डिलीट होते रिश्ते                  

‘समकालीन कथा परिदृश्य  में मुखरित संवेदनहीन होते मानवीय रिश्ते’ – आज का यही मुद्दा था. व्हाट्सएप ग्रुप ’वाक् युद्ध’ के इस  वैचारिक बहस में वह भी कूद पड़ा था. ग्रुप के सदस्यों के विचार पढ़ने और बड़ी शिद्दत से अपना पक्ष रखने में वह पूरी तरह तल्लीन था .
उसी कमरे में पत्नी भी मौजूद थी. उसके भी हाथ में एंड्रोयाइड  मोबाइल था. वैसे वह नई फेसबुकिया थी. वह किसी दूर दराज़ की एक नई फ्रेंड से चैटिंग करने में मशगूल थी. शायद किसी नई रेसिपी बनाने की विधि को लेकर जानकारियों का आदान-प्रदान हो रहा था.
एक ही कमरे में मौजूद रहने के बावजूद संवादहीनता की स्थिति में कब शाम उतर गई , उन्हें पता ही नहीं चला.
अचानक कॉलबेल गुनगुनाया. किसीके आगमन की सूचना थी. कॉलबेल की आवाज़ कानों में पड़ते ही दोनों ने एक दूसरे को देखा. चेहरों पर विरक्ति के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे. वैचारिक ज़ंग में इस अप्रत्याशित अवरोध से वह झुंझलाया. उसने अपनी पत्नी को इस उम्मीद से देखा कि शायद वह उठकर ‘अटेंड’ करे. लेकिन पत्नी अपनी ज़गह से हिलने को कतई तैयार नहीं थी. रेसिपी बताने की विधि पर सवाल-ज़वाब का  सिलसिला पूरे उफान पर था. ….विधि  बताने के दौरान अपने अपने हसबैंड को लेकर दिलचस्प चुहलबाजियां भी हो रही थी.
फिर एक बार कॉलबेल गुनगुनाया.
“ओह !” वह बुरी तरह झुंझलाते हुए उसने अपने घरेलू सेवक को हांक लगाई , “शामू , दरवाज़ा खोलो तो !”
“जी साब !” कहकर शामू दरवाजे के क़रीब पहुँचने ही वाला था कि उसने धीरे से हिदायत दी , “ और सुनो , कह देना कि घर पर कोई नहीं है.”
दोनों ने एक दूसरे को देखा. दोनों के चेहरों पर ‘रुकावट’ से निजात पाने के भाव हल्की मुस्कान के साथ चस्पां थे.

फ़ासला बरकरार है 

एब्रोड में रह रहे अपने बेटे-बहू से जी भर कर स्काइप पर बातचीत कर लेने के बाद मिस्टर लोबो सोफे में धंस गए. थोड़ी ही देर बाद उनकी पत्नी ने गरमा-गरम कॉफ़ी देकर उनकी ख़ुशमिज़ाजी में इजाफा कर दिया. कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए पत्नी से मुख़ातिब हुए , “गज़ब की तरक्की की है टेलीकम्युनिकेशन ने. ….रियली इट्स ए रेव्यूलेशन ऑफ़ टेक्नोलॉजी….सो स्ट्रेंज !”
“हाँ , ठीक कहते हो. अपने ज़माने में तो हम रेडियो और ट्रांजिस्टर को ही न्यू टेक्नोलॉजी मान कर चल रहे थे.”
“अब देखो न , सैकड़ों मील दूर रहने वाले अपने लोग विदीन ए सेकेंड कनेक्ट हो जा रहे हैं. फ्रंट- टू-फ्रंट हम कन्वर्स भी कर रहे हैं. दुनिया के किसी भी कंट्री की ख़बरों से पलक झपकते वाकिफ़ हो जा रहे हैं.”
“इस रेव्यूलेशनरी प्रोग्रेस से दुनिया कितनी छोटी हो गई है. लगता है वह हमारी मुट्ठी में सिमट गई है.” पत्नी ने समर्थन किया.
“और फ़ासले भी कम हो गए हैं. पहचान का दायरा भी कितना बढ़ गया है सोशल मीडिया से.”
कॉफ़ी ख़त्म कर मिस्टर लोबो बैंक जाने के लिए बिल्डिंग की चौथी मंजिल से नीचे उतरे तो देखा कि बड़ी तादाद में लोग जमा थे. इतनी बड़ी भीड़ की उपस्थिति के बावजूद माहौल शांत था. बीच – बीच में सिर्फ़ सिसकियाँ ही ख़ामोशी को तोड़ रही थी. मिस्टर लोबो भीड़ इकट्ठी होने की वज़ह जानने के लिए उतावले हो गए. उन्होंने फ़ौरन सामने खड़े सिक्यूरिटी गार्ड से पूछा.
“सर , आपको मालूम नहीं , श्रीवास्तव सर की मम्मी गुज़र गई ……..एक साल बीमार चल रही थी.”
“कौन श्रीवास्तव ?” पुरजोर दिमागी मशक्कत के बाद भी जब कोई चेहरा श्रीवास्तव बन कर नहीं उभरा तो उन्होंने आहिस्ता से पूछा.
“ लो जी  , आपको यह भी नहीं मालूम !  …..थर्ड फ्लोर में पाँच सालों से रह रहे हैं. कुछ दिन पहले ही तो उनके पिताजी बिल्डिंग की सीढ़ी से गिर गए थे. सप्ताह भर अस्पताल में रहने के बाद गुज़र गए. सुनते हैं ब्रेन हैमरेज हो गया था.”
“ओह , वेरी सैड !”
अपने बगलगीरों को न पहचानने और उनके अच्छे –बुरे हाल-समाचार से नवाकिफ़ होने की शर्मिंदगी और अफ़सोस के अतिरेक में उनकी ज़ुबान से यही निकला , “डिस्टेंस इज स्टील रिमेनिंग …!”

भगवान के नाम पर          
शहर के भव्य मंदिर के बाहर और भीतर दर्शनार्थियों की अपार भीड़ लगी हुई थी. शायद आज कोई धार्मिक उत्सव था. मंदिर से कुछ हटकर पूजन सामाग्रियों के अलावा फल वगैरह की दुकानें पंक्तिबद्ध लगी हुई थी.
मैं हरिया की दुकान से कुछ फल खरीद रहा था. सहसा चीथड़े में लिपटी वृद्ध काया वाली एक भिखारिन दुकान के समीप आ धमकी , “भला हो बेटा तेरा , भगवान के नाम पर एक केला दे दे !” मुझ जैसे कबाब में हड्डी को उपस्थित देख हरिया झुंझलाया और फ़ौरन झूठ बोल दिया , “आगे जाओ माई , फ़ालतू केला वेला नहीं है.” फिर जाने क्या सोच कर उसने एक सड़ा केला उठाकर उस भिखारिन के हाथ में थमा दिया. केला लेकर उसने क्षणांश उसे उलट-पलट किया और अपने पिचके सिल्वर के कटोरे से दो रूपये का एक सिक्का निकालकर हरिया की ओर बढ़ाते हुए कहा , “ ले पैसे ले , एक केला और दे !
पैसे लेकर हरिया ने एक बढ़िया सा केला उसे थमा दिया.
अचानक वह भिखारिन मंदिर की ओर मुड़ी और अपने लाठी तथा कटोरे को नीचे रखकर दोनों हथेलियों से केले को पकड़ कर चीखने लगी , “देख ले भगवान , तेरे नाम पर मिला सड़ा केला और पैसे से मिला बढ़िया केला…..अब  बता तू बड़ा न पैसा बड़ा ? फिर वह ठठाकर हंसने लगी.
हरिया अपने को व्यस्त दिखाने के लिए केलों के ढेर पर अकारण हाथ फेरने लगा.

प्रतियोगिता

एक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय स्तर की युवा कविता प्रतियोगिता में आई सैकड़ों प्रविष्टियों को पढ़ी , परखी जा रही थी. एक मुख्य निर्णायक और तीन सहायक निर्णायक में से एक ने एक लम्बी कविता उठाई.  शीर्षक था , ‘अपलोड होते सपनों में तुम्हारी तस्वीरों को डिलीट करते हुए’. एक सांस में उन्होंने पूरी कविता पढ़ डाली. कविता सर के ऊपर से गुज़र गई. दुबारा पढ़ी, तिबारा पढ़ी. दिमाग की नसें तड़कने लगी. लेकिन पल्ले नहीं पड़ी. झुंझलाकर उन्होंने उस कविता को दूसरे निर्णायक की ओर खिसका दिया वगैर कोई टिप्पणी किये. वही हाल दूसरे निर्णायक का भी था. दो-तीन मरतबा बड़े मनोयोग से पढने के बाद भी उनकी कविता की ‘समझ’ ने जब ज़वाब दे दिया तो उन्होंने तीसरे निर्णायक की ओर उस कविता को बढ़ा दिया. तीसरा निर्णायक कविता के शीर्षक को लेकर ही बहुत देर तक उलझा रहा. जबर्दस्त दिमागी कसरत और माथा-पच्ची करने के बाद भी जब शीर्षक का मतलब खुला नहीं तो उन्होंने कविता को वगैर पढ़े मुख्य निर्णायक को सौंप दिया.
मुख्य निर्णायक धीर-गंभीर होकर अत्यंत तन्मयतापूर्वक कविता को पढ़ते हुए उसे  जांचना-परखना शुरू किया. एक लम्बे समय के बाद उन्होंने आँखों से चश्मा उतार कर टेबुल पर रख दिया. कुर्सी पर गर्दन को पीछे टिकाकर अपनी आँखें मूंद ली. चांद सरीखे अपने सर को सहलाते हुए कुछ बुदबुदाते रहें. सहायक निर्णायकों की उत्सुक और व्याकुल आँखे उन पर टिकी हुई थीं प्रतिक्रिया जानने के लिए. बहुत देर बाद उसी अवस्था में रहने के बाद उन्होंने अपनी आँखों को चश्मे के हवाले किया और उस प्रविष्टि पर अपनी टिप्पणी दर्ज़ की.
महीने भर बाद लखटकिया पुरस्कार की घोषणा हुई. प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत कविता का शीर्षक था , ‘अपलोड होते सपनों में तुम्हारी तस्वीरों को डिलीट करते हुए

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संपर्क : अपर बेनियासोल , पो.आद्रा , जिला-पुरुलिया , पश्चिम बंगाल 723121  मो. 09800940477
email- martin29john@gmail.com

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