ख़ास कलम :: हेमा सिंह

हेमा सिंह की चार कविताएं

 

नारी

त्याग पथ पर मैं चली थी

ममता की मूरत बनी थी।

दीवारों में बंद मैं थी

कामिनी ही मैं बनी थी।

बात है बरसों पुरानी

आ गया है वक्त भारी।

आज जग की शान मैं हूं

मान और सम्मान मैं हूं।

घर की इज्जत ही नहीं

मैं पीटी उषा भी बनी हूं।

करुणा की देवी बनी थी

आंखें आजीवन भरी थी।

आह भी मैंने भरी थी

खामोशी मेरी कमी थी।

किंतु अब स्वच्छंद मैं हूं

भावना कमल मुख बंद मैं हूं।

त्याग की मूरत भी मैं हूं

दामिनी देवी भी मैं हूं।

 

सौ सौ बार विचार करो

नारी को बेचारी कहने से पहले

मन में अपने सौ-सौ बार विचार करो!

नारी भी तो जग में कीर्तिमान गढ़े,

नारी से ही वंश और परिवार बढ़े।

अबला कहने से पहले यह सोचो तो,

चिंतन के धुंधले दर्पण को पोछो तो।

नारी कोमल भावों की अधिनायक है,

सहनशील हर भाँति वफा के लायक है।

धैर्यशील पर अब मत अत्याचार करो,

मन में अपने सौ-सौ बार विचार करो!

नारी के जाए ही उस पर तंज करे,

नारी को छलते गरिमा को भंग करे।

सोचा कभी जलाई जाती बेटी क्यों

सोचा कभी सताई जाती बेटी क्यों?

शादी का बंधन पवित्र प्यारा नाता,

तुम दहेज को मांग नहीं व्यापार करो!

माना पुरुष प्रधान संस्कृति ही गढ़ी गई,

और विश्व में यही सूक्ति बस पढ़ी गई।

त्याग और बलिदान लुटाती भूल गए,

चंद पुराने जुमलों में ही सिमट गए।

कुल की गरिमा गढ़ती उसे दुलार करो

मन में अपने सौ-सौ बार विचार करो!

 

उस रोज

हम आज प्रिय तेरे हैं प्रीति है

उस रोज न जाने क्या होगा !

तन आज हमारा है मधुवन

सुबास भरा यह है चितवन !

कल मधुवन जब पतझड़ होगा

तन बास भरा ढलता होगा

उस रोज न जाने क्या होगा !

तुम आज हमारे हो अली तुम

पतझड़ में हमारा क्या होगा ?

अभी अश्रु हमारे हैं मोती

जिसे देख असीम पीड़ा होती!

जब अविरल यह बहता होगा

यह कपोल सूर्ख कहता होगा

तब कौन मेरा आंचल होगा !

प्रिय आज हमारे हो प्रियतम

रसहीन ज़माना क्या होगा !

 

अश्कों की बरसात

तुम से केवल नफ़रत की सौगात मिली,

और मुझे बस अश्कों की बरसात मिली।

जब-जब कुछ मांगा हमने इस दुनियां से,

बदले में बस धोखों की खैरात मिली।

हासिल हो तुमको दुनियां भर की खुशियां,

मुझको तो इस दुनियां से आघात मिली।

अश्क न मेरे पोंछो इनको बहने दो,

आंसू की तो किस्मत में बारात मिली।

चले गए हो तो अब वापस मत आना,

‘हेमा’ को तन्हाई की हर रात मिली।

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परिचय : हेमा सिंह का कई साझा संकलन प्रकाशित, निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन, दूरदर्शन से कविताओं का नियमित प्रसारण, विभिन्न साहित्यिक मंचों से सम्मान

संप्रति : शिक्षिका

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