समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में युवा ग़ज़लकारों का हस्तक्षेप

  • डॉ.भावना 

हमारा देश युवाओं का देश है। हर पीढ़ी के पास अपनी सोच और विचार होते हैं, जो समाज के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। युवा शक्ति के बल पर ही कोई समाज निर्माण  और विध्वंस की ओर अग्रसर होता है। विवेकानंद के अनुसार युवा वह है जो बुराइयों से लड़ता है, दुर्गुणों से दूर रहता है और जिस में होश और जोश दोनों हो। दुनिया का कोई भी आंदोलन और विचारधारा युवा शक्ति के बिना सशक्त नहीं हो सकता। वैसे जब बात गज़ल की आती है , तो लोग कहते हैं कि गज़ल लिखना कोई बच्चों का खेल नहीं है ।उम्र बीत जाती है ,इसे साधने में । पहले सालों तक तरही ग़ज़ल लिखकर रियाज किया जाता है  तब ही ग़ज़ल  मुकम्मल रूप में सामने आती है। ग़ज़ल  अरब से होते हुए फारसी,  उर्दू और हिंदी में आई है,इसलिए इसका व्याकरण भी आयातित है ,जिसे समझने में बहुत समय लगता है।पहले वरिष्ठ शायर से इसलाह किए बिना शायरी अधूरी मानी जाती थी। तरही शायरी में महारत हासिल करने के बाद ही स्वतंत्र शायरी की इजाजत मिलती थी। अब वह दौर लगभग  खत्म हो चुका है। आज विभिन्न पत्रिकाओं और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री ने काफी हद तक राह  आसान कर दी है। फेसबुक और व्हाट्सएप जैसी सोशल साइट्स पर निशुल्क कक्षाएं चलाई जा रही हैं, जो युवकों के लिए काफी कारगर सिद्ध हुई है। कहना न होगा कि युवाओं को लाइमलाइट मे लाने का काम फेसबुक, व्हाट्सएप और टि्वटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स ने किया है ।हाँ !हिंदी ग़ज़ल में युवाओं की भूमिका पर बात करते हुए अगर मैं देश के सबसे बड़े  छंद शास्त्री दरवेश  भारती जी का नाम न लूँ तो  युवा लेखन के  दशा और दिशा पर की गई बात अधूरी मानी जाएगी। दरवेश भारती ने अपनी पत्रिका’ गज़ल के बहाने’ के द्वारा युवा गज़ल कारों की एक पीढ़ी तैयार की है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता ।आज भी युवा गज़लकार अगर कहीं किसी बहर में फंसते हैं ,तो उससे बाहर निकलने के लिए गज़ल के बहाने का अवलोकन अवश्य करते हैं। दरवेश भारती एक  ऐसे गुरु थे, जिन्होंने बिना शुल्क हजारों एकलव्य पैदा किए। बाद के दिनों में उन्होंने व्हाट्सएप पर भी कक्षाएं लेना शुरू कर दी थी।

 

आज हिंदी ग़ज़ल की युवा पीढ़ी पूरे दमखम के साथ गज़ल के शिल्प को साधते हुए अपनी गज़लों का लोहा मनवा रही है। हिंदी ग़ज़ल में युवा पीढ़ी को दिशा देने में एक और महत्वपूर्ण नाम अनिरुद्ध  सिंहा का भी है,  जिन्होंने हिंदी ग़जल के युवा चेहरे को संपादित कर युवा ग़ज़लकारों को एक प्लेटफॉर्म  देने का प्रयास किया है। भोपाल ,मध्य प्रदेश से निकलने वाली पत्रिका गीत गागर ने भी युवा महिला ग़ज़लकार  पर  विशेषांक निकाला है, जो यकीनन एक बड़ा काम है।

 

