दर्द न जाने कोई

  • नीरज नीर

बरसात के बाद नदी जब अपना पानी समेटती है तो कुछ पानी किनारे के गड्ढों में छोड़ती चली जाती है। मुख्य धारा से पीछे छूट गया पानी भी बहना चाहता है । वह तड़पता है सागर से मिलन के लिए। पर सभी की किस्मत में सागर की नमकीनलहरों पर खेलना नहीं होता है। कुछ की किस्मत में गरम धूप की सीढ़ियाँ चढ़ते हुये ऊपर बादलों में गुम हो जाना लिखा रहता है। लेकिन यह सब भूल कर गड्ढों में फँसा पानी मछलियों के लिए घर बनाता है। मछलियों की अठखेलियाँ देखकर वह अपनी लाचारी भूल जाता है, वह इस दर्द को भूल जाता है कि उसके साथ का पानी बहकर आगे जा चुका है। पानी का स्वभाव स्त्री सा होता है;तरल और जीवन दायी। जीवन देने की लालसा में स्त्रियाँ कभी अपने दुख दर्द की परवाह नहीं करती है। सुनीता का जीवन भी इन्हीं गड्ढों के पानी की तरह था।

मीरपुर गाँव में चारो तरफ हरियाली थी।  खेतों के पार एक तरफ नदी बहती थी और दूसरी  तरफ एक पहाड़ी थी।  नदी और पहाड़ी के बीच की समतल भूमि में ताड़ के वृक्षों की बहुलता थी। बैशाख लगते ही इनसे ताड़ी निकालने का काम शुरू हो जाता था। ताड़ी निकालने का काम बंटाई पर होता था। जिनके ताड़ के वृक्ष थे उन्हें बांटकर आधी ताड़ी मिल जाती थी। ताड़ी पीने वाले ताड़ी पीकर मस्त हो कहीं आम वृक्ष के नीचे बेसुध पड़े रहते थे।

इन्हीं  बेसुध पड़े रहने वालों में से एक नाम था सुनीता के पति रमेशर सिंह का। रमेशर सिंह एक छोटा किसान था। किसान इसलिए कि उसके पास खेत थे।  पर रमेशर सिंह को किसानी का काम कभी नहीं सुहाया, इसलिए वह खेतों को बेचकर खाने लगा। वह दिन भर खाली बैठा रहता, ताड़ी, शराब पीता एवं जब पैसों की कमी होती खेत का एक टुकड़ा बेच देता। रमेशर सिंह अपने घर में अकेला था।   माँ बाप उसके गुजर चुके थे एवं भाइयों ने उसे अलग कर दिया था।  काम नहीं करने वाले आदमी को भला कौन बिठा कर खिलाता? भौजाइयों के रोज रोज के तानों से तंग आये  रमेशर सिंह को भी लगा कि बँटवारा करके अलग हो  जाना ही उचित है।  आख़िरकार रमेशर सिंह भाइयों से अलग होकर अपनी रोटियाँ खुद सेंकने लगा।   जब रमेशर सिंह भाइयों से अलग हुआ था तब तक  उसकी शादी नहीं हुई थी।

स्वयं से रोटियां सेंकने का सिलसिला जो एक बार शुरू हुआ तो  वह लंबा चलता रहा। रमेशर सिंह की शादी नहीं हुई।  भाइयों ने उसकी शादी करवाने में कोई रुचि नहीं दिखाई।  उनके मन में यह बात शायद चलती रही कि अगर रमेशर सिंह की शादी नहीं होगी तो आखिरकार उसके हिस्से की जमीन भी उन्हीं की हो जाएगी। जिस पुरुष की काफी उम्र बीत जाने पर भी जब शादी नहीं हो तो उसे बन्डा कहा जाता है।   शादी की उम्र रमेशर सिंह की कब की गुजर चुकी थी एवं गाँव में वह बंडों की श्रेणी में आ गया था।  लोग पीठ पीछे उसे बन्डा कहने लगे थे।

रमेशर सिंह सुबह में रोटियां सेंक कर दिन पर खाट पर पड़ा रहता ।   उसने अपने हिस्से की  जमीन को बँटाई पर उठा दिया था एवं बाँट कर जो मिल जाता था उससे गुजारा करता एवं जरूरत होने पर खेत का एक टुकड़ा  बेच देता था। गर्मी के दिनों में जो लोग ताड़ी उतारने का काम करते थे वही लोग महुआ चुआने का भी काम करते थे। रमेशर सिंह की  शाम महुआ की मस्ती में गुजरती।

