लोकजीवन की सहजता का काव्य-शिल्प

  • सुशील कुमार

‘सपनों को मरने मत देना’ युवा कवयित्री (डॉ) भावना का काव्य-संग्रह है। भावना बिहार (मुज्जफरपुर) की हैं और आर. एस. एस. कॉलेज में रसायन विज्ञान विभाग में प्राध्यापिका हैं। इसके पहले इनका एक गजल संग्रह‘शब्दों की कीमत’भी आ चुका है। डॉ. भावना कहानियां भी लिखती हैं।

पहले काव्य संग्रह में ही भावना ने स्त्री -विमर्श के चालू कलेवर से अपने को अलगाकर अभिव्यक्ति को लोकसंवेदना से जोड़दिया है। उन्होंने इसमें जनजीवन के प्रतिजो गहरी आस्था प्रदर्शित की है, वह उन समकालीन शहरी कवयित्रियों के स्त्री-विमर्श से जुदा करती है जिनमें विमर्श की पाश्चात्य प्रवृत्ति गोचर होती हो। इनके बन रहे मुहावरों में कवयित्री बाबुषा कोहली का नकलीपन , शुभमश्री का हिंग्लिशपन और गगन गिल का बड़बोलापन व भाषिक रचाव का उद्रेक नहीं। सहजता और सादगी इनकी कविता का अन्तरनिष्ठ और स्वाभाविक गुण है, जो लोकजीवन से प्रतिकृत होती हुई महसूस होती है और इसमें स्त्रीपन का परिवेश भी लोक से उतना ही संपृक्त दिखता है। यहां स्त्री होने के अहसास में ‘धरती की ऊष्मा’ और ‘प्रकृति की खुशबू’ विद्यमान है। वह श्रमजीवी और सपनों से भरी हुई है। बलत्कृत स्त्री भी यहां फिर से काम पर लौटना चाहती है जो कठोर जीवटता और जिजीविषा का प्रमाण देती है। उसका यह प्रण –

“तमाचा है समाज के उन ठेकेदारों को”

और काली लड़की भी अपना रूप-सौंदर्य अपने श्रम में पाती है –

“करिअक्की’ को यकीन है कि

उसका काला रूप

उसकी मेहनत से फीका पड़ जाएगा

और निखर जाएगा उसका सौंदर्य

उसके अथक श्रम में तप कर” (श्रम से निखरता सौंदर्य/ पृ-16)

इन कविताओं का सौष्ठव यह है कि इनमें जीवन का संघर्ष पूरी उदात्तता से देखा जा सकता है । यह मैनेजमेंट की कविता नहीं है , न यहां प्रेम गिलहरी है और न दिल अखरोट, ‘जलपरियां’ भी नहीं है यहाँ, न शब्दों का कोई वायवीय ‘तिलस्मी धुन’ –

“मिट्टी की दीवारें

फुस की छत

धान की कोठी

सब कुछ बहाने के बाद

बागमती अब

आंखों में उतर चुकी है

…………..

जान बचाकर भागे परिवार

सड़क किनारे आसमान ओढ़े

नदी के लौटने के इंतजार में हैं

बागमती का आक्रोश थमने पर

ये फिर लौटेंगे अपने गाँव

खून पसीने से जोड़ेंगे तिनका

बनाएंगे आशियाना” ( बागमती का आक्रोश / पृ 78-79)

भावना ने सादगी-भरी कविताओं का अपना एक खूबसूरत शिल्पविकसित किया है जो उसका असल सौंदर्य है । आपको बाबुषा , शुभमश्री और गगन की कविताओं में यह नहीं मिलेगा। वहां शब्दों को गूँथ-गूंथकरकविताएँ बनाई जाती है । यहाँ यह सीधे लोकजीवन से निःसृत होती है। बरसात में हहराती किसी पहाड़ी नदी की तरह –

“एक औरत

जब एक समान गति से

पीटती है धान

तो बिखर जाता है संगीत

चारो तरफ

और उसकी धुन पर

वह पीटती है पेट की भूख

धोती है अशिक्षा का

बदनुमा दाग

सँवारती है बच्चों का भविष्य

और उसके कोमल हाथ खुरदुरे

और कठोर हो जाते हैं “( धान पिटती औरत / पृ 91)

भावना स्त्री-अस्मिता के सवाल पर पुरुषों से भिड़ने के बजाय उसके मनोविज्ञान में शामिल होकर उसके दुःख-तकलीफों को भी अपने अस्तित्व से जोड़ती है जो उनके स्त्री विमर्श को नया आयाम देती है –

” आज

फिर वह चुप है

……….

