े में रसोइया रहे थे बूढ़े बाबा, जिन्हंे सोने और चांदी की मोहरे गर्म कर दाल में कड़का लगाने का हुनर आता था, उन्हें दर्जनांे नस्ल के घोड़ों की पहचान थी, दो फिट  लम्बाई से लेकर चार फिट तक लम्बी तलवार चलाने में भी जो खासे पटु थे। लेकिन जाने क्या राज था  िक वे अपना नाम किसी को नही बताते थे, मन्दिर की आरती हो या कोई यज्ञ, वे अपनी रसोई छोड़ के कभी मन्दिर में परनाम करने झांकते तक न थे-कैसे अजीब साधु थे।
पता ही न चला कि पूरी दोपहर बीत चली थी। हर सामान के साथ मैं उससे जुड़े समय में खोता रहा। उस समय में जाता रहा। लौट कर वर्तमान में आता रहा।
मेरे साथ अम्माँ  भी बीते हुए समय में जाती रही, आती रही। पता नही कब उन्होनें खाना बना लिया था और मेरे लिए थाली परस लायी थी। बहुत पतली पापड़ सी रोटी और मंूंग की सादा दाल में जो स्वाद था वह किसी मशहूर कुक के  बनाए खाने में क्या होता। बहुत चाव से खाना खाया मैंने।
हम तो पढ़लिख कर अपनी अपनी नौकरियो ंपर बाहर गांव चले गये, इस खानदानी घर में सिर्फ अम्माँ  रहती है, जिन्होंने किसी के साथ जाना नहीं स्वीकारा। जिद से कभीकभार हम ले भी जाते हैं तो महीना पंद्रह दिन में घर लौटने के लिए बखेड़ाशुरू कर देती हैं, बखेड़ा यानि कभी  खाना छोड़ देंगी तो कभी बोलना। हम इस बाल जिद पर हंसते हैं तो और ज्यादा कुपित होती हैं । फिर अन्ततः वापस अपनी इस दुनिया में लौट कर भर भर भुजा भेंटती है मढ़ा के अपने सामान से, उससे जुड़ी यादों से । खेती वे ही सम्हालती हैं और इस हुनर से सम्हालती हैं कि अच्छे किसान भी उनके सामने कहीं नही लगते।
सारा सामान निबेर लिया लेकिन मुझे हायर सेकेण्ड्री स्कूल का वह प्रमाणपत्र नही मिला जिसके लिए इतनी खुद्दा-बखेरी की।
अम्माँ की सारी पोटलियाँ और बक्से अपनी जगह ज्यों के त्यों रख मैं मढ़ा से बाहर आया और पसीना पोंछ रहा था कि अचानक अम्माँ ने याद दिलाया कि बैठक में बड़े भैया का हायर सेकेण्ड्री वाला प्रमाणपत्र कांच में मढ़ा हुआ टंगा है, कहीं उसी के पीछे तुम लोगों के कागज तो नही लगे।
क्षीण से उत्साह में भर के मैने भैया का वह प्रमाणपत्र उतारा और पीछे का प्लाय का टुकड़ा खोलने लगा।
वाह री अम्माँ की याददाश्त ! हम सबके प्रमाणपत्र वहीं थे। एक के पीछे एक सुरक्षित रखे हुये, मढ़े हुये।
कुछ देर बाद मैं अपनी चीज मिल जाने पर खुश हो कर लौट रहा था ।
अम्मां निस्पृह भाव से मुझे पांव छूता हुआ देख रही थी ।
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