एक दिन दारू के झोंक में रोटी सेंकते वक्त उसका हाथ बुरी तरह जल गया, उस दिन उसे घर में एक अदद औरत की बड़ी कमी महसूस हुई।   अगर औरत होती तो उसे अपना हाथ तो इस तरह नहीं जलाना पड़ता, उसने सोचा।  उसी पल उसने निश्चय कर लिया कि वह कहीं से भी एक औरत का जुगाड़ करेगा।

वैसे तो वह गाहे बेगाहे एक औरत के पास जाया करता था।  लेकिन उसके बारे में सोचकर उसका मन खराब हो गया।  उसे वह कैसे अपने घर पर लाकर बिठा सकता है? उसके पास तो न जाने कितने लोग जाते हैं। वह तो एक ऐसी औरत लेकर आएगा जो सिर्फ उसकी होगी। भाइयों एवं भाभियों से तो उसे कोई उम्मीद थी नहीं।

रमेशर सिंह जिस इलाक़े का था , उस इलाके में जिनकी शादी नहीं हुई थी वैसे कई लोग लड़कियाँ खरीद कर लाये थे एवं शादी कर ली थी। रमेशर सिंह ने निश्चय किया कि वह भी  अपने लिए लड़की खरीद कर लायेगा। रमेशर ने इस दिशा में कोशिश शुरू कर दी। उसकी कोशिश रंग लायी एवं वह एक औरत को खरीद कर लाने में सफल हो गया। लेकिन इस उपक्रम में उसे अपनी बहुत सारी जमीन बेच देनी पड़ी।  फिर भी वह खुश था कि उसके घर में कोई रोटी बनाने वाली तो आ गयी।

वह एक गोरे रंग, तीखे नैन-नक्श वाली खूबसूरत सी  औरत थी।  साड़ी को उल्टा पल्लू कर के पहनती थी।  जैसे आम बंगालन औरतें पहनती है। रमेशर सिंह और उसकी उम्र में बहुत अंतर था। गाँव वाले कहते थे कि वह उसे कहीं किसी कोठे से खरीद कर लाया था। परंतु रमेशर सिंह इस बारे में किसी से कुछ भी बात नहीं करता था। वह सुनीता पर जान छिड़कता था। उसकी सभी फरमाइशें पूरी करता था।

रमेशर सिंह दिन में घर के बाहर खटिया पर उघारे देह सोया रहता। सुनीता जब घर में अकेली परेशान हो जाती तो दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती थी।

सुनीता अपने घर के पुराने दरवाजे की चौखट से ओट लगाए सर पर पल्लू डाले एवं पल्लू का एक सिरा अपने दाँतो से दबाये उधर से गुजरते लोगों को अक्सर दिख जाती थी। वह लोगों से बात करना चाहती थी, लेकिन उसे बांग्ला के सिवा कुछ नहीं आता था और गाँव के लोगों को बांगला का “ब” भी नहीं पता था।

गाँव की औरते जब कभीरमेशर सिंह के घर गली बुलने जाती तो वह दौड़ कर मचिया लेकर आती और औरतों को कहती “बोसो । । बोसो”।  औरतें उसके इस बोसो पर ठठाकर हँस देती।  हालांकि धीरे धीरे  उसने गाँव की भाषा सीख ली थी।

रमेशर सिंह के घर में सुनीता के आने के बाद खर्चे बढ़ गए।  इसी दौरान उसने दो बच्चों को भी जन्म दिया। रमेशर सिंह के पास पहले से ही  छोटी सी खेती थी, उन्ही खेतो को बेच-बेच कर खाता रहा था । लेकिन बेच कर खाने से तो सोने का पहाड़ भी कम पड़े फिर रमेशर सिंह के खेतों की बात ही क्या थी? एक दिन ऐसा आया जब रमेशर सिंह के पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा। रमेशर सिंह साठ बसंत पार कर चुका था। उससे  अब नया कोई काम होने वाला नहीं था और सच तो यह है कि गांव में नया काम करने की कोई सम्भावना भी नहीं थी।  जिंदगी भर बैठ कर खाने वाला आदमी शारीरिक परिश्रम वाला काम भी नहीं कर सकता था कि मजदूरी करके अपने लिए दो रोटी कमा ले।

कुछ दिनों तक तो ऊधार पैंचा लेकर काम चला पर जब जब भूखों मरने की नौबत आ गयी तो एक दिन रमेशर सिंह घर छोड़कर भाग गया।