आज हिंदी गजल के पास कई ऐसे युवा चेहरे हैं जिनकी लेखनी प्रतिबद्ध लेखन का आईना है। ऐसे ही कुछ युवा चेहरों में मैं एक महत्वपूर्ण नाम के पी अनमोल का लेना चाहूँगी।  के पी  अनमोल युवा हिंदी ग़ज़ल के पांक्तेय  ग़ज़ल कारों में शुमार  हैं ।गज़ल में नयापन ढूंढना और उस नयापन का खुलकर प्रयोग करना इनकी खासियत है। गज़ल की पूरी परंपरा से सुपरिचित  होने के बाद अगर किसी शायर की अपने समय की जद्दोजहद ,आशा- आकांक्षा  जय- पराजय ,असंतोष -आक्रोश और टेक्नोलॉजी के साथ बदलते समाज की मानसिकता पर भी नजर हो तो फिर उसके शेरों की चमक देखते ही बनती है ।के पी अनमोल के कुछेक शेर  उदाहरण स्वरूप देखे जा सकते हैं-

एक तो शहरों में मम्मी और पापा व्यस्त  हैं

दूर बच्चों से बहुत है दादी -नानी सो अलग

या

चावल ,चीनी और आटे पर रोना था

यानी मन भर सन्नाटे पर रोना था

या

अफसोस, दर्द ,टीस, घुटन बेकली, तड़प

क्या- क्या पटक के जाती है दुनिया मेरे आगे

 

रामनाथ बेखबर एक बेहद संजीदा युवा गज़लकार हैं ।इनकी ग़ज़लें बरबस  आपको आकृष्ट किए बिना नहीं रह सकती। कहन का टटकापन   के साथ शिल्प का बखूबी निर्वाह इनकी खासियत है। इनके शेर देखें-

हो मेला कि महफिल या बाजार कोई

अकेला यहाँ अब तो हर आदमी है

या

शिखर पे बैठ समंदर नसीब कैसे हो

नदी के मन में जगी है ढलान की ख्वाहिश

या

चमक रहे हैं सितारे गगन में सदियों से

जमीं के हक में भी थोड़ी- सी रोशनी देकर

 

अभिषेक कुमार सिंह ने बहुत कम समय में गज़ल की दुनिया में अपना नाम बेहतरीन शायरों की सूची  में शुमार किया है। उनके कुछ शेर देखें-

इसलिए हमने सफर से पांव को रखा अलग

हम अगर चलने लगें तो रास्ते मर जाएंगे

या

जहां नीलाम होती हों बहारें

वो मेरे ख्वाब का गुलशन नहीं है

या

नाकाम हो गई मेरी चलने की कोशिशें

मजबूरियों का काफिला घुटने से है बंधा

 

सोनरूपा विशाल उत्तर प्रदेश,बदायूं  से  आती हैं और ये लगातार ग़ज़ल  के साथ-साथ गीत में भी काम करती रहती हैं। ये जितना अच्छा लिखती हैं ,उतना ही अच्छा तरन्नुम में पढ़ती भी हैं। इनके कुछ शेर आप देखें-

रखूंगी ध्यान इसका इस तरह मैं

कि जल्दी फूल को झड़ने न दूंगी

या

वो हारा है मगर टूटा नहीं है

वो शायद हौसलो से बाज़ होगा

या

सवेरे की थकन आंखों से बोली

ये सोना तो कोई सोना नहीं था

 

युवा ग़ज़लकार  राहुल शिवाय जितना अच्छा गीत लिखते हैं, उतनी ही अच्छी गज़लें  लिखते हैं और उतना ही बढ़िया दोहा लिखते हैं। कुल मिलाकर कहूं तो जैसे वे छंद के लिए ही बने हैं। उनके कुछ  शेर देखें –

चाह थी, कुछ रोटियां दे जाएगा हिस्से में वो

भाषणों में ख्वाब जो बस, आसमानी दे गया

या

बोलते हैं सिर्फ हम सब ,क्यों जतन करते नहीं

ये न सोचो ,सोचते ही झट -से गौना हो गया

 

