ऋण बद्ध       
         – सुमति सक्सेना लाल                                                                 
   पापा को गए एक साल पूरा होने वाला है। परसों उनका श्राद्ध है। पडिंतजी बैठे हुए हैं-परसों की पूजा के सामान की और सारे कर्म काण्डों की लिस्ट लिखा रहे हैं। छवि बड़े भक्ति भाव से हर चीज़ नोट करती जा रही है। मॉ बैठी बीच-बीच में अपने सुझाव, अपनी टिप्पणी देती जा रही हैं। मेरी इन सबके बीच में कोई भूमिका नहीं है, बस बैठा हूँ। इतने आयोजन के साथ दसवॉ तेरहवीं श्राद्ध करना , इस सदंर्भ में लोगों का आना जाना,बाहर से कुक की व्यवस्था, बर्तन क्राकरी का जुटाया जाना, लेना देना, खर्चा-जैसे कोई फंक्शन हो। मुझे हमेशा अजीब लगता है।
    एक अजीब सा ख़ालीपन लगता है। एक बार छवि से इस बारे में बात की थी तो आश्चर्य से उसने अपनी बड़ी बड़ी आखें फैला कर और बड़ी कर ली थीं,‘‘अरे अजीब बात करते हो। सभी तो करते हैं। फिर मॉ का फेथ है इस सब में । मान लिया पापा तक नहीं पहुंचेगा, ठीक है। पर सोचो हमारे ऐसा करने से मॉ को कितनी तसल्ली मिलती है।’’
    मैं चुप हो जाता हूँ। सोचता हॅू मॉ सच में भाग्यवान हैं जो छवि जैसी बहू मिली है। मॉ की तसल्ली और उनकी खुशी के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती है। कहती है ‘‘यह हम लोगों का ‘पे बैक’ टाइम है। हम जब बच्चे थे तब हमारे माता पिता ने हमारे लिए किया था। अब वे बूढे हैं तो हमें करना है। अपने मम्मी पापा के लिए भी ऐसे ही करती है। जितना उनके लिए करती है उतना ही मेरी मॉ के लिए। सोचता हूँ सम्बन्धों का यह गणित है तो सही-पर सही सही लगाया जा सकता है क्या? किसने कितना पाया, उसने कितना किया और उसे कितना मिला, इसका हिसाब है कहीं? पर मै छवि से कुछ नही कहता, बस अक्सर मज़ाक करता रहता हॅू,‘‘छवि अगर हम दोनो यों लाखों न पा रहे होते तो तुम्हारे इतने सारे अरमानों का क्या होता? उनका निबटारा तुम कैसे कर पातीं ?’’
    वह हर बार अपनी आखें फैला कर हॅसती है,‘‘पर हम लोग पा रहे हैं न…बस!’’
    पंडित जी जाने के लिए अपने कागज़ पत्तर समेट रहे हैं। मुझे पता है उनके जाने के बाद छवि मॉ के साथ बैठ कर पूजा के दिन क्या खाना बनेगा उसकी लिस्ट बनाएगी। क्या लेना देना है यह मॉ से पूछ कर तय करेगी। छवि ने दो दिन की छुट्टी ले रखी है-एक दिन पूजा के लिए और एक दिन तैयारी के लिए। वैसे तो वह तीन चार दिन से व्यस्त है इस काम में। शहर में रहने वाले रिश्तेदार भी शामिल होंगे-मामा,मौसी,बुआ, उन सबके बेटे बहुऐँ, सब ।
   आज बड़े साल बाद अचानक दादी का ख़्याल आया था,‘‘मॉ हम लोग दादी का श्राद्ध नही करते?’’
   क्षण भर के लिए मॉ के माथे पर सलवटें पड़ी थीं। फिर वे सभंल गयी थीं‘‘अब बेटा जब उनके बेटे ही नही रहे तो उनका कैसा श्राद्ध। जब तक तुम्हारे पापा रहे तब तक हम.पंडित को दान कर देते थे।’’
   मन आया था पूछू,‘‘और बीनू ?’’ पर चुप रहा था । वैसे भी जब इन चीज़ों में मेरा विश्वास ही नही है तो उनके मुद्दे क्या बनाना।
    0 0 0
  ….पापा उन दिनों बहुत खुश दिखने लगे थे। बेहद तसल्ली में-जैसे जीवन का हर सुख नियंत्रण में आ गया हो। कोई भी आता तो बातों के बीच एक बार तो ज़रूर कहते कि ‘‘मुझे तो ज्योतिषियों ने कह दिया था कि होलिका दहन के बाद आपकी सारी मुसीबतें भी भस्म हो जायेंगी। फिर पूरी ज़िदगी बहुत अच्छी कटेगी आपकी।’’
    असल में पापा की ज़्यादा बोलने की आदत थी सो वह सोचते बाद में थें और बोलते पहले थे। पापा के हॅसते चेहरे पर मेरी निगाहें टिक जातीं। हर बार मुझे अजीब लगता। हर बार उनकी तसल्ली बेहद कुटिल लगती। हर बार एक गुस्सा मन के भीतर धधकने लगता। क्या हो गया ऐसा पिछले दो महीनों में जिसके लिए पापा इतने ख़ुश हैं? क्या हो गया ऐसा जिसने पापा को मुसीबतों से मुक्त कर दिया?