सुनीता अब उस गाँव में अकेली एवं बिना किसी सहारे के हो गयी थी। पर उसे तो अपने दो नन्हें बच्चो का सहारा बनना था।

भूख किसी की सगी नहीं होती है। जब सुनीता के  बच्चे  भूख से बिलबिलाने लगे  तो माँ का ममतामयी दिल बिलख पड़ा।  पड़ोसियों से दो रोटी की भीख मांग कर लायी पर रोटी के साथ रमेशर सिंह के हिजड़ा होने का ताना भी साथ में मिला जो अपने बीबी बच्चे को अनाथ छोड़ कर भाग गया। सुनीता को अपने पति के बारे में ऐसा सुनना यद्यपि अच्छा नहीं लगा पर उसके पास सुनने के सिवा विकल्प ही क्या था?

जिसका पति घर छोड़ कर भाग जाये  उसके पड़ोसी भी दिलदार नहीं होते है।  पड़ोसियों ने शीघ्र ही दुरदुराना शुरू कर दिया।

सुनीता अब क्या करे सोचती।  कभी विचार करती कि कुएं में कूद कर जान दे दे, लेकिन बच्चों का ख्याल उसके पैर रोक लेता।  कभी विचारती कि बच्चों समेत कुएं में कूद जाये फिर सोचती आखिर बच्चों की जान लेने का अधिकार उसे कैसे है।  तो फिर वह क्या करे? वह खरीद कर लायी गयी थी इसलिए माँ बाप और मायके का सम्बन्ध तो कब का विच्छेदित हो गया था।  वह एक ऐसे वृक्ष की भांति थी जिसे  जड़ से उखाड़ कर छोड़ दिया गया हो। वह हवा के झोंकों के साथ दूर कहीं पहाड़ों के उस पार उड़ जाना चाहती थी, जहाँ उसकी जड़ें जमीन में गड़ी हो। जहाँ बच्चे भूख से तड़पते न हों,जहाँ लड़कियाँ बेचीं न जाती हो।

एक दिन रिश्ते का भतीजा संजय थोड़ा सा चावल लेकर आया। सुनीता को जीवन की थोड़ी आशा बंधी। परंतु एक हाथ से चावल देते हुये, दूसरे हाथ से उसने सुनीता का हाथ पकड़ लिया।

“ये क्या करते हैं बाबू? मैं आपके माँ जैसी हूँ”।  सुनीता ने हड़बड़ा कर रहा।

“तो चावल मुफ्त में आता है क्या?” संजय ने बेहयाई पूर्वक हँसते हुये कहा।

“तो ले जाइए अपना चावल। मैं आपसे चावल मांगने गयी थी क्या?” कई दिनों से भूखी व कमजोर सुनीता ने मिमियाते हुये कहा। उसके चेहरे पर बेचारगी से जायदा चिढ़ और परेशानी के भाव थे।

संजय घबरा गया। उसे लगा कहीं सुनीता शोर न मचाने लगे। वह वहाँ से चला गया। सुनीता की एक शाम के भात की आस भी साथ ही चली गयी।

क्या हुआ बाबू, इतना घबराए हुये क्यों लग रहे हो ? संजय को घबराए हुये देखकर, उसकी माँ ने पूछा।

“कुछ नहीं माँ, बस ऐसे ही” संजय ने कहा।

ऐसे ही कोई घबराता है क्या ? कोई परेशानी है क्या? संजय की माँ ने कहा।

नहीं ऐसी कोई बात नहीं। आज चाची पर दया करके थोड़ा सा चावल देने चला गया था तो चाची बदले में मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कमरे में ले जा रही थी।

उस रंडी की ये हिम्मत। भतार छोड़ के भाग गया है तो नया नया भतार खोज रही है। संजय की माँ ज़ोर-ज़ोर से सुनीता को गाली देते हुये चिल्लाने लगी। उसे अपने बेटे के  कहे पर पूरा यकीन था। उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उसका बेटा भी गलत हो सकता है और सुनीता सही। सुनीता को स्पष्टीकरण देने का कोई मौका भी नहीं दिया गया।

शीघ्र ही भीड़ जुट गयी। सारे गाँव ने इस बात पर यकीन कर लिया कि सुनीता चावल के बदले एक आदमी को हाथ पकड़ कर कमरे में ले जा रही थी।

 