सिखाओ तुम मोहब्बत ही, सिखाओ मत कोई मजहब

मोहब्बत के बिना हर शय ही बेबुनियाद लगती है

या

तुम्हें लगे तो लगे ताज ये घर उल्फत का

मुझे तो कट गये हाथों का हुनर लगता है

 

 

छोटी बह्र में ग़ज़ल लिखना सबसे कठिन माना जाता है। कुंदन आनंद कम शव्दों में छोटी बात कहने की हुनर में महारत हासिल किये हुए हैं।शेर देखें –

हम न जाने क्या से क्या खोते गये

इक जरा-सी चीज पाने के लिए

 

धूप कैसी भी हो पर काफी नहीं

इक समंदर को सुखाने के लिए

 

आजकल के युवा ग़ज़लकार ग़ज़ल को  साध लेना चाहते हैं ताकि शिल्प की बारिकियों को नजरअंदाज करने का आरोप उनपर लगे।महज 24 साल के युवा ग़ज़लकार गौरव कुमार नायक का ये शेर देखें-

अजब – सा शोर है इक मेरे भीतर

मेरी दुनिया से कोई जा रहा है

या

रस्सी पर जब भूख हमें चलवायेगी

हमको सारे लोग मदारी समझेंगे

 

ए. एफ. नज़र युवा ग़ज़ल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।पहल,सहरा के फूल और लोबान  ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हैं जो एक एफ नजर के प्रतिबद्ध और सक्रिय लेखन के प्रमाण हैं।

इनके शेर देखें –

अपना रिश्ता क्योंकर तोड़ें ,झूठी जिद की खातिर हम

तुझको प्यारा तेरा सच है,मुझको प्यारा मेरा सच

या

मीर मसीहा सब बीमार

जान बचेगी कैसे यार

 

ज्ञान प्रकाश पांडेय एक ऐसे युवा ग़ज़लकार हैं ,जिनकी ग़ज़लें आपको ठिठक कर बार-बार पढने पर विवश करेगी ।सर्द मौसम की ख़लिश ग़ज़ल संग्रह द्वारा सूर्खियों में आया यह ग़ज़लकार भीड़ से बिल्कुल अलग दिखाई देता है।इनके कुछ शेर देखें –

धूप पहनकर, भूख दबाकर इस गर्मी में पैदल -पैदल

बेचारी है पेट से घुन्नन की घरवाली कैसे जायें

या

 

अब न आँगन के और टुकड़े कर

ये सियासत है जहर घोलेगी

या

फकत दो जून की रोटी लंगोटी और इक छप्पर

समुन्दर के हृदय में बूंद-सा अरमान तो देखो

 

युवा ग़ज़लकार विकास ‘उछालो यूँ नहीं पत्थर( ग़ज़ल संग्रह) तथा बिहार के ग़ज़लकार संपादित संग्रह के साथ बहुत मजबूती से ग़ज़ल की दुनिया में अपना मुकाम बनाने में सफल हुए हैं।उनके कुछ शेर देखें-

करते कहाँ है फोन वो लिखते नहीं हैं खत

थोड़े जो क्या बड़े हुए बेटे मुकर गये

या

ये गरीबी मिसाल है साहब

भूख का डर नज़र नहीं आता

या

सफर की धूप में कितना चले हो

तुम्हारे होंठ पर शबनम नहीं है

 

नज्म सुभाष हिन्दी ग़ज़ल का एक सुपरिचित नाम है।चीखना बेकार है (ग़ज़ल संग्रह) के साथ ग़ज़ल की दुनिया में पदार्पण किया और पाठकों के दिल में उतरते चले गये ।उनके शेर देखें-

सोचिए बगुलों के हक में किन्तु सबके सामने

मुस्कुराकर मछलियों की मेजबानी कीजिए

या

जिस छोटू के खातिर थे कानून तमाम

उसको बरतन अब भी धोना पड़ता है

या

पेट भरता है कहाँ साहब किसी तकरीर से

कुछ तो ऐसा कीजिए जो मिल सके थाली यहाँ

 