    हुआ ही तो था। घर में दो दो मौतें । दादी की और बीनू की । सच ही तो है दोनों पापा की बहुत बड़ी ज़िम्मेवारियॉ थीं। बहुत बड़ी मुसीबत भी। असल में पापा मुसीबत और ज़िम्मेवारी, इन दोनो के बीच का अंतर नहीं जानते थे। ज़िम्मेवारियॉ तो पापा ने उनके प्रति कभी समझी ही नहीं। समझते तो उनकी मौत पर इस तरह चहकते नहीं।  समझते तो उन दोनो की इस तरह अवहेलना भी नहीं करते । पापा थक गए थे दोनों से। मगर क्यों ? पापा ने उन दोनों के लिए किया ही क्या जो थक गए ? असल मे उन दोनो का होना पापा को कोई खु़शी नही देता था इसलिए पापा ऊब गए थे। पर फिर भी क्या ऐसे कोई अपनों के जाने से यूँ खुश हो सकता है ?
    दादी पापा की माँ थीं और बीनू उनकी अपनी बेटी। वे तो दोनों को उतना भी महत्व नहीं दे रहे कि उस दुख का ऊपरी दिखावा ही कर लें। नहीं तो कम से कम चुप ही रहें।
    अजब सा मन हट गया था पापा से। माँ? कभी लगता वे भी तो कम नहीं। बीनू के लिए उनको कई बार रोते देखा था मैनें। आखि़र उनकी बेटी थी। उनके रक्त मॉस का हिस्सा। पर दादी? उनके प्रति तो.? कभी कुछ कड़वा बोली नहीं तो क्या? कभी कुछ मीठा किया भी तो नही।  अब छवि को देखता हूँ तो बीता हुआ सब कुछ और भी अधिक ग़लत लगने लगता है। सोचता हूँ इतने निश्छल भाव से उसे अपनी सेवा करते देख कर मॉ को कुछ कचोटता नहीं होगा क्या ? पर वे शायद उतना सोचने वाली इंसान ही नहीं हैं। वे कभी भी वैसी नहीं थीं । कितनी घिन थी दादी को…पर उनके अपाहिज होते ही उनकी साफ सफाई के लिए एक जमादारिन लगा दी गयी थी। कुछ दिन दादी बहुत परेशान रही थीं। उनका खाना पीना लगभग छूट गया था। फिर अपनी नियति स्वीकार कर ली थी उन्होंने। मैं स्कूल से लौटता तो देखता दादी मेवाती से बातें कर रही हैं और वह उनके सिरहाने ज़मीन पर पलंग की पाटी पकड़े बैठी है। आखि़र दादी कब तक भूखी रहती  और कब तक चुप। ठीक थीं तो आस पड़ोस में ही घूम आतीं। कभी सत्संग में भी चली जातीं। पर अब तो वे लाचार थीं। आज इतने सालों बाद सोचता हूँ कि इतना रूपया बाबा ने छोड़ा था। पापा अपनी जेब से खर्च न भी करते तो भी दादी के अपने पैसों से एक नर्स तो रख सकते थे….नहीं तो कम से कम एक साफ सुथरी आया ही। एक बार मॉ से कुछ ऐसा ही कहा था तो उनसे मीठी सी झिड़की खा कर चुप हो गया था। फिर वे काफी देर समझाती रही थीं,‘‘ देखो बेटा पापा सब सोच समझ कर मैनेज करते हैं। मेवाती भी कोई मुफ्त में तो नहीं बैठती न। वैसे भी कितना खर्चा है घर में। न जाने कितनी लम्बी बीमारी होगी इनकी। फिर हम लोगों को तुम्हारी पढ़ाई के लिए भी पैसे बचाने हैं।’’
   मेरे मन में हर बात के बहुत से जवाब उमड़ते रहे थे, पर मैं चुप ही रहा था। वैसे भी उन दिनों मैं चुप ही रहने लगा था। पता नहीं क्या हो गया था कि बहुत बात करने का मन ही नहीं करता। मॉ पापा के प्रति तब की बंधी चुप्पी पूरी तरह से कभी टूट ही नही पायी। आज तक नहीं.। मॉ पापा के प्रति मेरा यह मौन छवि को शुरू से परेशान करता रहा है।