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Tag: बहत्तरवां अंक

ख़ास कलम :: आकांक्षा कुमारी
खास कलम -

ख़ास कलम :: आकांक्षा कुमारी

September 25, 2023

शरीर का अंत मृत्यु नहीं होती   बड़े अरमानों को लेकर घरों को छोड़ आयें सीखने मौत को यमराज से छीन लेने की कलाएँ धरती का भगवान सुनती रही हूँ…

विशिष्ट ग़ज़लकार :: दिनेश तपन
ग़ज़ल - विशिष्ट ग़ज़लकार

विशिष्ट ग़ज़लकार :: दिनेश तपन

September 25, 2023

दिनेश तपन की ग‍़ज़लें 1 धन  दौलत  संजोते  रह  गए पाप उमर भर ढोते  रह गए   थी ख़ुशियों  की जिन्हें तमन्ना वे  ही सब दिन  रोते रह गए  …

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संपादकीय

संपादकीय –

 

 

संपादकीय –

बदलती जीवनशैली और झुलसती प्रकृति

गर्मी अपने चरम पर है। इस मौसम में बिजली की आंख-मिचौली भी लगातार जारी है। गेहूं की कटाई के बाद उसके सुरक्षित भंडारण की जिम्मेदारी भी किसान इसी महीने निभाते हैं। कड़ी धूप में गेहूं को सुखाकर, गेहूं के भूसे और नीम के पत्तों के साथ कोठी (अनाज रखने का पात्र) में बड़े ही जतन से अनाज को रखा जाता है। यह धूप जहां लीची में मिठास भरने के लिए आवश्यक है, वहीं अमोल (टिकोले) को पककर आम बनने के लिए भी जरूरी है। कुदरत ने हमें गर्मी के महीने को उसकी पूरी खूबसूरती और जीवंतता के साथ जीने का संदेश दिया है।
स्कूल और कॉलेजों में भी लगभग ग्रीष्मावकाश (गर्मी की छुट्टियां) शुरू हो चुकी है। लोग घरों में दिन-रात एसी चलाकर पड़े रहते हैं। तरक्की की सुविधा मिली है, तो उसका लाभ जरूर उठाना चाहिए, लेकिन एक सीमा में। आपको कोरोना का वह भयावह दौर याद होगा, जब एसी में रहने वाले अधिकांश लोग अधिक गंभीर स्थिति में पहुंच गए थे। तब डॉक्टरों ने भी एसी का प्रयोग कम करने की हिदायत दी थी।
गर्मी के मौसम में गर्मी का आनंद न लेकर, कृत्रिम रूप से वसंत (ठंडक) लेकर बैठना कहीं से भी मुनासिब नहीं है। एक तरफ हम एसी के आदी हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ पसीना बहाने के लिए जिम जा रहे हैं। जब कुदरत खुद हमारे शरीर से पसीना निकालकर उसे शुद्ध करना चाहती है, तो वह हमें पसंद नहीं आता। अंधानुकरण की यह होड़ मनुष्य को पतन (रसातल) की ओर ले जा रही है।
आज कोई भी रुककर सोचने को तैयार नहीं है। पृथ्वी रहे या भाड़ में जाए, बस दिखावे की होड़ मची है- “उसने एसी खरीदा है, तो मैं भी लूंगा; उसने नया फ्रिज लिया है, तो मुझे भी लेना है; मोबाइल एक साल से ज्यादा नहीं चलाना क्योंकि नए फीचर्स आ गए हैं.. इत्यादि-इत्यादि। नकल भी अगर अकल के साथ हो, तभी अच्छी लगती है; वरना बिना सोचे-समझे की गई नकल सिर्फ नुकसान ही पहुंचाती है। इसलिए आइए, मिलकर पृथ्वी को बचाएं और कुदरत के हर मौसम का स्वाभाविक आनंद लें।

  • डॉ भावना

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आंच व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है. इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं. लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
यह पत्रिका प्रत्येक महीने की एक तारीख को प्रकाशित की जाती है. कृपया रचनाएं इमेल पर भेजें. रचनाओं के मौलिक व किसी अंतरजाल पर प्रकाशित नहीं होने का प्रमाण भी संलग्न करें.
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