विजय कुमार स्वर्णकार की ग़ज़लों में जीवन के विविध रूपों की अभिव्यक्ति हुई है 
                                                     – अनिरुद्ध सिन्हा 
      आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल में आम आदमी के जीवन से जुड़े अनेक सामाजिक बिंब-प्रतिबिंब नज़र आते हैं। इसकी भावभूमि काफी व्यापक है। प्रेम की आंतरिक वेदना से लेकर अनेक जीवनानुभव ,अपने आशयों,तनावों,अंतर्विरोधों के साथ विन्यस्त हैं जिसमें वात्सल्य,प्रेम, पारिवारिक भावना,प्रकृति और सौंदर्य अलग-अलग ढंग से देखे जा सकते हैं। इसके सारे शेर अपनी सपाटबयानी से नहीं,अपनी संकेतिकता से चमत्कृत करते हैं। यह इतना सीधा-सादा या आसान काम नहीं है जितना कि ऊपर से लगता है। जिसका स्वभाव छंद के अनुकूल नहीं है,उसे समझने में थोड़ी कठिनाई तो होगी ही। ऐसा इसलिए भी है कि हिन्दी ग़ज़ल की कोई लंबी परंपरा नहीं है। अभी ग़ज़ल आलोचना की संस्कृति से पूरी तरह से जुड़ नहीं पाई है,इसलिए भी थोड़ी कठिनाई सामने आ रही है। परंतु इसकी अपार लोकप्रियता को देखकर यह अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि भविष्य में यह हिन्दी साहित्य की प्रमुख काव्य विधाओं में से एक होगी।
      विजय कुमार स्वर्णकार एक ऐसे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल के रूप रंग को बिगाड़े बिना अपने समय के सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक विषयों को अपनी ग़ज़लों के साथ जोड़ा है। समाज की प्रत्येक विसंगति को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से उकेरा है। प्रायः ग़ज़ल में समाज में व्याप्त कई त्रासद समस्याओं का वर्णन मिलता है। समाज की बिगड़ती स्थिति को गहराई के महसूस कर अपने सामर्थ्य के बल पर सशक्त अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है। ग़ज़लों में प्रतीक और बिंब का बहुत कुछ निकट का संबंध है।  प्रतीक से ज्यों अर्थ लक्ष्य रूप में संप्रेषित होता है वह सीमित,निश्चित और सपाट नहीं होता,उसमें भावों के रंग प्रस्फुटित होते हैं जो लक्ष्यार्थ को बिंब की छटा प्रदान करते हैं। देखें इस शेर को—-
खुलेगी बात यहाँ सिर्फ़ कुछ इशारों से
नज़र की चाभियों वाले जुबां पे ताले हैं
इस शेर में अभिधा का प्रयोग लक्षणा और व्यंजना के माध्यम से हुआ है। यह बिंब-चाक्षुष श्रेणी का है जो लक्ष्यार्थ बिंब के रूप में प्रकट होता है। यहाँ बोलने की विवशता है। परस्थितियों को समझने के लिए इशारों की बात की गई है।इस बिंब प्रधान शेर में वर्तमान की जटिलता और नए अर्थ व्यक्त कर पाने की क्षमता है।
इसी तरह का एक और शेरे देखें—-
प्रतीक्षा  पूछ ही बैठी उखड़ कर
नज़र किसके इशारे पर गड़ी है
       विजय कुमार स्वर्णकार की ग़ज़लों के आकर्षण के यही रहस्य हैं कि वह सच्ची और तीक्ष्ण हैं जिनमें यथार्थ-दर्शन और विरोध के मिले-जुले स्वर हैं।निश्चित रूप से इनकी ग़ज़लों में वह बेचैनी और छटपटाहट हैं जो दुनिया को बदलने के लिए हैं।
       “शब्दभेदी” विजय कुमार स्वर्णकार का नया ग़ज़ल-संग्रह है जो भारतीय ज्ञानपीठ,दिल्ली से छपकर पाठकों के समक्ष आया है। संग्रह में कुल 99 ग़ज़लें हैं। सारी ग़ज़लों के अपने रंग-रूप तेवर तो हैं ही साथ ही ग़ज़लकार की संवेदना और सरोकारों के क्षेत्र विस्तार भी उद्घाटित होते हैं। इससे ऐसा लगता है विजय कुमार स्वर्णकार ने अपने निजी वास्तविक अनुभव जगत से ही अपनी ग़ज़ल-यात्रा शुरू की है।  कम ग़ज़लकारों में यह देखा जाता है। यही कारण है 52वें वर्ष में ग़ज़ल के प्रथम संग्रह का प्रकाशन।इस उम्र में कई ग़ज़लकार अनेक संग्रहों के स्वामी हैं। जाहिर है ग़ज़लें समय की आंच में तपकर पकी तो होंगी ही।पकी हैं भी। तमाम ग़ज़लों में समय के दबाव और संदर्भों की हलचल साफ-साफ देखी जा सकती है।