उस चुप्पी से उपजे

सन्नाटे के बीच

तलाश रही हूँ

अपना अस्तित्व” (अस्तित्व/ पृ 92)

यह विमर्श विमर्शवादियों की सीमाओं को तोड़ता है, वह क्षण की तह में डूबकर कर ही मालूम किया जा सकता है –

“स्त्री

कोई इतिहास नहीं होती

जिसे भूला दिया जाए

स्त्री

कोई भविष्य नहीं

जिसकी योजना बनाई जाए

स्त्री

वर्तमान है

जिसमें डूब कर

उसे समझा

या महसूस किया जा सकता है” (स्त्री/ पृ 93)

क्योंकि यहाँ

“प्रेम का एक अलग व्याकरण है

एक अलग पाठशाला

यहाँ बिन कुछ कहे

सब कुछ सामने रहता है” (बोलती आंखें/ पृ-117)

इस प्रेम में प्रकृति भी उसी तरह शामिल होती है, जिस तरह युगल प्रेमी। यहाँ हरसिंगार के खिलने से अधिक उसके बिखर जाने में जीवन का अर्थ गुप्त रहता है। मेहनतकश स्त्रियों का भारतीय चित्त इनकी कविताओं में प्रतिबिंबित होता है और उन्हीं के समाज से स्त्री-विमर्श की दशा-दिशा तय होती है। यहां बिम्ब मन के कोने में बैठे किसी रूपवादी दर्शन से नहीं निकलते बल्कि जीवन की गतिकी और श्रम के सौंदर्य से उद्भासित होते हैं जो कवयित्री को समकालीन कविता में महत्वपूर्ण बनाती है। पर ऐसी कवयित्री पर चर्चा न कर आज के समीक्षक रूपवादी कवयित्रियों को बड़े-बड़े तमगों से नवाज रहे ! यह नव्य समीक्षा की पाश्चात्य प्रवृत्ति की ओर विशेष झुकाव के चलते फलित होता है जो कविता की सहज धारा को उसी तरह मोड़ देती है  जैसे नदियों की धारा को मोड़कर उस पर बांध बनाकर विकासवादी उसकी प्राकृतिक छटा को विनष्ट कर देते हैं।

यह भी गौर करने लायक बात है कि कवयित्री भावना का कविमन स्त्री के बने रूढ़ घेरे और प्रतिमानों को तोड़ने में किसी आंदोलन की तर्ज़ पर मुखर नहीं होता, बल्कि वह कामकाजी स्त्रियों में आत्मविश्वास और हुब को ढूंढता है और उसी को कविता के ‘टूल्स’ के रूप में उपयोग करता है।

मेट्रो सिटी की औरतें

नहीं लगाती सिंदूर

नहीं पहनती

हाथ भर चूड़ियाँ

नहीं बजती उसके पांव से

पायल की झंकार

………….

आत्मविश्वास से लबरेज

धरती को अपने डग से नापती

बस-ट्रेन में धक्के खाती

अपने हिस्से की जमीन

और आसमान

पाने की जद्दोजहद में

रोज़ तोड़ती हैं रूढ़ियाँ” ( मेट्रो सिटी की औरतें /पृ 123)

