सावन हे सखी सगरो सुहावन

कहते हैं, समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव -शंकर ने जब हलाहल का पान किया तो उनका पूरा शरीर विष  के ताप से नीला हो गया. इस ताप के शमन के लिए इंद्र भगवान ने खूब वर्षा की. संभवत: इसी वजह से भगवान शिव को जल का अभिषेक सर्वाधिक प्रिय है.
कवि अपनी कल्पना में अक्सर धरती को प्रेमिका और आसमान को प्रेमी के रूप में देखता है. धरती जब जेठ की धूप में झुलसने लगती है. तब आसमान बादल को धरती पर भेजकर  शीतल प्यार की बरसात  करता है. उसे चूमता है बूंदों  की शक्ल में ढलकर, दुलारता  है उसे उसके आंचल में हरियाली को सौंप कर. दरअसल कवि की निगाह में धरती और आसमान को एक साथ मिलाने का माध्यम बादल  और उसकी बूंदें हैं.
सावन का महीना आते ही कई स्मृतियां आंखों में बादल बन उमड़ने -घुमडने  लगती हैं. कभी घर के शहतीर में बने बड़े-बड़े झूले याद आते हैं. तो, कभी बगीचे में बने बच्चों के झूले. पर, हम हमेशा घर में महिलाओं की खातिर बने झूले में ही झूलने को बेताब रहते थे. झूले के दोनों तरफ से दो स्त्रियां और बीच में बैठी  कई स्त्रियाँ.  इस अद्भुत नजारों के साथ  सुरीले स्वर में गाई जाने वाली बारहमासी  को भला कौन भूल सकता है ?  स्त्रियां जब शुरू करती थी वह गीत —

“सावन हे सखी सगरो सुहावन रिमझिम बरसे मेघ है”

तो बादल भी गरजने -बरसने को आतुर हो उठते थे. क्या किशोरी, क्या युवती, क्या ब्याहता? सभी अपने हाथों में मेहंदी रचाए हरी – हरी चूड़ियां पहने खुद को धरती सरीखी बना लेती थी.
वैदिक साहित्य के अनुसार संपूर्ण सृष्टि पंचमहाभूतों (जल ,पृथ्वी, अग्नि आकाश एवं वायु ) से निर्मित हुआ है. हमारा शरीर भी इन्हीं के मिलने से बना है और यही जीवन का आधार भी  है. जब हम विस्तार में जाते हैं तो यह पृथ्वी ,जल, अग्नि, आकाश एवं वायु को  ही पर्यावरण कहते हैं. पर्यावरण यानी की वातावरण. वातावरण जिसमें जलचर, नभचर, थलचर व पृथ्वी के गर्भ के जीवन से लेकर ब्रह्मांड के ग्रह -नक्षत्र तक होते हैं. पेड़ लगाना हमारी परंपरा रही है. पेड़ को हम पूजते हैं. शादी -विवाह में आज भी आम -महुआ ब्याहने का प्रचलन है. यह प्रचलन कहीं न कहीं पर्यावरण को बचाए रखने की खातिर ही अस्तित्व में आई होगी. पर, आज हम अंधा-धुंध पेड़ काट कर नगर बसाने की ओर अग्रसर हैं. यह कैसा विकास है? क्या यह विकास के आड़ में विनाश को न्योतने का उपक्रम नहीं है ? हम अपने आने वाली पीढ़ी को कैसी धरती सौंप रहे हैं ? पॉलिथीन के अंधाधुंध प्रयोग ने न केवल हमारी नदियों व नालों को प्रभावित किया है, अपितु चापाकल लगाने में भी समस्या आ रही है. क्या झोला लेकर चलना हमारी शान के खिलाफ है ? क्या हम झूठी शान के लिए जीवन को खतरे में डाल सकते हैं ? कैसे बौद्धिक लोग हैं हम ? फेसबुक व  वाट्स एप्प पर तो खूब बहस करते हैं. पर, जीवन में उतारने की बारी आती है तो पीछे  की सीट पर बैठ जाते हैं. ऐसी बौद्धिकता किस काम की ? जो हम पर्यावरण की ओर सचेत करने में  भी सफल न हो.
तो, आइए मित्रों हम छोटे-छोटे लक्ष्य रखें  और उस पर अग्रसर हों. आज हम प्रतिज्ञा करें कि “* मैं पॉलिथीन  में कोई भी सामान नहीं लूंगा/ लूंगी”**. इस तरह हम  एक सुन्दर -स्वच्छ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें. फिर देखिएगा अबकी सावन झूम के बरसेगा और हमारी धरती को हरियाली से भर देगा.

– भावना

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One thought on “संपादक की कलम से ( तीसरा संस्करण )”
  1. आपके इस पहल का हम स्वागत करते है शुभकामनाये

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