पुस्तक के फ्लैप पर द्विजेन्द्र द्विज ने लिखा है”इस शब्दभेदी ग़ज़लकार की अभिव्यक्ति की प्रखरता से सम्पन्न निन्यानवें ग़ज़लों के पाँच सौ अड़तालीस बहुआयामी शे’रों में व्यंजनाओं की अप्रतिम झिलमिल पर विस्मित और अभिभूत हुआ जा सकता है।अतिश्योक्ति नहीं होगी यह कहना कि शिल्प,कहन और अर्थवत्ता के एकदम नए प्रतिमान स्थापित करने वाली ये ग़ज़लें ग़ज़ल-साहित्य जगत को बहुत कुछ नया देंगी।“
प्रश्न उठता है “यह नया क्या है। इसकी पड़ताल तो यहाँ पर आवश्यक हो जाता है। अगर कम शब्दों में कहा जाए तो संग्रह की ग़ज़लों का प्रत्येक शेर अपनी विषय वस्तु के दृष्टिकोण से अपना एक अलग और पूर्ण अस्तित्व रख रहा है। अधिकांश शेरों में बिंब,(दृश्य बिंब,श्रव्य बिंब)प्रतीक,मिथक,रूपक उत्कृष्ट रूप में उभरते हैं। कथ्य के नए-नए रूप सामने आते हैं। जैसा कि आज समय के आतंक से निकलने के लिए एक तल्ख बेचैनी से छटपटाता ढर्रेनुमा व्यवस्था विरोध और छिछले प्रेम का प्रदर्शन ही देखने को मिल रहा है। इनकी ग़ज़लों में विरोध तो हैं लेकिन शिल्प के अन्य तत्वों में छंद,भाषा,शैली,अभिव्यंजना,शब्द-शक्ति मुहावरे भी हैं। हाँ कहीं-कहीं उर्दू-फारसी शब्दों की बोझिलता परेशान ज़रूर करती है। अगर इस पर ध्यान दिया जाता तो मेरी समझ से यह संग्रह इस दशक के महत्वपूर्ण संग्रहों में से एक ज़रूर होता है। फिर भी अधिकांश ग़ज़लंी बोलचाल की ही भाषा में हैं।
        विजय कुमार स्वर्णकार की अधिकांश ग़ज़लें न केवल शब्द-योजना,बल्कि संवेदना की दृष्टि से भी हिन्दी की अपनी ही चीज़ लगती हैं।अनेकानेक पहलुओं को संवेद्य शब्द-रचना में पकड़ने की कोशिश की गई है। उत्कट और तीव्र भावात्मकता ग़ज़लों की विशेषता है।सहज भाषा में कठोर यथार्थ का सम्प्रेषण भी।  इसी वजह से हिन्दी ग़ज़ल को हर दृष्टि से  सर्वथा एक नूतन मोड़ मिला है और वह मोड़ जनवाद की ओर जाता है—–
न सिर्फ़ पाँवों में,देखो सड़क पे छाले हैं
यहाँ  के लोग  बहुत भाग-दौड़ वाले हैं
पाँव  में  वो फटी बिवाई दे
पीर सब की मुझे दिखाई दे
यह कौन आ गया है हमारे पड़ाव में
कोई दबाव  में है तो कोई तनाव में
मन आरती के दीप-सा देने लगा प्रकाश
ऐसी  जगाई  लौ कि  अंधेरे  चले गए
ऐसा भी नहीं है कि जतन काम न आये
आग़ाज़  की  तासीर के अंजाम न आये
अंत  में बातियों ने वो जौहर किया
सोच में था तमस इन पे क्या वार दें
      विजय कुमार स्वर्णकार शिल्प और ग़ज़ल के संधि-स्थल पर खड़े हैं। न कोई आरजकता और न ही ग़ज़ल में अधिक छूट लेने की प्रवृति। हिन्दी ग़ज़ल और काव्य कला के लिए, ग़ज़ल लेखन के लिए और भाषा के प्रांजल प्रवाह के लिए आदर के साथ सदैव रेखांकित किए जाते रहेंगे।संग्रह की सम्पूर्ण ग़ज़लें पठनीय हैं और अपना प्रभाव छोडने में सफल हैं।
समीक्षित कृति
शब्दभेदी (ग़ज़ल-संग्रह)
ग़ज़लकार-विजय कुमार स्वर्णकार
प्रकाशक-भारतीय ज्ञानपीठ,लोदी रोड,नयी दिल्ली-110003
मूल्य-250/-
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अनिरुद्ध सिन्हा गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार)mobile-7488542351email-anirudhsinhamunger@gmail.कॉम

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