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दिन कटे हैं धूप चुनते रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते। प्यास लेकर जी रहीं हैं आज समिधाएँ नई कुण्ड में पड़ने लगीं हैं क्षुब्ध आहुतियां कई…
विशिष्ट गीतकार :: डॉ. संजय पंकज
डॉ. संजय पंकज के तीन गीत मां तो होती सबके आगे पीछे रहती रखती सबको साए में! मां तो होती धूप चांदनी कुछ गाए अनगाए में! संबंधों की पूरी दुनिया…
विशिष्ट गीतकार :: शैलेंद्र शर्मा
सावन के झूले यादों में शेष रहे सावन के झूले गाँव-गाँव फैल गई शहरों की धूल छुईमुई पुरवा पर हँसते बबूल रह-रहके सूरज तरेरता है आँखें बाहों में भरने को…
