बड़ा पाप

–     चांदनी समर

संध्या के समय जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा कर दम तोड़ रही थी तो गुब्बारेवाला भी तेज़ी से गुब्बारे फुला कर अपनी सांसें फुला रहा था। समुद्र तट पर पर्यटकों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। बच्चे भी गुब्बारेवाले की तरफ लपक रहे थे। वह जल्दी-जल्दी गुब्बारे फुला रहा था, क्योंकि, आज उसे ढेर सारे गुब्बारे बेचने थे। गुब्बारे फुलाते-फुलाते जब उसकी सांसें फूल जाती तो उसकी आंखों के सामने एक दूसरा चेहरा हाँफने लगता और वह और तेज़ी से गुब्बारे फुलाने लगता। लेकिन एक दिन में 100 गुब्बारे बिक जाना आसान नहीं था. उसे उम्मीद थी कि वह एक सौ गुब्बारे बेच लेगा. यह उसका उद्देश्य नहीं, जरूरत थी। चेहरा झुर्रियों से भरा था, हाथ कांप रहे थे, मगर मन में एक उमंग थी, जो उसे रुकने नही दे रही थी। यह किसी का जीवन बचाने का सवाल था। बार-बार उसके चेहरे के सामने चारपाई पर फटे कम्बल में लिपटी एक बुढ़िया की सूरत घूम जाती। इस जीवन में वही तो उसकी सबकुछ थी. एक समय था जब उसने पति का पूरा साथ दिया था, लेकिन अब फ़ालिज ने उसे चारपाई पर गिरा दिया था।

बच्चें  दौड़ कर उसके पास आते और गुब्बारे ले कर चले जाते। शाम होते देख गुब्बारे वाले ने उत्साह से पैसे गिने। 330 रुपए हो गये थे, लेकिन उसे पत्नी के इंजेक्शन के लिए 500 रुपये चाहिए थे। गुब्बारेवाले को पता था कि आज वह पत्नी को इंजेक्शन नहीं दिला पाया तो उसकी जान शायद ही बच पाए। रविवार के कारण बाजार में भीड़ अधिक थी, इसलिए उसे आशा थी कि वह 500 रुपए के गुब्बारे बेच लेगा। तभी एक ओर से लड़कों का एक समूह उधर से गुज़रा। रंग-बिरंगे गुब्बारे को देख उन लड़कों के मन में भी गुब्बारे लेने की इच्छा हुई़। एक लड़के ने आगे बढ़ कर चार गुब्बारे मांगे। गुब्बारेवाले ने लाल पीले रंग के चार गुब्बारे उसकी तरफ़ बढ़ा दिए। बदले में लड़के ने 10 रुपये दिए।

“10 नही 20 हुए। 10 रुपये और दो”, गुब्बारेवाले ने कहा।

“अरे कोई बात नही इतना ही रख लो।” लड़के ने बड़े आराम से कहा।

“अरे! कैसे रख लें। पांच रुपए के हिसाब से चार गुब्बारों के 20 रुपये हुए।” गुब्बारेवाले ने कहा।

“अरे, सबसे तो लेते ही हो। एक से थोड़ा कम ही लोगे तो क्या होगा।” लड़के ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“ऐसे कैसे कम ले लें। पैसे पूरे दो, नहीं तो दो गुब्बारे वापस कर दो।” गुब्बारेवाले ने दो गुब्बारे वापस मांगे।

“अरे क्या हो गया। इत्ते गुब्बारे तो है तेरे पास। दो से क्या जायगा।” एक दूसरे लड़के ने ठिठाई से कहा।

“पैसे नही थे तो गुब्बारे लेने ही नही चाहिए थें।” अब गुब्बारेवाले की आवाज में झल्लाहट थी।

“अबे, क्या बोला।” एक लड़का गुस्से में पलटा।

“हाँ, पैसे नही हैं तो गुब्बारे छोड़ जाओ।” बूढ़े ने तंग आकर कहा।

“अच्छा गुब्बारे छोड़ दें।” एक दूसरे लड़के ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“हाँ गुब्बारे छोड़ जाओ।” बूढे ने फिर कहा।

“लो छोड़ दिया।” कहते हुए उस लड़के ने उसकी साइकिल में लगे सारे गुब्बारें आकाश में छोड़ दिये। सारे लड़कें जोर-जोर से हंसने लगे और गुब्बारा वाला उड़ते गुब्बारों को देखता रह गया। उसे गुब्बारें नही बुढ़िया के प्राण उड़ते दिख रहे थे। वो धड़ाम से ज़मीन पर बैठ गया। उसे आगे जाते लड़कों की बाते सुनाई दी। एक लड़का दूसरे लड़के को कह रहा था- “तुम्हे उसके सारे गुब्बारे नही उड़ाने चाहिए थे। बेचारा…”

“अरे तू क्यों इतना अफ़सोस कर रहा है। हमने कौन सा किसी की हत्या कर दी है। गुब्बारे ही तो उड़ाए हैं। कोई बड़ा पाप नही कर दिया।”

दूसरे लड़के ने उसके कंधे पर हाथ मारा और आगे बढ़ते चले गए।

गुब्बारेवाला बादलों की ओर जाते गुब्बारों को देखता रहा और उसकी आंखों से आंसू बहते रहे़. गुब्बारे के ओझल होते ही वह गश खाकर वहीं गिर पड़ा

 

 

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