यह संग्रह की बेहद खूबसूरत कविता है जिसमें श्रम का सौंदर्य ही उसके जीवन-संगीत के रूप में खिलता नजर आता है।जब कवि की भाषा सहज और उसकी अंतर्वस्तु मर्मीहोती है, तो वह कविता में आकर्षण का सृजन स्वतः करती है। कुछ लोग सरलता को सपाटबयानी समझकर भूल कर बैठते हैं। जटिल-दुरूह भाषा व भावबोध की कविताएं भी यदि बिम्ब-विहीन हैं तो वह सपाटबयानी हैं। यह वस्तुतः कविता की एक शैली हैजिसका मतलब है बिना बिम्ब की कविता की शैली। धूमिल की बहुतेरी पंक्तियां एकबारगी समझ में नहीं आतीं। पर बिम्बविहीन हैं ,इसलिए उनको सपाटबयानी की पंक्तियां मानी जाती हैं। अगर डॉ. भावना की कविताओं की भाषा-शैली पर बात करें तो वह कहीं बिम्बात्मक है तो कहीं सपाट, बल्कि यूँ कहें कि उनमें कहीं बिम्बों का अतिरेक नहीं। उनमें एक सन्तुलन साधा गया है। यही कविता की सोद्देश्यता भी है। कविता में बिम्बों का अतिरेक हमें बिम्बवाद की ओर ले जाता है। सर्वश्री अशोक वाजपेयी विजेंद्र, अरुण कमल, केदारनाथ सिंह आदि वरिष्ठ कवियों से लेकर गीत चतुर्वेदी, अशोक पांडे, बाबुषा, आदि युवा कवि-कवयित्रियों ने बिम्बों को कविता में जिस मुहवरेदानी के साथ लाने का सायास उपक्रम किया है, उससे कविता अपनी स्वभाविक बुनावट से दूर जाती दिखती है। इनकी  कविताएँ विस्मित जरूर करती हैं पर व्यग्र नहीं करती । मन को मथने के बजाय कलात्मक श्रम की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती हैं जो कभी लोकधर्मी कविताओं की प्रकृति नहीं रही । पर जबकवि लोकजीवन के अनुभव की गहराई में उतरता है तो स्वमेव उसमें प्राकृतिक बिम्ब आ जाते हैं, उसे उसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है।

भावना की कविताओं में बिम्ब का संतुलन लोकजीवन की इसी अनुभूति और गहराई से प्रकट हुआ है जो इनके काव्यशिल्प को विशेष बनाता है। सादे बयान के भीतर अनुभवलोक के इसी खनिज की उत्पत्ति भावना की कविताओं का खास गुण है जो उनके लेखकीय संस्कार का आईना है। मसलन,इनकी एक कविता है- मेरी कविता। इस कविता में अपनी बड़े सहज कहन के भीतर वह बिम्बों का जो पुट रचती हैं, वह उनके रचनाकर्म के अभीष्ट को बड़े सलीके से खोलकर रख देता है । वह कॉरपोरेट जगत की जुबान नहीं बनना चाहती। वह –

“सुस्ता लेना चाहती है

पीपल की छाँव में

जहाँ टोकरी भर घास छिल

गप्प मारती होती है तरुणियाँ”

– यहाँ लोकजीवन के जो बिम्ब आए हैं, उनमें गांव की लड़कियों के श्रम का आस्वाद घुला हुआ है। इनमें प्रकृति के साथ जीवन एक तरह का अल्हड़पन लिए दृष्टिगत होता है, किसी सुघड़पन के साथ नहीं – ‘अपनी भैसें चरवाही कर लौट रही’‘उन अल्हड़ किशोरियों के संग’ कविता इठलाना चाहती है। इनकी यह कविता नाउम्मीद बादल के बरस जाने पर किसानों के चेहरे पर खिलने वाली मुस्कानों से बनती है तो कहीं‘कुम्हार की मिट्टी’से

‘बनती है-

और होना चाहती है परिपूर्ण’

चाक पर ढलकर”।

दरअसल भावना की कविताएं अपने लोगों के पसीने में समाना चाहती है,उसकी सम्वेदना का अंश बन जाना चाहती हैं। यही भावना की कविताओं का समाजशास्त्र है। यह व्यक्ति के तनाव और ऊब से पैदा नहीं होती। इसमें दुःख-संवेदना की बुर्जुआ-दृष्टि नहीं है,बल्कि समाज की रचनात्मकता और उत्पादक वर्ग के जीवन की गतिकी से उपजती है।

