सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है :: विजय वेदांत

सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है   – विजय वेदांत ‘खामोशियों का दौर’ जितेंद्र कुमार ‘नूर’ का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है, जिसमें समकालीन भारत के राजनीतिक, सामाजिक…

डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ

डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ   1. पत्नी गूंगी, पति बहरा एक दिन पत्नी ने कहा अब मैं चुप रहूंगी तुमको किसी भी तरह कभी तंग नहीं करूंगी…

देख सको तो देख :: डॉ.अविनाश भारती

देख सको तो देखो डॉ अविनाश भारती समकालीन हिन्दी ग़ज़ल अपने समय की बेचैनियों, संघर्षों और आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने वाली एक सशक्त विधा के रूप में…

विशिष्ट कवयित्री :: अनीता सिंह

अनीता सिंह की पांच कविताएं   बरसा हथिया चौरी-चांचर सूंड गिराकर हथिया बरसा जोर- जोर से।   जब चढ़ता अदरा नहीं बरसे तब माटी फसलों को तरसे विदा काल जब…

भटकाव में इंसानियत से मुलाकात :: रूबी भूषण

भटकाव में इंसानियत से मुलाकात रूबी भूषण   जाने से पहले थोड़ा ठहरो तो, भीगी आँखों से आज बोलो तो… इस यात्रा का क्या नाम दूँ, आज तक नहीं समझ…

‘चिड़ियों की दावेदारी’ गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति :: जयप्रकाश मिश्र

‘चिड़ियों की दावेदारी” गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति जयप्रकाश मिश्र डॉ भावना साहित्य जगत में एक सुपरिचित एवं सम्मानित नाम है। इनकी सद्य प्रकाशित गजल संग्रह ” चिड़ियों…

‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ में समय, समाज और प्रतिरोध की चेतना :: विजय वेदांत     

‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ में समय, समाज और प्रतिरोध की चेतना विजय वेदांत समकालीन हिन्दी ग़ज़ल आज केवल प्रेम, विरह और निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति तक सीमित…