हिस्टीरिया और हेल्थ पेपर्स

‘दुनिया डोल रही है, आकाश डोल रहा है, पृथ्वी अपनी धुरी से कुछ दूर छिटक गयी है शायद, एक तेज़ आंधी चल रही है समूचे ब्रह्माण्ड में, पेड़ पौधे उखड़ गए हैं, सारे ग्रह नक्षत्रों के, उल्का पात हो रहा है, उसी पर हो रहा है, माँ’….

पता नहीं, यह माँ शब्द वह पूरा उच्चरित कर पायी या नहीं, उस निःशब्द लम्बे वाक्य में जो दिमाग में किसी बुलेट ट्रेन सा चल गया था—जब दुबारा होश का धागा हाथ आया—शायद, इसी शब्द पर अँटकी थी, सारे रिश्तों के चटकने के बाद, पकड़े हुए उसी एक शब्द की डोर, झूल रही थी जाने किस अतल गह्वर में?! जबकि क्या यही शब्द उसे सबसे ज़्यादा धोखा दे रहा था? इसी एक शब्द की दुनिया में उसे लौट जाना था, वह क्यों नहीं लौट पा रही थी इस शब्द की सुरक्षा में?
शायद आधे घंटे बाथरूम के गीले फर्श पर बेहोश पड़ी रही, किसी ने सुध बुध ली?!
वैसे अच्छा ही हुआ, वर्ना,
“अभया” “अभया” …………….
ख़याल आया कि पुकार आयी, “घंटे से ऊपर हुआ, हराम ज़ादी बाथरूम में बंद है. पानी, बत्ती के बिल आसमान छू रहे हैं.” आवाज़ आने लगी थी, वह फूट फूट कर रोना चाहती थी, लेकिन आँखें बिल्कुल सूखी, मन में दूर दूर तक रेत थी, ह्रदय में जमती हुई बर्फ, बाथरूम के गीलेपन में वह ठिठुर रही थी. रिश्तों की रुखाई से छिली हुई, ज़िंदगी तार तार थी. और माँ, माँ जब भी फ़ोन पर आती, कहती एडजस्ट करो. हमारे गांव में विदेश से लौटी बेटियां नहीं रखी जातीं। ससुराल से निकाली बेटियां किसी काम की नहीं। वही सदियों पुरानी बात, घड़ी की सुई रुक क्यों गयी है?
अभया को लगता है, किसी बड़ी लोहे या प्लास्टिक की घड़ी के डायल से उसे बाँध दिया गया है, जो ख़राब हो गयी है. उसकी सेकंड की सुई भी अभया को हाथ लगाकर ही नहीं चलानी पड़ती, पूरे दम से, हर काँटे से लटककर चलानी पड़ती है. किसी तरह वह बाथरूम में पंजों के बल उठती है, घुटने बुरी तरह जख्मी हो गए हैं. टखने इस तरह मुड़ गए हैं कि कभी सीधे होँगेँ या नहीं, पता नहीं। कुदरत का कोई करिश्मा है कि दीवार के सहारे, किसी तरह हर चीज़ को पकड़ती हुई वह बिस्तर पर आ बैठी है. और यह तो आज की बात है, वही जानती है वह हर दिन, हर रोज़ कैसे उठती है इस बिस्तर से, कैसे यहाँ लौटती है? ६ महीने से चल रहा है, साथ सोने का नाटक!
जैसी थी, कोरी कच्ची, वैसी ही रही. कागज़ सी डोलती हुई, उड़ जाए ज़रा सी पुरवाई में! काग़ज़ी बादाम, पुकारा जाता था उसे गांव भर में, जाने क्या भुतैली हवाएं चलती थीं यहाँ, खिड़कियां हमेशा बंद, बातें भी सब बंद, सारी आग, सारा तूफ़ान, कैद अपने भीतर! गुलमोहर अमलतास दोनों जल कर ख़ाक हो गए. राख हो गया , हर एक फूल आत्मा का, पर ये आदमी टस से मस न हुआ! आखिर कमी क्या थी उसमें? कमी उसमें थी, नामर्द कहीं का. क्या वह समलैंगिक था, क्या वह किसी और औरत के प्रेम में था? आखिर, कुछ तो कहता! गोरों की पार्टी में धुत्त रहना, गोरों की जी हुज़ूरी में व्यस्त रहना, गोरी मेमों के साथ मस्त रहना, ये यहाँ की आम समस्या है. लेकिन शादियां चलती हैं, ज़िन्दगी आगे बढ़ती है. ऐसा घटाटोप तो कहीं नहीं होता! कितनी कोशिश की है, हाल हाल तक उसने, कि कुछ तो बात हो, पर कितनी बेरुखी!
और वह है कि पूर्णतः वशीभूत है उसके! क्या ऐसा ही है? क्या जीवन जीने की उत्कट लालसा, घर बसाने की, प्रेम की अभिलाषा उसके आत्म सम्मान से बड़ी है? अभी कल ही उसने दूध का ग्लास पकड़ाया, तो हाथ छू सा गया. शंकर ने गहरी नज़रों से देखकर अपनी दृष्टि फेर ली. लेकिन अभया की उँगलियों में छुवन रह गयी. फिर वह उँगलियों से चलकर छाती तक पहुंची, और कबूतर बनकर उसके सीने में धड़कने लगी. हवाएं चलती रहीं रात भर, फूल झड़ते रहे, खुशबू बिखरती रही किसी जंगल में, वह करवट बदलती रही. कौन सा पक्षी बोला नहीं उस रात, वह आवाज़ों के दलदल में डूबती उतरती रही.
कभी पाँव छू गया अचानक, और झुरझुरी दौड़ गयी बदन में सारे, बजती रही बनकर और बनाकर, उसकी समूची देह का तानपुरा। एक साथ कितने ही वाद्य बज उठे और बजते ही रहे उसके भीतर कई कई रात लगातार। संगीत की एक सिम्फनी में वह विचरती रही, एक भटकती हिरणी सी, जिसकी कुलांचें बाँध दी गयी थीं. जब अचानक उस सितार के तार कसे जाते, जिसमें वह खुद को दिन में भी तब्दील किये रखती, तो लगता घुँघरू की तरह टूट कर बिखर जायेगी। कर्कश आवाज़ें फैलतीं, दिल कांच सा टुकड़े टुकड़े होता, ग़ायब हो जाता संगीत का सारा छलावा। वह औंधे मुँह बर्फीली किसी झील पर गिरती, दुनिया चकनाचूर हो जाती।
“हद हो गयी, सुबह से लगी है, एक सब्ज़ी दाल नहीं पकी! आज तक ढंग का कुछ नहीं बनाया इस लड़की ने, न एक दिन दाल परफेक्ट सिद्ध, न सब्ज़ी में जायका। डिम्पी ने तो खाना खाके कह दिया उस दिन, मज़ा नहीं आया मम्मी, आजकल बिल्कुल मज़ा नहीं आता खाने में! पता नहीं क्या कर रही है नासपिटी!” अपनी आयी हुई दोस्त के बहाने ऊँचा बोलती सास की आवाज़ पिघलते लावे सी उसके कानो में पड़ी, और आँसू की दो गर्म मोती सी बूँदें धनिया की पत्ती काटती अभया की हथेली पर टपक पड़ीं! ताज़े बने छोले के ऊपर डाली जाती, बारीक धनिया की कतरन की सारी खुशबू उड़ गयी. प्याज की झाँस अब भी थी आँखों में, पूरा परनाला बह चला. चने मसाले के साथ-साथ ताज़े पिसे गरम मसाले की चटक गंध थी, अब भी अभया की नाक में, शायद रसोई में भी थी, आँखों की नदी तो रुके ही न!
“अरे मेरी सोनकली, मेरी मक्खन की डली”, अम्मा उसकी रोटी पे ताज़े मक्खन का टुकड़ा डालती कहती! लस्सी का ग्लास पकड़ाया जाता उसे सुबह, दूध का शाम. खूब विचरती वह अपनी किताबें छोड़कर खेतों में, मेमने सी उछलती कूदती, तोड़ लाती पसंद की सब्ज़ियां, ढेरों फरमाइशें करती, कभी कुछ प्रयोग भी कर लेती चूल्हे पर! लेकिन क्या स्वाद था, नकचढ़ी बिटिया की उँगलियों में! उसके पिता को उसकी आँखों में सारा आसमान दिखता था, इसलिए ये विदेशी परिवार ढूँढा उन्होंने। वर्ना, मीलों तक फैली उनके खेतों की हरियाली के गीत में अप्सरा सी तिरती रहती थी उनकी बेटी!
नाक सुर्ख लाल थी, जब प्लेटें लगाई उसने। शायद उसके रुआंसे चेहरे को देखकर ज़्यादा चीड़ फाड़ नहीं हुई स्वाद बेस्वाद की, बहुत सी मीमांसा कांटे चम्मच के शोर में दबाकर रोक दी गयी. ‘ठीक ही बना है छोले तो, उसने पहले कौर को चबाते हुए सोचा था, बैंगन भरता भी ठीक, उसने भून कर मटर डाले थे, वह कुछ पनीर के बारे में सोचने जा रही थी कि अचानक अम्मा की आवाज़ सुनाई दी, अम्मा यानि माँ, हाँ उसकी माँ यहाँ, दूर खड़ी कहती हुई, सुबह से कुछ भी नहीं खाया तुमने, जब से आयी हो, हर रात किसी मशीन की तरह उसके लिए दूध का ग्लास ले जाती हो, कम से कम आधा ग्लास खुद पी लिया होता सुबह सवेरे, और अम्मा उसकी ओर ग्लास बढ़ा रहीं थीं, कि उसने पकड़ लिया था कि पकड़ छूट गयी थी, कि कैसे गिरा झन्न से गिलास, और दूध बिखरने की जगह कालिमा बिखर गयी, दूर दूर तक घना, घटाटोप अँधेरा………………….
“अरे रे SSSSSS” सास की आवाज़ चीख में बदल गयी थी………”.ये क्या हुआ? परेशान कर दिया इस लड़की ने! जब से आयी है, रोज़ कोई न कोई हंगामा। ज़िन्दगी बखेड़ा बन गयी. 911 बुलाओ”…….. “पहले नहीं बोले थे दीदी जी कि हमरा लत्ता के कनिया न चाही”, बिहारी काम वाली भी अपना कानून छांट रही थी,
जब अभया को होश आया कोई रहमदिल आवाज़ में उसके हाल पूछ रहा था, “हेलो”! एक भूरे बालों वाले गोरे डॉक्टर ने उसकी एक कलाई थाम रखी थी, नब्ज़ शायद वह ले चुका था या ले रहा था एक बार फिर. उसकी पेशानी पर एक मोटी सी गोरी नर्स की हथेली थी. दूसरे हाथ में, एक हल्की सी चुभन थी, या दर्द सा था. “आपका आयरन और हीमोग्लोबिन दोनों बहुत कम था, इसलिए हमने आपको इनफ्यूज़न की ड्रिप चढ़ा रखी है. आप आराम करें, कुछ खाएं पिएं. आप मेरी बात समझ रही हैं न?” डॉक्टर ने हल्की मुस्कराहट के साथ विदा ले ली थी. उसने अभया को अस्पताल में भर्ती कर लिया था.
ड्रिप लगे रहने तक नर्स ने कहा था वह साथ बनी रहेगी। यह पहली बार था कि अभया की हथेलियों के ऊपर सुई लगी थी, तो लगी ही थी, उसमें एक नली भी लगी थी, और उससे होकर खून से गहरे रंग का एक द्रव्य उसकी शिराओं, धमनियों में पहुंचाया जा रहा था. डॉक्टर का कहना था, आयरन इम्मेडिएटली अप करना था! इन्फ़्युज़न में कुल चार घंटे लगने थे. नर्स ने अभया को बताया था कि ड्रिप एक चक्के वाली रॉड अथवा स्टैंड से लगी है, जिसे बाथरूम में साथ ले जाया जा सकता है. यानि वह फ्रेश हो ले, तो उसके लिए टी टाइम वाले स्नैक्स मँगा दिए जाए!
शाम के पांच बज रहे थे. स्ट्रॉ लगाकर कागज़ के डब्बे से ऑरेंज जूस पीती, और पाइप लगे दोनों हाथों से चुकंदर वाला वेजिटेबल बर्गर खाते हुए अभया को बड़ा सुकून मिल रहा था. अमूमन क्या, शायद उसने आजतक दोनों हाथों से नहीं खाया था! लेकिन जब हाथों पर सलाइयां चढ़ जाए, त्वचा पर पेबंद लग जाए, कोई कैसे खाये? लेकिन, आज वह बिल्कुल उदास नहीं होगी, घर वाले उसे पूछे न पूछे! घरवाला जाए जहाँ जाना हो! ज़रूर, कहीं जाता ही होगा!
वरना, ऐसी क्या बेरुखी?! किसी दिन मजाल है कि उसने पलटकर पूछा हो कि तुम्हारा दूध वाला ग्लास कहाँ है? ओह! और वह भी कैसी नादान, बेवकूफ, खाना पीना तक छोड़ दिया इस आदमी के चक्कर में! पूरे कुनबे को बनाकर खिलाती रही, कभी ये मित्र सास की, कभी वो मित्र! लगता है, वर्षों की बची हुई दोस्ती यारी अब ही निभायी जा रही थी. मुफ्त की नौकरानी मिल गयी थी! इधर सास की किटी पार्टी उधर बेटे की रंडीबाज़ी! और नहीं तो क्या? गांव जैसे मोटे, मोटे, काले, काले बादल उमड़ आये अभया की आँखों में! लेकिन उसने भी ठान लिया कि टपकने न देगी! गोद में प्लास्टिक की थाली में उबले मटर थे, गाजर के चौकोर कटे टुकड़े, मकई के दाने! एक प्लास्टिक की चम्मच भी उसका इंतज़ार कर रही थी. चाय में डालने को डेयरी क्रीमर का पैकेट था, जिसे दोनों हाथों से थामे, वह बड़ी देर तक सुड़कती रही थी. चीनी उसने आज भी नहीं ली थी. ड्रिप खत्म होने होने को थी, कि एक नया पैकेट लगा दिया गया था . घंटे और लगेंगे, जब एक बार सुई चुभोई गयी थी, तब कम से कम २ पाउच आयरन भीतर करना था, एहि हुकुम था डॉक्टर का. नर्स तब तक कई बार अंदर बाहर कर चुकी थी. अभया अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दे पायी थी कि क्या वह मील्स स्किप करती रही है? लेकिन, सवाल शायद उसने कुछ कुछ समझा था. वह क्या बताती, बचे खुचे के अकेले निवाले का हिसाब? क्या आज तक उसके घर वाले ने उसके साथ बैठकर खाना खाया? घरवालों ने भी कभी कहा, बहु, तुम हमारे साथ बैठकर खाओ? ऐसी बहु के सब ऊपर सब ज़िम्मेदारी डालने की कथा तो उसने गांव तक में नहीं देखी थी. सुबह शाम इंतज़ार करो, घर भर का खाना ख़त्म होने का!
आख़िरकार, ड्रिप भी खत्म हुई थी. जाते-जाते नर्स ने कहा था, वह डिनर लगे हाथ भिजवाएगी. खाते खाते ही वह उनींदी हो उठी थी. थक गयी थी इतना कुछ पचाते पचाते! आखिर क्या क्या हजम करे देह? दवा दौड़ रही थी नसों में, लेकिन मन आकुल व्याकुल। क्यों? आखिर क्यों ग्राह्य नहीं थी वह? क्या वह त्याज्य थी? अस्पताल के तकिये में उसने अपना सर छिपा लिया था. जब से कनाडा आयी थी, पहली रात थी बिना पति के सानिध्य के. पहली अकेली रात कितनी सुखद थी, कितनी शांति पूर्ण। बेदम कर दिया था साथ सोने के नाटक ने उसे. अस्पताल की एक पूरी चौकी खाट थी उसके लिए, उसकी अपनी चादर। वह अलग थी उससे, किसी को ये बताना समझाना उसकी ज़िम्मेदारी नहीं थी कि किस किस्म की दूरी बनी हुई थी पति के साथ, महीनो के साथ में! वह कहती तो कैसे कहती? लेकिन, अब वह अस्पताल में थी, कहीं कुछ बहुत गड़बड़ था, और उसे बताना अकेले उसकी ज़िम्मेदारी नहीं! अस्पताल की सफ़ेद चादर में लिपट कर वह आश्वस्ति की नींद सोने जा रही थी.
बाहर कहीं वसंत की आहट थी, और कहीं नहीं तो पेड़ों की कोपलों में! हवा की कनकनी लगभग खत्म थी. सड़क किनारे ट्यूलिप्स और डैफ़ोडिल्स के जंगल उग रहे थे. एक दिन, वह टहलने चली गयी थी तो बवाल मच गया था. सास की शाम की चाय छूट गयी, मोहल्ले के देवर के पकौड़े छूट गए. ससुर की पगड़ी ढ़ीली हो गयी. मोहल्ले की सारी गाड़ियां पीछे हो लीं. वाकिंग ट्रैक उसे मिला नहीं था, सड़क किनारे टहल कर लौटी तो जैसे शहर भर के भारतीय समाज की नाक कटा कर! मुस्कुरा दी आधी अस्पताली नींद में अभया। लेकिन, सच था, उसके बाद फिर ट्यूलिप्स और डैफोडिल्स किनारे चलना नहीं हो पाया। बहु ज़रा ये, बहु ज़रा वो! उसे लगा जैसे चलते चलते, पाँव तले की घास रेत में तब्दील हो गयी है. और अचानक आसमान का सूरज, रेगिस्तान का सूरज हो कर तपने लगा है. डैफ़ोडिल्स और ट्यूलिप्स दहक रहे हैं, रेतीली ज़मीन धधक रही है. तप रहा है सबकुछ आस पास, हवा उबल रही है. और अचानक दूर कहीं, शोर उठता है, भयानक सा. वह कहाँ जा रही है? हड़बड़ा कर वह अस्पताल के बिस्तर में उठ बैठती है. यह शोर यहीं कहीं से आ रहा है. शायद बाहर, यहीं कमरे के बाहर से! कमरे में २ और मरीज़ सो रहे हैं, अभया घबराहट में बाहर चली आती है. बाहर डाइनिंग हॉल, लिविंग रूम सा है, दीवार पर टंगी घड़ी में, रात के बारह बज रहे हैं. उसी की तरह, सलवार कमीज में कोई मरीज़ा है, लगातार कुछ बोलती हुई, जो लगभग प्रलाप सा सुनाई दे रहा है, हॉस्पिटल के दो मेल नर्स उसे दोनों ओर से पकड़े हैं. उसे आश्वस्त किया जा रहा है, बैठने को कहा जा रहा है, पर वह है कि बैठने को तैयार नहीं, अस्पताल से भाग जाना चाहती है. उसे सिडेट करने के लिए इंजेक्शन की तैयारी की जा रही है. उसे वापस उसी मेन्टल वार्ड में ले जाना होगा! जबकि १० दिन दवाओं से मुक्त पूरी तरह ठीक होने पर, उसे उस वार्ड से जनरल वार्ड में लाया गया है. लेकिन, यह पहले भी हो चुका है, उस वार्ड से निकलते ही उसकी तबियत ख़राब हो जाती है. उसके चले जाने के बाद भी, मरीज़ काफी देर तक उसके बारे में बातें करते रहे. वह पति त्यक्ता है. जबकि, उसका मायका भी इसी शहर में है, लेकिन वह कभी इस मेन्टल वार्ड से निकल ही नहीं पाती। वहां रहते, रहते ठीक होती है, डॉक्टर रिलीज़ सर्टिफिकेट देते हैं, लेकिन उस चहरदीवारी से निकलते ही, पूरा सेट बैक. वही दीवारें, उसे अब घर लगती हैं.
कमरे में लौटकर अभया निढाल होकर बिस्तर पर पड़ रहती है. अगर कल उसके घरवाले, यानि ससुराल वाले नहीं आये तो? वह सोचना चाहती है, लेकिन मौका नहीं मिलता। कमरे के बाकी दो मरीज़ एक और ख़ुफ़िया कहानी पर बातें कर रहे हैं. कुछ उसे सुना कर ऊँचा भी, लेकिन तेज़ अंग्रेजी में. किसी तरह, कथा का मूल सार वह पकड़ लेती है, पर उसे विश्वास नहीं होता! हॉस्पिटल भुतहा है. और वह भी एक अन्य भारतीय महिला का ही भुतहा! उसका पति बेरहमी से पीटता था उसे, वह किसी तरह पुलिस बुलाकर अस्पताल पहुँचती थी, और ठीक होने पर दुबारा पिट कर भयानक चोटों और निर्लज्ज घावों के साथ वापस आ जाती थी. हॉस्पिटल वाले क्या करते, उन्हें रिहाई देनी होती थी. पति उसकी रिहाई को आतुर होता था. एक आध बार पुलिस में शिकायत भी करवाई गयी, पर कैसे न कैसे वह हमेशा बच जाता था, ये साबित करने में सफल कि चोटें सेल्फ इन्फ़्लीक्टेड हैं. वह जब भी पीटता दस्ताने पहन कर! इस तरह, उसने महिला को सुसाइडल घोषित करवा दिया, दमघोंटू इल्ज़ामों और खतरों से लाद दिया। यानि जब वह उसे पीटता, दस्ताने पहन कर ब्लेड या किसी अन्य नुकीली चीज़ से उसके वक्षों और जाँघों पर आक्रमण करता, उन्हें चीरता। कोतवाली में, अदालत में उसकी यारी थी, हमेशा बच निकलता। आखिरी बार, ऐसे जघन्य आक्रमण से उबर कर ठीक होकर जब उस महिला को घर लौटने के लिए बाध्य किया जा रहा था, उसने इसी अस्पताल क्या, इसी कमरे के बाथरूम में फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली.
कहानी सुनकर अभया की सुधरती हुई तबियत पुनः बिगड़ गयी. वह पहली रात जो वह अस्पताल के बिस्तर में सुरक्षित बिताना चाहती थी, एक भयानक दुःस्वप्न में तब्दील हो चुकी थी. सारी रात बिस्तर में जगी रहने के बाद, उसने पाया कि सर दर्द से फट रहा था. सुबह सुबह जितनी जल्दी लोगों से कथा की पुष्टि कर सकती थी, अभया ने की. कहानी सच्ची थी, लेकिन भूत का कोई प्रमाण नहीं होता। ये मरीज़ों ने कहा, हॉस्पिटल स्टाफ ने भुतहा इलज़ाम को बिल्कुल ग़लत बताया। लेकिन नाश्ते के बाद, इस किस्म के चक्कर आने लगे, जो आयरन इंफ्यूशन से पहले भी नहीं आते थे! बाथरूम में दो बार गिरते गिरते बचने के बाद, आखिर तीसरी बार, वह अचेत होकर गिर ही पड़ी थी. कमरे की बाकी दो महिलाओं ने स्टाफ को फ़ौरन बुलाया था, जिन्होंने उसे वहां से उठा कर वापस बिस्तर पर लिटाया। किन्तु मूर्छा कठिनाई से ही टूटी, और बढे हुए आयरन के बावजूद ऐसी मूर्छा का कारण जानने के लिए, कई किस्मों की मशीनो से तार उसकी देह से चिपका दिए गए. डॉक्टर भी एक साथ कई आ गए थे. कल शाम से अस्पताल में काफी नाटक हो गया लगता था.
“लगता है, आयरन का रिएक्शन हो गया है”, एक डॉक्टर कह रहा था, दूसरा पूछ रहा था, “कहीं इन्हें मिर्गी या हिस्टीरिया तो नहीं?”
“एपिलेप्सी या मिर्गी की कोई फैमिली हिस्ट्री नहीं, और यह मिर्गी नहीं, लेकिन क्या मिर्गी से मिलते जुलते कुछ इलेक्ट्रिक ब्रेन सीज़र्स? लेकिन न दाँतों का किटकिटाना है, न उस तरह से भयानक कांपना!”

“हिस्टीरिया, अन कंट्रोलबल इमोशन्स, फ्रेंज़ी, वाइल्डनेस, अन गवरनेबल इमोशनल एक्सेस”, हज़ार मेडिकल टर्म्स हवा में उछाले जाने लगे, कुछ डॉक्टर्स इंजेक्शन भी देना चाहते थे,लेकिन सेफ नहीं था, मूर्छा आ और जा रही थी, बेहोशी टूटती और फिर छा जाती थी, अभया पर झुकी हुई डॉक्टरों की टीम परेशान थी, कुछ ने मेडिकल साइंस की किताबें भी निकाल ली थीं और पूरे मनोयोग से उसके पन्ने ऐसे फड़फड़ा रहे थे, जैसे उसके पन्ने किसी तूफ़ान में खुले छूट गए हों! इनमें से कई जूनियर डॉक्टर्स थे, जो एक खूबसूरत सी मूर्छित देह के आगे, पसीने पसीने हो रहे थे. जांच के लिए, उठ बैठने के उपक्रम में अभया की लता सी देह एक आध बार उनकी बाहों में लहरा भी चुकी थी. आधी बेहोशी में, खुलती बंद होती आँखों में कुछ भी रूमानी नहीं था. आस पास एक घबराहट थी, जो कभी भी एक दहशत में बदल सकती थी.
“हालाकि इस शब्द को साइकीयात्रि और न्यूरोलॉजी दोनों से निकालने की बातें हो रही हैं, ‘सोमटाइज़ेशन डिसऑर्डर’ कह रहे हैं इसे, और ८० में ही अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन ने इसके सबसे विकराल रूप के लिए नाम चुना है, ‘कन्वरज़न डिसऑर्डर’ —-बहरहाल, सचमुच कुछ किताबों में देखो, मेल और फीमेल सिम्पटम्स कारण और डायग्नोसिस, कुछ फेमिनिस्ट थेओरीज़ भी देखो, आस्क द नर्स टू रब हर फ़ीट, वेक हर अप, गिव हर सम ऑरेंज जूस, उससे भी पहले, ग्लूकोज़ चढ़ाओ’ इम्मेडिएटली”—–जेनेरल फिज़ीशियन्स के साथ साथ साइकियाट्रिक वार्ड के हेड की भी यही राय थी.
“ये, हम सब जानते हैं, कि ‘हिस्टीरिया’ शब्द ग्रीक के यूटेरस शब्द से बना है—-प्लीज गेट ए पैप टेस्ट डन, गेट हर रेडी फॉर ऐन अल्ट्रा साउंड’—-और इनकी केस हिस्ट्री पता कीजिये, प्लीज् फाइंड आउट अबाउट हर मैरिटल लाइफ, सेक्सुअल लाइफ, सेक्सुअल हैबिट्स, ड़िज़ायर्स टू ‘—-पूरा ब्लड टेस्ट करो, थाइरोइड एस्ट्रोजेन, इ टी सी……”
“आल्सो फाइंड आउट फॉर सम रीसेंट शॉक्स, एंड प्रोलोंगड ट्रॉमा एक्सपीरियंस, हार्ट ब्रेक्स”, तमाम तरह के उपचारों, कुछ माइल्ड साइकिएट्रिक दवाओं और ग्लूकोस इत्यादि के बाद, बेहोशी की मौजूदा स्थिति संभाल में थी. लेकिन, लम्बी तहकीकात होनी थी. डॉक्टरों का जो भी कहना हो, मरीज़ों का कहना था कि अभया पर उस आत्म हत्या वाली महिला का भूत आ गया था. वह अस्पताल में इधर उधर भटकता था, और तमाम तरह की महिलाओं को, और कभी कभी पुरुषों को भी धर दबोचता था. फिर सारे वार्ड के सारे मरीज़ एक होकर, उस दिवंगत आत्मा के लिए एक स्वर में प्रार्थना सभा की मांग करते थे. डॉक्टरों का कहना था कि ये उनका उस मरीज़ा को याद करने का एक तरीका था. लेकिन, समस्या तब होती थी, जब वे इस कहानी का उपयोग एक दूसरे को डराने के लिए करते थे. बहरहाल, अभया आई सी यू में भर्ती थी, अकेला कमरा, और भूत के किसी किस्से को उस तक नहीं पहुँचना था. हालत में सुधार था. और उसके घर वालों के साथ ससुराल वालों की इस तरह फो ना फ़ानी हुई थी, कि लगता था समुद्र पर के सारे तार टूट गए हों. आखिर कार, ससुर जी ने नंबर मिलाया था, लड़की अगर मर गयी, तो हमपर मर्डर केस के साथ और कौन सा मुकदमा करेंगे बताना! अभया के माँ बाप आनन फानन में कनाडा पहुंचे थे, अभया के सगे और दूर दराज़ के भाइयों को लेकर। पता चला था कि लड़का अपनी गाड़ी का शोरूम खोलने से पहले, कार मैकेनिक था, और जितनी गाड़ियां उसने ठीक नहीं की होंगी, उससे ज़्यादा लड़किओं की ‘हार्ड ड्राइव की मरम्मत’ में उसकी दिलचस्पी थी. ये एक कैनेडियन स्लैंग था, जिसमें चुम्मा चाटी के साथ साथ जाने और क्या क्या गुर शामिल थे, पता करना बाकी था.
बाबू साहब हज़ार गोरी मेमों के साथ सो चुके थे, लाखों को टहला चुके थे. कुछ से बहुत मन मुटाव के बाद ब्रेक अप हुआ था, कहीं कहीं लड़की, दमड़ी, दारु के चक्कर में मारा पीटी भी हुई थी. गोरी तो गोरी, कितनी देशी लड़कियां, क्या क्या गुल नहीं खिला चुकी थीं, अपने बाबू के साथ. गाडी में, दोपहरी में, सुनसान घास के मैदानों पर, कभी कोट, कभी ब्लेजर, कभी डेनिम के जैकेट से अपना चेहरा साथ साथ ढ़के कई दोपहरें, बड़ी बेतक्कलुफी में खूबसूरत ग़ुज़री थीं. उन सबको साहब ज़ादे ने छोड़ दिया था. एक अजब संक्रमण काल था, लोग न देशी रहे थे, न विदेशी। लड़के कुंठित, इश्क बाज़ी क्या, भड़वा गिरी करते फिरते, अच्छी खासी लड़कियों को जैसे कोठे पे बिठा दें. इधर हिंदुस्तानी पंचायतें कुछ लड़कियों को रुस्वा कर रही थीं, उधर वह समाज बिखर रहा था, जो इश्क़ फरमाने वाले व्यक्ति को सज़ाए शादी का हुक्म दे दिया करता था. सारे मजनुओं को सात फेरों में बांध कर समाज अपनी स्थापना करता था. लेकिन, अब मनमानी और मनमौजी के दौर में, अगर आपको लगता हो कि प्रेम बेज़ार हो रहा था, तो शादियों की बर्बादी देखते बनती थी. ऐसे ही आवारा से किसी मौसम में, जो सबसे ज़्यादा अपनी प्रेमिका के लिए, सोने की चूड़ी खरीदने का मौसम होने को उतारू था, साहब ज़ादे के पिता जी ने पंजाब के गावों से आ रहे रिश्तों में से एक का ज़िक्र किया था ख़ास तौर से. और तस्वीर आगे बढ़ा दी थी. सादे से छींट के सलवार कुर्ते में, अभया के गाल टमाटर से लाल हो रहे थे. हिंदुस्तान की खिली हुई धूप उसकी आँखों से लेकर समूचे चेहरे पर फैली हुई थी. होठों के कोरों पर गुलाब की मिठास झलक रही थी. नैन नक्श कच्ची मूली की छीमी का तीखापन लिए. हिंदुस्तानी बयार और देसी बहार, खेत और पहाड़, झील और पुकार, सब कैद थे उस तस्वीर में. साहब जादे एक बार देस गए तो थे, लेकिन छोरियों को एहतियात पूर्वक दूर रखा गया था. पिता के आग्रह, मौसम के जादू से भी ज़्यादा लाड़ले साहब का मूड था, जिसने शादी के लिए हां भरी थी. वैसे जल्दी निर्णय तो और लोग भी लेते हैं, हर कोई दुनिया का हर संभव हिसाब कर के निर्णय नहीं लेता। लेकिन लोग झोंक में की हुई शादियां निभाते हैं, आवेग के एक क्षण का सदियों निर्वाह करते हैं. यानि लोग पल भर में अगर ज़िम्मेदारियाँ उठाते हैं, तो बीच राह उतार नहीं देते।
लेकिन बाबू साहब को अब तलाक चाहिए था. लाल गोटे के लहंगे में जो परी सी हस्ती घर आयी थी, वह अब एक मैली कुचैली बासी जज़्बातों की पोटली बन चुकी थी. ये पता करना कुछ मुश्किल जान पड़ रहा था कि दोनों के बीच कोई प्रेम संबंध बना था या नहीं। लड़की के पिता शादी अनल करवाना चाहते थे, रद्द, यानी जैसे कि कभी हुई ही न हो! वे अवाक थे कि चाण्डालों के इस घर में इन ५ लम्बे महीनो में किसी ने उनकी बेटी की खोज खबर नहीं ली! बाबू साहब को चुप चाप उसकी बगल में सोना, उसकी उठती गिरती साँसों का आनंद उठाना, उसकी टिकली बिंदी से हुलसना अच्छा लगता, उसे कुछ तरसाना भी, तड़पाना। बाबूसाहब दर असल भरे पेट होते, रोज़ किसी नई मेम की देह में मुंह मार आते, लौटकर बीवी का दिया दूध गटकते और सो जाते। उस की प्रतीक्षा, उसकी खामोशी उन्हें एक अजब सुकून से भर ती ज़रूर, किन्तु उसे नकार देने में उन्हें अधिक तृप्ति मिलती। उसकी भूख उन्हें भरे पेट पर और भूख देती, और जीजिविषा। उन्होंने बहुत सी स्त्रियों का साथ जिया था, अनेकों के साथ सम्भोग, सहवास किया था, किन्तु किसी स्त्री के जीवन को नियंत्रित करने का यह पहला मौका था.
वैसे वे खुद उहा पोह में थे कि वे उसे नियंत्रित करना चाहते भी थे या नहीं। उन्हें ये कभी पता नहीं होता था कि दरअसल, वे चाहते क्या थे. यों कहें, कि सात फेरे लेते लेते ही वे कुछ उससे उकता गए थे. वह सम्पूर्ण भक्ति जिसके साथ, इस कन्या का २२ वर्षीय जीवन शादी को समर्पित था, उसी की तैयारी में बीता था, उन्हें खीझा रही थी. फेरों से पहले हल्दी थी, तमाम किस्म की पूजाएं, बीच में कभी चाँद भी देखा गया था, संगीत की नदी बह रही थी, और ऐसे वाद्यों पर जिन्हें शायद वह पहली बार सुन रहे थे! अगर उन्होंने ढोलक का बजाया जाना सुना भी हो, तो उन बड़े बूढ़े हाथों की थाप अनोखी थी. एक विदेशी शादी में शरीक होने, एक समूचा गांव, क़स्बा, शहर उमडा आया था. मिठाइया ज़रूरत से ज़्यादा मीठी थी, लोग हद से ज़्यादा बातूनी, दुल्हन इतनी शर्मीली लजीली थी, कि फूलों की सेज पर गठरी बनी बैठी, सर उठाने का भी उपक्रम नहीं कर पा रही थी. और वह भी उससे बात तक नहीं कर पा रहा था. किसी ईमानदार शादी में भी ऐसा हो सकता था. हज़ार बातों की एक दीवार खड़ी हो जाती थी शादी की पहली रात, फिर दूल्हा दुल्हन उसकी ईंट ईंट बजा कर प्रेम करते थे. लेकिन बाबूसाहब ने दीवार को और ऊँचा, और पुख्ता होते रहने दिया। मुमकिन है, अगर दुल्हन पहल करती………. यानि कि जो कुछ भी वह नहीं थी, उन्हें वैसी ही चाहिए थी. वे ढूंढ ढूंढ कर उनमें ग़लतियाँ निकाल रहे थे, वे उसे ऐसे आज़मा रहे थे जैसे अब भी देख सुन कर पसंद ही कर रहे हों.
अभया के पिता की इच्छा हो रही थी लड़के को एक दमदार तमाचा मारने की, और इतना उन्होंने कह भी दिया था. लड़के के सात पुश्तों को गालियां देने के बाद, उन्होंने घोषणा की थी, “मैं अपनी बेटी को अपने साथ लेकर जा रहा हूँ. आप ये मान लें, वह कभी आपकी पत्नी नहीं थी, ये शादी हुई ही नहीं, मान लें, और मेरी ज़िन्दगी भर की जमा पूँजी डूब गयी”. विकट संग्राम था, चीख चिल्लाहट के बीच कईओं का गला बार बार भर आता था. लेकिन, जब सब बोलकर चुप हुए तो अभया के निर्णय ने सबको अवाक कर दिया था. वह तलाक के काग़ज़ पर तब तक साइन नहीं करेगी, जब तक उसे कैनेडियन नागरिकता नहीं मिलती, बल्कि कैनेडियन पासपोर्ट। और उस व्यक्ति को, जिससे सम्बन्ध विच्छेद होने वाला था, उसके रहने-खाने की पूरी व्यवस्था करनी होगी, एक अलग आवास का इंतज़ाम करना होगा। तमाम लोग भौचक थे, बस अभया बिल्कुल शांत और अडिग।
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परिचय – पत्र-पत्रिकाअो के अलावा कई काव्य संग्रह प्रकाशित. निरंतर लेखन. सामयिक लेखन में विशेष पहचान. संपर्क : A-204, Prakriti Apartments, Sector 6, Plot no 26, Dwarka, New Delhi 110075
मो. 9968186375, ईमेल—-nilirag18@gmail.com

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