उसके लिए तो यह बात ही अटपटी सी है कि ख़ून के इतने नज़दीकी रिश्ते में प्यार का मुखर प्रदर्शन न हो…उष्मा न हो…थोड़ी सी उत्तेजना और माहौल में एक मीठा सा हंगामा न हो । हम लोगों के भारत लौटते ही छवि मॉ पापा को अपने साथ बंगलौर ले आई थी। सच बात तो यह है कि उसने भारत लौटने का निर्णय भी उन्हीं लोगों के पीछे लिया था। मेरे दिमाग में तो वह बात आयी ही नही थी पर छवि के लिए तो,‘‘तुम अकेले बेटे हो उनके। ऐसे कैसे हम उनको बुढ़ापे में अकेला छोड़ सकते हैं। कोई भी तो नहीं उनके आस पास।’’
    छवि से रिश्ते में जुड़ने के बाद से अपने अतीत का ‘‘ग़लत’’ और अधिक चुभने लगा है। बहुत सी जिन बातों पर तब ध्यान भी नहीं दिया था वे अब एकदम सामने आकर खड़ी हो जाती हैं। वे बातें अब ज़्यादा साफ समझ आती हैं इसलिए और ज़्यादा हताश करती हैं। पर मैं चुप ही रहता हूँ। वैसे भी क्या फायदा उसे अपने ज़ख्म दिखाने से…तब उन ज़ख्मों पर पड़े खुरंट भी तो उचालने पड़ेंगे…फिर वे चोटें और अधिक पीड़ा देंगी। वैसे भी छवि से कैसे कह सकता हूँ कुछ भी? वह केवल मेरा दुख ही नहीं, मेरे परिवार की शरम है। फिर पापा तो हैं नहीं…और मॉ…उनके पास अपनी सोच थी ही कहॉ। वे तो पापा की इच्छा और आदेशों को पूरा करने का यंत्र मात्र थीं। उनकी आखों में वे ऑसू भी अपने रक्त मॉस से बनी बेटी के लिए होते थे-पापा के लिए आक्रोश शायद नहीं होता था उसमें। कम से कम मुझे कभी वैसा नहीं लगा । तभी तो पापा को इतने पूरे मन से प्यार कर पाती थीं और इतने पूरे मन से याद कर पाती हैं।
    जब बेहद गदगद कंठ से मां मेरे प्रति पापा के प्यार, मेरे प्रति उनकी दीवानगी के किस्से सुनाती हैं तो हर बार मेरा मन खिन्न हो जाता है। हर बार मन करता है कि पुछूँ ‘‘और बीनू ?’’  पर चुप रहता हूँ । न अपने ही ज़ख्म कुरेदना चाहता हूँ और न मॉ को ही कोई नयी चोट देना चाहता हूँ । जो उन्होंने नही देखा,नहीं सोचा,उसे अब दिखा कर या सुझा कर क्या फायदा? वैसे भी बीनू तो अब इस दुनिया में है नहीं।  उसे मरे तो बीस साल से भी अधिक हो चुका। पर बीनू को उसका हक न दिला पाने की पीड़ा…उसके अनाथालय में रहते हुए स्वयं घर की सुविधॉए, मॉ पापा का प्यार, परिवार समाज की सुरक्षा-सब कुछ चुभती हैं आज। इतने आराम से जी रहा था मैं यहॉ और वह बेचारी वहॉ….पता नहीं क्या क्या भोगा उसने।
0 0 0
    पापा को पार्किसंस हो गया था। उस दिन आफिस जाने लगा था तो छवि रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी थी,‘‘तुम्हें क्या हो गया है सुनील? पापा की हालत देख रहे हो ? चलो किसा तरह से डाक्टर एक बार उन्हें देखने को घर आ भी जाए पर एक्स रे, स्कैनिंग तो उन्हें लेकर ही जाना पड़ेगा न ?’’ उसकी आखों में मेरे लिए शिकायत है।
   उन दिनों मुझे उसके चेहरे पर शिकायत ही दिखने लगी थी । अजब तरह से उलझी सी लगती है वह। अजब तरह से देखा था उसने मुझे,‘‘छ फीट के पापा। मैं और मॉ तो नही संभाल सकते उनको। वैसे भी..’’ उसने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया था । अजब तरह से उसने अपने सिर को झटका दिया था ,जैसे मन ही मन बड़बड़ा रही हो वह। उसके लिए रक्त मॉस का हर रिश्ता बहुत निकट होता है…उसमें भी कोई दूरी हो सकती है…कोई शिकायत हो सकती है यह उसकी सोच के बाहर है। मैं छवि को क्या बताता और क्या ख़ुद याद करता। वैसे भी उसके लिए तो पापा बेहद ‘डोटिंग फादर’ थे।