हे भगवान! घोर कलयुग आ गया है। बेटा-भतीजा की भी मर्यादा नहीं रह गयी है। गाँव में जिसने इस घटना के बारे में सुना सुनीता के नाम पर थू–थू किया।

फिर तो  अकेले में कई लोगों ने सुनीता को चावल देने की कोशिश की।

समाज के सारे रिश्ते कितनी पतली एवं कमजोर  डोर के बल पर टिके हुये थे,जो स्त्री के कमजोर एवं लाचार होते ही छिन्न भिन्न होकर बिखरने लगे थे?सुनीता को गाँव के हर आदमी की शक्ल से ही अब उबकाई आने लगी थी। उसे लगता था कि गाँव का हर आदमी एक बड़ी से जीभ में बदल गया है, जो उसकी ओर बढ़ता चला आ रहा है।

एक दिन गोधूलि बेला में जब अँधेरा पिछवाड़े के नीम से उतरकर धीमे धीमे आँगन में पाँव पसारने लगा था एवं उसकी भूख अपने चरम बिंदु पर पहुँचने लगी थी, उसे लगा कि उसका  प्राण गले में आकर अटक गया है।  बेटे भूख से बेसुध खटिया पर पड़े थे।  सुबह से उन्हें पानी पिलाकर फुसला रही थी।  पर पानी पिलाकर बच्चे तो फुसल जाते हैं, भूख को फुसलाना संभव नहीं,  वह फिर आकर खड़ी हो जाती है। शाम के धुंधलके में सुनीता बच्चों को साथ लिए घर छोड़ कर यह सोचकर निकल पड़ी कि या तो बाहर निकल कर रोटी का इंतजाम करेगी या बच्चे के साथ ही कहीं जान दे दगी। कई दिनों से भूखों रहने के बाबजूद वह दिन में  यह सोचकर नहीं निकल सकी थी  कि कहीं समाज के लोगों को उसके घर से बाहर जाने का पता नहीं चल जाए जिससे रमेशर सिंह की प्रतिष्ठा धूमिल न हो।

रास्ते में उसके बड़े बेटे ने बड़े ही भोलेपन  से पूछा “माँ तुम जादू से रोटी नहीं बना सकती?” इस बात पर सुनीता की आँखें भर आयी।  “काश बेटे मैं बना पाती! अगर मैं जादू से कुछ बना पाती तो तुम्हें भूखा नहीं रहने देती मेरे बच्चे।    मैं जादू से एक ऐसी दुनियां बनाती जहाँ कोई बच्चा भूख से नहीं तड़पे। ” सुनीता ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।

सुनीता के गांव से निकटवर्ती कस्बे की दूरी चार किलोमीटर थी। भूख से बेहाल सुनीता कस्बे के बस स्टैंड तक पहुँचते-पहुँचते निढाल  हो गयी।  सड़क किनारे गड़े चापाकल से पानी पीकर वह वहीं एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर कटे वृक्ष की भांति गिर गई।  मानसिक रूप से बटोरी गयी सारी शक्तियां मानो टूटकर बिखर गयी। घास जब तक जमीन में अपने जड़ से जुड़ी रहती है तब तक बड़ी से बड़ी आंधियां भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती लेकिन जड़ से उखड़ते ही घास तिनके में तब्दील होकर उड़ जाती है।

रात का धुंधलका गहराने लगा था।  छोटे से कस्बे से इस समय किसी भी सवारी गाड़ी के खुलने की अब कोई सम्भावना नहीं थी।

थोड़ी देर में जब उसने जरा होश संभाला तो देखा कि बच्चे भूख से बिलख रहे हैं।  छोटा वाला तो  एक दम अधमरा सा हो गया है।  वह रो भी नहीं पा रहा था एवं उसकी आँखें उलटने लगी थी।

सुनीता ने साहस करके होटल वाले से कहा “भैया एक रोटी दे दो बच्चे को खिलाना है”

“पैसे हैं?” होटल वाले ने पूछा

“पैसे तो नहीं है भैया” उसने कहा

पैसे नहीं हैं तो रोटी क्या मुफ्त में मिलती है?  चल भाग यहाँ से” होटल वाला घुड़का।

“बच्चा मर जायेगा भैया, रोटी दे दो।  बदले में तुम जो कहोगे मैं तुम्हारा काम कर दूंगी” उसने कहा

“अच्छा ! तो पहले काम कर दे फिर रोटी लेना” होटल वाले ने कहा उसकी ओर देखते हुए कहा

“क्या काम है भैया बोलो” उसने मुँह से मरियल सी आवाज निकली।

बच्चे को इधर चौकी पर रखो और अन्दर आओ।

होटल वाला उसे होटल के पीछे बने कमरे में ले गया जिसमे आटे की बोरियां और होटल में काम आने वाले अन्य सामान रखे थे। उसने उसे धकेल कर बोरे  पर गिरा दिया।  कई दिनों की भूखी सुनीता लाश की तरह बोरे से लुढ़क कर नीचे गिर गयी।

होटल वाले ने उसे उठाकर फिर से बोरे पर रखा । “ठीक से बैठ ससुरी । । । । ” होटल  वाला घुड़का

“क्या करना है भैया?” उसने मिमियाते हुए पूछा

“आरती उतारनी है तेरी।  टाइम मत ख़राब कर ।  रोटी चाहिए तो जल्दी कर नहीं तो भाग यहाँ से”

“ऐसा न करो भैया , कोई और काम करवा लो।  मैं जूठे बर्तन धो दूंगी। ” सुनीता ने गिड़गिड़ाते हुये कहा।

जूठे बर्तन धोने के लिए बहुत पड़े है यहाँ।  देख अभी दुकानदारी का टाइम है।  टाइम खराब मत कर।  आती  है तो बोल नहीं तो भाग यहाँ से।

सुनीता का बड़ा बच्चा जोर जोर से रोने लगा था, जिसकी आवाज उसे सुनायी दे रही थी।  वह विचलित हो उठी।

कोई माँ अपने बच्चों को भूखा मरने कैसे दे सकती है? चाहे इसके लिए उसे स्वयं कितनी भी बार मरना पड़े।

उसने आँखें बंद कर ली और अपना शरीर ढीला छोड़ दिया।

होटल वाला अपने काम में लग गया।  वह उसके मुँह को बुरी तरह भम्भोड़ने लगा।  उसके मुँह से तम्बाखू की भयानक बदबू आ रही थी।  वह तेजी से कुत्ते की भांति हिल रहा था और शीघ्र ही ठण्डा हो गया।  कमरे में कोई दरवाजा या परदे का कोई इंतजाम नहीं था।

सुनीता की आँखों में आंसू आ गए।  लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी थी कि उसके बच्चों के लिए एक रोटी का इंतजाम तो हो गया।

लेकिन भूखे को रोटी मिलना इतना आसान होता तो कोई बच्चा भूख से नहीं मरता।

अभी होटल वाला निबट ही रहा था कि कमरे में एक आदमी और आकर खड़ा हो गया।  वह किसी बस का खलासी था।

सुनीता ने अपने आँख के आंसू पोछे और कपड़े सँभालने लगी।  तभी खलासी ने आकर फिर से आटे की बोरी पर उसे पटक दिया।

“जाती कहाँ है साली, हम भी हैं”खलासी ने विद्रूप हँसी हँसते हुए कहा।

“भैया हमको जाने दो, हमारा बच्चा मर जाएगा। ”

सुनीता ने चिल्लाने की कोशिश की लेकिन उसकी आवाज़ गले में ही अटक गयी।

“भैया आपने तो कहा था कि आप रोटी दोगे, आपने जो कहा मैंने किया।  भैया अब रोटी दे दो। । ।  भैया।  मेरा बच्चा भूख से मर जायेगा।  आपका पैर पकड़ते हैं भैया। इतना निर्दयी मत बनो भैया” उसने होटल वाले से दया की भीख माँगते हुये कहा ।

उसकी आँखों के आगे धुंधलका छाने लगा था।  उसका गला सूख रहा था।

“चुप साली।  दे देगी तो घट जाएगा क्या? होटल वाले ने हँसते हुए कहा और खलासी को ईशारा कर दिया।

खलासी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा। सुनीता मृत देह की तरह पड़ी रही।  उसके देह से संवेदना ख़त्म हो गयी थी।  उसे कुछ भी अब महसूस नहीं हो रहा था।

शीघ्र ही यह खबर पूरे बस स्टैंड में फ़ैल गयी कि होटल में माल आया हुआ है।

रात गहराने के साथ बस स्टैंड में रात बिताने वाले ड्राईवर, खलासी और दलाल होटल के उस कमरे में आते रहे और निकलते रहे।  कुल मिलकर पंद्रह जानवरों ने उस रात उस लाश के साथ अपनी हवश पूरी की। बाहर दो निरीह बच्चे भूख से तड़प कर मर गए।

 

नीरज नीर / 04 .03 .2018

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *