भटकाव में इंसानियत से मुलाकात :: रूबी भूषण

भटकाव में इंसानियत से मुलाकात रूबी भूषण   जाने से पहले थोड़ा ठहरो तो, भीगी आँखों से आज बोलो तो… इस यात्रा का क्या नाम दूँ, आज तक नहीं समझ…

‘चिड़ियों की दावेदारी’ गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति :: जयप्रकाश मिश्र

‘चिड़ियों की दावेदारी” गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति जयप्रकाश मिश्र डॉ भावना साहित्य जगत में एक सुपरिचित एवं सम्मानित नाम है। इनकी सद्य प्रकाशित गजल संग्रह ” चिड़ियों…

‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ में समय, समाज और प्रतिरोध की चेतना :: विजय वेदांत     

‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ में समय, समाज और प्रतिरोध की चेतना विजय वेदांत समकालीन हिन्दी ग़ज़ल आज केवल प्रेम, विरह और निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति तक सीमित…

 ‘खैराबेमू’ : रंगकर्मी ‘पंकज’ का समानान्तर नाट्य-आन्दोललन :: डॉ.अमर पंकज

 ‘खैराबेमू’ : रंगकर्मी ‘पंकज’ का समानान्तर नाट्य-आन्दोललन – डॉ अमर पंकज सारांश: आचार्य प्रोफेसर ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ का जन्म 30 जून 1919 को तत्कालीन बिहार के संताल परगना जिला…

मन और मंज़र :: शुभम कुमार

मन और मंज़र (संस्मरणात्मक ललित निबंध) – शुभम कुमार प्रतिदिन की भाँति आज भी सुबह की मॉर्निंग वॉक के बाद जब मैं अपने बगीचे में पहुँचा, तो खिले फूलों को…

नदी को बहने दो : अनिरुद्ध प्रसाद विमल

नदी को बहने दो – अनिरुद्ध प्रसाद विमल श्रेयसी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। यह दूसरा दिन था। खाने की इच्छा होती, परन्तु खाया नहीं जाता। नर्क से…

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में जन-मुक्ति की चेतना :: डॉ.अविनाश भारती

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में जन-मुक्ति की चेतना – डॉ.अविनाश भारती हिन्दी ग़ज़ल का विकास एक सांस्कृतिक संक्रमण की कथा है। अरबी-फारसी परंपरा में जन्मी यह विधा जब उर्दू में विकसित…