   ‘‘डोटिंग फादर?’’ यह शब्द पीड़ा देता है मुझे। बीनू के भी तो पिता ही थे। उस दिन पापा दफ्तर से जल्दी ही लौट आए थे । आने से पहले मॉ को फोन कर दिया था । बीनू को भी तैयार करने के लिए कह दिया था उन्होंने। दोनों के बीच क्या बात हुयी थी यह मुझे पता नहीं….पर पापा के आते ही पापा मॉ बीनू को लेकर कहीं चले गए थे । साथ में पापा के दोस्त डेविड अंकल भी थे । ढाई तीन घन्टे बाद लौटे थे यह लोग…पर बीनू साथ में नहीं थी । मॉ एक साथ शॉत और परेशान दोनो लग रही थीं । मैंने उन्हें बीनू  की खटुलिया के पास आखों में ऑसू भरे खड़े देखा था । उसके बाद कई दिन तक…कई बार उन्हें ऑसू पोंछते देखा था ।
    ‘‘बीनू कहॉ है?’’ पूछने पर मॉ रोने लगीं थीं । पापा ने बताया था कि उसे हॅास्टल भेज दिया है। कहॉ? क्यों? कैसे? कब आएगी? हर बात का पापा नें गोलमाल उलझा सा जवाब दिया था । पापा के चेहरे पर विजयी भाव था । उन्होंने बहुत प्यार से मॉ के कन्धे पर हाथ रखा था,‘‘रोती क्यों हो , वहॉ यहॉ से ज़्यादा खुश रहेगी । उसके साथ के कितने बच्चे हैं वहॉ।’’
    मैं परेशान होने लगा था ‘‘पर वहॉ हम लोग तो नहीं होंगे । वह तो अपने हाथ से खाना भी नहीं खा पाती।’’
    पर पापा ने मेरी किसी बात पर ध्यान नही दिया था । पापा नें शाम को घूमने चलने का प्रोग्राम बना लिया था । मॉ का जाने का मन नहीं था पर वे पापा का विरोध नहीं कर पायी थीं।सो तो वह कभी भी नहीं कर पाती थीं। मेरा मन नही था पर मॉ ने मुझे चलने के लिए मना लिया था।  …और पापा -वह तो जैसे उस शाम को सैलिब्रेट करने के मूड में थे। बड़ी रात गए लौटे थे हम लोग।  घर खोलते ही बीनू की ख़ाली खटुलिया देखते ही जैसे धक्क से हो गयी थी । हम तीनों ही उधर देख रहे थे। मॉ उस जगह जा कर गुमसुम सी खड़ी हो गयी थीं …मै दूर खड़ा उसके न होने के एहसास को महसूस करता रहा था…पापा ने उधर देखा था,‘‘कल बीनू का सामान यहॉ से हटा देना। यह जगह ख़ाली हो जाएगी। यहॉ पर प्रैस की टेबल भी लगायी जा सकती है।’’
   मॉ कुछ नहीं बोली थीं , बस उस जगह से हट गयी थीं । मुझे उन पर बहुत तरस आया था… बहुत गुस्सा भी। क्यों उसे भेजने दिया मॉ ने। पापा का विरोध क्यों नही किया । पापा ने कहा और वे भी साथ जा कर पहुचा आई उसे । याद आया था अभी मॉ कुछ दिन पहले मौसी से बात कर रही थीं,‘‘दिन ब दिन बीनू के पीछे मेरा और दिनेश का रिश्ता बिगड़ता जा रहा है । ये उसे ज़रा भी बर्दाश्त नहीं करते । मै उसके लिए कुछ भी करू इनका मूड बिगड़ जाता है।’’
