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रंजन कुमार झा (1) व्याधि तुझे तो आना ही था सँग कुदरत के इन मनुजों ने जो निर्मम व्यवहार किया है भू, जंगल, पर्वत, नदियों पर जितना अत्याचार किया है…
विशिष्ट गीतकार : जय कृष्ण राय तुषार
एक गीत-ये हमारे प्रान बहुत मुश्किल से हवा में लहलहाते धान ये नहीं हैं धान , प्यारे ये हमारे प्रान ! जोंक पांवों में लिपटकर रही पीती खून, खुरपियों से…
विशिष्ट गीतकार :: धीरज श्रीवास्तव
(1) क्या रक्खा अब यार गाँव में! नहीं रहा जब प्यार गाँव में! बड़कन के दरवाजे पर है खूँटा गड़ा बुझावन का! फोड़ दिया सर कल्लू ने कल अब्दुल और…