डॉ. भावना में स्त्री विमर्श का स्त्रोत-बिंदु भी यहीं जान पड़ता है। वह न विचारों का वेग खड़ी करती हैं , न स्त्री विमर्श के नाम पर “काया-स्वतंत्रता” की ओर प्रवृत्त होतीहैं, जबकि आधुनिक विमर्श की बहुतेरी कविताएँ श्रम से जी चुराती नजर आती हैं, श्रमजीवियों की अवहेलना कर देहको पूँजी तुल्य समझ केवल उसके शोषण पर अपना ध्यान केंद्रित करती नजर आती हैं।

आप यह भी महसूस करेंगे कि भावना की कविताओं का सादापन और अल्हड़पन एक साथऔर एक लहजे में आता है। पर कहीं काव्यकला के व्यतिक्रम में नहीं ले जाता । वस्तुतः यह त्रिलोचन-नागार्जुन परम्परा का गढ़ा हुआ भाषा-शिल्प है, जो कविता में बड़बोलेपन से बाँकपन उत्पन्न नहीं करता, बल्कि श्रमलोक का अद्भुत सौंदर्य बिखेरता है।  कविता की अंतर्वस्तु खुद ही अपने सामाजिक यथार्थ का वरणकरती है।

अब कविता की समकालीनता पर आता हूँ। यहाँ समकालीनता भी कविता – भाषा में प्रयुक्त मुहावरों के नकलीपन, हिंग्लिशपन और भाषिक उद्रेक से तय नहीं होती , बल्कि उन शब्दावलियों से तय होती है जो सामाजिक यथार्थ को कलात्मकता और भावात्मकता के साथ पाठक के अंदर एक ऐसा विचारबोध सृजित करती है जो उसे उसकी वस्तुनिष्ठता में प्रकट कर सके। इस शब्दकर्म में डॉ. भावना कहीं चूकती नहीं, बल्कि सकुशल गन्तव्य तक पहुंचती है। यही इनकी कविता की सफलता है।

अतएव कह सकते हैं कि कवयित्री भावना आधुनिक कविता की अत्यंत संभावन शील कवयित्री हैं । इनकेइस प्रथम काव्य संकलन “सपनों को मरने मत देना” की सहज लोकधर्मी स्वभाव को देखकर यह सुखद आश्वस्ति होती है कि आगे चलकर अभिव्यक्ति की शैली में और भी निखार व पैनापन आएगा।•

 

डॉ. भावना की कुछ कविताएं

रोटी में मिठास

 

पहली बार

मानव जब जन्मा होगा पृथ्वी पर

मुझे नहीं मालूम

कि पहले उसने प्रेम को महसूस किया होगा

या भूख को

प्रेम का होना जीवन में /महत्वपूर्ण है या नहीं

मुझे नहीं पता

पर,मुझे पता है

कि प्रेम न हो जीवन में

तो सारी दौलत बेमानी हो जाती है

करोड़ों की लागत से बनी बहुमंजिली इमारत भी

नहीं कर पाती तृप्त

सीमेंट और ईंटों के गठजोड़ में

नहीं होता संवेदना के लिए स्पेस

 

जीवन का मतलब

सिर्फ भूख से रोटी का मिलना-भर नहीं होता

रूह से रूह का मिलना भी है

जिसके मिलने भर से

आ जाती है रोटी में मिठास

यह जरूरी नहीं जानना

 

यह जरूरी नहीं जानना

कि मोर की तड़प को महसूस

उमड़ता है बादल

या बादल को उमड़ते देख

नाचता है मोर

 

यह जरूरी नहीं जानना

कि सूरजमुखी के प्रेम की खातिर

फिर-फिर निकलता है सूरज

या सूरज के प्रेम की खातिर

खिलने को अकुला जाता है सूरजमुखी

 

यह जरूरी नहीं जानना

कि पूनम के चांद को देख

समुन्दर की लहरें

हो जाती हैं बेकाबू

या लहरों के आवेग को देख

चांद उसे अपलक निहारता है

 

जरूरी है जानना

कि कैसे पेट के भूगोल में उलझ

हमने बेच दी हैं संवेदनाएं

खो दिया है वह प्रेम

जो कभी मिट्टी के घर में

महमहाया करता था

आंगन के चारों ओर

नदी

1.

नदी जब उतरी थी

कल-कल करती पहाड़ों से

सुना था उसने

कहीं है समंदर

जहाँ पहुँचना/उससे मिलना

उसमें समा जाना सार्थकता है उसकी

नदी दिन-रात सपना देखा करती

सपने में समंदर देखती

जो अपनी विशाल भुजाएँ फैलाये

आतुर है उसे समा लेने को

नदी मन ही मन मुसकरा देती

और उसकी शोखी

क्ल-कल छल-छल ध्वनि में

हो उठती थी परिवर्तित

 

2

नदी अब खो गयी प्यार में

उसे अपनी सुध-बुध न रही

वह दौड़ती भागती

रास्ते की बाधाओं से बेखबर

पहुँची समंदर के पास

समंदर गौरवान्वित हुआ खुद पर

उसने फिर फाँस लिया एक और नदी को

अपने प्रेमपाश में

उसने बढ़ा दी अपनी भुजाएँ

और समा लिया उसे अपने भीतर

नदी उसके भीतर समाहित

हजारों नदियों सी एक नदी बन गयी

उसका अस्तित्व समाप्त हो गया

 

3

एक दिन नदी ने समंदर से पूछा

प्रिये मैंने तुम्हारे लिए घर-बार छोड़ा

सगे संबंधियों को छोड़े

अपनी पहचान भी खो दी

फिर भी तुम्हारी नजर में

मेरी कोई अहमियत नहीं

समंदर मुसकराया और धीरे से कहा

प्रिये अहमियत तो दूसरों की होती है

तुम तो हमारे भीतर हो

हममें समाहित

तो फिर अहमियत कैसी

नदी खुद पर हँस पड़ी

 

4

नदी समा गयी समंदर में

खो दिया है अपना कुल/गोत्र/पहचान

भूल गयी है अपनी चाल

क्ल-कल छल-छल की ध्वनि

अपनी हँसी अपना एकांत

नदी जो अब विलीन है समंदर में

समंदर में दहाड़ती है हमेशा

पर उसके अंदर का आक्रोश दब सा जाता है

समंदर के शोर में

वह भागना चाहती है अपने अस्तित्व की तलाश में

लेकिन पत्थरों से टकरा कर लौट आती है

फिर फिर वहीं

नदी अब तड़पती है

अपनी पहचान की खातिर

उसके अनवरत आँसुओं ने

कर दिया है पूरे समंदर को नमकीन

यह समंदर और कुछ नहीं

नदी के आँसू हैं

और उसकी लहरें

नदी के हृदय का शोर

नदी जिसकी नियति तड़प है

 

5

नदी जो तड़प रही है

अपनी पहचान की खातिर

तब सूरज नहीं देख पाया है

उसकी तड़प उसकी बेचैनी

उसने भर दी है अपने किरणों में

थोड़ी और गरमी

कर दिया है वाष्पीकृत उसके जल को

वह जल संधनित हो

मँडरा रहा बादल बन अंबर में

फिर बूँदों की शक्ल में आ गया है धरती पर

नदी खुश है अपने पुनर्जन्म से

अभिभूत है सूरज के उपकार से

जिसने उसे लौटा दिया है

उसका वजूद, उसकी पहचान

नदी समंदर की विशालता को ठुकरा

अपनी छोटी सी दुनिया में खुश है

 

6

नदी को अब भी याद आती है समंदर की

नदी अब भी तड़पती है समंदर के लिए

लेकिन नदी अब समझदार हो गयी है

वह नहीं मिटाना चाहती अपना वजूद

वह जीना चाहती है

अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ

 

………………………………………………………..

पुस्तक  सपनों को मरने मत देना
कवयित्री – भावना
अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद

समीक्षक – सुशील कुमार

सम्प्रति, सहायक निदेशक,

प्राथमिक शिक्षा निदेशालय,

स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,

पो०- धुर्वा, राँची (झारखंड)-834004

मो० नं०- 7004 353 450 और 0 9006740311

 

 

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