मंगल सिंह ‘नाचीज’ की ग़ज़लें और उसका मिज़ाज दोनों अद्भुत हैं।ग़ज़ल लिखना और ग़ज़ल जीते हुए लिखना दोनों अलग बात है।मंगल जी के कुछ शेर देखें-

अंदर जाकर साँस घुटेगी

दीवारों ने समझाया था

या

सच से कहो कि बोरिया-बिस्तर समेट ले

अब लोग चाहते हैं फसाना नया -नया

या

मेरी किस्मत लिखने वाला

खुद हाथ दिखाता फिरता है

 

डॉ सीमा विजयवर्गीय एक उम्दा ग़ज़लकार हैं।इनकी ग़ज़लें सोशल साइट्स और पत्रिकाओं में  छपकर अक्सर ध्यान आकृष्ट करती हैं।शेर देखें –

अपने गमलों में रख लेना थोड़ी खुशबू

तुलसी,बेला ,रात की रानी भूल न जाना

 

डॉ. पंकज कर्ण  साझा संग्रहों और पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपते रहते हैं ।समाजिक सरोकार से लबरेज इनकी ग़ज़लें  आपको अपने पास अवश्य ठिठकायेंगी। शेर देखें –

बिन तोहफ़ा के काम नहीं कर सकता है

दफ्तर का ये बाबू जो सरकारी है

या

जो धूप के सफर में गुजारी है ज़िन्दगी

उसके लिए शजर का भला सायबान क्या

या

चला घर से तो मिट्टी गांव की भी साथ ले आया

यही कुछ सोचकर परदेश में ये काम आयेंगे

 

गरिमा सक्सेना एक बेहतरीन गीतकार, ग़ज़लकार और दोहाकार भी हैं।ये जिस विधा में भी लिखती हैं ,दिल से लिखती हैं।स्वाभाविक है दिल से लिखा दिल तक पहुँचेगा ही।शेर देखें –

लहरें आईं ,छूकर वापस लौट गयीं

कोई रूखापन था शायद साहिल में

या

ठूँठ होकर  भी बूढ़ा वो बरगद

अपनी शाखों पे आसरा देगा

 

वाराणसी से ग़ज़ल साधने में दिन-रात लगी शायरा भावना श्रीवास्तव बहुत कम दिनों में  काफी ख्याति अर्जित की हैं।कुछ नया कहना और सबसे हटकर कहना इनकी खासियत है। इनके कुछ शेर देखें-

बढ़ी है हैसियत  फिर भी मगर क्यों

मेरे अरमान घटते जा रहे हैं

या

तुम्हें उड़ना मुबारक हो फलक पर

जमीं से है मेरा रिश्ता अभी तक

या

गले लगा के करे हर खता मुआफ मेरी

बगैर माँ के भला इतना प्यार कौन करे

 

मनोज एहसास अपनी ग़ज़लों में अलग कहन और तेवर की वज़ह से दूर से पहचाने जाते हैं। प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक इनकी ग़ज़लें  बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं ।कुछ नया कहने की जिद और नए सोच को ग़ज़ल के शिल्प में ढालकर परोसने की कला ही किसी ग़ज़लकार को उसकी जमीन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है ।कहना न होगा कि ये तमाम चीजें मनोज एहसास के पास पूरी मजबूती के साथ हैं। उनकी ग़ज़लों में सामाजिक सरोकार ,युगीन दुश्वारियां और विद्रूपताएं बहुत शिद्दत के साथ उभरकर  सामने आती  हैं। इनके शेर देखें-

तुमने अपने मातम पर भी खर्च किया मोटा पैसा

और किसी निर्धन के घर में मुश्किल से त्यौहार हुआ

या

ऐसे वह अपने चेहरे से सारे दाग छुपा देंगे

कंप्यूटर से बनी हुई उम्दा तस्वीर दिखा देंगे

या

तेरा वादा सबको रोटी देने का है वो मालिक!

चार दिनों से बरस रहे हो ,अब पानी बरसाओ मत

 

समकालीन हिंदी ग़ज़ल में युवा ग़ज़लकारों की बात हो और हम अमन चांदपुरी को भूल जाएँ, यह संभव नहीं है ।अमन चांदपुरी ने बहुत ही कम उम्र में बेहतरीन गजलें कहीं हैं। यह अलग बात है की काल ने अचानक ही इन्हें हमसे छीन लिया ,लेकिन इनकी ग़ज़लें हमेशा- हमेशा के लिए हिंदी गज़ल की दुनिया में दर्ज हो गयी हैं । शेर देखें –

अपनी लाश का बोझ उठाऊँ नामुमकिन

मौत से पहले ही मर जाऊँ नामुमकिन

या

अभी इंसा तो बन पाए नहीं हो

बनोगे आदमी से देवता क्या

 

अमिता अहद एक ऐसे  ग़ज़लकार  हैं जो  अपनी लेखनी के बल पर हमेशा ही सुर्खियों में बने रहते हैं । उनकी कुछ शेर आप देखें –

खुश्क  इतनी यह जमीं कैसे हुई

कर रहा हूं खुद से पल-पल पूछताछ

या

गरीबी आंख में अपनी बड़े सपने नहीं रखती

गरीबों को मकां का बल्ब  भी फानूस लगता है

 

अरविंद उनियाल ‘अनजान’ एक बेहतरीन शायर हैं और उनकी गज़लें आम जनमानस को प्रभावित करने में पूरी तरह सफल है। उनके कुछ शेर देखें-

जो पिछले साल दिखती थी वही इस साल दिखती है

गरीबों की दशा तो आज भी बदहाल दिखती है

या

चिता को अग्नि देना ही ,नहीं बस धर्म बेटे का

दवा बिन खाँसती अम्मा, के कातर स्वर बुलाते हैं

 

अवनीश त्रिपाठी हिंदी ग़ज़ल और गीत में बराबर हस्तक्षेप रखते हैं ।इनकी ग़ज़लें आए दिन पत्र-पत्रिकाओं एवं सोशल साइट पर देखने को मिलती हैं और प्रशंसित होती हैं ।उनके शेर देखें-

हकीकत में बहुत शातिर खिलाड़ी बन गए हो तुम

इशारे पर नचाते गोटियां,झेलें भला कब तक

या

जहां पंछियों का ठिकाना रहा था

खड़ा है कहाँ वह शजर  ढूंढता हूं

 

एम आर चिश्ती बिहार के मुजफ्फरपुर से आते हैं और उन्होंने बिहार प्रार्थना गीत भी लिखा है ।उनकी गज़लें और उनका तरन्नुम दोनों बेमिसाल है। उनके कुछ शेर देखें-

वो सच कहें भी तो उन पर यकीं नहीं होता

भला वह किस लिए बेकार झूठ बोलते हैं

या

कौन चीखा है यहां रात के सन्नाटे में

कौन आया है मेरी नींद उड़ाने के लिए

 

ज्ञानेंद्र पाठक युवा ग़ज़लकार हैं और उनकी ग़ज़लों में जन सरोकार बिना लाउड हुए चुपके से सारी बात कह जाता है ।उनके शेर देखें –

उस आखिरी बुजुर्ग के जाने के बाद फिर

घर के अदब शऊर  बहुत दिन नहीं रहे

या

अंधेरा लाख गहरा हो उजाला आके रहती है

कोई शब रोक सकती है भला सूरज को उगने से

 

दीपक अवस्थी एक बेहतरीन युवा गज़लकार हैं ।उनकी ग़ज़लें देर तक जेहन में विराजमान रहती हैं ।उनके शेर देखें-

सूरज की स्याही से सारे जिंदा लोग

चलता- फिरता साया लिखते रहते हैं

या

हो गए चालाक सारे सांप या फिर दोस्तों

आ गई है कुछ कमी अब आदमी के बीन में

 

देवेश दिक्षित एक बेहतरीन शायर हैं ।उनकी ग़ज़लों में राजनीति का वीभत्स चेहरा  एवं जनसरोकार खुलकर बोलता है। उनके शेर देखें-

सब सियासत वोट की, कोई जिए कोई मरे

कह रहे हैं दास्तां गलियों के पत्थर देखिए

या

कभी बूढ़ी नहीं होती तुम्हारी याद इस घर में

हर इक दीवार पर फोटो तुम्हारे बोल देते हैं

 

नवनीत शर्मा एक बेहद संजीदा युवा ग़ज़लकार हैं। इनकी गज़लों में जन सरोकार पूरी तरह से व्यक्त होता है। उनके शेर देखें-

हवेली से यही फरमान आया

कहूं जैसा तू वैसा कर नहीं तो

या

लहलहाते हैं दर्द के पौधे

इश्क का बाग ,याद माली है

 

मंगल सिंह नाचीज एक बेहद संजीदा युवा शायर हैं, जिनकी गज़लें चापलूस लोगों पर प्रहार करती हैं और गरीबों के हक में बात करती हैं। उनके शेर देखें-

पेट जुमलों से मत भरो साहिब

हाथ को काम चाहिए, है क्या?

या

चाटे नहीं यूँ  तलवे कभी आफताब के

जुगनू से काम शब ने चलाया है उम्र भर

 

शुभम श्रीवास्तव ओम  चर्चित गज़लकार  हैं। ग़ज़ल में पारदर्शिता और जीवन में पारदर्शिता दोनों दो चीजें हैं शुभम  जीवन में पारदर्शिता के हिमायती हैं ।उनके शेर देखें-

निशाने पर न रक्खूंगा किसी को

न शीशा हूँ, न शीशा ढूँढता हूँ

या

झोपड़ी से सिसकियाँ आने लगी हैं

आज लगता है कि फिर फाॅका किया है

 

सज्जन धर्मेंद्र की शायरी आम जनता की शायरी है। उन्हें भोजन की बर्बादी हो या फिर किसी की औकात की बात वे हर जगह अपनी बात बहुत संजीदगी से करते हैं।

इनके शेर देखें-

मौका मिले तो लाँघ ये  जाएँ पहाड़ भी

तीखी ढलान पर न  फिसलती हैं चीटियां

 

जी भर खाओ लेकिन यूं तो मत बर्बाद करो

एक लहू की बूँद जली है हर- इक दाने में

 

सागर आनंद युवा ग़ज़लकारों की दुनिया में एक महत्वपूर्ण नाम है। आदमी के बीच में  जानवर को देखना वाकई बहुत पीड़ादायक है।  सागर आनंद आम आदमी के पक्ष में हमेशा बात करते हैं। जिनको कोई नहीं पूछता यानी  हाशिए जिन पर किसी की नजर नहीं जाती ,वहाँ उनकी नज़र जाती है। एक शायर की नजर वहीं जानी भी चाहिए ।उनके  शेर देखें-

जानवर भी आजकल शरमा  रहे हैं

जानवर- सा बोल आदम बोलता है

या

आपकी यादों में कब से रो रही है जानकी

प्यार वाला प्यार लेकर आइए श्री राम जी

इनके अलावा  सुभाष पाठक जिया, सुमन मिश्रा, आरती कुमारी, अंकुर अनंत, अनामिका पांडेय या अना इलाहाबादी, अनुराग सिंह ऋषि, अभिषेक कुमार अंबर, अर्पित शर्मा अर्पित, असमा सुबहानी, जयनित कुमार मेहता, प्रणव मिश्र तेजस, प्रवीण कुमार मकवाणा,  पुष्पेंद्र पुष्प,मेहबूब सोनालिया, विकास प्रताप वर्मा, विजय राही, विवेक बिजनौरी, सरगम अग्रवाल, चाँदनी समर जैसे कई महत्वपूर्ण नाम हैं, जो लगातार हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।