   तो मॉ ने पापा से अपना रिश्ता सुधारने के लिए भेज दिया उसे घर से दूर । मैं परेशान होने लगा था…किसी दिन मुझे ही कुछ हो जाए तो यह लोग मुझे भी घर से निकाल देंगे । सुना था कभी कभी बड़ी उमर में भी उॅचाई से गिर जाने पर दिमाग बिगड़ जाता है । मॉ के ही कोई रिश्तेदार हैं उनका बेटा हाई स्कूल में पढ़ता था। सीढ़ी से गिर गया था। सारा लिखा पढ़ा भूल गया। तब से दिमाग बेकार है । बहुत इलाज कराया मगर ठीक नही हुआ। मैं अजब तरह से दहशत में जीने लगा था।  उॅचाई से डर लगने लगा था मुझे-संभल कर सीढ़ी चढ़ने लगा था। हाईट का वह फोबिया आज भी बना हुआ है।
   पापा मुझे सच में बहुत प्यार करते थे । सुबह मुझे स्कूल छोड़ने जाते। दुपहर को लंच के लिए आफिस से उठने का टाइम मेरे हिसाब से तय करते। मैं रिक्शे से स्कूल जाऊॅ यह उन्हें अच्छा नहीं लगता था। पर मुझे उस प्यार से कोई खु़शी नही मिलती थी। लगता जैसे उनका प्यार गिजाइयों की तरह मेरे वजूद से चिपक गया हो-जिससे मैं अपने आप को मुक्त कर लेना चाहता था। कई बार मन आता था पूछू उनसे कि क्यों प्यार करते हैं आप मुझे ? क्यों हर जगह साथ ले जाना चाहते हैं आप मुझे ? क्योंकि मैं आपका बेटा हॅू ? नहीं । झूठ बोलते हैं आप। अपने आप को ही नहीं जानते आप । बीनू  भी तो आपकी बेटी ही है । आप इसलिए प्यार करते हैं मुझे कि मैं सुन्दर हूँ-स्वस्थ हूँ-पढ़ने में तेज़ हूँ-मेरे होने पर आप गर्व कर सकते हैं।
न जाने कितनी बातें याद आती रहतीं-न जाने कितनी बातों पर सीने के अंदर ग़ुस्सा धधकता रहता। बीनू के अनाथालय जाने के दो साल पहले पापा का इन्दौर ट्रान्स्फर हुआ था। घर मिलने में समय लगा था सो हम लोग गैस्ट हाउस में ही रह रहे थे। एक बहुत बड़ा सा कमरा…अटैच्ड बाथ रूम और किचन के साथ। सामने की तरफ एक खुला हुआ बराम्दा और पीछे की तरफ बराम्दे की तरह ही एक छोटी सी जगह, बन्द करने की व्यवस्था के साथ । कई महीने हम लोगों को वहीं रहना पड़ा था । सो वही कमरा हम लोगों का बैड रूम, ड्राइंगरूम सभी कुछ था । कोई भी आता उसे उसी कमरे मे बैठाना पड़ता । नए नए पहुचे थे हम लोग सो पापा से मिलने आने वालों की काफी बड़ी संख्या थी वहॉ…कुछ अपने काम के सिलसिले में आते, कुछ कर्टसी कॉल देने। उस दिन पापा के कोई अफसर अपनी पत्नी सहित आए थे। बीनू शायद भूखी थी इसलिए रो रही थी । रोते हुए उसने अपनी गर्दन टेढ़ी करके बॉयी तरफ डाल ली थी। रोते हुए उसके मुह से एक तरफ को लार गिरने लग गयी थी । पापा के चेहरे पर खिजलाहट व खिसियाहट दोनों थी। उन्होंने घूर कर मॉ की तरफ देखा था मगर वे बातों में मगन थीं और उन्होंने पापा की तरफ ध्यान नहीं दिया था। वे बीनू का मूह पोंछ कर उसकी पीठ प्यार से थपथपाने लगीं थीं । वे किचन से उसका खाना उठा लायी थीं और एक बड़े से कटोरे में रोटी के टुकड़े डाले थे और फिर उसी के उपर दाल और सब्जी डाल कर सब एक साथ मींजने लगी थीं । मिसेज़ वर्मा ने अजब तरह से कटोरे की तरफ देखा था जैसे उन्हें कुछ समझ न आ रहा हो । बीनू खाना देखकर शान्त हो गयी थी । मॉ उसे चावल की तरह हाथ से ही रोटी खिलाने लगीं थीं। पापा उन्हें घूर कर देखते रहे थे पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया था।  उन लोगों के जाने के बाद पापा काफी देर तक चिल्लाते रहे थे ‘‘क्या ज़रूरी है कि कोई भी आए तो इस शो पीस की नुमाइश की जाए?’’
