विशिष्ट ग़ज़लकार :: सुरेश मेहर

सुरेश मेहर की छह ग़ज़लें

 

1

वो भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते

पैरवी सच की ये अख़बार नहीं कर सकते

 

मेरे दुश्मन ही ने की होगी हिमाक़त ऐसी

दोस्त सीने पे मेरे वार नहीं कर सकते

 

क्यों मेरी बात को तुम मान नहीं लेते हो

तुम हवाओं को गिरफ़्तार नहीं कर सकते

 

भूख़ मँहगाई ग़रीबी नहीं मिट पाएँगी

यानी बाबा ये चमत्कार नहीं कर सकते

 

गुलमुहर देखते रहते हैं झरोखों से तुम्हें

ऐसी गुस्ताख़ी तो कचनार नहीं कर सकते

 

कौन कह सकता है क्या होना है अगले पल में

आप ख़ुद को भी ख़बरदार नहीं कर सकते

 

आसमाँ ओढ़ लिया मैंने बिछाकर धरती

मुझको बेघर दरो दीवार नहीं कर सकते

 

अपने अंदर तुम्हें इक चीख बनानी होगी

मरती ख़ामोशी से यलग़ार नहीं कर सकते

 

मुझे अब उनके मुताबिक नज़र आना होगा

मुझे मुझ जैसा वो स्वीकार नहीं कर सकते

 

2

क्या हुआ गर ये मुहब्बत यहीं रोपी गई है

उसके आँगन में भी इस पेड़ की टहनी गई है

 

और भला किसके लिए अग्नि परीक्षाएँ हैं

बीती सदियों से बस औरत ही तो परखी गई है

 

सिल चुके होंठों से भी रीढ़ को सीधा रखकर

वो जो कहनी न थी वो बात भी कह दी गई है

 

आप गर चाहें तो कुछ घूम के जा सकते हैं

वैसे पगडंडी मेरे गांव को सीधी गई है

 

लेना देना ही न था जिससे मेरा कुछ भी

अब मेरे पाले में वो गेंद भी फेंकी गई है

 

फ़ख़्र की बात तो यह है कि पड़ा है छापा

और उस पर ये कि इक चोरी भी पकड़ी गई है

 

अब तो बस राह में रुककर कहीं मूतेंगे हुज़ूर

पान की पीक से दीवार तो सज ही गई है

3

तीर सारे तुणीर हो गए हैं

तेरी अँखियो का नीर हो गए हैं

 

गीत तुम पर लिखे थे जो मैंने

हल्दी अक्षत अबीर हो गए हैं

 

जबसे पत्थर हुआ है दिल मेरा

अक्स तेरे लकीर हो गए हैं

 

लफ़्ज़ मीरा हुए हैं मेरे सब

और मिसरे कबीर हो गए हैं

 

वो भी कुछ कुछ हुई है रांझा, सो

हम भी थोड़े से हीर हो गए हैं

 

कृष्ण की लौ में देवता सारे

पेड़ पौधे अहीर हो गए हैं

 

इन दृगों का नहीं है दोष कोई

तुमसे मिलकर अधीर हो गए हैं

 

वो भी लगने लगी है काया सी

हम भी कुछ कुछ शरीर हो गए हैं

4

लड़खड़ाने के दिन थे खड़े हो गए

मुफ़लिसी थी सो बच्चे बड़े हो गए

 

नफ़रतों की हवाएँ कुछ ऐसी चलीं

बस्तियों में धड़े ही धड़े हो गए

 

कोई तो पूछे आकर कि क्या बात है

कितने दिन हमको ज़िद पर अड़े हो गए

 

दरमियाँ दूरियाँ तो नहीं आ गईं

कितने दिन उसको मुझसे लड़े हो गए

 

मेरे भी कानों पर जूँ नहीं रेंगती

और अब तुम भी चिकने घड़े हो गए

 

वक़्त बदला हमारा तो यूँ भी हुआ

नर्म लहजे थे जो वो कड़े हो गए

 

ज़िन्दगी की सड़क ! तुझपे चलते हुए

हम गिरे फिर गिरे पर खड़े हो गए

5

न कह कि ख़ामुशी कोई विराम है यति है

ये बस बवंडरों के आगमन की पद्धति है

 

फिर अपने बच्चों को माँयें शिविर में ढूँढेंगी

तमाम युद्धों की बस एक जैसी परिणति है

 

ये ठीक है कि ये छोटी सी बात है लेकिन

विरोध दर्ज़ न करना भी मूक सहमति है

 

ये योगियों की धरा है मगर यहाँ केवल

हर एक जोड़े में  इक कामदेव है रति है

 

ख़ामोशी आपकी गूँगा न कर दे लोगों को

न सोचिए कि ये क्षति कोई व्यक्तिगत क्षति है

6

एक दो थोड़ी हैं बाज़ार बनाने वाले

हर तरफ़ बैठे हैं सरकार बनाने वाले

 

रोज़ मँझधार से दो चार हुआ करते हैं

अपने हाथों को ही पतवार बनाने वाले

 

अब भी उम्मीद है अब भी यही लगता है मुझे

सच लिखेंगे कभी अख़बार बनाने वाले

 

भोथरी दुनिया में मज़बूर हैं रहने के लिए

चाकुओं छुरियों पे ये धार बनाने वाले

 

ख़ुद को लिखते हैं कहानी में कहानी होकर

ख़ुद ही किरदार हैं किरदार बनाने वाले

 

औरतें पूछेंगीं इतवारों के बारे में अगर

बग़लें झाँकेंगे ये इतवार बनाने वाले

 

जाने क्या क्या है बनाने के लिए दुनिया में

जान पाते कभी हथियार बनाने वाले

 

मज़हबी नारों पे आख़िर ये उठेंगे कैसे

हाथ ठहरे मेरे घर बार बनाने वाले

 

आईनों से कोई उम्मीद न कीजै सच की

ये भी होते हैं अदाकार बनाने वाले

 

इतना आसाँ नहीं होता है बनाना कुछ भी

थोड़े मिट जाते हैं हर बार बनाने वाले

 

पुल बनाने में मुझे कितना सुकूँ मिलता है

कैसे समझेंगे ये दीवार बनाने वाले

 

एक तितली की मुहब्बत पे लिखेंगे सब कुछ

काग़ज़ों पे यूँ ही कचनार बनाने वाले

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परिचय :: सुदेश कुमार मेहर की आठ ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित है. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतन प्रकाशन. राष्ट्रीय  स्तर पर भारतीय रेल के राजभाषा का मैथिलीशरण गुप्त प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत

सम्पर्क – 11, शुभ विहार कॉलोनी , शिवानंद नगर , सैक्टर-3, रायपुर छत्तीसगढ़ -492008

मोबाइल: 9752442906

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