अप्रत्यक्ष शिकार 

               – डा0 विकास कुमार

लौतन वाली की इस बेरुखी से खिसियाकर कर घपोचन साह रेलवे पटरी की ओर बढ़ गया था, कोई रेलगाड़ी के नीचे आकर पटरी में कट जायेगा, मगर वह वापस घर नहीं जायेगा। भला कोई पत्नी अपने पति से इस तरह का व्यवहार भी करती है क्या ? बेकार ही वह इस लॉकडाउन में लगातार सात दिनो तक साइकिल चलाकर मुम्बई से आया था – सकरा। वह तो अपने पत्नी और बच्चो को देखने के लिए इतना जहमत उठाकर, पुलिस से पीटते-बचाते आया था, कि कहीं उन्हें कोई तकलीफ तो नहीं है, पाँँच-छः महीने हो गये थे, उसे घर छोड़े हुए। पत्नी को कुछ ही पैसे तो देकर गया था वह। भला हो उस सहुवाइन का जो लौतन वाली को अपने घर पर बरतन-बासन के लिए रख ली थी, जिससे कुछ आमदनी हो जाती थी। मगर इस समय जैसे मुम्बई में काम बंद हो गया था, लोग एक दूसरे से दूरियाँँ बनाने लग गये थे और अपने घरों या कल कारखाना से लोगों को काम से हटाना शुरू कर दिया था, वैसे ही सहुवाइन भी तो बरतन-बासन के काम से हटा दी होगी-लौतन वाली को। उस पर दो बच्चों के  साथ उसकी बूढ़ी माँँ को भी तो उसी के जिम्मे छोड़ आया था। अपने साथ तीन-तीन जान को पालना कोई आसान काम नही होता। इधर भी मुम्बई में कोरोना वायरस संक्रमण के कारण काम धंधा भी चौपट हो गया था, ऐसे मे यहाँँ ज्यादा दिन ठहरना उचित नहीं था। एक तो लॉकडाउन के कारण रेलगाड़ी-बस की आवाजाही पर सम्पूर्ण रूप से रोक लगा दी गयी थी, तीसपर में सभी काम-धंधों पर भी ब्रेक लग गया था। इस तरह वहाँँ की स्थिति काफी दयनीय हो गयी थी। बिना काम-धंधा के एक दिन भी रहना वहाँँ कितना भारी पड़ता है, वहाँँ रहने वाला दिहाड़ी मजदूर ही जानता है। दिन भर दिहाड़ी का पाँँच सौ रूपये तो मिल जाते, लेकिन वहाँँ महंगाई इतनी है कि इतने पैसे भी कम पड़ जाते। एक कहावत भी है न कि मुम्बई पैसे वालो की नगरी है। वहाँँ उसके खाना-खुराकी में डेढ़-दो सौ रूपये खर्च हो जाते थे, पच्चास रूपये का दारू न पिये, तो रात में नींद भी न आ पायेगी। एक तो दिन भर काम करने से शरीर तो अलग से पिराता, वहाँँ तो उसकी लौतन वाली भी तो नही थी, जिससे की तेल-मालिस का सुखभोग मिल सके। फिर तो दारू-शराब का ही आसरा रहता। बस ठेके से एक नीब ले लिया और मजे से पिया, फिर खर्राटा पीटकर सो गया। मर-मजदूरी के लिए कभी-कभी दूर तक भी जाना पड़ता था। साइट तक आने-जाने मे भी चालीस-पचास रूपये खर्च, फिर खैनी-गुटखा के लिए भी दस-बीस रूपया अलग से, इसके अलावे पचास रूपये प्रतिदिन के हिसाब से खोली का भाड़ा । मुम्बई के धारावी या साइन इलाके में बारह बाइ दस के खोली में आठ-दस आदमी से कम क्या रहते, बस शरीर सीधा करने भर की जगह मिल जाय, काफी है, अगर करवट बदलने की इच्छा से हुई तो पैर दूसरे के शरीर से जा टकराये, इस तरह घपोचन साह का एक दिन का खर्च तीन सौ रूपये हो जाना, कोई आश्चर्य की बात नहीं था, ले-देकर सौ-डेढ़ सौ रूपये ही बच पाते थे, प्रतिरोज के हिसाब से। हाँँ, जब कभी ओवर टाइम काम कर लिया तो कुछ अधिक पैसे बच पाते थे।इस तरह मुम्बई में बिना काम के रहने का मतलब अबतक जो भी कमायी बची हुई थी, उसे बिना मतलब के खर्च कर देना। उसमें भी बच्चे-पत्नी और बूढ़ी माँँ की आशा पर पानी फेर देना। पहले चरण के लॉकडाउन को तो किसी तरह काट लिया था, मगर दूसरे चरण के लॉकडाउन ने उसे अंदर से तोड़कर रख दिया था। इधर खाना-खुराकी में खर्चा तो हो ही रहा था, उस पर से खोली का मालिक अलग से रोज-रोज धमका रहा था, ‘देखो भाई! अपना भी परिवार है, तुमलोग से खोली का भाड़ा नहीं लेगा, तो मै क्या खायेगा ? या तो रहने का पैसा दो, नही तो फूटो यहाँँ से।‘इधर सरकारी महकमें के लोग और कुछ धनी-मानी लोग, जो भी मदद कर रहे थे, उससे तो कभी-कभी पेट की ज्वाला शांत हो जाती थी, मगर रोज-रोज दूसरों का आसरा करना भी तो अच्छा नहीं था। दूसरांे से मदद लेने की भी एक सीमा होती है। इससे तो अच्छा है कि जो कुछ पैसा बचा है, उसे लेकर घर ही चला जाय। कम से कम परिवार के साथ तो रहेगें, कुछ रूखा-सुखा खाकर कुछ दिन तो जीवन काट ही लिया जायेगा। कोई रोज तो ऐसा होगा नहीं, कुछ दिनो की तो बात है, उसके बाद सब ठीक हो ही जायेगा।वैसे भी उसके कुछ संगी-साथी घर के लिए रवाना हो चुके थे, कुछ तो ट्रक में लदाकर, कुछ तो अभिनेता सोनू सूद के बसों में सवार होकर, कुछ तो रिक्शा से, तो कुछ टेम्पू से और कुछ तो साइकिल से हीं। कुछ तो ऐसे भी थे जो पैदल ही निकल पड़े थे। जब सभी मुम्बई नगरी को छोड़कर जा हीं रहें हैं, तो वह यहाँँ अकेले रहकर क्या पहाड़ धांस लेगा। उसने भी अपने एक दिहाड़ी मित्र रामबच्चन राय के साथ घर जाने की योजना बना ली थी। रामबच्चन सकरा के बगल के हीं करीब छः-सात किलोमीटर दूर कर्पूरीग्राम का निवासी था, सो दोनो ने अपने मोबाइल को सस्ते-सुस्ते में बेचकर पुरानी साइकिल ले ली थी और मुम्बई से बिहार की यात्रा पर निकल पड़े थे-दोनों। दोनों बारी-बारी से कभी चालक की भूमिका निभाते, तो कभी यात्री की। लगभग सात-दिनों की भागीरथी प्रयास के पश्चात् बहुत सारे कष्टों को सहते, पुलिस से बचते-बचाते, मददगारों द्वारा दिये गये भोजन को ग्रहण करते सकरा पहुँँच गये थे दोनों। रामबच्चन राय घपोचन साह को सकरा के सीमा में छोड़कर कर्पूरीग्राम के लिए रवाना हो गया था। घपोचन साह जैसे ही अपना गाँँव पहुँँचा तो देखा कि वहाँँ का तो नजारा ही कुछ और है। गांव के मुख्य सड़क पर बाँँस की ठठरी लगाये गाँँव के कुछ लड़के पहरेदारी कर रहे थे कि कोई भी बाहरी व्यक्ति गाँँव में प्रवेश न कर पाये और ताकि इस विदेशी बीमारी को गाँव में पैर पसार नहीं पाय। जैसे ही घपोचन साह बाँँस की ठठरी के नजदीक पहुँँचा कि पहरेदारी कर रहे लड़कों ने दूर से ही डंडा दिखाते हुए कहा, ‘कहाँँ-कहाँ, कहाँँ एकदम से घुसे जा रहे हो अंदर ? चलो बाहर ही रहो।‘‘अरे भाई ! मुम्बई से आ रहा हूँँ साइकिल से, बीबी-बच्चों से मिलने जाना है, जाने तो दो।‘ अनुनय के स्वर में बोला था घपोचन साह। ‘ओ़़ तो। मुम्बई से आ रहे हो, कोरोना बीमारी को लेकर। चले जाओं, सकरा हाई स्कूल-कोरेंटाइन सेंटर में। चौदह दिन रहोगे, अगर उतना दिन तक ठीक रहे, तब घुसने देंगे गाँँव में।‘ एक व्यक्ति ने घुड़कते हुआ कहा था।‘अरे भाई ! नही है, हमको कुछ बीमारी-उमारी, हमको जाने दो।‘‘काहे जबरदस्ती कर रहे हो भाई। चलो जाओ, स्कूल में। सारी व्यवस्था है, वहाँँ, रहने-खाने -पीने की।‘ किसी दूसरे व्यक्ति ने समझाते हुए कहा था। तभी कुछ ही देरी में पुलिस की गाड़ी पहुँँच गयी थी। डण्डा हिलाते हुए हवालदार ने कहा था़ ‘बाहर से आये हो न, तो चौदह दिन के लिए कोरेन्टाइन सेंटर पर रहना ही होगा, चलो जल्दी से जाओ स्कूल में।  वहाँँ तुम निगरानी में रहोगे।‘ फिर न चाहते हुए भी घपोचन साह को उस स्कूल में जाना ही पड़ा था। हालांकि अभी तक कोई जान-पहचान का कोई व्यक्ति मिला भी नहीं था कि उससे संवाद पहुँँचा दे पत्नी और बच्चों तक, कि चिंता की कोई बात नहीं है, उसका घर वाला सकरा तक आ गया है और सकरा कोई छोटा-मोटा गाँँव तो था नही, करीब पाँँच-छ किलोमीटर तक फैला हुआ, करीब दस-बारह हजार से अधिक की आबादी होगी वहाँँ की। एक ही गाँँव दो पंचायतो में बंटा था- सकरा पूर्वी और सकरा पश्चिमी। उसका घर एकदम पश्चिमी छोड़ पर था सकरा पश्चिमी क्षेत्र में।   फिर आबादी इतनी ज्यादा कि हर कोई को पहचानना संभव नही था। वहाँँ के दोनों मुखिया और वार्ड सदस्यों का साफ आदेश था कि कोई भी व्यक्ति बाहर से आये, चाहे वह लाट साहब ही क्यों न हो, उसे गाँँव के अंदर घुसने ही नहीं देना है। खासकर जो दिल्ली-बम्बई से आये तो, उसके साथ तो ज्यादा ही सख्त रहना है। वहाँँ बहुत जोरों से यह महामारी फैला हुआ है। कहीं कोई वहाँँ से बीमारी लेकर आ जाय तो फिर पूरे गाँँव में ही महामारी फैल जायेगी। सो गाँँव के सीमाने से दो तीन किलोमीटर दूर सकरा हाईस्कूल में क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया था, जहाँँ बाहर से आये हुए लोगों को दो सप्ताह के लिए गाँँव-समाज से अलग एकांतवास में रहना था। घपोचन साह को भी वहीं जबरदस्ती भेजा गया था। अभी तक तो वह यह सोचा भी नहीं था कि उसे अपने ही गाँँव में पहुँँच जाने के बावजूद घर तक जाने नहीं दिया जायेगा। मुम्बई तो खैर, मुम्बई ही है, मगर यह गाँँव जहाँ के लोग अपने है, वे ही उसे घुसने नहीं दे रहे थे, फिर मुम्बई और सकरा के लोगो में अंतर ही क्या है ? इस महामारी के समय में जिस पत्नी, बच्चों और अपनी बूढ़ी माँँ की देखभाल के लिए उतने दूर से साइकिल के सहारे चला आया था, वह अपने गाँव में आकर भी दिल्ली दूर का अनुभव कर रहा था।क्वारेंटाइन सेंटर में हर तरह की व्यवस्था थी, सबके अलग-अलग बिस्तर ओढ़ने के लिए अलग-अलग चादर और अलग-अलग बर्त्तन में भोजन मिलते थे, समय से तीनों टाइम का खाना मिल जाता था, लेकिन एक चीज जो नहीं मिल रहा था, वह था-अपने परिवार के संग रहने का सुख। पता नही लौतन वाली कैसी होगी, दोनो बच्चों का खाना मिल रहा होगा या नहीं, बूढ़ी माँँ कैसी होगी। इस तरह उसे परिवार की चिंता खाये जा रही थी। यहाँ का चौदह दिन उसे चौदह साल लग रहे थे। ऐसा लग रहा था कि राम के बाद चौदह साल का बनवास उसे ही मिल गया हो। मोबाइल भी था, तो उसे बेच दिया था, आनन फानन में नम्बर भी नही लिख पाया था अपने घर का। और नम्बर होता भी यहाँँ कौन देता मोबाइल। यहाँँ तो एक-दूसरे को छुना तक मना है, तो फिर मोबाइल से ही कौन दोस्ती करता।जब तक वह मुम्बई में था, तो संतोष था कि वह उनसे इतना दूर है, तो कैसे मिल पायेगा। और अब जब वह गाँँव तक पहुँँच ही गया है, तो सिर्फ छः सात किलोमीटर की दूरी पर है वह उनसे नहीं मिल पा रहा है। यह पीड़ा उसके लिए असहनीय प्रतीत हो रहा था।  दूसरे ही दिन, उसने क्वारेंटाइन सेंटर में तैनात प्रभारी मास्टर साहब से अनुनय भी किया था, इस पर तो मास्टर साहब भड़क ही गयें थे, ‘का जी तुम मेरी नौकरी खा जाओगे क्या ? चुपचाप से यही रहो। बारह-तेरह दिन बाद तो छुट्टी मिल ही जायेगी, फिर तो परिवार के साथ में रहना ही है।‘ लेकिन घपोचन साह ने जिद पकड़ ली थी। मास्टर साहब ने पुलिस की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘जाओ जल्दी से कमरे में, कहीं पुलिस देख लिया तो कम नहीं मारेगा।‘‘अरे मार ही तो खाते आ रहे है, सर ! अब क्या जान ही ले लेगें क्या ? हम आ जायेंगें वापस, परिवार से मिलने के बाद। फिर चौदह दिन क्या एक महीना रख लिजिएगा।‘ अभी वह मास्टर साहब के समक्ष गिड़गिड़ा ही रहा था कि एक जमादार ने दूर से ही आवाज लगायी, ‘क्या जी, तुमको सुनाई नहीं दे रहा है क्या ? जब कह रहे है कि जाओं अपने कमरें में, तो नौटंकी काहे कर रहे हो ? हमलोग क्या बिना परिवार के है !  भागो अपने कमरे के अंदर, नहीं तो लगायेंगें दो-चार डंडा, तब होस-ठीकाने आ जायेगा।‘फिर मन मसोसकर घपोचन साह अपने कमरें में चला गया था। वह उन्हें कैसे समझाये के उसके अंदर भूचाल मचा हुआ है, परिवार से मिलने के खातिर। सिर्फ दो घंटे की मुहलत मिल जाय, तो वह सिर्फ चेहरा देख लेगा़ और जो कुछ पैसा बचाकर मुम्बई से लाया है, उसे देकर बैरंग वापस आ जायेगा। पर यहाँँ तो किसी को बाहर झाँँकने तक की आजादी नहीं थी, उसे तो यह किसी जेल से कम नहीं लग रहा था। रात के बारह बज रहे थे। घपोचन साह ने महसूस किया कि सभी लोग बेसुध सो रहें है। उनके मस्तिष्क में कुछ खुराफात सुझी थी। यही मौका है इस जेल से भागने का। वह धीरे-से उठा था और अपने बोरिया-बिस्तर को समेट कर बिल्ली के मानिंद धीरे-धीरे चारदिवारी के करीब पहुँँचा था, उसने देखा, दरबान भी दरवाजे पर पसरा पड़ा है। उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान अटखेलियाँँ कर गयी थी और बिना समय गवाये कुत्ते की भाँँति एक ही छलांग में विद्यालय के चार दिवारी से बाहर आ गया था। अब वह आजाद पंछी की भाँँति उड़ने को आतुर था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसा कि उसने बहुत बड़ी जंग जीत ली हो।वह बचते-बचाते पैदल ही अपने घर की ओर चल दिया था। करीब एक घंटे के बाद अपने झोपड़ी नुमा घर के पास पहुँँचा था। घर के दरवाजे के पास ही पहुँँचकर उसने आवाज लगायी थी, ‘लौतन वाली ओ लौतन वाली।‘उसकी पत्नी पास के लौतन गाँँव की थी, कई वर्ष पूर्व नारायण पौद्वार जी खेत में काम करने के वक्त दोनो की मुलाकात हुई थी, और यही मुलाकात बाद में प्रेम का रूप ले लिया था,  और फिर दोनो वैवाहिक बंधन में बंध गये थे, दोनो एक ही बिरादरी के थे, इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया था और फिर दोनो के मधुर संयोग से दो बच्चे इस दुनियाँँ में आ पाये थे। गाँँव में, गाँँव की बहुरियाँँ को नाम से नहीं बुलाने का प्रचलन था, अतः जो बहुरिया का जिस भी गाँँव से आती थी, उसे उसी गाँँव के नाम के साथ बुलाया जाता था। अतः उसका नाम भी लौतन वाली ही पड़ गया था। घपोचन साह भी उसे यही नाम से पुकारते थे। मघ्यरात्रि में आवाज सुनकर एकबारगी लौतन वाली चौंक गयी थी। फिर घपोचन साह के बारम्बार पुकारने के बाद वह अंदाज लगा ही ली कि यह तो उसके पति का ही आवाज है, वह बिस्तर पर लेटे आवाज लगा दी,‘ हाँ।‘‘हाँँ लौतन वाली, हम आ गये हैं, मुम्बई से, दरवाजा खोलो।‘ वह झट से उठी और दरवाजे के करीब आयी। मन हुआ कि दरवाजा खेालकर सीधे गले ही लग जाये, पाँँच-छः महीने हो गये थे, मिले हुए। पर अचानक ही उसे वस्तुस्थिति का भान हुआ कि सारे टोले में हल्ला हो गया है कि मुम्बई के धारावी में सबसे ज्यादा करोना का प्रकोप हुआ है। उसका पति भी धारावी के झोपड़पट्टी में ही रहता है, कहीं उसका पति करोना को लेकर आया होगा तो, फिर उसे भी तो हो जायेगा। फिर तो यह फैलने वाली बीमारी है। उससे बच्चों को भी हो जायेगा,‘ फिर टोले मे फैल जायेगा, और फिर पूरे गाँँव में। वैसे भी टोले वाले कह रहे थे कि घपोचना को घुसने नहीं देना है, नही ंतो उससे पूरे गाँँव में बीमारी फैल जायेगी।लौतन वाली ठिठकी थी, फिर डरते हुए आवाज लगायी, ‘मुनवा के पापा!‘ ‘हाँँ, लौतन वाली, खोलो दरवाजा, तीन दिन पहले ही आ गये थे, वहाँँ हाई स्कूल में रह रहे थे। भाग कर आये है, वहाँँ से।‘ घपोचन साह धीरे-धीरे बोल रहा था कि कहीं अगल बगल वाले कोई सुन न लेवे।‘लेकिन आप यहाँँ काहे आये ? कहीं बीमारी-उमारी लेकर आये होगें तब ! फिर आपसे हमलोगों को भी तो हो जायेगा।‘ लौतन वाली सीने में पत्थर रखकर बोली थी।एक बारगी तो घपोचन साह का माथा ठनक गया था, पत्नी के बदले व्यवहार को देखकर फिर रूखे स्वर में बोला था, ‘अरे, नहीं है हमको बीमारी-उमारी। जल्दी खोलो दरवाजा।‘‘न , दरवाजा नहीं खोलेगें। हमको बीमारी हो जायेगा तो कोई बात नही, लेकिन फिर बाल-बच्चों को हो जायेगा तब ?  हम दरवाजा नहीं खोलेगें। आप वहीें उस स्कूल में ही रहिये अभी। जब छुट्टी हो जायेगा, आपका, तब आइयेगा।‘ थोड़ा कठोर होते हुए बोली थी लौतन वाली।पत्नी के बदलते तेवर से घपोचन साह काफी आहत हो गया था, जिसके लिए वह इतना कष्ट सहकर सात-समुद्र पार कर आया था, वही दरवाजा खोलने से मना कर रही थी। यहाँँ आदमी उतना दूर से आया है, हाल चाल पूछना चाहिए, लोटा-पानी देना चाहिए, आव भगत करना चाहिए- सो नहीं। यहाँँ तो दरवाजा खोलने में उसकी नानी मरी जा रही है। पत्नी के इस पत्थर व्यवहार से उसे लगा कि किसी ने जोरदार तमाचा मार दिया हो उसके गाल पर। पुलिस का डंडा भी इतना जोरदार नहीं था, जितना की पत्नी की बोली।‘अरे बच्चवा लोग को दिखा दो, उसे देख लेगें, माँँ का हाल-चाल पूछ लेंगे, फिर हम चले जायेंगें।‘ घपोचन साह थोड़ा नरम होते हुए अनुनय कर रहे थे।‘बच्चालोग सब ठीक है। माँँ भी ठीक है।  हम सबका ख्याल रख रहे है, बस अभी आप जाइये स्कूल।‘‘मतलब की दरवाजा नहीं खोलेगी।‘ घपोचन साह थोड़ सख्त अंदाज में बोला था।‘नहीें । मुनवा के पापा।  यहाँँ हम अभी दरवाजा नहीं खोलेंगें।‘ कलेजे पर पत्थर रखकर बोली थी लौतन वाली । ‘ठीक है, रहो तुमलोग घर पर। हम जा रहे हैं जहन्नुम में।‘ गुस्से में घपोचन साह बोला था और जेब से पैसे निकाल कर दरवाजे पर फेकते हुए बाहर की ओर चल दिया था। पत्नी के इस व्यवहार ने उसे अंदर से तोड़ कर रख दिया था। जब पत्नी ही इस तरह का सलूक कर रही है, तो बाकी और लोगों से क्या उम्मीद लगायी जा सकती है। लेकिन वह अब वह स्कूल जाकर करेगा ही क्या ? क्वारेंटाइन अवधि समाप्त होने के बाद भी पत्नी के व्यवहार का क्या भरोसा। जब इतने दूर से आदमी आया है, उसका चेहरा देखना तक इसको कबूल नहीं, तो अब क्या आशा करना है।  अब उसे लगने लगा था कि वह झूठ-मूठ के ही परिवार के लिए परेशान था, यहाँँ तो लोगों का नजरिया ही बदल गया है। ऐसे दिन देखने से अच्छा यही होता कि करोना ही हो जाता हमको, मर खफ जाते।घपोचन साह के अंदर अब जीने की इच्छा समाप्त हो गयी है। ऐसे जीने से अच्छा है मर जाना। वह खिसियाकर वह क्वारेंटाइन सेंटर की ओर कदम नही बढ़ाकर ढ़ोली रेलवे स्टेशन की ओर कदम बढ़ा दिया था-रेलगाड़ी के नीचे आकर प्राण त्यागने के लिए। आखिर कोरोना वायरस ने अप्रत्यक्ष रूप से घपोचन साह को अपना शिकार बना ही लिया था।                   ………………………………………………………………………
परिचय : डॉ विकास कुमार की की कई कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुकी है. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी इनकी कहानियां प्रकाशित होती रहती हैं.

सम्प्रति: कोष.अधीक्षक सह.विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, रामेश्वर चेथरू महाविद्यालय, सकरा, (बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय ) मुजफ्फरपुर, बिहार-843105

सम्पर्क: ग्राम – अमगावाँ, डाकघर- शिला, प्रखण्ड – सिमरिया, जिला- चतरा,  झारखण्ड – 825401

मो0 नं0: 8102596563, 9031194157

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