    मॉ की आखें झलझलानें लगीं थीं,‘‘इस एक कमरे में मैं उसे कहॉ छिपा दूँ?’’  मॉ ने जैसे सफाई दी थी । मुझे उन पर गुस्सा आया था । सफाई क्यों दे रही हैं। यह क्यों नहीं कह सकतीं कि वह जैसी भी है, जो भी है, हमारी बेटी है। अगर सुनील बाहर आ सकता है तो वह क्यों नहीं?
    ‘‘क्यों पीछे का बराम्दा नहीं है क्या?  वह भी तो कमरे की तरह बन्द है। कोई उठा नहीं ले जाएगा तुम्हारी लड़की को’’  उन्होंने बड़ी हिकारत से बीनू की तरफ देखा था,‘‘वैसे भी इस मुसीबत को कौन ले जाएगा?’’
    मॉ ने फिर सफाई दी थी, ‘‘पीछे के बराम्दे में कितनी तो धूप आती है।’’
    पापा ने फिर आखं तरेर ली थीं,‘‘तो…तो क्या हुआ? दिमाग है उसके पास जो धूप छॉव,सर्दी,गर्मी का फर्क समझ सके?’’
    मैं सन्न रह गया था। इससे ज़्यादा ख़्याल तो पापा टॉमी का करते हैं। पापा तो आए दिन बीनू को लेकर मॉ पर झल्लाते रहते पर वे उस झुझलाहट की सफाई सी देकर पापा को मना लेतीं या अन्ततः पापा की बात मान कर उनकी इच्छानुसार निर्णय ले लेतीं। बीनू के अधिकार को लेकर मैंने कभी उन्हें सीधे तन कर खड़े होते नहीं देखा…उसके लिए पापा से कभी उलझते नहीं देखा। वह तो ऐसा लगता जैसे बीनू उनका अपराध हो। इस घर में बीनू के अधिकार थे ऐसा शायद मॉ ख़ुद भी नहीं समझती थीं।
    बेचारी बेज़ुबान , बेदिमाग बीनू । पर वह बेज़ुबान व बेदिमाग भले ही रही हो पर सुख और दुख को महसूस करने के लिए दिल तो था ही न उसके पास। प्यार और अपमान का भेद करने लायक दिमाग भी था शायद। कितनी बार मैने उसे गले से गों गों करके आवाज़ निकालते सुना था-जैसे रोना सीना फाड़ कर बाहर निकल रहा हो….तब हाथ पैर सहित उसका पूरा शरीर बुरी तरह हिलने लगता…जैसे दिल दिमाग शरीर सब विद्रोह कर रहे हों । पर उसको लेकर पापा बहरे, अन्धे सब कुछ थे…बे दिमाग और बे दिल के भी…और मॉ..? उनका सारा सही और ग़लत पापा से शुरू हो कर पापा पर ही रुक जाता । किंतु वह मॉ थीं इसलिए बेटी का ग़म जब तब मना लेतीं….नाते रिश्तेदारों से उस दुख पर बात कर लेतीं….जब तब रो भी लेतीं । पर अपने आप को लेकर बीनू ख़ुद भी पीड़ित है इतना देख पाने की सूक्ष्म दृष्टि किसी के पास नहीं थी। किन्तु बीनू दुखी थी…बहुत ज़्यादा दुखी थी…यह बात आज इतने सालों बाद पीछे पलट कर देखने पर अच्छी तरह समझ पाता हॅू । ख़ैर मैं तो तब बच्चा था…पर मॉ पापा भी नहीं समझ पाए उसका दुख। पापा को तो उससे जैसे कोई मतलब ही नहीं था। और मॉ….? उनके लिए भी जैसे वह अकेला उनका दर्द था-उन दोनों ही के लिए जैसे बीनू का कोई इंसानी वजूद था ही नहीं ।
    …उस दिन बुआ आयी थीं । वह केवल एक चाकलेट लायी थीं मेरे लिए और आते ही वह उन्होंने मुझे पकड़ा दी थी । बीनू बुआ की तरफ फिर मेरे हाथ की चाकलेट की तरफ लटकी गर्दन के साथ तिरछी निगाह से देखती रही थी…और फिर बड़ी ज़ोर से रोई थी । हम सब  फौरन समझ गए थे कि बुआ ने उसे चाकलेट नहीं दी इस बात को लेकर नाराज़ है वह । बुआ एकदम खिसिया गयी थीं…‘‘ अरे इसका तो ध्यान ही नही रहा ’’ उनके मुह से अचानक निकला था-और ऐसा कहते ही वह और अधिक खिसिया गयी थीं । उन्होंने मेरे हाथ से चाकलेट ले ली थी,‘‘सुनी बेटा मैं अभी तुझे दूसरी मंगा दूँगी।’’ वह चाकलेट खोल कर उन्होने बीनू की तरफ बढ़ाई थी। नीलू ने मुह फेर लिया था और वह उसी आहत भाव से रोती रही थी । बुआ के बहुत मनुहार करने पर भी उसने चाकलेट की तरफ मुह नही किया था। उस पूरे दिन बुआ बहुत खिसियायी सी, बहुत  दुखी रही थीं।…और पापा कहते हैं उसे क्या अकल…दिमाग भी है उसके पास ? कितना ग़लत सोचते थे पापा ।
    इन्दौर हम लोगों के लिए नई जगह थी आस पास काफी घूमने लायक। आए दिन हमारे घूमने के कार्यक्रम बनने लगे थे।  बीनू को बन्द कमरे में छोड़ दिया जाता । छोड़ा तो उसे लखनऊ में भी जाता था पर वहॉ दादी उसके पास होती थीं । पर यहॉ तो वह अकेली थी । उस बेचारी का सबेरा भी उसी कमरे में होता और उसकी रात भी वहीं होती। मुझे भी घूमने जाना अच्छा लगता था पर धीरे धीरे मैने उन लोगों के साथ जाना छोड़ दिया था। जब बीनू  को अकेले छोड़ कर बाहर ताला लगाया जाता तो मुझे बुरा लगता। सारे समय मन पर बोझ सा महसूस होता। बाहर जब कुछ बहुत अच्छा लगता तो ख़ुश होते अचानक आखों में ऑसू भरने लगते। लौट कर आता तो बीनू  के पास जाने का साहस नहीं होता। लगता जैसे वह बहुत रूठी हुयी है। उसे मनाता तो भी कैसे…। वैसे ज़ुबान की भाषा वह भले ही न समझती हो पर लगता मन की भाषा समझती है वह। हर बार ही हम लोगों को बाहर जाने के लिये तैयार होते देखती तो हू हू कर के रोती…सिर को झटका दे कर अपना विरोध दिखाती और फिर थक कर उसकी गर्दन एक तरफ को लटक जाती । जब मैने मॉ पापा के साथ जाना छोड़ दिया तो उन लोगों के जाने के बाद मुझे घर में पा वह किलकारी मार कर हॅसती…मुह से अजब सी आवाज़ें निकालती…लगता जैसे खुश हो रही है । उससे संवाद तो संभव था ही नहीं …सो मैं उसके आस पास बैठ जाता और टी. वी. खोल देता । यह सोच कर कि मै उसके आस पास हॅू, वह अकेली नहीं है, मुझे भी अजब सा सुकून मिलता। बीनू को हॉस्टल भेजने के अगले हफते मॉ पापा गए थे उससे मिलने । मैं उनके साथ जाने के लिए बहुत रोया था। मैं बीनू  से मिलना चाहता था। मैं उसे देखना चाहता था। मुझे उसकी बहुत याद आ रही थी। पर पापा मुझे साथ ले जाने के लिये तैयार नही हुए थे। मॉ ने भी बहुत कहा था पर वे टस से मस नहीं हुए थे। मॉ ने उसके कुछ अच्छे कपड़े, कुछ खाने का सामान ले जाने के लिए रख लिया था। पर पापा कुछ भी नहीं ले गए थे। मॉ के ज़िद्द़  करने पर पहले हल्के से आखें तरेरी थीं।
   फिर प्यार से समझाया था,‘‘तुम समझती क्यों नहीं कि यदि हम लोग इस तरह करेंगे तो वह लोग समझ जाऐंगे।’’ और मॉ ने हाथ का सामान नीचे रख दिया था । मैं नहीं समझ पाया था कि पापा ने  किस बात को समझने के लिए कहा था और वह लोग क्या समझ जाऐंगे ।
    ऐसे मौकों पर मुझे मॉ पर एक साथ गुस्सा और तरस दोनो आता। ऐसा लगता कि इतने सालों तक पापा के साथ रहते हुए उनकी अपनी सोच ही ख़तम ही चुकी है या उन्होंने सोचना ही एकदम बन्द कर दिया है-सही या ग़लत, अच्छा या बुरा, कुछ भी । कोई इंसान अपने आप को ऐसा कैसे बना सकता है ?
     अगले हफते मॉ फिर से बीनू के हॉस्टल जाने की तैयारी करने लगीं थीं । पापा ने एकदम डॉट दिया था,‘‘.दिमाग ख़राब हो गया है तुम्हारा?’’ उनका वही तरीका…पहले आखें  तरेरीं…फिर प्यार से समझाने लगे थे, ‘‘ऐसे हर हफ्ते जाएंगे अगर हम लोग तो उन लोगों को शक होने लगेगा।’’
    धीरे धीरे पूरी बात समझ में आने लगी थी मुझे। कुछ उन लोगों की आपसी बात चीत से और कुछ अपनी अकल से। बीनू को इन लोगों ने मदर टेरेसा के होम में डाला है। डेविड अंकल ने इस काम में पापा की मदद की थी। अनाथ बच्चे लिए जाते थे वहॉ । मतलब….मतलब उसे अनाथ बताया गया था। मैं बहुत बेचैन रहा था । मां बाप परिवार के होते हुए अनाथालय में है बीनू । अनाथ बच्चों के बीच अनाथों की तरह ही तो पल रही होगी वह । आज सोचता हॅू अनाथ ही तो थी बेचारी । रक्त मॉस के रिश्ते होने से ही तो कोई अपना नहीं हो जाता।
    धीमें धीमें हम सब को बीनू के अभाव की आदत पड़ गयी थी। घर में पहले से कम काम लगने लगा था। घर पहले से ज़्यादा साफ सुथरा लगने लगा था,पहले से थोड़ा बड़ा….और पापा पहले से ज़्यादा प्रसन्न और उत्तेजित दिखने लगे थे । रोज़ की तरह वे उस दिन लंच पर आए थे । हमेशा की तरह तरोताज़ा दिख रहे थे । खाने के बीच उन्होने मम्मी को बताया था कि बीनू को कलकत्ते के होम में भेज दिया गया है।’’ जैसे कोई अख़बार में पढ़ी ख़बर सुनाता है ।
    मॉ का कौरा हाथ में ही थम गया था,‘‘अरे! ऐसे कैसे? न बताया, न पूछा और कलकत्ता भेज दिया….और क्यों? ’’
    पापा आराम से खाना खाते रहे थे,‘‘उन की इच्छा और उन के रूल्स। अब तुम पूछताछ करने मत पहुच जाना।’’
000
पंडित जी पूजा ख़तम कर चुके हैं और उपदेश सुना रहे हैं-‘‘मातृ पितृ देवः माता पिता देवता होते हैं। उनकी सेवा करनी चाहिए। वे विस्तार से बता रहे हैं कि पुत्र के क्या क्या कर्तव्य होते हैं, संतान के ऊपर ऋण होता है माता पिता का जिससे वह कई जन्मों तक उऋण नहीं हो सकता । छवि बहुत भक्ति भाव से उनकी बातें सुन रही है-मैं निर्विकार बैठा हॅू। कितनी लम्बी सूची है संतान के दायित्वों की। मैं सोचता हूँ बस वही तो ऋणबद्ध है….किसी शास्त्र…किसी धर्म ग्रंथ में माता पिता के कोई दायित्व नहीं । कर्त्तव्य केवल संतान के हैं । मन करता है उठ जाऊॅ पूजा पर से। पर बैठा रहता हॅू । पंडित जी ने दान में दिया जाने वाला सामान मेरी खुली हथेली के उपर रख दिया था…पंडित जी के कपड़े…घड़ी…पैन…एक लिफाफे मे रूपये। पंडित जी ने कहा था अपने पिता को याद करो…संकल्प लो…और उनकी आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करो। मैने अपनी आखें मूँद ली थीं ।
   बंद आखों के आगे बीनू आ कर खड़ी हो गयी थी । लगा था दिल के भीतर प्यार और याद का कोई सूख गया सैलाब फट पड़ा हो । मेरी बंद पलकों में ऑसू भरने लगे थे । पंडित जी मंत्रोच्चारण कर रहे हैं । मैं मन ही मन बुदबुदाया था ‘‘ मेरी बहन मुझे माफ कर दे…तेरे लिए कुछ मैने भी तो नहीं किया…भगवान तेरी आत्मा को शान्ति दे दे बीनू  ।
  अपनी पीठ पर छवि का प्यार भरा स्पर्श महसूस करता हॅू । वह मेरी पीठ सहला रही है। शायद मेरी आंखो से ऑसू बह रहे हैं ।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *